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देश का मिजाज सर्वेक्षणः मोदी में है भरोसा...

इस छमाही जनमत सर्वेक्षण से पता चलता है कि लोगों की राय में प्रधानमंत्री अब भी बेहतरीन विकल्प, मगर चिंता की लकीरें पहले से और गहरी होकर उभरीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
अपडेटेड 27 जनवरी , 2022

निकोलो मैकियावेली ने अपनी किताब द प्रिंस में लिखा है, ''यहां कुछ भी हाथ में लेना उतना कठिन नहीं, कुछ भी करना उतना खतरनाक नहीं, कुछ भी अपनी सफलता में उतना अनिश्चित नहीं, जितना चीजों की नई व्यवस्था के आरंभ की अगुआई करना है.'' अपने दूसरे कार्यकाल के मध्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश को मौजूदा आर्थिक दलदल से बाहर निकालने और मजबूती से समृद्धि के रास्ते पर ले जाने के लिए प्राथमिकताओं में निर्णायक बदलाव लाना होगा. उन्हें अपने कार्यकाल के बचे हुए वर्षों का इस्तेमाल देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाली महान शक्ति बनने में करना होगा—ताकि उस किस्म की नई व्यवस्था हासिल की जा सके जिसका जिक्र मैकियावेली कर रहे थे.

ये इंडिया टुडे-सी-वोटर छमाही देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के जनवरी, 2022 संस्करण से उभरते दो मुख्य निष्कर्ष हैं. सर्वे में लोगों ने यह विश्वास दोहराया है कि नरेंद्र मोदी शीर्ष पद के लिए सबसे उपयुक्त बने हुए हैं. देश के सामने मौजूद संकटों की तिकड़ी—अभूतपूर्व और लंबी कोविड महामारी, तहस-नहस अर्थव्यवस्था और चीन के साथ सीमा पर खतरनाक टकराव—को प्रधानमंत्री ने अब तक जिस तरह संभाला है, यह भरोसा उससे उपजा है.

मोदी की निजी लोकप्रियता इस सर्वे में और ऊपर पहुंच गई है. अगस्त, 2021 में 54 फीसद के मुकाबले 62.8 फीसद लोगों ने उनके कामकाज को अच्छा या बेहतरीन आंका है. यह कोविड की पहली लहर के शिखर पर अगस्त, 2020 में प्रधानमंत्री को मिली असाधारण 78 फीसद स्वीकृति से कुछ दूर है. मगर इससे कामों को अंजाम देने की मोदी की काबिलियत में उनका भरोसा कमजोर नहीं होता.

देश का मिजाज सर्वेक्षणः मोदी में है भरोसा...
देश का मिजाज सर्वेक्षणः मोदी में है भरोसा...

उनकी लोकप्रियता और उनके सबसे करीबी विपक्षी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकप्रियता के बीच बढ़ती खाई इस धारणा को पुख्ता करती है. जब पूछा गया कि अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए कौन सबसे ज्यादा उपयुक्त है, तो 52.5 फीसद लोगों ने मोदी और महज 6.8 फीसद ने राहुल के पक्ष में राय दी, जो 46 फीसद का विशाल अंतर है. अगस्त 2021 में यह अंतर घटकर 14 फीसद पर आ गया था, जब मोदी का आंकड़ा 24 फीसद और राहुल का 10 फीसद था. एनडीए सरकार के कामकाज की रेटिंग भी बढ़ी है, जब 58.7 फीसद लोगों ने कहा कि वे संतुष्ट या बहुत संतुष्ट हैं, जबकि अगस्त 2021 में ऐसा कहने वाले 53 फीसद थे.

मोदी और उनकी सरकार के प्रति भरोसे के इस बूस्टर डोज की क्या वजहें हैं? इसकी एक वजह तो कोविड के खिलाफ टीके का वह जबरदस्त अभियान मालूम देता है, जो 18 जनवरी को 1.64 अरब के पार चला गया और जिसमें भारत की 94 करोड़ वयस्क आबादी के 70 फीसद से ज्यादा लोगों को अब पूरे टीके लग चुके हैं. इससे महामारी से घिरे देश में सुरक्षा का एहसास तारी हुआ और जिंदगियों तथा रोजी-रोटियों की रक्षा हुई, सो अलग.

आज चुनाव हुए तो संभावित नतीजे
आज चुनाव हुए तो संभावित नतीजे

देश का मिज़ाज सर्वे में इसी अनुमोदन की झलक तब भी दिखाई दी, जब कोविड महामारी से निबटने को एनडीए सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया. इसके बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण (15.7 फीसद) और कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाना (12 फीसद) था. यह अगस्त, 2021 के सर्वे से बिल्कुल विपरीत है, जिसमें दूसरी लहर के प्रचंड उभार के वक्त कोविड से निपटने को सरकार की सबसे बड़ी नाकामी माना गया था.

