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कायम रहेगी सुर सत्ता

सात दशक तक गायन में सक्रिय स्वरकोकिला लता मंगेशकर ने हाल ही में दुनिया को अलविदा कहा. उनके पार्श्वगायिका बनने, भारतीय संगीत की दुनिया पर छाने और जीने की खोजपरक दास्तान.

स्वरकोकिला लता मंगेशकर
स्वरकोकिला लता मंगेशकर
अपडेटेड 15 फ़रवरी , 2022

यह सही है कि फनकार कभी भी फन से बड़ा नहीं हो सकता लेकिन कुछ फनकार ऐसे होते हैं जो अपनी प्रतिभा और प्रयोगधर्मिता के बूते उसे उसकी ज्ञात सीमाओं और संभावनाओं से भी काफी आगे लेकर निकल जाते हैं. इसकी वजह से वे अक्सर कला का पर्याय बन जाते हैं और कभी-कभी उन्हें देवत्व का दर्जा हासिल हो जाता है. लता मंगेशकर उन्हीं चंद फनकारों में शुमार हैं.

आधुनिक भारत के इतिहास में संगीत, खासकर फिल्म संगीत उनके बिना अधूरा है. इसके अलावा, भजनों, गजलों, अभंग पदों, नात, कव्वाली, श्लोक-मंत्र गायन, लोक-गीतों के माध्यम से उन्होंने जितनी रोशनी बिखेरी, उसके अनुपात में कोई संगीत विश्लेषक या सिनेमा अध्येता अपनी बात कभी भी मुकम्मल नहीं कर सकता. पर अंतत: वे भी इनसान थीं और इसके गुण-दोषों से मुक्त न थीं. कोविड-19 की वजह से महीने भर तक बीमार रहीं और 6 फरवरी को परम तत्व में विलीन हो गईं.

लेकिन उनकी आवाज हमेशा गूंजती रहेगी. यह आवाज, महात्मा गांधी की धोती और रबींद्रनाथ टैगोर की दाढ़ी की तरह भारत की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन गई. अगर संचार के जादूगर मार्शल मकलूहन आज जिंदा होते और उन्हें अपने ''वैश्विक गांव’’ के चारों ओर भारत के संगीत फलक पर निगाह डालने के लिए कहा जाता, तो शायद वे एक नए मुहावरे से इस आवाज को आदरांजलि देते: ''संगीत ही चंपी है.’’

इस सर्वव्यापी संगीत की ''चंपी’’ करने वाली और भारत के बेहद लोकप्रिय सुगम संगीत उद्योग की सम्राज्ञी एक स्थूलकाय, सांवली, कैमरे के आगे शर्मीली, सीधी-सादी मराठी महिला लताबाई मंगेशकर थीं. पार्श्वगायिका के तौर पर इस महिला का रौब-दाब कुछ ऐसा था कि 1981 में देश के 100 करोड़ रुपए के फिल्म जगत के शहंशाह भी उसका सपना तक नहीं देख सकते.

उनकी भृकुटि पर एक बल पड़ा नहीं कि देश के सबसे ज्यादा मेहनताना पाने वाले संगीत निर्देशक दहशत में आ जाते थे. इनकार में उनकी गर्दन जरा हिली नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संपर्कों वाली रिकॉर्ड कंपनियों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती थी. संगीत निर्देशक जोड़ी शंकर-जयकिशन के शंकर ने कहा था: ''जुकाम लताजी को होता है और समूची फिल्म इंडस्ट्री को छींकें आने लगती हैं.’’

किसी भी महिला ने उतने गाने रिकॉर्ड नहीं करवाए जितने 92 साल की लता ने करवाए. गिनेस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉड्र्स, 1991 के मुताबिक, लता ने 1948 से 1987 के दौरान 30,000 गाने गाए. उन्होंने अपना आखरी गाना 2019 में सौगंध मुझे इस मिट्टी की मयूरेश पै के साथ रिकॉर्ड कराया. गाने गाते हुए उन्होंने शानदार दौलत कमाई, जिसका मोटा-मोटी अनुमान ही लगाया जा सकता है.

''निर्विवाद’’ मलिका: उन्होंने पार्श्वगायन को उसके मातहत दर्जे से बहुत ऊंचा उठाकर देश के फलते-फूलते मनोरंजन उद्योग के बेशकीमती हिस्से के दर्जे पर पहुंचा दिया. बहुत पहले 1959 में टाइम पत्रिका ने ''भारत के पार्श्वगायकों की निर्विवाद और अपरिहार्य मलिका’’ कहकर उनका वर्णन किया था.

लता जिन उपलब्धियों का विशाल पिटारा थीं, वे गायकी के बहुत छोटे-से दायरे में बरसों लगातार खटने और पसीना बहाने का मुकम्मल नतीजा है. लता मंगेशकर यह काम हैरतअंगेज सहजता से करती थीं. ज्यादातर मर्तबा वे समुचित रिहर्सल किए बगैर गातीं और बगैर किसी रीटेक के, 70 सदस्यों के ऑर्केस्ट्रा के साथ सीधे गाते हुए फिल्म का साउंड ट्रैक रिकॉर्ड करवा देती थीं.

