अमिताभ बच्चन@80
मुंबई के जुहू—पिन कोड 400049—में दो इमारतें हैं जिन्हें भारतीय सिनेमा का मक्का मानना चाहिए. ये इमारतें अपने आप में महान श्रद्धा या सम्मान नहीं जगातीं, न ही उनसे ऐसा आभामंडल झलकता है जो उच्च तबकों के धनी-मानी मोहल्ले के बंगलों से कथित तौर पर झलकता है. लेकिन किसी पूजास्थल की तरह बात उन लोगों की है जो उसके भीतर रहते हैं.
फिल्म दर्शकों की एकाधिक पीढ़ियां इस शख्स से इस कदर सम्मोहित रही हैं कि उसने एक अलौकिक हैसियत हासिल कर ली लगती है. यहां बाहर सड़क पर गाड़ियां धीमी हो जाती हैं ताकि सवारियां फटाफट तस्वीर खींच सकें, भले ही वह महज लकड़ी के प्रवेशद्वार की तस्वीर हो. पैदल यात्री ठहरकर विशाल मटके से दो घूंट पानी पीते हुए खुद को तरोताजा करते हैं और फिर यह प्रार्थना कि किसी तरह चमत्कार हो और उनके दर्शन हो जाएं. सफारी पहने सतर्क मर्द पिर्र-पिर्र सीटियां बजाते हैं ताकि भीड़ इकट्ठी न हो.
कोई फायदा नहीं. भीड़ हमेशा बनी रहती है, खासकर शाम को. 1976 से 2000 के दशक तक यह नजारा प्रतीक्षा पर दिखता था, अब जलसा पर. नजदीक ही जनक भी है, एक किस्म का दफ्तर, जो नजरों से चूक गया है. यह शायद हैरानी की बात भी नहीं क्योंकि यह मूलत: घर ही है जहां श्रद्धालु नजदीक होने का जादू महसूस करते हैं. वे जिस हीरो की पूजा के लिए आए हैं वह यहीं रहता है: नाम है अमिताभ बच्चन.
रविवार की शाम है. यह वह दिन है जब बच्चन अगर शहर में हुए और मन हुआ तो बाहर आकर अपने मुरीदों का अभिवादन करने और हाथ हिलाने के लिए जाने जाते हैं. भीड़ में कुछ लोगों से सरसरी तौर पर बात करने पर इस शख्स के बारे में कुछ बातें पता चलती हैं—किस तरह उसका शक्ति-क्षेत्र काल और स्थान के सामान्य तटबंधों के ऊपर और आर-पार बहता है. मुरीद हर आयु वर्ग के हैं.
लोकप्रियता का यह सैलाब भी देश के ओर-छोर तक फैला है, जो हिंदी फिल्मों की शख्सियत के लिए सामान्य बात नहीं. वकील और शिक्षिका, जेसी और स्मिता, केरल की हैं. वे जुहू बीच पर अपने दोस्तों को चकमा देकर इस उम्मीद में यहां चली आईं कि उस शख्स की एक झलक पा सकेंगी जिसने पीकू में उनका मन मोह लिया.
प्रतीक्षा से जलसा की तरफ बढ़ने का रास्ता बनाते हुए जेसी कहती हैं, ''उनमें कुछ तो बहुत दिलचस्प है.’’ उनसे कुछ दूर सड़क के उस पार खड़े विकास सिंह डॉक्टर हैं और पटना से आए हैं. वे ''सुपरहीरो’’ कहकर बच्चन का जिक्र करते हैं. बच्चन की अपनी पसंदीदा फिल्मों की लंबी फेहरिस्त साझा करते हुए उनके शब्द श्रद्धा और विस्मय से भीगे हैं. वे कहते हैं, ''वे दूसरों से बहुत अलग हैं. कितने आए और चले गए, पर वे अब भी अदाकारी दिखा रहे हैं.’’
