
भारत से गाड़ी से घंटे भर की दूरी पर नवसारी में चुनावी रैली स्थल पर बड़ी संख्या में लोग जमा हैं. सभी ने भगवा रंग की गांधी टोपी पहनी हुई है, जिस पर भाजपा अंकित है; कई लोगों ने प्रधानमंत्री के चेहरे वाले कार्डबोर्ड कटआउट थाम रखे हैं और लोगों को आकर्षित कर रहे हैं. कार्यक्रम स्थल के पास हवा में नरेंद्र मोदी का हेलिकॉप्टर नजर आता है और भीड़ उत्साह में चिल्लाने लगती है.
जब मोदी ने उनका अभिवादन करने के लिए मंच पर कदम रखा तो ''मोदी, मोदी, मोदी,’’ की आवाज गगनभेदी हो गई. नरेंद्र मोदी को देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के लिए मुख्यमंत्री का पद छोड़े करीब नौ साल हो गए हैं लेकिन गुजरात में उनका स्वागत उसी आदर और स्नेह से होता है, जैसा कि रिकॉर्ड साढ़े बारह साल के लिए राज्य के मुखिया रहने के दौरान किया जाता था. मोदी ने उनमें गुजराती अस्मिता जैसी दुर्लभ भावना जगाई है. उनकी पार्टी 1995 के बाद से राज्य के चुनावों में अपराजेय है; 2002 से वह मोदी और गुजरात के अद्भुत संगम से प्लावित है.
मोदी ने लोगों से भाजपा के चुनाव अभियान के नारे 'आ गुजरात, मैं बनव्यु छे’ (इस गुजरात को मैंने बनाया है) को दोहराने के लिए नहीं कहा. लेकिन, अपने संबोधन में, उन्होंने लोगों को यह याद दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि कैसे उन्होंने यह तय किया कि केंद्र और राज्य दोनों में मौजूद भाजपा सरकारें, इस शहर में विकास की प्रमुख योजनाएं लेकर आएं. स्थानीय गुजराती में धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने अपनी बातें इतने सधे तरीके से रखीं कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए.
उन्होंने वे सब विशेष कार्य गिनाए जो उन्होंने इस क्षेत्र के लिए किए हैं. इसके बाद उन्होंने एक व्यक्तिगत अनुरोध किया—गांवों-कस्बों के मतदाताओं के घरों में जाइए और उनसे मतदान करने के लिए कहिए. उन्होंने कहा, ''इसे तीर्थयात्रा या पवित्र कार्य की तरह लें. भाजपा के किए अच्छे कार्यों की चर्चा करें और उन्हें मतदान के दिन बाहर निकलने और मतदान करने के लिए कहें. लेकिन मुझ पर एक व्यक्तिगत उपकार भी करो, क्या आप करोगे? लोगों को जाकर बताओ कि हमारे नरेंद्रभाई नवसारी आए थे और उन्हें मेरा प्रणाम भी कहना.’’
यह सुनते ही भीड़ जोश में आ गई और सबने हां में जवाब दिया. उत्साहित होकर, मोदी ने आगे कहा, ''उन्हें बताएं कि उनका वोट मेरे लिए उनका आशीर्वाद होगा जो मुझे देश के लिए किए गए अच्छे काम को आगे जारी रखने की अनुमति देगा.’’ भगवा साड़ी, टोपी और दुपट्टे में सजीं, आगे की पंक्ति में बैठीं एक भाजपा कार्यकर्ता मेघना अमदावादी वहां उपस्थित सभी लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. वे कहती हैं, ''हम नरेंद्रभाई को एक पिता के रूप में नहीं बल्कि अपने बड़े भाई के रूप में देखते हैं जिनसे हम अपनी परेशानियों को साझा कर सकते हैं और वे भी परिवार के सदस्य की तरह हमारी हर तरह से मदद करते हैं. उन्हें हमेशा हमारा वोट मिलेगा.’’
गुजरात में दो चरणों में मतदान होने हैं—1 और 5 दिसंबर को—और इसमें कोई संदेह नहीं है कि नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए चुनाव के नतीजे तय करने में एक निर्णायक कारक होंगे. वे लगातार पार्टी के ट्रंप कार्ड बने हुए हैं. भाजपा गुजरात में पिछले 27 वर्षों से सत्ता में है. पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा ऐंटी-इनकंबेंसी या सत्ता विरोधी रुझान है, और पार्टी अपना गढ़ बचाने के लिए दोगुनी मेहनत कर रही है.