ऐसा लगता है कि इस झटके से सबक सीखते हुए मोदी तीसरी लहर की तरफ धकेल रहे कोविड के हालिया वैरिएंट ओमिक्रॉन के खतरे से निबटने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आए. प्रधानमंत्री ने 60 साल से ऊपर के लाचार वयस्कों के लिए बूस्टर डोज का और 15 से 18 साल आयु वर्ग के किशोरों को टीके लगाना शुरू करने का ऐलान किया. मोदी ने सभी मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस भी की और उन्हें इस चुनौती के खिलाफ कमर कसते हुए टेस्टिंग सुविधाएं बढ़ाने, ऑक्सीजन की आपूर्ति और क्रिटिकल केयर उपकरणों के साथ पर्याप्त बिस्तरों के इंतजाम की सलाह दी.

अलबत्ता मोदी और उनकी सरकार को इस देश का मिज़ाज सर्वे में जो समर्थन मिला है, उसके साथ कुछ चेतावनियां भी जुड़ी हैं. बढ़ती कीमतों और बेरोजगारी को सरकार की दो सबसे बड़ी नाकामियों में गिना गया है. इस सूची में नोटबंदी को और जोड़ लें, तो 44 फीसद जितनी बड़ी तादाद में लोगों ने सरकार से हुई सबसे बड़ी निराशाओं में आर्थिक मुद्दों की तरफ इशारा किया है. हालांकि सरकार को इस बात से कुछ तसल्ली मिल सकती है कि लोगों का बहुमत—51.9 फीसद—अब भी मानते हैं कि उसने अर्थव्यवस्था को अच्छी तरह संभाला.

राज्यवार सीटें
राज्यवार सीटें

तिस पर भी कुछ अन्य विचारणीय संकेतकों से इस मोर्चे पर आत्मसंतोष दूर हो जाना चाहिए. 64 फीसद जितनी बड़ी तादाद में लोग मानते हैं कि 2014 में मोदी सरकार के कमान संभालने के बाद उनकी आर्थिक हैसियत या तो जस की तस है या बदतर हुई है और 51 फीसद तो अगले छह महीनों में हालात बेहतर होने की उम्मीद तक नहीं करते. यही नहीं, सर्वे में शामिल आधे से ज्यादा लोग उम्मीद करते हैं कि उनके घर की आमदनी जहां की तहां रहेगी या और बदतर होगी, जबकि 64 फीसद ने बताया कि कोविड-19 की वजह से उनकी आमदनी घटी है. करीब 45 फीसद ने नौकरियों की कमी को बेहद गंभीर समस्या बताया. ये मोदी सरकार के लिए खतरे के संकेत होने चाहिए.

सर्वे के निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के कुल कामकाज को पिछले सर्वे के मुकाबले कहीं बेहतर आंकने के बावजूद 543 सदस्यीय लोकसभा में बहुमत के लिहाज से उनकी स्थिति 2019 की भारी जीत के मुकाबले कमजोर क्यों बनी हुई है. सरकार की स्थिरता को तत्काल कोई खतरा नहीं है, पर अगर आज चुनाव हों, तो एनडीए मई 2019 में जीती अपनी वास्तविक 352 सीटों से घटकर 296 पर आ जाएगा और इस तरह उसे 56 सीटों का नुक्सान होगा. लगातार दूसरे सर्वे में सत्तारूढ़ भाजपा की सीटों में 30 सीटों की गिरावट आई है और उसकी अपनी सीटों की संख्या 271 पर आ गई है, जो बहुमत से एक कम है, जबकि 2019 के चुनाव में उसने वास्तव में 303 सीटें जीती थीं. कांग्रेस पार्टी को फायदा हुआ है, पर ज्यादा नहीं. 2019 की उसकी 52 सीटों में महज 10 का इजाफा हुआ है.

लोगों के रुझान में फर्क
लोगों के रुझान में फर्क

भाजपा के लिए हालात और भी बदतर हो सकते थे, अगर कांग्रेस की स्थिति उन प्रमुख राज्यों जहां उसने 2018 में विधानसभा चुनाव जीते थे—मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़—में काफी कमजोर न हुई होती. मौजूदा सर्वे कहता है कि इन राज्यों में आज भाजपा उसी तरह बहुमत हासिल करेगी, जैसे उसने 2019 में किया था. यहां तक कि गुजरात में भी, जहां कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव में कड़ी टक्कर दी थी, आज की स्थिति में संसदीय चुनाव में उसे कोई फायदा होने की संभावना नहीं है और ऐसा बाद में पार्टी के भीतर छिड़ी अंतर्कलह की वजह से होगा.

