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आवरण कथाः माहिर खिलाड़ी

तोक्यो में अगर पदक मिल जाता है तो यह भारत में इस खेल के सुनहरे भविष्य और मिर्जा, दोनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है.

फवाद मिर्जा
फवाद मिर्जा
अपडेटेड 16 जुलाई , 2021

फवाद मिर्जा, 29 वर्ष 
क्षेत्र: घुड़सवारी 

श्रेणी: व्यक्तिगत प्रदर्शन जिनमें ड्रेसेज (घोड़े पर बैठने के करतब), शो जंपिंग (छलांग) और क्रॉस कंट्री (खुले मैदान में रेस) शामिल है

उपलब्धियां:  2018 एशियन गेम्स में दो रजत पदक, व्यक्तिगत और टीम इवेंट में

कैसे क्वालिफाइ किया: ओशियाना ग्रुप क्वालिफायर्स (दक्षिण पूर्व एशिया) की रैंकिंग में शीर्ष स्थान पाकर 2019 में ओलंपिक कोटा सुनिश्चित किया. मिर्जा ने मई 2021 में पोलैंड में दो घोड़ों के साथ सीसी144 लांग इवेंट कंपीटिशन में न्यूनतम अहर्ता प्राप्त की

फवाद मिर्जा के लिए छुट्टी का कोई दिन नहीं होता. उनकी हर सुबह 7 बजे जर्मनी के बर्गडॉर्फ में एक अस्तबल में शुरू होती है जहां वे सात से आठ घोड़ों के साथ समय बिताते हैं. उनमें सिग्नॉर मेडिकॉट भी शामिल है, जिसके साथ उन्होंने दो एशियन गेम्स मेडल जीते हैं. घोड़ों की सवारी करने के अलावा मिर्जा उन्हें खिलाते और नहलाते हैं और उन्हें चराने और टहलाने के लिए भी लेकर जाते हैं. मिर्जा कहते हैं कि जानवर का भरोसा जीतने के लिए आपको उनके साथ समय बिताना होता है. इससे दोनों के बीच लगाव बढ़ता है. 

बेंगलूरू स्थित मिर्जा के परिवार में घोड़ों के प्रति लगाव पुराना है. उनके पिता, डॉ. हसनैन मिर्जा, भारत में घोड़ों के जाने-माने पशु चिकित्सकों में से एक हैं. मिर्जा के मुताबिक, ''जब मैं बड़ा हो रहा था तब मेरे पास खेलने के लिए कभी गेमबॉय या प्लेस्टेशन नहीं था.’’ पांच साल की उम्र में वे एक स्टड फार्म में घोड़े की सवारी करने लगे थे और जल्द ही वे मुकाबले में हिस्सा लेने के लिए घुड़सवारी करने लगे थे. उनके पहले जूनियर नेशनल चैंपियनशिप पदक ने घुड़सवारी के उनके शौक को पेशे में बदलने की ख्वाहिश पैदा कर दी. 

घुड़सवारी महंगा खेल है. 2014 से मिर्जा की विदेश में ट्रेनिंग का खर्च बेंगलूरू का एम्बेसी इंटरनेशनल राइडिंग स्कूल उठा रहा है. उनको पूर्व जर्मन विश्व चैंपियन और दो बार के ओलंपिक पदक विजेता सैंड्रा औफार्थ प्रशिक्षित कर रहे हैं, जो खुद भी तोक्यो में ओलंपिक में मुकाबले में हिस्सा लेंगे.

मिर्जा व्यक्तिगत आयोजन में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं. उनसे पहले इंद्रजीत लांबा (अटलांटा 1996) और इम्तियाज अनीस (सिडनी 2000) भारत की ओर से शामिल हो चुके हैं. लेकिन मिर्जा ने जकार्ता में 2018 एशियाई खेलों में इतिहास रच दिया, जब उन्होंने दो रजत पदक जीता और इस खेल में भारत के 36 साल पुराने पदक के इंतजार को खत्म किया. इन पदकों से देश में खेल को बड़ा प्रचार मिला और मिर्जा को 2019 में अर्जुन पुरस्कार. 

तोक्यो में अगर पदक मिल जाता है तो यह भारत में इस खेल के सुनहरे भविष्य और मिर्जा, दोनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है. मिर्जा कहते हैं, ‘‘सिर्फ गिनती बढ़ाने के लिए वहां जाने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए वहां जा रहा हूं. उम्मीद है कि मैं शीर्ष कुछ घुड़सवारों में जगह बनाऊंगा.’’ हालांकि इस खेल में, जीत अकेले घुड़सवार के दम पर नहीं मिलती. सिग्नॉर मेडिकॉट की पीठ पर सिर्फ एक घुड़सवार नहीं बल्कि भारत की उम्मीदें भी सवार होंगी. 

सलाहकार की राय
''प्रतिस्पर्धा किसी घोड़े और घुड़सवार के लिए असली परीक्षा होती है. आपको ड्रेसेज में सटीक, थकाऊ क्रॉस कंट्री को पास करना होता है और आप में दो राउंड की जंपिंग के लिए दम-खम होना चाहिए. फवाद यकीन वहां यूं ही नहीं जा रहे हैं. वे जोरदार प्रदर्शन करेंगे और जी-जान लगा देंगे’’
डॉ. हसनैन मिर्जा 
घोड़ों के डॉक्टर और फवाद के पिता

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