लेकिन, जैसा कि राजनैतिक विश्लेषक घनश्याम शाह बताते हैं, ''गुजराती अस्मिता और विकास की बात अब मतदाताओं को उतना नहीं लुभा पा रही, जैसा कि वह करती थी. लेकिन एकमात्र कारक जो अभी भी वैसा ही मजबूत दिखता है वह मोदी का करिश्मा है, जो भाजपा को फिर से चुनाव जीतने में सक्षम बनाएगा.’’ यह वास्तव में उल्लेखनीय होगा क्योंकि 2017 में भी, जब कांग्रेस ने भाजपा के सामने एक कठिन चुनौती पेश की, फिर भी पार्टी कम बहुमत से ही सही पर जीतने में कामयाब रही तो इसके पीछे सबसे मुख्य कारक मोदी ही थे.
वर्षों से, कांग्रेस राज्य में भाजपा की प्राथमिक चुनौती बनी हुई है. इसलिए, राज्य में विधानसभा चुनाव दोध्रुवीय मुकाबले रहे हैं. हालांकि, इस बार अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) के लिए रुझान बढ़ रहा है. यानी पहली बार ज्यादातर सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला होने की उम्मीद है. अक्तूबर में लोकनीति-सीएसडीएस और इस महीने सी-वोटर के जनमत सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि आप पार्टी भाजपा के बजाए कांग्रेस के वोट ज्यादा काट रही है.

2017 में, भाजपा ने 49.1 प्रतिशत और कांग्रेस ने 41.4 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे. दोनों सर्वेक्षणों में आप को तीसरी ताकत के रूप में उभरता हुआ बताया गया है और उसे 20 से 25 फीसद वोट मिलने की संभावना है. हालांकि, उसके ज्यादातर वोट कांग्रेस के खाते के होंगे जिसके इन चुनावों में गिरकर लगभग 25 फीसद रह जाने की उम्मीद है. भाजपा का वोट शेयर भी गिरेगा, लेकिन ज्यादा गिरावट नहीं होगी और इसके 45 फीसद से ऊपर रहने की उक्वमीद है.
इसलिए, चुनावी पंडितों का अनुमान है कि त्रिकोणीय मुकाबले के परिणामस्वरूप भाजपा की निर्णायक जीत हो सकती है क्योंकि अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में विपक्षी वोट विभाजित होंगे. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, जिन्होंने भाजपा के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार किया है, इंडिया टुडे को आत्मविश्वास के साथ बताते हैं, ''मेरे शब्दों पर ध्यान दें, हम राज्य में ऐतिहासिक जीत दर्ज करेंगे. इस बार की जीत हमारे पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ देगी.’’ हालांकि उन्होंने संख्या बताने से इनकार करते हुए कहा कि अभियान के दूसरे चरण के शुरू होने के बाद ही चीजें स्पष्ट होंगी.
सी-वोटर के सर्वे ने भाजपा को कुल 182 सीटों में से 131 से 139 सीटें दी हैं, जो 2017 में पार्टी द्वारा जीती गई 99 सीटों से उल्लेखनीय वृद्धि है. कांग्रेस की सीटों के घटकर आधा हो जाने की उम्मीद जताई गई है और यह 2017 के 77 सीटों से घटकर 31-39 के बीच सिमट जाएगी. आप के 7-15 सीटों के साथ गुजरात विधानसभा में पदार्पण करने की उम्मीद है. हालांकि, भाजपा इस बार न केवल 2002 में मिली 127 सीटों के अपने उच्चतम आंकड़े को पार करने की उम्मीद कर रही है, बल्कि 1985 में माधवसिंह सोलंकी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा 149 सीटें जीतने वाले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ने की उम्मीद कर रही है.
मोदी का तूफानी प्रचार
उत्साहजनक भविष्यवाणियों के बावजूद, मोदी प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. 3 नवंबर को चुनाव की घोषणा के बाद से ही वे पूरे गुजरात में लगभग हर दिन रैलियां और रोड शो कर रहे हैं. मोदी के लिए, गुजरात चुनाव केवल प्रतिष्ठा की लड़ाई ही नहीं है, बल्कि उसके परिणाम 2024 के आम चुनाव के लिए उत्साहजनक माहौल बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. वे जवाहरलाल नेहरू के बाद ऐसे दूसरे प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद कर रहे हैं जिसे केंद्र में लगातार तीसरा कार्यकाल मिल सकेगा.