1977 में वे लंबे विदेश दौरे से सीधे राज कपूर की सत्यम् शिवम् सुंदरम् की रिकॉर्डिंग के लिए पहुंच गईं, संगीत निर्देशक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को 10 मिनट फिल्म का थीम सांग गुनगुनाते सुना और रिकॉर्डिंग रूम में दाखिल हो गईं. नतीजा एक ऐसे गाने की शक्ल में सामने आया जो करीब दो साल तक लोकप्रिय गानों की फेहरिस्त में चोटी पर रहा और आज भी खूब सुना जाता है.

उन्होंने 1946 से हिंदी फिल्मों में गाना शुरू कर दिया था और अस्सी के दशक में उनके पास मुंबई में कम से कम 50 फिल्मों के लिए गाने के करार हुआ करते थे. उन्होंने मधुबाला और नरगिस सरीखी गुजरे जमाने की दिलकश तारिकाओं के लिए गाने गाए. उतनी ही सहजता से उन्होंने कल पैदा हुई लड़कियों के लिए गाने गाए. (देखें: मेरी आवाज ही पहचान है...)

आलोचक: सभी कामयाब कलाकारों की तरह लता के भी कटु आलोचक रहे हैं, जो कहते थे कि उन्होंने अपनी सुनहरी आवाज गंवा दी है. अनारकली के मशहूर गानों के संगीत रचयिता और उनके घनिष्ठ दोस्त रहे सी. रामचंद्र ने कभी कहा था, ''लता मंगेशकर गुजरे जमाने की लता की फीकी छाया भर हैं.’’ मगर एक युवा संगीत निर्देशक ने पलटकर जवाब दिया कि ज्यादा संभावना इस बात की है कि खुद रामचंद्र अपने अतीत की ''फीकी छाया’’ हैं.

सरगम और आशा के गानों की जबरदस्त सफलता के बावजूद वे फिल्मों के लिए कम गा रही थीं. इसकी जगह वे अपनी पुरानी हिट फिल्मों को रीसाइकिल करने की स्वदेशी तरकीब के बारे में सोच रही थीं: यानी उन्हें लाइव कंसर्ट में फिर से रिकॉर्ड करना. इसमें पूरी तरह उन्हीं का फायदा था, क्योंकि इन गानों की दस फीसद या इतनी ही रॉयल्टी सीधे उन्हें मिलती.

उन फिल्मों के प्रोड्यूसरों को दरकिनार करते हुए, जिनकी फिल्मों में ये गाने आए थे. विदेशों में उन्हें और ज्यादा से ज्यादा सुना जाता था. विदेश में उनका कंसर्ट 1974 में नेहरू स्मारक निधि के सहयोग से लंदन के प्रतिष्ठित रॉयल एल्बर्ट हॉल में उनके लाइव प्रदर्शन से शुरू हुआ था. 

विदेश में कार्यक्रम: उनकी लोकप्रियता का कुछ अंदाजा अमेरिका और कनाडा में उनके और रविशंकर के एक प्रदर्शन के लिए वसूल की जाने वाली फीस से लगाया जा सकता है. वे अस्सी के दशक के शुरू में 15,000 डॉलर मांगतीं और हासिल करती थीं, जबकि रविशंकर महज 1,000 डॉलर लेते थे.

संगीत की किन्हीं विधाओं में अगर वे डगमगाईं तो वे हैं गजल और भजन. गजलों में जगजीत-चित्रा सिंह की जोड़ी ने लता की तो बात ही छोड़ दें, बेगम अख्तर और पाकिस्तान के मेंहदी हसन सहित हरेक को पीछे छोड़ दिया. गजलों में लता शीर्ष पर नहीं पहुंच पाईं, तो भजनों में भी अपनी बढ़त अस्सी के दशक में हरिओम शरण के हाथों गंवा बैठीं. 

अलबत्ता विदेशों में अपने लाइव प्रदर्शन के बेहद लोकप्रिय एल्बमों को मूल रिकॉर्ड की तरह दिखाकर लता ने शरण, जगजीत-चित्रा और बाकी गैर-फिल्मी गायकों के ऊपर नुक्सान की भरपाई करने वाली जीत हासिल की. रॉयल एल्बर्ट हॉल के रिकॉर्ड ने तो रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की ही, उद्योग में मौजूद संकेतों से बिल्कुल साफ है कि 1980 में पैलेडियम थिएटर में उनके कार्यक्रम की लाइव रिकॉर्ड की बिक्री कुछ ही वक्त में छह अंकों का निशान पार कर गई.

शुरुआती जिंदगी: लता मंगेशकर की शुरुआती जिंदगी गरीबी, हाड़-तोड़ मेहनत और बदकिस्मती के दुस्वप्नों की महागाथा है. मराठा हृदयप्रदेश महाराष्ट्र से दूर इंदौर में उनका जन्म हुआ. गोवा के मंगेशी से आए उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय गायक थे, जिनकी शिक्षा-दीक्षा बाबा माशेलकर के रंगारंग पंजाबी स्कूल में हुई थी. दीनानाथ की एक नाटक मंडली थी, जिसने अपना तंबू राज्य के हरेक कस्बे में गाड़ा, जिनमें पुणे, कोल्हापुर, सतारा, सांगली और मिरज भी थे.

