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गरीबीः गरीबों की थाली खाली

केंद्र सरकार के कल्याणकारी योजनाओं पर भारी-भरकम खर्च के बावजूद महामारी के वर्षों में गरीबी हटाने के मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन कमजोर रहा. बजट भी कम ही उम्मीद बंधाता है

मजबूरी कोलकाता में गरीबों को खाद्य पैकेट बांटते एनजीओ कार्यकर्ता
मजबूरी कोलकाता में गरीबों को खाद्य पैकेट बांटते एनजीओ कार्यकर्ता
अपडेटेड 17 फ़रवरी , 2022

पिछले साल नवंबर में स्टैंडअप कॉमेडियन वीर दास ने यह कहकर तहलका मचा दिया था कि साफ-साफ दो भारत हैं. भले ही दो भारत का विचार बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन आर्थिक विषमताएं स्पष्ट रूप से ऐसे हालात पैदा कर रही हैं, जो उसी नजरिए का इजहार करता है. इसे आंकड़ों में देखें. जनवरी में समानता पर जारी ऑक्सफेम इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे अमीर 98 भारतीयों के पास उतनी ही संपत्ति (657 डॉलर या 49.15 लाख करोड़ रुपए) है, जितनी करीब 55.5 करोड़ गरीब लोगों के पास है. अर्थशास्त्री तथा वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब के सह-निदेशक लुकाच चांसेल की अर्थशास्त्रियों टॉमस पिकेटी, इमैनुअल साएज और गैब्रिएल जुकमैन के साथ लिखी गई विश्व विषमता रिपोर्ट 2022 में बताया गया है कि भारत ''दौलतमंद एलीट वर्ग के साथ गरीब और बेहद गैर-बराबरी वाले देश'' के तौर पर सबसे अलग दिखता है, जहां चोटी के 10 फीसद के पास कुल राष्ट्रीय आमदनी का 57 फीसद है वहीं निचले 50 फीसद की हिस्सेदारी सिर्फ 13 फीसद है.

गरीबीः गरीबों की थाली खाली
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इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एक वयस्क आदमी की औसत सालाना राष्ट्रीय आय 2021 में 2,04,200 रु. है लेकिन निचले पायदान के 50 फीसद की आमदनी सिर्फ 53,610 रुपए है, जबकि चोटी के 10 फीसद की आमदनी 20 गुना ज्यादा (11,66,520 रुपए) है. कोविड महामारी के दौरान यह खाई बेहिसाब बढ़ी है. महामारी की शुरुआत से ही भारत के करीब 84 फीसद परिवारों की आमदनी में गिरावट आई है. थिंक टैंक प्राइस (पीपुल्स रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी) ने खुलासा किया कि 2020-21 में भारत में 20 फीसद सबसे गरीब परिवारों की सालाना आमदनी करीब 53 फीसद घटी है. इसके मुकाबले, चोटी के 20 फीसद परिवारों की आमदनी में इसी अवधि के दौरान करीब 39 फीसदी की वृद्धि हुई.

इसलिए 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब बजट पेश किया तो चुनौती सिर्फ महामारी की चोट खाई अर्थव्यवस्था के साज-संभाल की ही नहीं थी, बल्कि उसे अधिक समावेशी भी बनाना था. मई 2020 में केंद्र सरकार ने कमजोर लोगों को महामारी की मार से बचाने के वास्ते 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज घोषित किया जिसमें 1.7 लाख करोड़ रु. की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना और महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गांरटी एक्ट (मनरेगा) के तहत सहायता और एमएसएमई, प्रवासी कामगारों, फुटपाथ के दुकानदारों और कृषि व संबंधित क्षेत्र के लोगों की मदद का प्रावधान था. साथ ही आवास, बिजली, स्वच्छता, रसोई गैस, पेयजल और आर्थिक समावेशन के लिए बैंक खातों समेत पहले से चल रही योजनाओं के तहत भी मदद जारी है.

गरीबीः गरीबों की थाली खाली
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इन उपायों के बावजूद, अनेक अध्ययनों में दावा किया गया कि भारत में महामारी के दौरान गरीबी में आबादी की हिस्सेदारी में खासी वृद्धि हुई. बीते साल अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में दावा किया गया कि महामारी के दौरान 23 करोड़ भारतीय गरीबी की खाई में चले गए, जबकि प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट कहती है कि महामारी से जन्मी मंदी के कारण एक साल में भारत में गरीबों की संख्या 6 करोड़ से दोगुनी बढ़कर 13.4 करोड़ हो गई.

इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी जोर का मकसद रोजगार बढ़ाना और उपभोग को रफ्तार देना है, लेकिन यह शायद काफी न हो, क्योंकि पिछले दो साल में रहने-खाने का खर्च कई गुना बढ़ गया है. रोजगार के अवसरों की किल्लत ने आमदनी को प्रभावित किया है. किसी परिवार के खर्च के दो मुख्य स्रोत स्वास्थ्य और शिक्षा की मद में काफी इजाफा हुआ है.

ऑक्सफेम की रिपोर्ट के मुताबिक, किसी सुपर-स्पेशिएलिटी निजी अस्पताल में कोविड-19 के इलाज का खर्च आम भारतीय की औसत मासिक आमदनी का 31 गुना हो सकता है. सिर्फ कोविड ही नहीं, स्वास्थ्य की मद में जेब से खर्च 5.5 करोड़ लोगों को 2017 में गरीबी की ओर ढकेल ले गया. इसी तरह, पिछले दो साल में दूसरा सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्र शिक्षा का है. डिजिटल शिक्षा की ओर अचानक अग्रसर होने से मोबाइल फोन या लैपटॉप खरीदने और इंटरनेट डेटा प्लान खरीदने से खर्च में इजाफा हुआ है.

गरीबीः गरीबों की थाली खाली
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महामारी की मार से रोजगार में भारी कटौती के वर्ष में, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट आवंटन बढ़ाए जाने की उम्मीद थी. शिक्षा पर सरकारी खर्च 2014 और 2019 के बीच जीडीपी के करीब 3 फीसद के आसपास घूमता है, जबकि ऐतिहासिक लक्ष्य 6 फीसद का है. दूसरे मध्यम आय वाले देश ज्यादा खर्च करते हैं—मसलन, ब्राजील 6.1 फीसद, रूस 4.7 फीसद और दक्षिण अफ्रीका 6.8 फीसद. इन देशों में स्वास्थ्य पर भी भारत के 3.5 फीसद के मुकाबले ज्यादा आवंटन रहा है—ब्राजील 9.5 फीसद, रूस 5.3 फीसद और दक्षिण अफ्रीका 8.2 फीसद. इस बजट में महामारी की हालत के मद्देनजर केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य पर खर्च का बजट आवंटन (2020-21 के मुकाबले) 28 फीसद बढ़ाया है, लेकिन इसी अवधि में शिक्षा मंत्रालय का आवंटन महज 5 फीसद बढ़ा है. दरअसल सरकार के 2020 में नई शिक्षा नीति के ऐलान के बावजूद बजट आवंटन 2020-21 में 99,311.5 करोड़ रु. से घटकर 2021-22 में 93,224.3 करोड़ रु. हो गया है.

फिर भी, कई खराब प्रदर्शन वाले राज्यों ने शिक्षा और स्वास्थ्य की मद में अधिक रकम का आवंटन करके चीजें सुधारने की कोशिश की है. पिछले साल जारी हुए नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआइ) के मुताबिक, बिहार और असम जैसे राज्य शिक्षा और स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं, जिनकी बहुआयामी गरीब आबादी क्रमश: 52 फीसद और 33 फीसद है. असल में, असम तो बड़े राज्यों में शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाला रहा है. इसके नतीजे भी दिख रहे हैं. असम, नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक, 2019-20 में स्वास्थ्य क्षेत्र में खासी प्रगति दिखाने वाला दूसरा राज्य बनकर उभरा है.

गरीबीः गरीबों की थाली खाली
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इसी तरह, उत्तर प्रदेश ने आधार वर्ष (2018-19) से संदर्भ वर्ष (2019-20) के बीच माध्यमिक स्वास्थ्य परिणाम सूचकांक के प्रदर्शन में खासा सुधार दिखाया है.

लेकिन ऐसी बढ़ोतरी वाले सुधार इसलिए फीके पड़ जाते हैं क्योंकि अव्वल पांच राज्यों और निचले पांच राज्यों के बीच कुल प्रदर्शन का फर्क बड़ी खाई जैसा है. बहुआयामी गरीब बिहार में 52 फीसद हैं तो केरल में 1 फीसद से भी कम हैं.

गरीबी में यह फर्क इन राज्यों के स्वास्थ्य और शिक्षा की मद में प्रदर्शन में झलकता है. नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक 2019-20 में अव्वल चार राज्य दक्षिण के केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश हैं जबकि निचले चार हिंदी प्रदेश से-उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान हैं. समृद्ध दक्षिण भारतीय राज्यों ने खासकर स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश की विरासत की वजह से अच्छा प्रदर्शन किया है.