पिछले आठ वर्षों में भाजपा के सितारे बुलंद रहे हैं. इसका एक कारण यह है कि मतदाताओं ने मोदी को एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में देखा है, जो हिंदुत्व समर्थक होने के साथ-साथ विकास समर्थक भी हैं और जिन्होंने शासन में विकास के प्रति सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाया है. केंद्र में पहुंचने से पहले गुजरात उनके लिए प्रयोगशाला बनी और उसने उनके अभूतपूर्व और ऐतिहासिक शिखर पर पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसलिए, मोदी को गुजरात केवल जीतना नहीं है, बल्कि बड़े फासले से जीत हासिल करनी है.
प्रधानमंत्री इन अनिवार्यताओं को बखूबी समझते हैं और इसलिए उन्होंने गुजरात चुनाव की तैयारी खुद उनकी अपनी पार्टी और प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के शुरू होने से बहुत पहले से शुरू कर दी थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ मिलकर एक चुनावी रणनीति बनाने के बाद, उन्होंने जमीनी स्तर पर नजर बनाकर रखी है. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री और उनकी टीम ने ऐसे पांच प्रमुख मुद्दों की पहचान की, जो भाजपा का खेल खराब कर सकते हैं. सत्ता-विरोधी रुझान और हाल के वर्षों में कुछ वर्गों के बीच बढ़ रहा आंतरिक असंतोष इस सूची में सबसे ऊपर था.
दूसरी महंगाई और बेरोजगारी थी, जो कोविड महामारी और देश की अर्थव्यवस्था के खराब प्रदर्शन के कारण बहुत अधिक बढ़ गई थी. तीसरा था कांग्रेस पर नकेल कसके उसे बेअसर करना, जिसने 2017 में अपने उत्साही अभियान से भाजपा को चौंका दिया था और 77 सीटें जीती थीं, जो 1995 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन था. चौथा विभिन्न जाति समूहों और विशेष रूप से पाटीदारों के बीच उपेक्षा या पूर्वाग्रह की किसी भी भावना को खत्म करना क्योंकि पाटीदारों के विद्रोह ने ही 2017 में कांग्रेस को उसके ढाई दशक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तक पहुंचाया था.

पांचवां, आप और उसके संयोजक केजरीवाल द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए बहुत-सी सुविधाओं को मुफ्त करने की घोषणाओं के कारण पैदा हो रही चुनौती से निपटना था जिसे मोदी ने 'रेवड़ी’ संस्कृति का नाम दिया था. आप की चुनौती उसके लिए दोधारी तलवार साबित हो सकती है. विपक्षी वोटों के विभाजन से भाजपा को अधिक संख्या में सीटें हासिल करने में मदद मिल सकती है. लेकिन यह एक अन्य बड़ी ताकत के रूप में भी उभर सकती है और 2027 में गुजरात में वही कमाल कर सकती है जो उसने पंजाब में किया. इस साल पंजाब में आप पार्टी ने अपना दूसरा चुनाव लड़ा और विरोधियों को धूल चटाते हुए प्रचंड बहुमत हासिल किया है.
इस साल के चुनावों के लिए मोदी ने काफी पहले, जुलाई 2021 में ही, भाजपा की शानदार जीत के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी थी. इस दिशा में पहला कदम राज्य में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) मतदाताओं को लुभाने के लिए केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल था. राज्य की कुल आबादी में 37 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ ओबीसी की संख्या सबसे अधिक है और वे 90 सीटों पर परिणाम को प्रभावित करते हैं.
इसलिए मध्य गुजरात के आणंद जिले से देवसिंह चौहान, सूरत से दर्शना जरदोश और सौराष्ट्र के सुरेंद्रनगर से डॉ. महेंद्र मुंजपारा जैसे ओबीसी नेताओं को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. भाजपा ने 2017 में आणंद और सुरेंद्रनगर जिलों में खराब प्रदर्शन किया था और वहां से क्रमश: सात सीटों में से केवल दो और पांच में से एक सीट जीती थी.
