
ऐसे वर्ष होते हैं जब कोई राष्ट्र किसी एक संकट में फंस जाता है और वह संकट उसे पतन के कगार पर धकेल देता है. लेकिन शायद ही कभी किसी राष्ट्र को एक ही वर्ष में भारी नुक्सान पहुंचाने वाले कई संकटों ने एक साथ आ घेरा हो, जैसा कि भारत के साथ 2020 में हुआ था.
कोविड-19 महामारी ने न केवल हमारे जीवन पर बल्कि हमारी आजीविका पर भी कहर बरपाया, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में खलबली मच गई. सीमाओं पर हद दर्जे की चीनी आक्रामकता, जो पिछले कई दशकों में नहीं देखी गई थी, से राष्ट्र की अखंडता पर खतरा मंडराने लगा. फिर किसान आंदोलन जो केंद्र सरकार के लिए एक तरह से अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा साबित हो रहा है, लगभग दो महीने से बिना रुके चल रहा है.
जब देश इतनी आपात स्थितियों से घिर जाए, तो देश का नेतृत्व कर रहे किसी भी नेता की अपनी और उसकी सरकार की लोकप्रियता में भारी गिरावट आ जाती है. संयुक्त राज्य अमेरिका में, डोनाल्ड ट्रंप आंशिक रूप से इसी धारणा के कारण फिर से चुनाव नहीं जीत सके कि उन्होंने महामारी का उचित प्रबंधन नहीं किया, जिसके कारण अमेरिका में कोविड-19 के सबसे अधिक मामले आए और सबसे ज्यादा लोगों की जान गई.

एक करोड़ से अधिक मामलों के साथ भारत, कोविड से पीडि़त लोगों की संख्या के लिहाज से दुनिया में दूसरे स्थान पर है जबकि मृत्यु का आंकड़ा 1,50,000 को पार कर गया है. इससे भी बदतर, अर्थव्यवस्था दशकों में पहली बार एक नकारात्मक वार्षिक जीडीपी विकास दर दर्ज करने जा रही है और बेरोजगारी सर्वकालिक उच्च स्तर पर बनी हुई है. फिर भी, नवीनतम इंडिया टुडे-कार्वी इनसाइट्स के देश का मिज़ाज (मूड ऑफ द नेशन या एमओटीएन) सर्वेक्षण से पता चलता है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ऊंचाइयों को छू रही है और सर्वेक्षण में भाग लेने वाले उत्तरदाताओं ने उनकी सरकार के प्रदर्शन को सराहा है.

सरकार के जनाधार के खिसकने की बात तो भूल ही जाइए, अगर इस समय संसदीय चुनाव होता है तो मोदी की अगुआई में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार 321 सीटों के साथ अपना परचम फिर से लहराएगी. यहां अगस्त 2020 में हुए देश का मिज़ाज के पिछले सर्वेक्षण से पांच सीटों का इजाफा दिखता है, हालांकि यह अभी भी 357 सीटों से नीचे है जो एनडीए ने वास्तव में 2019 के आम चुनाव में जीती थीं.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 291 लोकसभा सीटें मिलने का अनुमान है जो साधारण बहुमत के लिए आवश्यक 272 से 19 अधिक है और यह सुनिश्चित करता है कि एनडीए के सहयोगी भाजपा के प्रभुत्व को चुनौती देने की स्थिति में नहीं होंगे. गौरतलब है कि महामारी और उसके प्रबंधन ने भाजपा के लिए समर्थन बढ़ाया है. 2019 के आम चुनाव में जोरदार वापसी के कुछ महीनों बाद, जनवरी 2020 में हुए देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में भाजपा की सीटें बहुमत से पीछे रह गई थीं जबकि एक साल बाद जब देश इतनी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब उसकी स्थिति बेहतर दिखती है.
महामारी के बीच मोदी के प्रभाव में इजाफा हुआ और वे अजेय और अपरिहार्य नेता के रूप में उभरे हैं. सर्वेक्षण में भाग लेने वाले उत्तरदाताओं में से 74 प्रतिशत ने उनके प्रदर्शन को अच्छा या उत्कृष्ट माना है, जो अगस्त 2020 में उनकी 78 प्रतिशत रेटिंग से थोड़ा कम तो है, फिर भी सत्ता में अपने सातवें वर्ष में एक नेता के लिए ऐसी लोकप्रियता रेटिंग अभूतपूर्व मानी जाएगी. (सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री रेटिंग में, मोदी अब अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से बहुत आगे हैं.)

