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आवरण कथाः तमाम महाशक्तियों की जननी

इतिहास का अंत: 21वीं सदी में महाशक्ति पर नए सिरे से विचार.

थॉमस फ्रीडमैन
थॉमस फ्रीडमैन
अपडेटेड 8 नवंबर , 2021

इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2021

थॉमस फ्रीडमैन, तीन-बार के पुलित्जर पुरस्कार विजेता और लेखक

कोविड-19 की सबसे विध्वंसक मार अमेरिका पर पड़ी. 7,00,000 से ज्यादा मौतों के साथ वह आज भी सर्वाधिक प्रभावित देश है. विश्व की महाशक्ति एकाएक घुटनों पर आ गई. पुलित्जर विजेता लेखक-स्तंभकार थॉमस फ्रीडमैन के लिए यह एकमात्र महाशक्ति प्रकृति मां की जीत थी.

15 साल पहले वे यह बोलकर मशहूर हुए थे कि दुनिया सपाट है क्योंकि इसने दूरसंचार का प्लेटफॉर्म बनाया है, जिससे अब ज्यादा तरीकों से ज्यादा जगहों के ज्यादा लोग जुड़ और साथ मिलकर काम तथा प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं.

उनके विचार से महामारी इस सपाट दुनिया के लिए दूसरा निर्णायक क्षण थी. इसने उन देशों को उघाड़कर रख दिया जिनके पास अच्छी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था और साथ मिलकर काम करने में समर्थ बनाने वाली राजनीति नहीं थी.

‘‘महामारी ने अमेरिका में साबित किया कि देश का एक बड़ा हिस्सा समन्वित ढंग से निबटना नहीं चाहता था...केमिस्ट्री, बायोलॉजी और फिजिक्स की बजाए विचारधारा और राजनैतिक चुनाव अभियान के साथ जवाब देना चाहता था.

जब आप दूसरी महाशक्ति के साथ ऐसा करते हैं तो मुमकिन है आप ऐसा करके बच निकलें. पर जब आप तमाम महाशक्तियों की जननी प्रकृति के साथ ऐसा करते हैं तो, बच्चे! वही तो सारी केमिस्ट्री, बायोलॉजी और फिजिक्स है, वह तुमसे कीमत वसूल करेगी’’

अहम बातें
दुनिया तेजी से बढ़ रही है. माइक्रोचिप, बैंडविद्थ, सेंसर, सॉफ्टवेयर, मशीन लर्निंग के पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव तेजी से रफ्तार पकड़ रहे हैं

यह आपस में एकमेक हो रही है, जलवायु परिवर्तन से भी—हम अब मौसम की एक जैसी उग्रताएं झेल रहे हैं—और दूरसंचार से भी

यह वाकई गहरी हो रही है. टेक्नोलॉजी हमें ऐसी जगहों पर ले जा रही है जो इतनी गहरी हैं कि सरकार भी नहीं जानती कि हम कहां हैं

यह आमूलचूल खुल रही है; इस नन्हे-से यंत्र से कोई भी प्रकाशक, फिल्मकार, पैपराजी (तस्वीर के लिए हस्तियों का पीछा करने वाला फोटोग्राफर), संपादक बन सकता है, और यह हरेक की टीका-टिप्पणी के लिए खुला है

यह वाकई स्मार्ट हो रही है; अब हमने ऐसी मशीनें बना ली हैं जो मानव मस्तिष्क से विकसित किसी भी चीज से आगे हैं

टिक-टिक करते बम: हमारे वक्त की आतंक और जासूसी की खौफनाक और हैरतअंगेज कहानियां

एड्रियन लेवी, पत्रकार और स्पाइ स्टोरीज के सह-लेखक

‘‘आइएसआइ ऐसी अदम्य स्थिति में है कि यह किन्हीं भी नागरिक प्रक्रियाओं से बंधी नहीं है और किसी भी देखरेख या निगरानी से हमेशा बच निकली है. 1980 के दशक में यह बेहद मालामाल भी हुई... यह वह दौर था जब यह लड़ाई में लहूलुहान हुई पर साथ ही अकूत दौलतमंद भी...और इसलिए फिर इसने अपना ध्यान भारत की तरफ मोड़ा’’

‘’रॉ बिल्कुल अलहदा है, यह आइएसआइ के 20 साल बाद वजूद में आया और कई, कई सालों तक अपने गुट-निरपेक्ष, ज्यादा शांतिकामी नजरिए के लिए काफी सम्मानित और बहुत ही दुलारा था’’

‘‘आइएसआइ कुख्यात, दुष्ट, विवेकहीन मालूम देती है (जबकि) भारतीय ऐसे पुलिस अफसरों की तरह (पेश किए जाते हैं) जो लोकतंत्र से बंधे हैं. दरअसल दोनों के पास जासूसी के हर पहलू को संभालने के लिए तमाम किस्म के कामों में दक्ष खुफिया तंत्र हैं’’.

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