अब भी, यह 'अब भी’ मौजूं है क्योंकि बच्चन 11 अक्तूबर को 80 बरस के हो रहे हैं. उन्होंने 27 साल की उम्र में फीचर फिल्मों में पदार्पण किया. वह जमाना ही अलग था—बीटल्स अपनी धुनें अब भी बजा रहे थे, नन्हा-मुन्ना दूरदर्शन बंबई तक भी नहीं पहुंचा था, और हिंदी फिल्मों की मोहतरमाएं मधुमक्खी की तरह बालों का जूड़ा बांधे, सुरीले गीत गाती, साइकिल चलाती पिकनिक मनाने जाती थीं. तिरेपन सालों में वह सब पुल के नीचे बह गया, मगर वे 'अब भी’ अपने खेल के शिखर पर हैं. इस कदर कि वे अपने खालिस और अद्भुत काम की विशालता से, और अपने काम की तनिक भी फीकी न पड़ी आचार नीति से नौजवान साथियों तक को शर्मसार करते हैं.
मगर किसी परिघटना (फेनामेनन) को भी कहीं न कहीं से तो शुरू होना होता है. इसकी ऐतिहासिक शुरुआत सात हिंदुस्तानी (1969) नाम की एक फिल्म में शांत और गरिमापूर्ण प्रवेश के साथ हुई. पुराने लेखक-निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास के माध्यम से. पर उनकी आदर्शवादी फितरत ने उन्हें मुख्य मार्ग से दूर ही रखा.
मुख्यधारा ने इस लंबे-ऊंचे और दुबले-पतले नौजवान को कुछ और सालों के लिए नकार दिया. कुछेक छोटी-मोटी फिल्में ही उनके हाथ आईं. बच्चन के एक साल बाद फिल्मों में आने वाले नवीन निश्चल को स्टारडम और पैसा कहीं ज्यादा तेजी से नसीब हुआ. यह अब भी ऐसी दुनिया थी जो सुघड़ चेहरों वाले रोमानी हीरो के लिए बनी थी. लिहाजा उसके बाद जो हुआ, उसका अंदाजा किसी को न था.
ऋषिकेश मुखर्जी की आनंद (1971) में सहायक भूमिका निर्णायक साबित हुई—सुपरस्टार राजेश खन्ना को ध्यान में रखकर लिखी गई भूमिका के ऐन बगल में भी बच्चन की शांत गहराई छनकर बाहर आ ही गई. फिल्मकारों ने धीरे-धीरे इस लौ को साज पर चढ़ाना सीखा. आखिरकार जंजीर (1973) ने इसे पूरी ज्वाला में बदल दिया. बच्चन की अदाकारी में वह ईमानदार पुलिस वाला सत्तर के दशक में ऐसी आदिम शक्ति के साथ सामने आया कि उसने अपने वक्त की चेतना को जकड़ लिया.
यह ऐसा वक्त था जब देश और उसके युवा भीतर ही भीतर उबाल खा रहे थे, भ्रष्ट और नाकारा व्यवस्था पर आक्रोश से इस कदर खीझने लगे थे कि उसे थामने की नाकाम कोशिश में जल्द ही आपातकाल लगाना पड़ा. बच्चन का 'ऐंग्री यंग मैन’ या नाराज नौजवान उस ज्यादा बड़े तूफान का मूर्त रूप बन गया.
और बना रहा, एक-आदमी के उस दावानल की तरह, जो उस दशक और उससे आगे तक फैला था. दीवार, शोले, त्रिशूल, डॉन, मुकद्दर का सिकंदर और काला पत्थर सरीखी फिल्मों के साथ केवल अमिताभ बच्चन की तकदीर ही नहीं बदली, हिंदी सिनेमा का हृदय और संस्कृति भी बदल गई. इसका सुर और आवाज ही बदल गई. उस दौरान वे ऊंचे शिखर पर ठीक इसीलिए विराजमान थे क्योंकि उन्होंने उस वक्त की इबारतों को परदे पर उकेरा, मानो कोई ईश्वर सृष्टि रच रहा हो.