दो महीने बाद, सितंबर 2021 में, भाजपा ने अपना जाति अंकगणित दुरुस्त करने और सत्ता विरोधी चिंताओं को दूर करने के प्रयास में, तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उनके मंत्रिमंडल को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. रूपाणी की जगह भूपेंद्र पटेल ने ले ली, जिन्होंने इससे पहले कभी मंत्री पद भी नहीं संभाला था, लेकिन अहमदाबाद में एक नगरपालिका पार्षद के रूप में बहुत लोकप्रिय रहे थे.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे पाटीदार हैं और उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर 2017 में पार्टी के खिलाफ विद्रोह करने वाले पाटीदार समुदाय के असंतुष्ट तत्वों को पार्टी ने एक बड़ा संकेत दिया था. मोदी ने कहा है कि अगर भाजपा जीतती है तो पटेल ही फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे. पार्टी इस जाति समूह से अपने पक्ष में बड़े पैमाने पर वोटों की उम्मीद कर रही है, जो आबादी का 16 प्रतिशत है और 20-30 सीटों के परिणाम को प्रभावित कर सकता है.
इसके साथ ही भाजपा ने अपने मौजूदा विधायकों से किनारा कर लिया है. रूपाणी और नितिन पटेल, प्रदीपसिंह जडेजा और भूपेंद्रसिंह चुडासमा जैसे कई ताकतवर मंत्रियों समेत 42 मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया गया है. इससे बड़े पैमाने पर नाराजगी भी देखी गई और 49 सीटों पर पार्टी को खुले विरोध का सामना करना पड़ा है. कुछ नेताओं ने विद्रोह भी कर दिया है और पार्टी के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं.
इससे भाजपा को 12 नेताओं को पार्टी से निष्कासित करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस विद्रोह को फिलहाल काफी हद तक इस वादे के साथ दबा दिया गया है कि जिन लोगों को चुनाव में मौका नहीं मिला उन्हें निगमों या सार्वजनिक उपक्रमों में अच्छे पद दिए जाएंगे. कई मामलों में, पार्टी ने अपने प्रत्याशियों को उस क्षेत्र के पुराने दिग्गजों को पूरा सम्मान देने और उन्हें प्रत्याशी के साथ चुनाव प्रचार में शामिल होने को राजी किया है ताकि उनके समर्थकों को शांत और संतुष्ट रखा जा सके.
कांग्रेस की घेराबंदी
कांग्रेस को रोकने के लिए भाजपा ने सूझबूझ के साथ कदम बढ़ाए हैं. 2017 में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ी वजह हार्दिक पटेल द्वारा चलाया गया पाटीदार आरक्षण आंदोलन था, जिसने पाटीदार युवाओं को भाजपा के खिलाफ खड़ा कर दिया था. वह असंतोष सत्ता-विरोधी भावना में बदल गया और इससे भाजपा ने अपने हिस्से के 30 प्रतिशत से अधिक पटेल वोट गंवा दिए. चुनाव के बाद, कांग्रेस ने हार्दिक पटेल को राज्य इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था, लेकिन वे जल्द ही पार्टी के रवैये से चिढ़ने लगे.

अपने काडरों की नाराजगी का जोखिम उठाते हुए, भाजपा ने हार्दिक पटेल को पार्टी में शामिल करा लिया और फिर उन्हें उनके गृहनगर वीरमगाम के आसपास की मुट्ठी भर सीटों तक सीमित करके उनके प्रभाव को बेअसर कर दिया. हार्दिक वीरमगाम सीट से चुनाव भी लड़ रहे हैं. इसके साथ ही, भाजपा ने कांग्रेस के अन्य विधायकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया और उन्हें लुभाकर अपने पाले में लाना शुरू किया.
दलबदल करने वाले 20 कांग्रेसियों में से छह पटेल समुदाय के हैं और बाकी विभिन्न ओबीसी समुदायों के हैं. उनमें अल्पेश ठाकोर भी हैं, जिन्होंने 2017 में ओबीसी मतदाताओं को कांग्रेस के साथ लाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी. पटेल समुदाय के युवा 2015 में, आरक्षण के लिए जिस पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के तहत एकजुट हुए थे, वह हालांकि आधिकारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है लेकिन व्यावहारिक रूप से निष्क्रिय है.