पिता के पेशे की वजह से बच्चों—चार बेटियों और एक बेटे—को घुमंतू जिंदगी बसर करनी पड़ी. दीनानाथ अपने बच्चों की समुचित स्कूली पढ़ाई का इंतजाम तो नहीं कर पाए, लेकिन इसकी भरपाई उन्होंने शुरुआती जिंदगी में संगीत के सबको की कड़ी खुराक देकर की. लता ने कहा, ‘‘मेरे संगीत के रुझानों की बुनियाद उन शुरुआती दिनों में ही पड़ गई थी.’’

दीनानाथ की नाटक कंपनी बलवंत संगीत नाटक मंडल बहुत पैसा नहीं उलीचती थी, लेकिन इतना तो दे ही देती थी कि परिवार सीधी-सादी जिंदगी बसर कर पाए. बच्चों में सबसे बड़ी लता ने बचपन में एक ही आफत झेली, वह थी दो साल की उम्र में चेचक का हमला, जिसके निशान मरते दम तक रहे.

परिवार के लिए तबाही ने 1934-35 में दस्तक दी, जब अलमस्त मिजाज के पारसी आर्देशिर ईरानी ने पहली ''टॉकी’’ आलम आरा बनाकर भारतीय सिनेमा को खामोशी के युग से बाहर धकेल दिया. बंगाल के अलावा महाराष्ट्र अकेला दूसरा राज्य था जहां घुमंतू नाटक कंपनियों का बोलबाला था. नाटक कंपनियां इस ''ध्वनि आक्रमण’’ के असर से लडख़ड़ा गईं. दीनानाथ की बलवंत नाटक मंडली सहित उनमें से ज्यादातर बंद हो गईं. परिवार छोटे-से व्यापारिक कस्बे सांगली आ गया, जहां, लता के शब्दों में, ''हम पहली बार बसे.’’

दीनानाथ ने सांगली में अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखकर एक फिल्म कंपनी शुरू की. बदलाव आसान नहीं था. 1930 के उस दशक में दर्शकों की समझ और संवेदना तेजी से बदल रही थी. लिहाजा उनके डिब्बाबंद थिएटर को ज्यादा खरीदार नहीं मिले. 1938 में फिल्म कंपनी बंद हो गई और परिवार एक बार फिर उखड़कर इस बार पुणे आ गया.

कमाऊ पूत: दीनानाथ की जिंदगी के बाकी चार साल पूरा परिवार आकाशवाणी के पुणे केंद्र पर गायन से होने वाली उनकी थोड़ी-सी आमदनी पर जिंदा रहा. 1942 में जब प्लूरिसी, दिल के दौरे और हताशा से दीनानाथ की मृत्यु हुई, हड्डियों की टीबी से ग्रस्त उनके सबसे छोटे बेटे हृदयनाथ अपने पिता की बगल में लेटे थे. दीनानाथ की मृत्यु के आठवें दिन महज 13 की उम्र में लता ने अच्छा-खासा मेकअप पोता और जानी-मानी अभिनेत्री नंदा के पिता मास्टर विनायक राव की मराठी फिल्म पाहिलि मंगलागौर में अभिनय करने और गाना गाने आ गईं.

उस फिल्म में लता ने नायिका की बहन का किरदार अदा किया और तीन गाने गाए. लता ने बताया था, ''मुझे मेकअप करने से नफरत थी. मुझे रोशनी की चकाचौंध में खड़े होने से नफरत थी. मगर मैं परिवार की कमाऊ पूत थी और कोई चारा नहीं था. जिस दिन मैं मास्टर विनायक की फिल्म में काम करने गई, घर में खाने को कुछ नहीं था.’’

उनकी अदाकारी से विनायक खुश थे और उन्होंने उन्हें 60 रुपए महीने की पगार पर स्टाफ कलाकार के तौर पर रख लिया. 1947 में विनायक की मृत्यु और उनकी कंपनी प्रफुल्ल पिक्चर्स के बंद होने के वक्त उनकी पगार बढ़कर 350 रुपए हो गई थी. मगर उससे पहले 1945 में कंपनी अपना मुख्यालय पुणे से हटाकर बंबई ले आई और इस तरह लता अपने सपनों के महानगर में आ गईं.

उन दिनों नाना चौक पर दो कमरों के फ्लैट का किराया 25 रुपए महीना था, जो निकाल पाना लता के लिए तब तक भी आसान नहीं था, खासकर जब कजिंस सहित उनके परिवार में आठ सदस्य थे. छोटी बहन आशा भोंसले, जो अब मशहूर गायिका हैं, उस वक्त इतनी छोटी थीं कि गायन से कमा नहीं सकती थीं. हृदयनाथ ने बताया, ''परिवार चलाने के लिए दीदी दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत कर रही थीं.’’