जो बाद में आए उनके लिए कहानी में और भी कई चौंकाऊ मोड़ थे. चोट और खराब सेहत का दौर, राजनीति की तरफ भटकाव जो जितनी चमक-दमक के साथ शुरू हुआ था उतने ही तिरस्कार के साथ खत्म, फिल्मों की फेहरिस्त जो घटकर मोटे तौर पर उन बेमानी फिल्मों तक आ गई जिन्होंने उनकी पिछली कीर्ति सरीखा कुछ रचे बगैर उनकी अतीत की लोकप्रियता पर सवारी गांठने की कोशिश की, और फिर कारोबार का विनाशक रुख.
एक कंपनी बनाई गई जिसने बड़ा सोचने की जुर्रत की पर जिसका हश्र छोटे और बहुत छोटे में हुआ. सदी जब खत्म हो रही थी, अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड दिवालियेपन में सिमट रहा था—अपने साथ इतिहास की मानव रचना को भी नीचे ले जा रहा था. फिर जब नई सहस्राब्दी का घंटा बजा, घड़ी का कांटा फिर दूसरी तरफ झुक गया. अनूठी दूसरी पारी शुरू हुई. स्टार टीवी के क्विज शो कौन बनेगा करोड़पति से बच्चन ड्रॉइंग रूमों के ऐन भीतर पहुंच गए... और लोगों ने इस तरह प्यार न्योछावर किया कि मानो इनसान के भेस में देवता घरों में उतर आए हों. धीरे-धीरे फिल्में भी दूसरी बार अपनी चमक बिखरने लगीं.
लंबी दौड़ का घोड़ा
सन् 2022 में 80 की दहलीज चूमने के बावजूद बच्चन जरा भी पीछे हटने को तैयार नहीं. अप्रैल में रिलीज हुई रनवे 34 में वे एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो के गंभीर मुखिया का किरदार अदा कर रहे थे, जो तड़क-भड़क के मुरीद पायलट (अजय देवगन) से कड़ी पूछताछ करता और उसे झाड़ लगाता है. सितंबर में बच्चन ब्रह्मास्त्र में अक्लमंद और तलवार लहराते मेंटर थे. फिल्म ने देश भर से 247 करोड़ रुपए बटोरे और अब भी सिनेमाघरों में चल रही है.
मगर उनके शामियाने में एक और फिल्म आने वाली है—गुडबाय. पुष्पा से मशहूर हुई रश्मिका मंदाना इसमें उनकी को-स्टार हैं, जो उनकी नातिन नव्या नवेली नंदा से महज एक साल बड़ी हैं. दर्शक उन्हें नवंबर में भी बड़े परदे पर देखेंगे, जब वे अनुपम खेर और बोमन ईरानी के साथ सूरज बडज़ात्या की फिल्म ऊंचाई में नमूदार होंगे. छोटे परदे पर तो वे हैं ही, केबीसी के लिए दिन में 14 घंटे शूटिंग कर रहे हैं, जिसका 14वां सीजन चल रहा है. इस किस्म के पूरी तरह भरे कैलेंडर के साथ किसी को लगेगा कि यह 1970-80 के दशक हैं, जब बच्चन ऐसी रफ्तार और तेजी से काम कर रहे थे कि परिवार के लिए उनके पास समय नहीं था.
1980 में जब वे अपने शिखर पर थे और भरपूर फिल्में दे रहे थे, इंडिया टुडे (अंग्रेजी) ने अपने आवरण पर पेश करते हुए उन्हें नया नाम दिया था—'द वन-मैन इंडस्ट्री.’ उस वक्त शायद वे इतने धूमधाम से भरे रहे होंगे कि उन्हें दिलीप कुमार सरीखे अभिनेताओं की तरह 'संस्था’ नहीं माना जा सकता होगा. मगर अभिनय के विविधतापूर्ण खजाने से सजी अच्छी-खासी फिल्मों के साथ तुलना तो की ही जाने लगी होगी. दो साल बाद शक्ति में दोनों आमने-सामने आए.
