पहली जनवरी 2017 को समाजवादी पार्टी (सपा) का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के करीब छह साल बाद 8 दिसंबर को वह मौका आया जब अखिलेश यादव अपने पैतृक गांव सैफई में चुनावी जीत का जश्न मना रहे थे. पिता मुलायम सिंह यादव के देहांत के बाद मैनपुरी में हुए लोकसभा उपचुनाव में ससुर की विरासत संभालने अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव सपा उम्मीदवार के रूप में मैदान में थीं.
तरफ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कभी मुलायम के शिष्य रहे रघुराज शाक्य को चुनाव में उतारा था. 8 दिसंबर को वोटों की गिनती शुरू होते ही लखनऊ में मौजूद अखिलेश यादव सैफई के लिए निकल पड़े. जैसे-जैसे दिन बीतता गया सैफई में मौजूद मुलायम सिंह यादव की कोठी के बाहर जश्न मनाने के लिए सपा कार्यकर्ताओं की भीड़ बढ़ती गई. उपचुनाव के दौरान सारी कटुता मिटाकर अखिलेश के साथ आए चाचा शिवपाल यादव ने भी सैफई में अपनी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पाटी (लोहिया) का सपा में विलय का ऐलान कर दिया.
मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के साथ खतौली विधानसभा उपचुनाव में सपा की जीत के साथ यूपी की राजनीति में नए बदलाव का भी सूत्रपात होता लग रहा है. मैनपुरी में सपा के नेता मनोज पाल कहते हैं, ''मैनपुरी के साथ खतौली उपचुनाव में सपा की जीत अखिलेश यादव, शिवपाल यादव, आजम खान और राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी के बीच संबंध को प्रगाढ़ करेगी जिससे सपा अब और मजबूत विपक्ष बनेगी.’’
सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक अखाड़ा रही मैनपुरी लोकसभा सीट ने वैसे तो उपचुनाव समेत कुल 21 चुनाव देखे लेकिन 2022 का उपचुनाव कई मायनों में अनूठा था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत सत्तारूढ़ दल भाजपा के करीब सभी बड़े नेता मैनपुरी में चुनाव प्रचार में उतरे थे. वहीं दूसरी ओर मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत बचाने के लिए अखिलेश समेत सपा के दिग्गज नेता भी गली-गली वोट मांग रहे थे.
अंत में मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव में डिंपल की जीत ने वह परंपरा बरकरार रखी जिसमें मुलायम सिंह के राजनीतिक उदय के बाद मैनपुरी में कोई दूसरा दल चुनाव नहीं जीत पाया. साथ ही इस जीत ने मैनपुरी लोकसभा सीट से किसी महिला को अबतक जीत न मिलने का मिथक भी तोड़ा है.
खतौली विधानसभा सीट पर रालोद हमेशा सैनी उम्मीदवार पर दांव लगाती रही थी लेकिन इस उपचुनाव में रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी ने गुर्जर जाति के उम्मीदवार मदन भैया को उतार कर ऐसा जातिगत चक्रव्यूह रचा जिसे भेद पाने में भाजपा सफल न हो सकी. इस सीट पर जाट-गुर्जर-मुस्लिम वोटर की जुगलबंदी भाजपा के सैनी उम्मीदवार पर भारी पड़ी.
नतीजा भाजपा को विधानसभा चुनाव में जीती सीट गंवानी पड़ी. खतौली सीट गंवाने की भरपाई भाजपा ने सपा के वरिष्ठ नेता आजम खां की परंपरागत सीट जीत कर की है. भाजपा उम्मीदवार आकाश सक्सेना ने सपा उम्मीदवार आसिम रजा को हराकर पहली बार रामपुर विधानसभा में कमल खिलाया है. आजम को कोर्ट से सजा मिलने के बाद खाली हुई रामपुर विधानसभा सीट को जीतने के लिए भाजपा ने पूरा जोर लगा दिया था.
आसिम को टिकट मिलने से नाराज आजम के बेहद करीबी रहे फसाहत अली खां उर्फ शानू ने अपने कई समर्थकों के साथ भाजपा का दामन थाम लिया था. स्थानीय मुस्लिम मतदाताओं पर खासी पकड़ रखने वाले शानू के समर्थन ने भाजपा उम्मीदवार आकाश सक्सेना की दावेदारी मजबूत कर दी थी. इसका नतीजा रामपुर विधानसभा सीट पर भाजपा की जीत के रूप में सामने आया. यह पहला मौका है जब भाजपा का रामपुर लोकसभा सीट के साथ विधानसभा सीट पर भी कब्जा हुआ है.