मुंबई में लता के लिए पहली बड़ी घटना वह थी जब उन्हें शास्त्रीय गायक अमन अली खां भिंडीबाजारवाले से मिलवाया गया, जिन्होंने उन्हें अपनी शार्गिदी में ले लिया. यह पूरी रस्म अदायगी के साथ हुआ, जिसमें उनके बाजू पर बाकायदा गंडा बांधा गया. मगर बंटवारे के नतीजतन अमन अली पाकिस्तान चले गए और लता को अमानत अली में नया गुरु खोजना पड़ा, जो पारंगत गायक थे और उसी स्कूल में पढ़ाते थे जिसमें यशस्वी शास्त्रीय गायक आमिर खान पढ़ाते थे.

1951 में अमानत अली की मृत्यु से लता की शास्त्रीय संगीत की शिक्षा-दीक्षा पर अचानक विराम लग गया. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा था, ''अमानत अली अगर जिंदा होते तो शायद मैं शास्त्रीय गायिका बन गई होती.’’ मगर इसकी कम ही संभावना थी क्योंकि 1947 तक लता पार्श्वगायिका के तौर पर स्थापित हो चुकी थीं. उसी साल उन्होंने मजबूर नाम की एक फिल्म के लिए गाया. यह ठुमरी थी और नायिका के लिए उनका पहला गाना भी. मजबूर बहुत हिट फिल्म थी.

मजबूर में यह पहला मौका भी उन्हें नाटकीय ढंग से मिला. विनायक की मृत्यु और प्रफुल्ल पिक्चर्स के बंद होने के बाद जल्द ही मंगेशकर परिवार फिर तंगहाली की चपेट में था, क्योंकि लता की कोई तय आमदनी नहीं थी. वे फिल्मों में एक्स्ट्रा सप्लाइ करने वाले शख्स के पास गईं, जो उन्हें अमानत अली के करीबी दोस्त और उस वक्त के अग्रणी संगीत निर्देशक मास्टर गुलाम हैदर के पास ले गए.

हैदर इस कमउम्र लड़की की आवाज की रेंज और सुरीलेपन पर मुग्ध हो गए. वे उन्हें शशिधर मुखर्जी के पास ले गए, जिनका फिल्मिस्तान स्टुडियो बंबइया शो बिजनेस का मक्का हुआ करता था. मुखर्जी ने उसी वन्न्त उन्हें खारिज कर दिया और कहा कि इस ''नन्ही-सी बेचारी’’ की आवाज इतनी ''चीं चीं करने वाली’’ है कि हीरोइन कामिनी कौशल के लिए फबेगी नहीं, जो 1940 के दशक में रुपहले परदे की मलिका थीं.

हैदर ने शांतभाव से उनसे कहा: ''मुखर्जी, मैं तुम्हें आज पहले से बता रहा हूं कि यह बच्ची बहुत जल्द हरेक को पीछे छोड़ देगी, नूरजहां को भी.’’ नूरजहां, जो बाद में पाकिस्तान चली गईं और वहां शीर्ष पर पहुंचीं, उन दिनों वे सुगम संगीत का सबसे बड़ा नाम हुआ करती थीं.

शुरुआत: उसी दिन गुलाम हैदर के साथ लता मलाड स्थित बॉम्बे टॉकीज के स्टुडियो गईं. मूसलाधार बारिश हो रही थी. गोरेगांव स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हैदर ने उनसे वही गाना गाने को कहा जो उन्होंने थोड़ी देर पहले मुखर्जी के लिए गाया था—'बुलबुलो मत रो यहां’. वे गा रही थीं और हैदर अपनी 555 ब्रांड की सिगरेट की डिब्बी पर उंगलियां थपथपा रहे थे. हैदर गाने में डूबे रहे. गाना खत्म होने के बाद भी उन्होंने एक शब्द नहीं बोला.

घंटे भर बाद लता यही गाना बॉम्बे टॉकीज में गा रही थीं, जहां उन्हें मजबूर के लिए चुन लिया गया. लता ने बताया था, ''उसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.’’ मजबूर के लिए रिकॉर्डिंग आसान नहीं थी. गाने की 32 टेक में रिकॉर्डिंग हुई. बॉम्बे टॉकीज के रिहर्सल रूम में गुलाम हैदर की ''खोज’’ को सुनने के लिए संगीत निर्देशकों की पूरी फौज जमा थी. उनमें हुसनलाल भगतराम, अनिल बिस्वास, नौशाद और खेमचंद प्रकाश प्रमुख थे.

लखनऊ में जन्मे सौम्य संगीत निर्देशक नौशाद की सुरीली धुनें 1950 के दशक की संगीतमय फिल्मों की कामयाबी के लिए बड़े पैमाने पर जिम्मेदार हुआ करती थीं. पहली पेशकश उनकी तरफ से आई और उन्होंने अंदाज के लिए लता के साथ करार किया. अंदाज बॉक्स ऑफिस के धुर्रे बिखेर देने वाली कामयाब फिल्म थी. भगतराम ने एक और कामयाब फिल्म बड़ी बहन के लिए लता से गवाया. फिर बरसात आई जिसमें उन्होंने जिया बेकरार है  गाया, वह गाना जिसकी लोकप्रियता आज भी कम नहीं हुई है.