मगर चार दशक बाद बच्चन के करियर ने न सिर्फ फिल्मों की खालिस तादाद—180 से ऊपर और अभी जारी—से बल्कि उनमें अपने अभिनय की विविध छटाओं से भी अदाकारी के दूसरे दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया है. उनकी अत्यंत प्रतिष्ठित हैसियत और साथ ही कैमरे के सामने सहजता ही वह चीज है जो उन्हें उनके चेहरे के तलबगार ब्रांड के बीच सबसे भरोसेमंद नामों में से एक बना देती है.
और इससे भी अहम वह गहरी और धीर-गंभीर आवाज, जो उनके प्रोडक्ट्सह और सेवाओं को बेच सकती है. 2021 की डफ ऐंड फेल्प्स सेलेब्रिटी ब्रांड वैल्यूएशन स्टडी ने बच्चन को 5.42 करोड़ डॉलर की ब्रांड वैल्यू के साथ छठे पायदान पर रखा. सरकारों ने भी अपने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ सरीखे जनसेवा से जुड़े विज्ञापन अभियानों के लिए या कोविड-19 महामारी के दौरान नागरिकों से सचेत रहने की गुजारिश के लिए उन्हीं पर भरोसा किया.
उम्र आम तौर पर किसी भी व्यक्ति पर दिखाई देने लगती है, पर बच्चन के मामले में अभिनय करने और अपने फैन्स से जुड़ने का उनका उत्साह बुढ़ापे या जीर्णता से अछूता है. जैसे ही दूसरा लॉकडाउन खत्म हुआ, वे कैमरे के सामने आने के लिए अधीर हो उठे और अपने पसंदीदा फोटोग्राफर अविनाश गोवारिकर को बुलावा भेज दिया.
दंगल के फिल्मकार नीतेश तिवारी, जिन्होंने बच्चन को भूतनाथ रिटनर्स में निर्देशित करने के अलावा केबीसी के विज्ञापन कैंपेन में भी उनके साथ काम किया, कहते हैं, ''हमारे देश ने कई सुपरस्टार देखे, पर इतना लंबा चलने वाला यह स्टारडम विरला है और इसकी बराबरी करना बहुत मुश्किल होगा.’’ आज के कई निर्देशकों की तरह तिवारी बड़ी तादाद में बच्चन की फिल्में देखते बड़े हुए.
मुकद्दर का सिकंदर के अंत में वे अपने हीरो के लिए रोए, तो ग्वालियर में हम का टिकट नहीं मिल पाने पर मुस्कराए...क्योंकि इसका मतलब था कि खराब दौर के बाद बच्चन की फिल्म आखिरकार हिट हो गई थी. उस वक्त वे ''बुरी तरह घबराए हुए’’ थे जब केबीसी के प्रचार अभियान ''कोई सवाल छोटा नहीं होता’’ के नैरेशन के लिए बच्चन के दफ्तर जनक में बैठे थे.
वे बताते हैं कि उनकी मां और परिवार को जब पता चला कि वे बच्चन के साथ काम कर रहे हैं, उन्हें इतना गर्व हुआ कि जितना उनके आइआइटी बॉम्बे में दाखिला लेने पर भी नहीं हुआ था. तिवारी कहते हैं, ''बालसुलभ जिज्ञासा उन्हें चलाए रखती है. वे 30 सेकंड के विज्ञापन और ढाई घंटे की फिल्म के लिए बराबर मेहनत करते हैं.’’