लोगों के रुझान में फर्क
लोगों के रुझान में फर्क

इसके विपरीत भाजपा इन चार राज्यों को जीतने के अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार में सूपड़ा साफ करके अपना बहुमत बनाए रख सकती है. सर्वे बताता है कि पूरब और दक्षिण में सीटें हासिल करने की भाजपा की बेतहाशा कोशिशें फलीभूत नहीं हुई हैं. पश्चिम बंगाल में पार्टी को पिछले साल राज्य के चुनाव में भीषण पराजय झेलनी पड़ी और ओडिशा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अपराजेय बने हुए हैं. कर्नाटक में भाजपा की स्थिति नाजुक बनी हुई है, जबकि तेलंगाना में बड़ी छलांगें लगाने के बावजूद भाजपा के. चंद्रशेखर राव की सरकार को बेदखल कर सकेगी, इसकी कोई संभावना नही है. न ही वह महाराष्ट्र में सत्ता पर महाराष्ट्र विकास अघाड़ी का शिकंजा कमजोर कर पा रही है.

हालांकि हाल के राज्य चुनावों में मोदी के करिश्मे का प्रतिफल मिलना कम हुआ है, लेकिन फिर भी वे 2024 में दोबारा चुनकर आने के लिए भाजपा के ट्रंप कार्ड बने हुए हैं. सर्वे के नतीजों से पता चलता है कि ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी (इसी क्रम से) विपक्ष के गठबंधन की अगुआई करने के लिए सबसे उपयुक्त माने जा रहे हैं, पर उनकी लोकप्रिय अपील मोदी के मुकाबले बहुत पीछे है. यही वजह है कि विपक्ष अब तक मोदी सरकार के खिलाफ कोई भरोसेमंद अफसाना खड़ा नहीं कर पाया है या मतदाताओं को राजकाज का सुसंगत और वैकल्पिक विजन नहीं दे पाया है. दरअसल, सर्वेक्षण के नतीजों से पता चलता है कि मोदी को भारत में अब तक हुए प्रधानमंत्रियों में सबसे अच्छा माना जाता है और वे इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और जवाहरलाल नेहरू से भी कहीं आगे हैं.

लोगों के रुझान में फर्क
लोगों के रुझान में फर्क

सबसे दिलचस्प यह है कि जब लोगों से भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के उत्तराधिकारी के बारे में पूछा गया, तो पहली बार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच घर्षण देखा गया. पिछले देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में फासला घटने लगा था. अगर भाजपा उत्तर प्रदेश का आसन्न चुनाव जीत जाती है तो शायद पलड़ा आदित्यनाथ की ओर झुक जाए. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का उभार शायद इस वजह से है कि उन्हें कट्टर हिंदुत्व वाला माना जाता है, जैसी मोदी की छवि 2014 के पहले थी. 2014 की होड़ में ही मोदी ने प्रमुख कट्टर छवि के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को पीछे छोड़ दिया था और वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के प्रमुख दावेदार बनकर उभरे थे.

यह आम धारणाओं का संघर्ष हो सकता है, लेकिन इसमें शक नहीं है कि एनडीए सरकार के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से मोदी-शाह जोड़ी ने हिंदुत्व की अपनी साख को मजबूत किया है. उन लोगों ने अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए फुर्ती से कदम बढ़ाया (जिसमें शाह ने बढ़त ली) और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तेजी से उसके निर्माण का काम शुरू कराया. ये दोनों ही मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियां मानी गई हैं, जिससे भाजपा को अपने हिंदुत्व वोट बैंक को एकजुट रखने में मदद मिली है.

सबसे बेहतर प्रधानमंत्री कौन
सबसे बेहतर प्रधानमंत्री कौन

कुल मिलाकर देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के नतीजे मोदी और उनकी सरकार के लिए मिले-जुले हैं. वे अप्रत्याशित संकटों के दौर में भी जन समर्थन बनाए रखने का श्रेय ले सकते हैं, जबकि इसके उलट यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दो वर्ष बाद ही मनमोहन सिंह सरकार की लोकप्रियता छीजने लगी थी. फिर भी, बढ़ती आर्थिक परेशानियां, खासकर उछाल लेती महंगाई और बेरोजगारी की दर में इजाफा मोदी और उनकी सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर रहा है. भाजपा की ध्रुवीकरण, अति-राष्ट्रवाद और कुछ वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की रणनीति शायद 2024 में जीत के लिए काफी न हो.