शोहरत लता की जिंदगी में अचानक आई, पर पैसा अब भी आंख-मिचौली खेल रहा था. जिया बेकरार है  के लिए उन्हें महज 200 रुपए मिले और कई साल तक एक गाने के लिए कभी 400 रुपए से ज्यादा नहीं मिले. हरेक गाने के लिए उन्हें रिहर्सल पर कम से कम एक पखवाड़े बैठना पड़ता, कम से कम आधा दर्जन रीटेक से गुजरने की यंत्रणा की तो बात ही छोड़ दें.

मुलाकात: देर रात घर लौटते हुए अक्सर उनकी झपकी लग जाती. कई बार वे आधी रात गुजरने के बाद आखिरी स्टेशन चर्चगेट पहुंच जातीं, जहां सफाई करने वाली महिला उन्हें जगाती और उतरने को कहती. ''उतनी देर रात भी मैं चर्चगेट से पैदल घर लौटती. बंबई उन दिनों सञ्जय शहर हुआ करता था.’’

एक दिन लोकल ट्रेन के तीसरे दर्जे के डिब्बे में नौशाद ने उन्हें अदाकार दिलीप कुमार से मिलवाया (''उन दिनों हम सभी रोज आने-जाने वाले मुसाफिर हुआ करते थे’’). दिलीप कुमार को मराठी लहजे में ढली उनकी हिंदी मजेदार लगती थी और तब तक उन्हें तंग करते रहे जब तक ''मेरे कान शर्म से झनझनाने न लगे’’. तीन दशक बाद खुद दिलीप कुमार ने यह घटना याद करते हुए कहा था कि अब हिंदी और उर्दू के हरेक लफ्ज का लता का उच्चारण सुनकर खुद उनके कान झनझनाने लगते हैं. 

फिल्म निर्देशक बासु भट्टाचार्य कहते थे, ''लता मंगेशकर की कहानी जबरदस्त नारीवादी पटकथा की तरह है.’’ इसमें वाकई नारीवादी कथानक के सभी तत्व हैं, पुरुष दबदबे वाले समाज में अकेली महिला की पहचान की खोज, अंतत: उसकी जीत और किस्मत का नाटकीय मोड़. गुजरे दिनों के एक बेहद अहम संगीत निर्देशक ने निष्पक्ष ढंग से पूरे मामले का विश्लेषण किया.

उन्होंने कहा: ''हममें से कुछ ने लता को अपनी और केवल अपनी जायदाद की तरह बरता. हमने उन पर हावी होने, उन्हें अपनी छाया में रखने और उन्हें धमकाने की कोशिश की. हो सकता है जब वे हमारे साथ हमारे ही ढंग से व्यवहार करने लगी हों, तो हम परेशान हो गए हों.’’

उनमें से कुछ तो जाहिरा तौर पर महज ''परेशान’’ ही नहीं हुए, बल्कि बुरी तरह चिढ़ गए. एक दशक लता के ''करीबी दोस्त’’ रहे रामचंद्र ने ''निरंकुश, बेरहम और खोखली ’’ करार देते हुए उन्हें ''ईष्यालु औरत-जो किसी भी दूसरे गायक को बर्दाश्त नहीं कर सकती; कलाकार के बजाए कारोबारी औरत.’’ तक कह दिया.

प्रतिद्वंद्वी: उनके ज्यादातर आलोचक उनकी शख्सियत से इस कदर अवाक् और भयभीत थे कि उस तरह खुलकर उनके खिलाफ बोलना नहीं चाहते थे जिस तरह रामचंद्र बोले. वे गुमनामी के सुरक्षित किले से अपनी बरछियां चलाते थे. उनके खिलाफ मुख्य आरोप अलबत्ता यह था कि वे प्रतिस्पर्धा को लेकर चौकन्नी थीं और अपनी प्रतिद्वंद्वियों को इंडस्ट्री से बाहर धकेल देने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं.

एक इंटरव्यू में उन्होंने एक बार कहा था,''आती हुई ताकत को कोई रोक नहीं सकता.’’ मगर उनकी प्रतिद्वंद्वियों-वाणी जयराम, रूना लैला, सुलक्षणा पंडित, प्रीति सागर और हेमलता- की नाकामी की आधा दर्जन कहानियों में उनका अदृश्य हाथ माना जाता था.

जयराम तमिलनाडु की थीं और वे अपने मूल राज्य लौटकर शीर्ष गायिका बन गईं. उनके अलावा लता की ''शिकार’’ कोई भी अन्य गायिका इतनी बहादुर नहीं थी कि उनके खिलाफ खुलकर आरोप लगाती. मगर ''ऑफ-रिकॉर्ड’’ बातचीत में एक कार्यप्रणाली की तरफ इशारा किया जाता था. उनमें से एक ने कहा: ''वे अक्सर गायिका की संगीत निर्देशकों से सिफारिश करके उसे बढ़ावा देतीं और फिर तत्काल ही यह बात सार्वजनिक कर देतीं ताकि बाद में कोई उन्हें असहिष्णु होने का दोषी न ठहरा सके.