उनके साथ काम कर चुका तकरीबन हर शख्स बच्चन के लंबे वक्त तक टिके रहने का श्रेय उनके ''अनुशासन’’ को देता है, जिसकी पैरवी मोहब्बतें के उनके किरदार ने की थी. तीन पत्ती में उन्हें निर्देशित कर चुकीं लीना यादव याद करती हैं कि किस तरह वे फिल्म के चार नए लोगों को—जिनमें श्रद्धा कपूर भी थीं—समय की पाबंदी और तैयारी के उनके जज्बे से प्रेरणा लेने के लिए कहती थीं. वैसे तो वे कभी देर से नहीं आते, पर कभी ऐसा हुआ भी तो वे संदेश भेजकर सीधे निर्देशक को बताने और इसका जवाब पाने की उक्वमीद करने के लिए जाने जाते हैं.
दिव्यता से भरी आभा
यह आभा, जिसे आर. बाल्की ''मिथकीय और रहस्यपूर्ण’’ कहते हैं, दर्शकों तक भी पहुंचती है. और यही कारण है कि दर्शकों का दिल कभी नहीं भरता. पिछले 15 वर्षों में उनके साथ सबसे ज्यादा काम कर चुके सहयोगियों में से एक बाल्की जिन्होंने घूमर, जो शायद 2023 में रिलीज होगी, में उनके लिए एक और कैमियो लिखा है, उस एक्स-फैक्टर के बारे में भी बात करते हैं. उनके मुताबिक, यह ''बच्चन की खुद की कोशिशों और दुनिया के प्रयास से पैदा हुआ है जिसने इस मिथक को सहेज कर रखा है.’’
वे कहते हैं, ''इस मिथक से जो हुआ है वह यह है कि हम उनकी शख्सियत की थाह नहीं ले पा रहे हैं, जो दोबारा फिर कभी नहीं आएगी. सिनेमा में बच्चन जैसे सितारे दोबारा कभी नहीं होंगे क्योंकि मौजूदा सितारों में उस तरह की विशालता नहीं है.’’ यह पहेली हमेशा बनी रहती है, खासकर जब से बच्चन ने पिछले एक दशक में मीडिया के साथ बातचीत बहुत कम कर दी है. यहां तक कि बच्चन के शुरुआती दिनों में जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों में उनके लिए कुछ सबसे चर्चित भूमिकाएं लिखने वाले चर्चित पटकथा लेखक-गीतकार जावेद अख्तर कहते हैं, ''कोई भी व्यक्ति जो अमिताभ बच्चन को जानने का दावा करता है, वह झूठ बोल रहा है. वे बहुत ही गंभीर और अंतर्मुखी व्यक्ति हैं.’’
कोई ऐसा मंच जहां दर्शक सबसे करीब से बच्चन को जान पाते हैं, तो वह केबीसी है. उस कार्यक्रम के दौरान उनके व्यक्तित्व में सहज और त्वरित परिवर्तन देखते बनता है. वे अपने निजी जीवन के यादगार क्षणों और अपने करियर के किस्से भी सुनाते हैं. यह प्रसिद्ध शो ऐसे समय में आया जब बच्चन उस फिल्म उद्योग में आर्थिक सुरक्षा और एक पेशेवर के रूप में अपनी प्रासंगिकता के लिए संघर्ष कर रहे थे जो कि तब उभार पर था—मल्टीप्लेक्स बूम ने सिनेमा की पुरानी मुख्यधारा से इतर एक स्वतंत्र सिनेमा के उदय को प्रोत्साहित किया था.
उनके बेटे अभिषेक ने रिफ्यूजी (2000) के साथ अपनी शुरुआत की थी; शाहरुख खान उस दौर के बादशाह थे, अन्य खान—आमिर और सलमान—की धमक के बीच अमिताभ को पैसे कमाने में मुश्किल हो रही थी. 59 साल की उम्र में, बच्चन इस तथ्य से बहुत परिचित थे कि कमर्शियल बॉलीवुड हीरो बने रहने का प्रयास—जैसा हश्र मृत्युदाता का हुआ था—व्यर्थ था; वे दिन लद चुके थे और उन्हें ऐसे किरदारों की दरकार थी जो उनकी किंवदंती-सी छवि को कम न करें.
