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''सिख धर्म ने बताया कि भगवान है, बाइबल ने रास्ता दिखाया कि उन्हें पाऊं कैसे’’

नरूला का दावा है कि वे गठिया से लेकर लकवा और कैंसर तक ठीक कर सकते हैं, यहां तक कि मुर्दा को भी जिंदा कर सकते हैं.

गुरुनाम सिंह
गुरुनाम सिंह
अपडेटेड 7 नवंबर , 2022

रामजीत सिंह 64 वर्ष, फर्स्ट बैप्टिस्ट चर्च, कोट मीत सिंह, अमृतसर

पादरीनामा
''सिख धर्म ने बताया कि भगवान है, बाइबल ने रास्ता दिखाया कि उन्हें पाऊं कैसे’’

जट सिख रामजीत सिंह नौसेना से सेवानिवृत्ति के बाद शराब और अवसाद में डूब गए थे. ''ट्रेन के कटने को मैं घर से रेलवे ट्रैक की ओर निकला था. तभी चमकते चेहरे वाला एक आदमी (शायद यीशु) मिला और मुझे बेटियों का वास्ता देकर घर जाने को कहा. उसकी बात मानी और बुरी आदतें छोड़ने का फैसला किया.’’

अब रामजीत फर्स्ट बैपटिस्ट चर्च का हिस्सा हैं. वे पगड़ी पहनते हैं, दाढ़ी रखते हैं. इससे उन्हें अपने ईसाई धर्म और एक सिख जैसी वेशभूषा के बीच कभी विरोधाभास महसूस नहीं हुआ. खुद में वे दोनों को पाते हैं: ''सिख धर्म ने मुझे सिखाया कि ईश्वर है, बाइबल मुझे सिखाती है कि उसे कैसे खोजा जाए.’’

अंकुर योसेफ नरूला, 43 वर्ष, चर्च ऑफ साइन्स ऐंड वंडर्स, खंब्रा, जालंधर

पादरीनामा
''हम पर होने वाले हमलों का जवाब देने के लिए हम धरना नहीं, 'संवाद और चर्चा’ का सहारा लेंगे’’

जालंधर में एक हिंदू खत्री व्यवसायी परिवार में जन्मे नरूला दक्षिण अफ्रीकी पादरियों से प्रभावित थे. उनके वीडियो देखते थे. उनके मुताबिक, यीशु ने सपने में आकर ईसाई धर्म अपनाने को कहा. उन्होंने 2008 में तीन अनुयायियों के साथ मिनिस्ट्री शुरू की. आज यह पंजाब का सबसे बड़ा चर्च है, जो दुनिया भर में 3,00,000 सदस्य होना का दावा करता है.

इसकी रविवार की सभाओं में 10 से 15 हजार लोग आते हैं. उनके यूट्यूब चैनल के 12.3 लाख सब्सक्राइबर हैं. वे कहते हैं कि प्रवचनों के जरिए वे लोगों की तकलीफ दूर करते हैं. नरूला का दावा है कि वे गठिया से लेकर लकवा और कैंसर तक ठीक कर सकते हैं, यहां तक कि मुर्दा को भी जिंदा कर सकते हैं. उन पर सिख समूहों ने हमला भी किया था लेकिन उनका कहना है कि उनकी कार्य समिति इसके लिए धरना नहीं, 'संवाद और चर्चा’ का सहारा लेगी.

गुरुनाम सिंह, 53 वर्ष
गुरनाम सिंह मिनिस्ट्री, जीसस बेथेल (फुल गॉस्पल) चर्च, सेहंसरा कलां, अजनाला

पादरीनामा
''एक चमत्कार ने मेरा और मेरे परिवार का जीवन बदल दिया’’

अगस्त के आखिरी हफ्ते में निहंग सिखों के एक समूह ने राजा की रविवार की धार्मिक सभा पर हमला किया. उन्हें लगा कि राजा और उनकी मिनिस्ट्री (ईसाइयों की धार्मिक सभा) लोगों का धर्मांतरण कराने का प्रयास कर रही थी और वे इस बात से नाराज थे. अकाल तक्चत के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के निहंगों का समर्थन करने के बाद हमले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिखों का ध्यान खींचा. सांसी जनजाति के राजा दसेक साल पहले ईसाई धर्म अपनाने से पहले एक बेकरी में काम करते थे.