उसके बाद वे मुश्कें कसना शुरू करतीं. 'आहत करने वाले’ संगीत निर्देशक पाते कि लता के साथ उनकी तारीखें रद्द कर दी गई हैं.  फिर उनके 'नजदीकी सूत्र’ संदेश फैलाते कि कीमत चुकाकर ही उनके साथ शांति कायम की जा सकती है, कि उन्हें उस नई गायिका को 'निकालना’ होगा.’’

ऐसा बर्ताव साबित कर पाना मुश्किल था. मगर ऋषिकेश मुखर्जी की गुड्डी में बोले रे पपीहरा गाने से रातोंरात मशहूर हुईं जयराम ने अचानक पाया कि उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है. असल में उनका 'पाप’ गुलजार की मीरा (संगीत: रवि शंकर) में गाने से कई गुना बढ़ गया. वह भी उस वक्त जब लता ने पहले तो हृदयनाथ को उसका संगीत निर्देशक बनाने के लिए जोर डाला और बात बनी नहीं तो फिल्म के लिए गाने का अनुबंध तोड़कर निकल गईं.

जयराम की मांग देखते ही देखते इतनी तेजी से काफूर हुई कि वे बोरिया-बिस्तर बांधकर चुपचाप और बेमुराद मद्रास (अब चेन्नै) लौट गईं. बाद में जयराम ने लता पर उन्हें फिल्मों से निकलवाने के लिए संगीत निर्देशकों को ''ब्लैकमेल करने’’ का आरोप लगाया.

इस अग्निपरीक्षा से गुजरने वाली जयराम अकेली नहीं थीं. बांग्लादेश की गायिका रूना लैला को भी बंबई को अलविदा कहने के लिए मजबूर कर दिया गया. उनके निजी रिकॉर्ड दमा दम मस्त कलंदर ने जबरदस्त धूम मचाई थी. घरौंदा के उनके गानों को भी ऐसी ही कामयाबी मिली. इसके संगीत निर्देशक जयदेव उन्हें स्वीकार करने वाली अकेली हस्ती थे. मगर दूसरों ने उनके साथ इस तरह सुलूक किया मानो वे अछूत हों. बंबई में अफवाह फैल गई कि वे जासूस हैं. गाने के लिए उन्हें लेना देशद्रोह के बराबर माना जाने लगा. उन्हें भी उलटे पांव लौटना पड़ा. वे केन्या चली गईं.

जबरदस्त दबदबा: लता इस आरोप को झटक देती थीं (देखें इंटरव्यू) कि होनहार गायिकाओं की ऊंची 'बाल मृत्यु दर’ के लिए वाकई वे जिम्मेदार हैं. उन्होंने कहा था, ''बंबई में रूना के पहले सार्वजनिक प्रदर्शन में मैं मौजूद थी. यहां तक कि उनकी पहली रिकॉॄडग में भी मैं मौजूद थी.’’ उनके आलोचक कहते हैं, ''उनका बचाव का तर्क यही है.’’

इसमें कोई शक नहीं कि इंडस्ट्री में उनका इतना भारी दबदबा था कि अगर चाहें तो किसी भी दूसरे गायक का गला घोंट दें. और गायक ही क्यों? कुछ साल पहले उन्होंने सत्यम् शिवम् सुंदरम् के लिए गाने में मुश्किलें पैदा करके राज कपूर तक को नाकों चने चबवा दिए. लंबी तनातनी के बाद उन्होंने इस फिल्म के लिए गाया, लेकिन तभी जब कपूर हारकर रिकॉर्ड की रॉयल्टी का एक हिस्सा उन्हें देने के लिए राजी हो गए.

बी.आर. चोपड़ा अकेले बड़े निर्देशक थे जिन्होंने रॉयल्टी में हिस्सेदारी की लता की मांग नहीं मानी. चोपड़ा के करीबी सहयोगी ने इंडिया टुडे को बताया था: ''हमारा इरादा उनका निरादर करना नहीं है. लेकिन कारोबारी शर्तों पर हम सहमत नहीं हैं.’’

संगीत और फिल्म निर्देशक अलबत्ता अकेले में उनकी 'सनक’ के बारे में शिकायत करते थे. उनमें से एक ने बताया, ''अगर उनका मन नहीं हुआ, तो उनका ड्राइवर स्टुडियो को फोन करके कहेगा कि 'मैडम’ नहीं आएंगी. 'सॉरी’ तक नहीं.’’ एक अन्य नामी फिल्मकार ने दबी जुबान बताया कि उनके अहं को ''लगातार सहलाना जरूरी होता है.’’