लेकिन शोबिज की दुनिया में, जो नजरों से ओझल, वह स्मृतियों से बाहर जैसा होता है. इसलिए केबीसी पर ''दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक’’ की भूमिका निभाना एक गेमचेंजर था, जैसा कि स्टार प्लस के कार्यकारी उपाध्यक्ष, प्रोग्रामिंग और बच्चन के चिर प्रशंसक समीर नायर मानते हैं. नायर कहते हैं, ''रात 8 बजे जब शो आता था, तब रिमोट माता-पिता के नियंत्रण में होता था, जो बच्चन के प्रशंसक थे, जबकि बच्चे खान के फैन.’’ लेकिन ग्रे फ्रेंच दाढ़ी में, धाराप्रवाह हिंदी और अंग्रेजी के बीच सहज परिवर्तन कौशल और अपने आकर्षण तथा सकारात्मकता से सबको बांधते हुए, बच्चन जल्द ही युवाओं के बीच भी छा गए और अपना फैन बेस बढ़ाया.
यह ऐसा समय भी था जब वे अधिक विज्ञापनों में नजर आने लगे और शुजित सरकार तथा बाल्की जैसे रचनाधर्मियों की एक नई पीढ़ी के संपर्क में आए, जिन्होंने बाद में उन्हें एक ऐसा उपहार दिया जिसके लिए हर अभिनेता तरसता है—खुद को फिर से स्थापित करने का अवसर. बच्चन के साथ सरकार की पहली फिल्म, शूबाइट, अभी तक रिलीज तो नहीं हुई है, लेकिन इसने उनकी दूसरी पारी में सबसे उपयोगी सहयोगों में से एक की जमीन तैयार की.
सरकार ने एक बार इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, ''हमें एक-दूसरे पर इतना भरोसा है कि हम किसी भी विषय पर बात कर सकते हैं.’’ उन्होंने कहा था, ''मैं उनके साथ कोई खास एजेंडा लेकर नहीं चलता और वे भी इसे मानते हैं. एक शख्सियत के तौर पर वे दहशत बनाने वाले तो हैं लेकिन अंदर से वे एक मासूम बच्चे जैसे हैं जो सिर्फ अभिनय करना चाहता है.’’
बाद के दौर में बच्चन ने खुद को जरूरतों के मुताबिक ढालने में भी गजब का हुनर दिखाया है. किस्मत की भी भूमिका रही है क्योंकि फिल्म निर्माताओं की एक नई नस्ल उभरी, जिनके पास बच्चन को ध्यान में रखते हुए लीक से हटकर कहानियां थीं, जैसे; राकेश ओमप्रकाश मेहरा की अक्स, संजय लीला भंसाली की ब्लैक, बाल्की की पा आदि. बदले में, अभिनेता ने उन स्क्रिप्ट्स के लिए भी उसी उत्साह और रुचि के साथ अभिनय किया. और, इस प्रक्रिया में, उन्हें दर्शकों का एक नया वर्ग मिलता गया.
पहली लहर
आइआइटी मद्रास में फिल्म स्टडीज की प्रोफेसर आयशा इकबाल विश्वमोहन उन कई सिनेप्रेमियों में से एक हैं जिन्होंने बच्चन की 'पहली लहर’ को करीब से देखा है. जंजीर से शुरू होने वाली वह दशक भर की सुनहरी लकीर जिसने उनके समकालीन जितेंद्र को यह टिप्पणी करने के लिए प्रेरित किया कि हिंदी सिनेमा के ''नंबर 1 से नंबर 10 स्टार’’ सब अमिताभ ही थे. आयशा अभिनेता की उस बड़ी अपील का श्रेय उनके निभाए गए उन असंख्य श्रमिक वर्ग के नायकों के किरदार में ढलने की उनकी उस क्षमता को देती हैं जिससे वे ''परदे पर अपने किरदारों को जीवंत कर देते थे.’’