कांग्रेस ने एक व्यापारी और शक्तिशाली श्री खोडलधाम मंदिर ट्रस्ट (एसकेटीटी), जिसका मुख्यालय राजकोट में है, के संस्थापक ट्रस्टी नरेश पटेल को अपने पाले में लाकर पलटवार की कोशिश की. राज्य के कुल पाटीदारों में से 80 प्रतिशत लेउवा पटेल हैं. उनकी खोडियार माता के प्रति बड़ी निष्ठा है और खोडलधाम मंदिर एक शक्तिशाली राजनैतिक धुरी के रूप में उभरा है. जनवरी में नरेश पटेल ने आखिरकार राजनीति में आने की इच्छा जताई और सूत्रों के मुताबिक वे कांग्रेस में लगभग शामिल हो चुके थे.
लेकिन बाद में उन्होंने यह घोषणा की कि यह राजनीति में सक्रिय होने का ''सही समय नहीं है.’’ दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह घोषणा कथित तौर पर मोदी से मुलाकात के बाद की. इस बीच, भाजपा ने एसकेटीटी के दूसरे सबसे शक्तिशाली सदस्य रमेश तिलारा को, भाजपा के पूर्व मंत्री गोविंद पटेल की इच्छाओं के विरुद्ध राजकोट (दक्षिण) सीट से चुनाव मैदान में उतारा. गोविंद पटेल ने पिछले चुनाव में यह सीट बड़े आराम से जीती थी.
गुजरात में कांग्रेस की रणनीति पहेली बनी हुई है. 2017 में 77 सीटें जीतने के बावजूद, यह विधानसभा की कार्यवाहियों में या बाद के स्थानीय चुनावों में एक जोरदार विपक्ष की भूमिका निभाने में विफल रहा और इससे उसके समर्थकों में बड़ी निराशा हुई. अपनी जड़ें मजबूत करने के बजाए, उसने अपनी चुनावी जमीन आप को सौंप दी जिसने सूरत नगरपालिका चुनावों में 120 में से 27 सीटें जीत लीं. विधानसभा चुनावों की रणनीति राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर छोड़ दी गई है, जिन्होंने 2017 में कांग्रेस के प्रभावशाली प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
पिछले चुनाव में राहुल गांधी ने गुजरात अभियान का नेतृत्व किया था और राज्य में बड़े पैमाने पर प्रचार किया था. इस बार उन्होंने अपनी भारत जोड़ो यात्रा को जारी रखना पसंद किया, जिसमें गुजरात शामिल नहीं है. आखिरकार वे दो रैलियों को संबोधित करने के लिए तैयार हो गए—एक सूरत के पास अनावल में और दूसरी राजकोट में. आदिवासियों के दबदबे वाले शहर अनावल में राहुल को सुनने के लिए उमड़ी भीड़ से कांग्रेस के लिए समर्थन स्पष्ट दिख रहा था. लेकिन राहुल गांधी ने वहां ज्यादातर समय अपनी यात्रा के उद्देश्यों के बारे में बात करने में बिताया, प्रमुख आदिवासी मुद्दों को संबोधित करने पर कम.
राहुल के साथ एक परेशानी यह भी है कि वे गुजराती नहीं बोल पाते, और मोदी गुजराती बोलकर जनता के साथ एक स्वाभाविक जुड़ाव स्थापित कर लेते हैं. जब राहुल ने अपने भाषण में नदियों को जोड़ने वाली परियोजना के तहत पार-तापी-नर्मदा परियोजना के लिए आदिवासियों की भूमि के संभावित अधिग्रहण की आशंकाओं का जिक्र किया, तभी उन्हें सबसे अधिक सराहना मिली.
आदिवासी भाजपा का विरोध अपनी इस आशंका के कारण करते हैं कि पार्टी शहरी विकास के नाम पर उनके जल, जंगल और जमीन पर कब्जा करके कॉर्पोरेट्स को सौंप देगी. 2017 में, भाजपा ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 27 सीटों में से सिर्फ नौ सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस को सबसे ज्यादा 15 सीटें मिलीं, बाकी अन्य पार्टियों के खाते में गईं.
इस बार, भाजपा ने आदिवासियों को आश्वासन दिया है कि नदी-जोड़ो परियोजना को रोक दिया गया है. मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि कैसे उनकी सरकार ने आदिवासियों के प्रतीक बिरसा मुंडा के योगदानों को पहचानते हुए उन्हें जोर-शोर से फैलाया है. इस बीच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध संस्था जनजाति कल्याण आश्रम ने राज्य के 14 आदिवासी जिलों में अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं. हालांकि, चुनाव विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस चुनाव में भी आदिवासियों का समर्थन कांग्रेस को जारी रहेगा.