आप लता को स्टुडियो में काम करते देखते तो कुछ अंदाजा मिल जाता. वे घड़ी के कांटे की तरह थीं, सीखने में कभी एक पाली से ज्यादा का वन्न्त नहीं लेती थीं. बस वहीं रिहर्सल करके गाना रिकॉर्ड करवा देतीं. यहां तक कि किशोर कुमार सरीखे प्रतिष्ठित गायक अक्सर हरेक रिकॉॄडग के लिए 10 बार रिहर्सल करते थे और कई रीटेक लेते. रफी भी कम वन्न्त में गाना पूरा नहीं कर पाते थे. यही नहीं, 70 लोगों के ऑर्केस्ट्रा के लिए एक पाली बचाने का मतलब 2,500 रुपए बचाना होता था, स्टुडियो के किराये की तो बात ही छोड़ दें.

तो वह क्या है जो इस अविश्वसनीय गायन मशीन को चलाता था? उत्तर: उनकी शैली, आवाज की रेंज और सुरीलापन. आवाज के सुरीलेपन को भले परिभाषित न किया जा सके, पर उसकी स्थिरता और धैर्य को आवाज की ऊंचाई नापने वाले वीयू-मीटर पर देखा जा सकता था. फिल्म सेंटर के रिकॉर्डिंग स्टुडियो में एक साउंड रिकॉर्डिस्ट ने बताया: ''जब लता, फर्ज कीजिए, आवाज को एक सुर ए तक नीचे लाती हैं, तो वीयू-मीटर का कांटा 440 के चक्र पर चट्टान की तरह स्थिर रहता है.

मैंने किसी भी दूसरे गायक के साथ ऐसा होते नहीं देखा. उनकी आवाज की रेंज भी चकराने वाली थी. सप्तक की ऊंचाई पर यह ठीक एफ पर पहुंच जाती है और निचले सप्तक पर ए जितने नीचे उतर आती है..’’ 

हिंदी फिल्म संगीत में पॉप शैली के अगुआ, शोले के संगीतकार और आशा के पति राहुल देव बर्मन ने कहा था, ''अतीत में गायिकाओं के लिए आवाज में ढेरों कंपन के साथ गाना आम बात हुआ करती थी. उनमें से केवल कुछ ही, शायद अकेली शमशाद बेगम, इससे बच पाती थीं. मगर उनमें से हरेक सुरों में कंपन होने देती थीं.

मगर वह शैली बदली और लंबे सुर लोकप्रिय हो गए. लता एक बार मर्दाना शैली पर चली गई थीं—कंपनरहित, झालररहित.’’ आशा की आवाज में भी गजब का लोच है. मगर उनके पास लता जैसी रेंज नहीं है. उनकी दूसरी दिक्कत उनकी आवाज की लपलपाती कमनीयता है, अकाट्य सक्वमोहकता, जो उन्हें केवल कैबरे और डिस्को गानों के खांचे में डाल देती है.

जद्दोजेहद: अलबत्ता बंबइया फिल्म उद्योग में संगीत पैकेजिंग योजना का अभिन्न हिस्सा है. 1975 तक फिल्म पोस्टरों पर संगीत निर्देशकों का नाम उतने ही बड़े अक्षरों में होता था जितने बड़े अक्षरों में निर्देशक का होता था. मगर पार्श्वगायकों की मोलभाव की ताकत तब बहुत निर्णायक नहीं होती थी, जब तक 1960 के दशक में लता की अगुआई में एक औरत की सेना ने जेहाद नहीं किया.

हर गाने के लिए मेहनताना पांच अंकों की धनराशि तक बढ़ाने के लिए उन्होंने प्रोड्यूसरों से मोलभाव किया. बाद में रिकॉर्ड कंपनियों से विशाल रॉयल्टी का एक हिस्सा गायकों को दिलवाने के लिए प्रोड्यूसरों पर सामूहिक दबाव डाला. जीएसआइ की बंबई स्थित मुक्चय इकाई के प्रमुख विजय किशोर दुबे स्वीकार करते हैं, ''यह गायकों की बड़ी जीत थी.’’

अलबत्ता उन्होंने जो पैसा कमाया और जो हक और अधिकार हासिल किया, वह भारतीयों—यहां और विदेशों में—के बीच उनकी जबरदस्त लोकप्रियता के आगे फीका है. उन्हें ऐ मेरे वतन के लोगो गाते सुनकर जवाहरलाल नेहरू सार्वजनिक रूप से रो पड़े थे. ताज्जुब नहीं कि उन्हें पद्मभूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न समेत विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा गया. 

उन्होंने विभिन्न भाषाओं में गाने रिकॉर्ड किए. दक्षिण में भी उन्हें स्वीकार किया गया है, जहां तिरुपति में उन्हें अष्ठाना संगीत विद्वांसुलु (मंदिर की राज संगीतकार) की उपाधि से नवाजा गया. उन्होंने नेपाली में एक गाना गाया, जिसके बोल राजा महेंद्र ने लिखे. असमिया में उनके गाने उतने ही दिल को छूते हैं जितने उनके भोजपुरी गाने या उनकी मूल भाषा मराठी में उनके गाने दिल के तार छेड़ देते हैं.