हर किरदार के साथ बच्चन मुख्यधारा के हिंदी फिल्म नायक की परिभाषा बदल रहे थे. आयशा कहती हैं, ''वे राजेश खन्ना की पैदा की गई रूमानियत के चरम के लिए एक आदर्श मारक या एंटिडोट थे. एक वर्चस्ववादी मर्द के रूप में उनका अनूठा अवतार हजारों की भीड़ के बीच एक अलग धौंस के साथ आगे बढ़ते लोन रेंजर, आक्रामक शहरी युवा या अर्बन काउबॉय, एक सतर्क नायक की सलीम-जावेद की उस अवधारणा के लिए एकदम मुफीद रहा, जिसे क्लिंट ईस्टवुड और स्टीव मैकक्वीन जैसे हॉलीवुड सितारों ने लोकप्रिय बनाया था. इसमें उन्होंने गंभीरता की एक शैली जोड़ दी जो दिलीप कुमार की खासियत थी. कई शख्सियतों के इस मिले-जुले अवतार ने एक ऐसा नया नायक गढ़ा जो नैतिक रूप से अनेक अर्थों का प्रतिबिंब और बदलते समय के मिजाज के अनुकूल था.’’
लेकिन अपने नए दौर की तरह, बच्चन अपने करियर के शीर्ष पर फिल्मों को लेकर अपने चयन को लेकर बहुत साहसी थे और खुद को किसी खास दायरे में बांध दिए जाने को तैयार न थे. इस गुस्सैल युवा ने रोमांस (कभी-कभी, सिलसिला), कॉमेडी (चुपके चुपके, अमर अकबर एंथनी, मिस्टर नटवरलाल, नमक हलाल) में अपनी अदाकारी के एक अलग स्टाइल का दम दिखाया तो आलाप (1977) और मंजिल (1979) जैसी फिल्मों में अधिक संवेदनशील किरदारों के साथ अवतरित हुए, भले ही उन फिल्मों को उनके ऐक्शन से भरपूर ड्रामा जैसी सफलता नहीं मिली.
किरदारों में विविधता से भरे उनके फिल्मी सफर ने लेखक, फिल्म इतिहासकार और पुराने दस्तावेजों के संरक्षक (आर्काइविस्ट) एस.एम.एम. औसजा जैसे उनके कट्टर प्रशंसकों को जन्म दिया, जिन्होंने 1981 से अपने स्कूल के दिनों से ही बच्चन से जुड़ी स्मृतियों का संग्रह करना शुरू किया था. वे स्वीकारते हैं कि उनके प्रिय सितारे से भी कुछ चूक हुई है: ''यह कहना सही न होगा कि उन्होंने खराब फिल्में नहीं की हैं या कोई गिरावट नहीं आई है. लेकिन बावजूद इसके, ऐसे क्षण भी रहे हैं जिनमें वे औरों से अलग खड़े होते हैं.’’
आज औसजा के पास पोस्टर, फिल्म की तस्वीरों, लॉबी कार्ड, पत्रिकाएं, स्लाइड, ट्रांसपेरेंसीज (प्रोजेक्टर पर लगाने वाली छवि), किताबें, पोस्टकार्ड समेत 5,000 से अधिक चीजें हैं. अपने नायक के लिए बेइंतहा प्यार की औसजा की यह मेहनत एक चार किलो वजनी और 600-पन्नों की कॉफीटेबल बुक के रूप में बच्चन परिवार में अपनी जगह बनाएगी जो बच्चन के दादा प्रताप नारायण श्रीवास्तव के प्रतापगढ़ से शुरू होकर, उनकी बहू ऐश्वर्या के साथ, तीन पीढ़ियों की दास्तान को समेटती है. बच्चन पहले ही उनकी दो अन्य पुस्तकों का विमोचन कर चुके हैं.