इसकी वजह यह है कि लाभार्थी भले मोदी की उनकी कई कल्याणकारी योजनाओं के लिए तारीफ करें, मगर वे सरकारी खैरात के बदले सुरक्षित रोजगार और आमदनी में बढ़ोतरी चाहते हैं. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में यह आम धारण प्रतिध्वनित हुई है कि सरकार की आर्थिक नीतियों से मोटे तौर पर बड़े कारोबारी घरानों को ही फायदा मिला है. इसके अलावा, सर्वेक्षण में दूसरे संबंधित रुझान भी हैं, जो मोदी और उनकी टीम का चिंता का सबब होना चाहिए. एक तो यही कि बदले की कार्रवाई के डर से लोग खुलकर बोलने से घबराते हैं. फिर, ये चिंताएं भी हैं कि लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं की अवहेलना हो रही है. अल्पसंख्यकों में सांप्रदायिक अमन-चैन को लेकर शंका बनी हुई है. अपने दूसरे कार्यकाल के बाकी बचे वर्षों में प्रधानमंत्री को व्यापक राजनैतिक सहमति की खातिर बातचीत की पहल करके इस बेचैनी को शांत करना चाहिए.

देश का मिजाज सर्वेक्षण
देश का मिजाज सर्वेक्षण

मोदी की सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक वृद्घि को बढ़ाने की है, जिससे अधिक रोजगार पैदा हो और महंगाई पर रोक लगे. यह भी चिंता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को झटका लगता है, तो प्रधानमंत्री अपने दूसरे कार्यकाल में शुरू किए गए सुधारों पर अमल से पीछे हट सकते हैं.

देश का मिजाज सर्वेक्षण
देश का मिजाज सर्वेक्षणः मोदी में है भरोसा...

उनके राजनैतिक दबाव में झुकने की एक मिसाल कृषि कानूनों पर पीछे हट जाना माना जा रहा है. हालांकि मोदी के साथ काम करने वाले करीबी लोग ऐसी गलतफहमियों को खारिज करते हैं और जोर देकर कहते हैं कि प्रधानमंत्री निजीकरण सहित सभी सुधारों पर जोरदार ढंग से आगे बढ़ेंगे. सरकार को पूरा यकीन है कि ओमिक्रॉन अर्थव्यवस्था को वैसा नुक्सान नहीं पहुंचाएगा, जैसा पहली लहर में हुआ था.

देश का मिजाज सर्वेक्षण
देश का मिजाज सर्वेक्षणः मोदी में है भरोसा...

सबसे बढ़कर, उनके सलाहकारों का मानना है कि उनकी सरकार के हालिया आर्थिक प्रोत्साहन और सुधारों के साथ आगे आने वाले कुछ और कदमों से तेजी से आर्थिक विकास होगा और बेरोजगारी की चिंताएं कम होंगी. प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा इंडिया टुडे से कहते हैं, ''हमने वृद्घि के लिए संतुलित, समेकित नजरिए के साथ तात्कालिक, मध्यम और दीर्घ अवधि के उपायों पर गौर किया है. बेरोजगारी और महंगाई चुनौती बनी हुई है, लेकिन हमें भरोसा है कि हम उन पर काबू पा सकेंगे. सुधार प्रक्रिया धीमी नहीं पड़ेगी. प्रधानमंत्री मौजूदा सिस्टम और प्रक्रियाओं में पूरी तरह बदलाव चाहते हैं. उन्हें पूरा यकीन है कि भारत को 2047 तक विकसित देश होने के लिए तेज आर्थिक वृद्घि की जरूरत है.''  

देश का मिजाज सर्वेक्षण
देश का मिजाज सर्वेक्षण

प्रधानमंत्री के साथ विभिन्न भूमिकाओं में दो दशकों से काम करने वाले मिश्रा यह भी कहते हैं, ''प्रधानमंत्री अब ज्यादा भरोसे से आगे बढ़ रहे हैं और बदलाव की रफ्तार के प्रति हमेशा सतर्क रहते हैं और सभी मुद्दों पर करीबी नजर रखते हैं.'' ऐसा लगता है कि यही विश्वास देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में लोग भी प्रधानमंत्री की काबिलियत में रखते हैं कि वे देश को संकट से निकाल लेंगे और ऊंचाई पर ले जाएंगे. वे मोदी पर भरोसा कर रहे हैं कि देश को नीचा नहीं देखने देंगे. 

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