शोहरत का भार वजनदार सलीब की तरह होता है, हालांकि उन्होंने इसे असाधारण सहजता से धारण किया. इसने उनके इर्द-गिर्द एक घेरा बना दिया जो दिखाई नहीं देता था. राजमाता की तरह इसके भीतर बाकायदा विराजमान रहकर वे आधुनिक मीरा की सार्वजनिक छवि पर खरी उतरती थीं—सफेद साड़ी पहने अविवाहित महिला, जो हर हफ्ते, सफेद एंबेसेडर कार में, अपने हाथ में सफेद वैनिटी बैग झुलाती महालक्ष्मी मंदिर जाती थीं.

भिन्न छवि: विरले ही मौके होते थे जब वे इस छवि से कुछ बाहर आती थीं, मसलन जब वे विदेश दौरों पर जाती थीं. अस्सी के दशक के शुरू में वे साल में कम से कम चार महीने देश से बाहर रहती थीं. अमेरिका और यूरोप की उनकी अनगिनत ''सप्ताहांत यात्राएं’’ इनमें शामिल नहीं हैं. वहां वे खुद को नियंत्रणों से मुक्त खुला छोड़ देती थीं.

शिकागो में विवाहित दिल्ली की गृहिणी शांता आनंद ने बताया था, ''मैंने लास वेगास के कैसिनो में उन्हें भारी रकम हारते देखा है; न्यूयॉर्क के बॉम्बे रेस्तरां में मैंने उन्हें खाने का लुत्फ उठाते देखा है; मैंने उन्हें खुशमिजाज रंगों के छापों वाली साड़ी में फिफ्टी सेकंड स्ट्रीट पर ड्राइव करते देखा है. यह सब उनकी आम छवि से इतना अलग है, लेकिन मुझे अच्छा लगता है कि अमेरिका में वे अपनी सारी वर्जनाएं तोड़ देती हैं.’’

लता मुश्किल से ही कभी इसके बारे में बात करती थीं क्योंकि यह उनकी मीरा की छवि के अनुरूप नहीं थी. वे हर जगह नाक घुसेड़ने वाले बंबइया फिल्म प्रेस को बालिश्त भर दूर रखती थीं. अपनी निजी छवि को लेकर वे इतनी संवेदनशील और सतर्क थीं कि सांसों पर नियंत्रण के लिए वे रोज जो योगाभ्यास करती थीं, लेकिन उसके भी फोटो नहीं लेने देतीं. अपने योगाभ्यासों की ही बदौलत वे सांस लेने के लिए ठहरे बगैर इतने लंबे समय तक सक्रिय रहीं.

उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया कि वे रोज डेढ़ घंटे अपने घर पर तुलसीदास शर्मा नाम के एक शक्चस से शास्त्रीय संगीत के सबक सीखती थीं. उनके एक करीबी के मुताबिक, ''अगर आप कहें कि लता मंगेशकर को किसी से सीखना पड़ता है, तो हो सकता है लोग इसे गलत समझें.’’

वे अनिवार्य तौर पर संकोची और एकांतप्रिय थीं—ग्लैमर की मिलनसार दुनिया में निपट अकेली. उनके अकेले टिकाऊ साथी राजस्थान के खूबसूरत राजकुमार और क्रिकेट कमेंटेटर राज सिंह डूंगरपुर थे, जो उनकी तारीखें तय करते, प्रोड्यूसरों के साथ उनके करारों को अंतिम रूप देते और विदेशी दौरों में भी उनके साथ रहते थे.

अगर उनके संग-सोहबत की प्रेस में चर्चा होती, तो दोनों नाराज हो जाते. और यह लता मंगेशकर की अभेद्य हैसियत का ही संकेत है कि बंबई के पेशेवर कीचड़ उछालने वालों ने कभी इस रिश्ते का दोहन नहीं किया. यह 'अफवाह’ बस फिल्मी कॉकटेल पार्टियों में उनका पीछा करती थी और रात बीतने और आवाजें धुंधली पड़ने के साथ दम तोड़ देती थी. 

अलबत्ता उनकी मीरा की छवि, जो उन्हें इतनी अजीज थी, किसी बात से नहीं टूटी. न ही इस आरोप से कि वे बाजार पर अपना एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश करती थीं. उनके लिए अलबत्ता इनकी तब तक वाकई कोई अहमियत नहीं थी जब तक वे भारतीय फिल्म संगीत की ''निर्विवाद और अपरिहार्य’’ मलिका बनी हुई थीं.

1970 के दशक में ऐक्शन से भरपूर फिल्मों का दौर नया खतरा लाया. बंबइया फिल्मों में गानों की औसत संख्या 1960 के दशक के दर्जन भर से घटकर अस्सी के दशक में चार पर आ गई थी. सुरीलेपन की जगह इलेक्ट्रॉनिक शोर-शराबे ने ले ली. थाप के आगे गीत हार रहा था. 

भारत के एक-महिला केंद्रित संगीत उद्योग के लिए आने वाले वक्त की यह डरावना पदचाप जैसा था. लेकिन फिर नब्बे के दशक और नई सदी में सुरीले गानों का दौर आया. उनके नए गाने भी उतने ही मकबूल हुए. तमाम आलोचनाओं और उत्सुकताओं के बहुत ऊपर सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर की सर्वोच्च सत्ता कायम रहेगी.

—साथ में मोहम्मद वक़ास.

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