आरएसएस, जिसकी तालुका स्तर पर 1,334 दैनिक शाखाएं लगती हैं, समरस गांव के माध्यम से गांवों में दलित समुदायों तक पहुंचने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है. पिछले एक साल में, 1,000 गांवों में समरस यज्ञ आयोजित किए गए हैं, जिसमें सभी समुदाय एक साथ बैठते हैं. आरएसएस इस मौके का इस्तेमाल अपने एक गांव, एक कुआं, एक श्मशान के नारे को आगे बढ़ाने के लिए भी कर रहा है. यह अलग बात है कि राज्य में हाल में हुई उत्पीड़न की कई घटनाओं से दलितों में खासी नाराजगी है. भाजपा ने इसे शांत करने की कई कोशिशें की हैं, मगर दलित वोटों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
हालांकि, भले ही कांग्रेस का चुनावी अभियान अपेक्षाकृत सुस्त नजर आता है, लेकिन भाजपा को डर है कि वह जमीनी स्तर पर चुपचाप काम कर रही है और मोदी ने कार्यकर्ताओं को अपने संबोधनों में इसको लेकर आगाह भी किया है. एक अन्य भाजपा नेता का कहना है कि कांग्रेस सोलंकी द्वारा तैयार उसी केएचएएम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम) फॉर्मूले पर काम कर रही है जिसने उसे रिकॉर्ड जनादेश दिलाया था. कांग्रेस ने खासकर गांवों में छोटी-छोटी बैठकों और नुक्कड़ सभाओं पर अपना ध्यान लगाया है.
उधर, भाजपा को मजबूत होती आप पार्टी से भी जूझना पड़ रहा है. हालांकि भाजपा के शीर्ष नेता उसके अभियान को महज दिखावा बता कर खारिज कर देते हैं, लेकिन पार्टीजन यह मानते हैं कि आप राज्य में अपनी पैठ बनाने लगी है, खासकर तब, जब केजरीवाल ने मुफ्त स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के अलावा राज्य के हर बेरोजगार युवा को नौकरी मिलने तक 3,000 रुपए की सहायता और किसानों को मुफ्त पानी तथा बिजली की आपूर्ति सहित कई लोकलुभावन घोषणाएं की हैं. हालांकि प्रधानमंत्री ने अगस्त में आप का नाम लिए बिना रेवड़ी संस्कृति का जिक्र किया लेकिन वे जहां भी प्रचार के लिए गए, वे राज्य के लिए एक के बाद एक कुल 73,000 करोड़ रुपए की योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं.
इसमें लघु, छोटे और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए पूंजी और बिजली सब्सिडी को बढ़ावा देने के लिए आत्मनिर्भर गुजरात योजना भी शामिल है. इसके अलावा, राज्य में शन्न्तिशाली सहकारी समितियों को लुभाने के लिए, केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने नीति में सुधार किए ताकि राज्य में 15-20 लाख गन्ना किसानों की 8,000 करोड़ रुपए की कर देनदारी माफ की जा सके.
इस बीच, राज्य में बेरोजगारी को दूर करने के लिए, भाजपा सरकार ने राज्य में उद्योग-धंधे को बढ़ाने के लिए बड़े प्रोत्साहन की घोषणा की है. इनमें धोलेरा में वेदांत-फॉक्सकॉन का सेमीकंडक्टर संयंत्र और वडोदरा में टाटा-एयरबस निर्माण इकाई की घोषणा शामिल है. अक्तूबर में, मोदी ने भरूच में भारत के पहले थोक दवा निर्माण संयंत्र का उदघारोटन किया. राज्य में चुनाव अभियान में सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर पैदा की जा रही नौकरियों की संख्या को दर्शाने के लिए इन सभी का जोरशोर से उल्लेख किया जा रहा है.
आक्रामक रणनीति
हालांकि माहौल भाजपा के पक्ष में झुका नजर आता है, इसके बावजूद, मोदी और उनके सहयोगी कोई जोखिम नहीं लेना चाह रहे हैं और मतदाताओं को लुभाने के लिए सारे घोड़े खोल दिए गए हैं. विशाल रैलियों के अलावा, प्रधानमंत्री घर-घर जाकर प्रचार करने की भी योजना बना रहे हैं. पूर्व विधायक और गुजरात अभियान में मोदी के विश्वस्त सहयोगी भरत पंड्या ने इंडिया टुडे को बताया, ''हम विजय के लिए तीन 'व’ में विश्वास करते हैं—विचार, वातावरण और व्यवस्था.’’