इतिहास का निर्माण और उसका संरक्षण भी जैसे-जैसे उनके लिए दीवानगी बढ़ती गई, बच्चन भारतीय सिनेमा में अपनी अलग जगह को लेकर स्पष्ट रूप से जागरूक हो गए. फिल्म निर्माता, आर्काइविस्ट और रिस्टोरर (पुरानी चीजों की मरम्मत करके संरक्षित रखने वाले पेशेवर) शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर, जिन्होंने फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन (एफएचएफ) की स्थापना की और बच्चन जिसके ब्रांड एंबेसडर हैं, बताते हैं कि अभिनेता ने जुहू के अपने बंगले के एक वातानुकूलित कमरे में मिली, चुपके चुपके, जंजीर और डॉन जैसी अपनी फिल्मों के 35 मिमी सेल्युलाइड को संरक्षित किया था.
18 शहरों में दर्शक उनके सत्तर और अस्सी के दशक की 11 क्लासिक फिल्मों को 8-11 अक्तूबर तक पीवीआर सिनेमाघरों में बच्चन-बैक टू द बिगिनिंग नामक एफएचएफ रेट्रोस्पेक्टिव में देख सकते हैं. यदि कोई एक जीवित अभिनेता है जो रेट्रोस्पेक्टिव की योग्यता रखता है, तो वह निश्चित रूप से बच्चन हैं. डूंगरपुर का कहना है कि 80 रुपए के टिकट के साथ ज्यादातर शो बिक चुके हैं—और यहां तक कि कई अभिनेता भी फोन करके अमर अकबर एंथनी के टिकट मांग रहे हैं.
डूंगरपुर कहते हैं, ''भारतीय सिनेमा के अतीत, वर्तमान और भविष्य को पाटने वाला श्री बच्चन से बेहतर दूसरा कोई नहीं. उन्होंने अतीत को संरक्षित किया है और वर्तमान को संरक्षित करना जारी रखा है, जैसा कि उनके ट्वीट्स पर नंबर डालने से स्पष्ट होता है. अधिकांश लोग उनके साथ जो चल रहा है उसे वैसे ही चलने देते हैं लेकिन बच्चन उस दुनिया को भली-भांति समझते हैं जिसमें वे रहते हैं.’’ वे अपने ट्वीट और ब्लॉग पोस्ट खुद लिखते हैं.
लेकिन 1999 से उनका फोकस बस ऐक्टिंग पर है. एबीसीएल की नाकामी से सबक लेते हुए एबी कॉर्प कुछ फिल्मों का सह-निर्माता बनने के लिए तैयार है. दर्शकों को अगले साल बच्चन परिवार की तीन पीढ़ियां देखने को मिलेंगी. उनके नाती, अगस्त्य नंदा, जोया अख्तर की नेटफ्लिक्स की फिल्म द आर्चीज से अपनी पारी की शुरुआत करेंगे; बेटे अभिषेक बाल्की की घूमर में दिखाई देंगे और 80 साल की उम्र में अमिताभ, दीपिका पादुकोण और प्रभास के साथ एक बहुभाषी प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगे.
1997 में उनकी पहली होम प्रोडक्शन मृत्युदाता फ्लॉप होने पर इंडिया टुडे ने लिखा था, ''सवाल है—बच्चन यहां से कहां जाएंगे?’’ हमें या किसी को यह भान न था कि 25 साल बाद, हम उनके बारे में ''अभी भी’’ बातें कर रहे होंगे. उनके नाम 'अमिताभ’ का अर्थ है 'वह प्रकाश जो मंद नहीं पड़ता.’ और यह सही भी नजर आता है.
वह प्रकाश अंधेरे सिनेमाघरों, टीवी सेट और अब हमारे मोबाइल स्क्रीन को रोशन करता है. उनका दौर कितना लंबा कहा जाएगा, यह इसी से समझा जा सकता है. हालांकि, 25 साल पुराने उस सवाल का जवाब क्या है? तो जवाब है—अमिताभ बच्चन अपनी अंतिम सांस तक अभिनय करते रहेंगे और दुनिया उसका आनंद लेती रहेगी.