उन्हें लकवा मार गया था और उनका दावा है कि प्रार्थना से उनका लकवा ठीक हो गया. राजा कहते हैं, ''चमत्कार ने मेरी और परिवार की जिंदगी बदल दी.’’ जट सिखों ने उनके परिवार को स्थानीय गुरुद्वारे में प्रवेश करने से कई बार रोका. ''उन्हें हमारे मांसाहारी खाने पर ऐतराज था. अब कोई हम पर कुछ थोप नहीं सकता.’’ उनकी धार्मिक सभा अभी बंद है. राजा को उम्मीद है कि वे एक दिन जमीन खरीदेंगे और सभाएं फिर से शुरू करेंगे.

पादरीनामा
''ईसाई नेताओं के साथ मेरे अनुभव ने मुझे बदलकर रख दिया’’

हरप्रीत देओल, 42 वर्ष, द ओपन डोर चर्च ऐंड जीसस हीलिंग मिनिस्ट्री, खोजेवाल, कपूरथला

पंजाब के दोआबा क्षेत्र के अधिकांश युवाओं की तरह, बीसेक की उम्र के देओल भी कनाडा जाने और वहीं बसने का सपना देख रहे थे. पर किस्मत ने कुछ और ही तय कर रखा था. उन्हें वीजा ही नहीं मिल सका. देओल के पिता हरभजन सिंह पहले से ही एक प्रसिद्ध पादरी थे, जिन्होंने 1988 में एक ऑस्ट्रेलियाई पादरी के प्रभाव में धर्म बदला था.

जट सिख से ईसाई बने देओल को पिता का द ओपन डोर चर्च विरासत में मिला, जो अपने नाम के बावजूद पंजाब के सबसे पुराने पेंटेकॉस्टल चर्चों में से एक है. देओल कहते हैं, ''मेरे पिता धार्मिक व्यक्ति थे पर मैं वैसा नहीं था. उनके सहयोगियों के साथ मेरे अनुभव, मेरे पिता के प्रति उनके सम्मान और सबसे बढ़कर, ईसाई नेताओं के साथ मेरे अपने अनुभव ने मुझे बदल दिया.’’

2012 से ही वे धार्मिक उपदेशक बन गए हैं और अब एक एकड़ भूमि पर चर्च बनवा रहे हैं जो उनकी मिनिस्ट्री से सटा हुआ है. उनके रविवार के उपदेश और उपचार सत्र (हीलिंग सेशन) में सबसे अधिक भीड़ होती है; उनका दावा है कि उन्होंने अपनी प्रार्थनाओं से कैंसर रोगियों को भी ठीक किया है. वर्तमान में, देओल पीसीपीसी (पेंटेकॉस्टल चर्च प्रबंधक कमेटी) का एक ढांचा तैयार करने में व्यस्त हैं, जिसकी स्थापना उन्होंने की थी और अब वे पेंटेकॉस्टल पादरियों को संगठित करने जा रहे हैं.

मनोहर सिंह, 56 वर्ष द मनोहर सिंह मिनिस्ट्रीज, नारायणगढ़, अमृतसर

पादरीनामा
''मेरे पास साधन-सुविधाएंभले ही कम हों लेकिन मैं बड़े सुकून में हूं’’

जब किसी को पता चलता है कि मनोहर सिंह ईसाई हैं तो उस व्यक्ति का पहला सवाल उनके रूप-रंग को लेकर होता है. कपड़े के व्यापारी रहे मनोहर ने ईसाई होने के बावजूद सिख पगड़ी और लंबी दाढ़ी बरकरार रखी. वे कहते हैं, ''लोग जब मेरे पहनावे के बारे में पूछते हैं तो मैं उन्हें बताता हूं कि यह मेरी तहजीब और परवरिश का हिस्सा है. ईसाई नबी भी अपनी-अपनी संस्कृतियों की पगड़ी पहनते थे.’’