मोदी ने अपनी रैलियों से ऐसा माहौल तैयार किया है जिसने राज्य भर में सभी 52,000 बूथों पर 10.40 लाख पन्ना प्रमुखों और 10.90 लाख काडर के साथ पार्टी की सुव्यवस्थित चुनावी मशीनरी को सक्रिय कर दिया है. पार्टी ने संगठनात्मक टीमों को और मजबूती प्रदान करने के लिए अपनी प्रवासी टीमों—दूसरे राज्यों के नेताओं की—को भी सक्रिय कर दिया है. उन्हें संपर्क कार्यक्रमों, मानव शक्ति केंद्रों के साथ-साथ जमीन पर संसाधन जुटाते हुए बूथ-स्तरीय गतिविधियों को तैयार करने और निष्पादित करने के लिए नियुक्त किया गया है.
पार्टी के लगभग 150 वरिष्ठ नेताओं, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अन्य राज्यों के नेताओं को 'कारपेट-बॉक्विबंग कैंपेन यानी तूफानी प्रचार’, संपर्क और बड़े डायस्पोरा को लुभाने के लिए बनाई गई रणनीतियों को कार्यान्वित करने के लिए तैनात किया गया है. भाजपा का विदेशी विंग प्रवासी भारतीयों को उनके अपने प्रभाव क्षेत्र में पार्टी उम्मीदवारों के लिए समर्थन जुटाने को तैयार कर रहा है. पन्ना समितियों को तैनात करने की भाजपा की रणनीति, जिसने उत्तर प्रदेश में अच्छे परिणाम दिए, गुजरात में भी आजमाई जा रही है.
इस बीच, पार्टी ने राज्य भर में डिजिटल वार रूम स्थापित किए हैं. दर्जनों युवा एक कतार में लगे कंप्यूटरों के स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हैं जबकि दीवारों पर लगे कई टेलीविजन स्क्रीनों पर क्षेत्रीय या राष्ट्रीय समाचार चैनल चल रहे हैं. आंखें और उंगलियां लगातार घूम रही हैं, क्योंकि ये युवा चौबीसों घंटे काम करते हैं.
वे वस्तुत: मतदाताओं के साथ सीधे संपर्क में रहते हैं और डिजिटल स्पेस में अपने कथ्य को स्थापित करते हैं. भाजपा ने रचनात्मक भाषा का एक सख्त मानक तैयार कर रखा है जिसका पालन हर उम्मीदवार को करना पड़ता है. एकरूपता बनाए रखने के लिए सभी उम्मीदवारों के सोशल मीडिया हैंडलों को केंद्रीय रूप से नियंत्रित किया जाता है. प्रत्याशियों से उम्मीद की जाती है कि वे अपना पूरा ध्यान प्रचार पर केंद्रित करेंगे जबकि उनके संपर्क का प्रबंधन केंद्रीय टीम करेगी. विज्ञापन लगातार चलते हैं.
भाजपा सूत्रों का कहना है कि उन्होंने पार्टी के संदेश को फैलाने के लिए 1,00,000 से अधिक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए हैं. पार्टी की केंद्रीय डिजिटल मीडिया प्रबंधन टीम सोशल मीडिया पर रियल-टाइम अपडेट की सुविधा के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को वीडियोग्राफर और फोटोग्राफर भी प्रदान करती है. सूत्र बताते हैं कि एक उम्मीदवार अपने कुल चुनाव खर्च का कम से कम 10-15 फीसद डिजिटल अभियान पर खर्च करता है.
लेकिन चाहे डिजिटल क्षेत्र में हो या रैलियों और डोर-टू-डोर अभियानों में—मुख्य मुद्दा एक ही रहता है—यह चुनाव मोदी बनाम बाकियों के बीच है. प्रधानमंत्री वह ताबीज बने हुए हैं कि जिसके भरोसे भाजपा बड़ी जीत की उम्मीद रखती है. इसलिए गुजरात में प्रचार में जो कुछ चल रहा है, वह सब मोदी-मोदी है.
—साथ में जुमाना शाह

