किरण डी.तारे
कोविड पॉजिटिव: 8 अप्रैल
स्थिति: इलाजरत
जगह: मुंबई
दरअसल, रिपोर्टर होने के नाते मैंने हमेशा बाहर फील्ड में होना और दफ्तर में बैठकर भी लोगों से बातचीत करना पसंद किया है. अप्रैल और जुलाई 2020 के दौरान जब मुंबई हॉटस्पॉट था, मैं महामारी की खबरों के लिए अक्सर धारावी और अस्पतालों सरीखे शहर के बुरी तरह प्रभावित इलाकों में जाया करता था.
बीते कुछ महीनों के दौरान मैंने काम के सिलसिले में महाराष्ट्र के विदर्भ (नया हॉटस्पॉट), गोवा और गुजरात की यात्राएं कीं. इन सभी यात्राओं के दौरान भी मैं खुद को सुरक्षित रखने में कामयाब रहा था.
अलबत्ता 5 अप्रैल को मुझे तेज बुखार हो गया. एक दिन बाद सूखी खांसी होने लगी. 8 अप्रैल को आरटी-पीसीआर टेस्ट ने तस्दीक कर दी कि मुझे और मेरी पत्नी को कोविड है. हम फौरन अपने एक बेडरूम के अपार्टमेंट के हॉल में आ गए और हमारी बेटियां, 16 साल की रावी और 10 साल की सरयू, बेडरूम में बंद हो गईं. शुक्र है कि मैंने अपने सत्तर से ऊपर के पिता को पिछले साल महामारी की शुरुआत में अपने चाचा के घर जलगांव भेज दिया था.
अब घर में घिरकर मैं न तो अपनी स्पोर्ट्स साइकिल और न ही एक्टिवा स्कूटर चला पाता हूं. अखबार के बगैर सुबह बोझिल हो गई है. मेरी जानकारी और मेलजोल टीवी न्यूज और मोबाइल के मैसेज तक सीमित हैं. मैंने नितिन गोखले की किताब मनोहर पर्रीकर: ब्रिलिएंट माइंड, सिंपल लाइफ पढऩा शुरू किया है.
इधर मेरी पत्नी और मैं बीमार पड़े थे, उधर रावी ही घर चला रही थी—थोड़ी-थोड़ी देर में हमें गर्म पानी से लेकर हमारे टिफिन बॉक्स देने, बर्तन मांजने और अपनी नटखट लेकिन संवेदनशील छोटी बहन की देखभाल करने तक. रावी यह सब अपनी 12वीं की, और सरयू की भी, पढ़ाई के साथ-साथ संभाल रही है. बीते कुछ दिनों के दौरान अपनी बड़ी बेटी को देखकर मेरा यह यकीन पुख्ता ही हुआ है कि बेटियां हमारी जिंदगी की सबसे बेशकीमती धरोहर हैं.
कोविड के काले बादलों में उम्मीद की दूसरी किरण वह लगाव है जो हमें अपने परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों और साथियों से मिला. शुरुआत में मैंने अपनी बीमारी के बारे में खामोश रहने का जतन किया, पर बात फैल गई और फिर मदद का तांता लग गया. उनकी दयालुता से मुझे ताकत मिली और पुख्ता यकीन हुआ कि मैं पहले से भी ज्यादा उत्साह और ऊर्जा के साथ जल्द काम पर लौटूंगा.