इस फर्क को गहरा करने वाला दूसरा पहलू पौष्टिकता का स्तर है. दुनिया की पौष्टिकता में कमी वाली कुल आबादी का एक-चौथाई भारत में है. फूड पॉलिसी जर्नल में प्रकाशित इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आइएफपीआरआइ) की कल्याणी रघुनाथन के अक्तूबर 2020 के अध्ययन-पत्र से पता चला कि 60 फीसद भारतीय पौष्टिक आहार नहीं खा पाते. इनमें ज्यादातर आबादी हिंदी प्रदेशों और पूर्वी राज्यों की है. नीति आयोग की एमपीआइ रिपोर्ट के मुताबिक, पांच राज्यों-बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आंकड़े 43-52 फीसद के बीच हैं. केरल और तमिलनाडु की हिस्सेदारी क्रमश: 15 फीसद और 25 फीसद है. दूसरे सूचकांकों के मामलों में भी यही सही है. केरल में शिशु मृत्यु दर प्रति 1,000 जन्म पर सिर्फ 4.4 है और तमिलनाडु में 18.6 है. इसके विपरीत बिहार और उत्तर प्रदेश में यह क्रमश: 50.4 और 46.8 है. शिक्षा का सूचकांक भी राज्यों के बीच खाई का आईना है. स्कूली शिक्षा से वंचित आबादी की हिस्सेदारी बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 27 फीसद से 17 फीसद के बीच है (एमपीआइ आंकड़े). यह हिस्सेदारी केरल, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में 2 फीसद से 7 फीसद के बीच है. 

इन फर्कों को हाल में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-5 के संदर्भ में देखने से कई सामाजिक मिथक टूट जाते हैं. कई राज्यों में यह राजनैतिक अफसाना जोरदार है कि ऊंची जनसंख्या वृद्धि के लिए मुसलमान जिम्मेदार हैं. लेकिन विडंबना देखिए कि एनएफएचएस-5 से पता चलता है कि देश में प्रजनन दर-यानी प्रति महिला बच्चे की दर बदलाव स्तर से नीचे 2 पर पहुंच गई है (बदलाव स्तर 2.1 है, जो किसी देश में जन्म और मृत्यु की संख्या में संतुलन के लिए जरूरी आधार-रेखा है). इस दर से जनसंख्या न बढ़ रही है, न घट रही है. वह स्थिर बनी हुई है. 2.1 से नीचे जाने का मतलब है कि भारत में जनसंख्या विस्फोट नहीं है और भविष्य में इसमें गिरावट देखी जा सकती है. एनएफएचएस-5 से यह भी पता चला है कि 15 वर्ष से कम आयु वर्ग की आबादी देश में 2015-16 के 28.6 फीसद से गिरकर 2019-20 में 26.5 फीसद पर आ गई है.

गरीबीः गरीबों की थाली खाली
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सबसे बढ़कर देश में मुसलमान बहुल आबादी वाले इकलौते जम्मू-कश्मीर (जो राज्य से अब केंद्र शासित प्रदेश है) में सबसे कम प्रजनन दर 1.4 दर्ज की गई है. दूसरे नंबर पर ज्यादा मुस्लिम आबादी (34 फीसद) वाले असम में प्रजनन दर 1.9 दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है. इसके उलट सबसे ऊंची प्रजनन दर वाले दो राज्य बिहार (3) और उत्तर प्रदेश (2.4) वही हैं, जो स्वास्थ्य और शिक्षा के एमपीआइ सूचकांक में सबसे नीचे हैं.

जानकारों के मुताबिक, समृद्ध राज्यों में शिक्षा के उच्च स्तर और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से सभी धर्मों में महिलाओं की शादी अधिक उम्र में होती है और नतीजतन प्रजनन दर में गिरावट आती है. मुंबई में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज में डिपार्टमेंट ऑफ बायोस्टैटिस्टिक्स ऐंड इपीडेमियोलॉजी की प्रमुख प्रोफेसर सईदुन निसा कहती हैं, ''प्रजनन का काफी ज्यादा रिश्ता धर्म या जाति के बदले शिक्षा से जुड़ा है.''

भारत की 1.3 आबादी—जिसे कई सामाजिक बुराइयों की जड़ माना जाता है—अब स्थिर हो गई है. लेकिन उसका काफी बड़ा भाग गरीबी में जकड़ा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार गरीबों और वंचितों को आवास, बिजली, रसोई गैस, पानी और वित्तीय समावेशन के जरिए ताकत देने का काम कर रही है. 2005-06 और 2015-16 में बहुआयामी गरीबों की आबादी 54.7 फीसद से गिरकर 27.5 फीसद हो गई. मौजूदा सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह उस रुझान को महामारी की वजह से मुड़ने न दे.

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