लबाना व्यापारी समुदाय के मनोहर ने अपनी किशोरवय बेटी की मृत्यु के बाद ईसाई धर्म अपना लिया. वे एक हादसे में अपने बेटे को गंवाने के कारण पहले से ही तनाव में थे. वे याद करते हैं, ''कुछ पादरी मेरे पास आए और उन्होंने मुझे बड़ी मानसिक शांति दी. इसके बाद मैंने बाइबल पढ़ना शुरू किया. अब भले ही मेरा घर बहुत छोटा है, संसाधन कम हैं और शायद मेरे पास सुख-सुविधाओं के साधन बहुत कम हैं लेकिन मैं हूं बड़े सुकून में.’’

गुरुनाम सिंह, 53 वर्षगुरनाम सिंह मिनिस्ट्री, जीसस बेथेल (फुल गॉस्पल) चर्च,सेहंसरा कलां, अजनाला

पादरीनामा
''मैं लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं कराता, सिर्फ बाइबल का प्रचार करता हूं’’

पंजाब पुलिस में एएसआइ गुरुनाम सिंह 1998 में परिवार से अलग होकर ईसाई बन गए. वे बताते हैं, ''पत्नी बच्चा पैदा करने में असमर्थ थी, तो परिवार चाहता था कि मैं दूसरी शादी कर लूं. मुझे यह मंजूर न था. मैं अमृतसर चला गया, जहां कुछ पादरियों के संपर्क में आया. उनकी दुआओं से अब मेरे तीन बच्चे हैं.’’

मजहबी सिख गुरुनाम सिंह ड्यूटी के समय पगड़ी पहनते हैं और घर लौटने पर बाइबल का प्रचार करते हैं. उन्होंने घर के पिछले हिस्से को चर्च में बदल दिया है, जहां रविवार के उपदेश के दौरान करीब 50 लोग जुटते हैं. वे कहते हैं, ''मैं धर्मांतरण नहीं करता, सिर्फ बाइबल का प्रचार करता हूं.’’

गुरनाम सिंह खेड़ा, 52 वर्ष, होली जीसस फायर चर्च और गुरनाम खेरा मिनिस्ट्रीज, हरपुरा, गुरदासपुर

''मैंने चमत्कार देखे हैं, खुद भी कुछ चमत्कार किए हैं’’

दशकों से गुरनाम सिंह को गुरदासपुर क्षेत्र में दो चीजों के लिए जाना जाता था: पहला इलाके के एक प्रमुख चिकित्सक के रूप में और दूसरा जसवंत सिंह खेड़ा के छोटे भाई के रूप में जो खालिस्तान कमांडो फोर्स से जुड़ा था और आतंकवादी वासन सिंह जफरवाल का करीबी सहयोगी था. जसवंत को 2006 में जब एक स्थानीय पादरी ने ईश्वर की 'प्राप्ति’ का रास्ता बताया तो उसने ईसाई धर्म अपना लिया.

एक साल बाद गुरनाम और उनके परिवार ने भी ईसाई धर्म की शरण ली. गुरनाम कहते हैं, ''मैंने चमत्कार देखे हैं, कुछ चमत्कार तो मैंने भी किए हैं.’’ लेकिन जब वे धर्मोपदेश देते हैं, तब भी अपने सिर पर पगड़ी बांधे रखते हैं. वे कहते हैं, ''हाल ही में कुछ सिख संगठनों ने पुलिस से शिकायत की. मैंने उन्हें स्पष्ट रूप से कहा कि मैं अपनी पगड़ी हटा दूंगा अगर यह संविधान के खिलाफ है या अवैध है. लेकिन इसे मैं सिर्फ इसलिए तो बिल्कुल नहीं हटाने वाला क्योंकि किसी सिख संगठन को इससे ऐतराज है.’’

गुरनाम का तीन साल पहले समुदाय के साथ एक और टकराव उस वक्त हुआ था जब उनके पिता का अंतिम संस्कार सिखों के लिए बने श्मशान में नहीं करने दिया गया था और पुलिस तथा स्थानीय प्रशासन के दखल के बाद उन्हें एक ईसाई कब्रिस्तान में लेकर जाना पड़ा था.

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