उनकी सरकार के समग्र प्रदर्शन को भी मजबूत समर्थन मिला है. 66 प्रतिशत ने कहा कि वे सरकार के प्रदर्शन से संतुष्ट या बहुत संतुष्ट हैं. ऐसे उत्साहजनक परिणामों के बीच मायूसी की एकमात्र वजह यह है कि दक्षिण भारत मोदी और भाजपा से उतना प्रभावित नहीं है जितना देश के बाकी हिस्से. मोदी और एनडीए के लिए चिंता का विषय यह भी होना चाहिए कि मुसलमान उनके प्रदर्शन से नाखुश हैं और अन्य समुदायों के मुकाबले उन्होंने बहुत कम रेटिंग दी है. जाहिर है, मोदी के सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास नारे में उनका भरोसा नहीं दिखता.
नवीनतम देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में भाजपा के संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ओर से प्रस्तावित उस एजेंडे के लिए मजबूत समर्थन दिखता है, जिसे मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद से तेजी से आगे बढ़ाया गया है. सर्वे में मोदी सरकार की जो दो सबसे बड़ी उपलब्धियां बताई गईं वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू होना और कश्मीर में धारा 370 को निरस्त करना हैं. ये दोनों संघ परिवार के अनिवार्य कार्यों की सूची में रहे हैं.


कोविड-19 पर मोदी सरकार का प्रदर्शन उपलब्धियों की सूची में तीसरे पायदान पर है और मेक इन इंडिया या आत्मनिर्भर भारत अभियान जैसी पहल को 10 प्रतिशत से भी कम समर्थन प्राप्त हुआ. विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) अधिनियम या सीएए जिसने फरवरी 2020 में दिल्ली में दंगे भड़काए थे, का सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोगों (53 फीसद) ने समर्थन किया है.
समान नागरिक संहिता, एक ऐसा प्रोजेक्ट जो संघ परिवार को बहुत प्रिय है, को भी 70 फीसद समर्थन मिला है. सर्वेक्षण का एक परिणाम उदारवादियों के लिए चुभने वाला हो सकता है. इसमें अंतरधार्मिक विवाह को रोकने वाले उस विवादास्पद अध्यादेश को हिंदुओं का भारी समर्थन मिला है जिसे मुसलमानों की ओर से कथित तौर पर छेड़े गए ‘लव जिहाद’ को रोकने वाला कहा जाता है.
तो, हमारे जनवरी 2021 देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के दो बड़े संदेश हैं:
नरेंद्र मोदी अपने नेतृत्व की कठिन परीक्षा में बहुत अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए हैं;
संघ परिवार के एजेंडे को व्यापक सार्वजनिक स्वीकृति मिली है जिससे हिंदुत्व का एजेंडा और मजबूत हुआ है

तो, वह क्या है जो कठिन बाधाओं के बावजूद भारतीय राजनीति में मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और निरंतर प्रभुत्व की व्याख्या करता है? प्रबंधन विशेषज्ञ नीहारिका वोहरा का कहना है कि असली नेतृत्व तब प्रकट होता है जब कोई संकट हो और उसका कोई ज्ञात समाधान न हो. ऐसे में वरीयता उस प्रभावोत्पादक कार्रवाई को दी जाती है जिसे वह कोविड-19 महामारी जैसी असाधारण घटनाओं के लिए, जिनमें सभी नेतृत्वकर्ता समाधानों की तलाश में लगे होते हैं, ‘‘अनुकूलन चुनौतियां’’ से संबोधित करती हैं.
वोहरा के शब्दों में तब नेता कहता है, ‘‘आइए हम फिलहाल यथासंभव सर्वश्रेष्ठ काम करें और आगे बढ़ते हुए समाधानों की तलाश करें.’’ वह महामारी के कारण जीवन और आजीविका दोनों के लिए अत्यधिक भय की स्थिति से निपटता है और साथ ही लोगों को विश्वास दिलाता है कि वह उनके पीछे खड़ा है.’’
लगता है कि महामारी से निपटने के क्रम में मोदी ने उसे ही अपनाया जिसे प्रबंधन विशेषज्ञ डी. सरस्वती ‘सोसाइटी फॉर एफेम्चुअल ऐक्शन’ के लिए लिखे आलेख में किसी संकट से निपटने तथा रूपांतरकारी लक्ष्यों की प्राप्ति के पांच मुख्य सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया है. पहले सिद्धांत का नाम है 'हाथ की चिडिय़ा’. इसके अनुसार, किसी को भी सही अवसर की प्रतीक्षा करने के बजाए जो भी उपलब्ध जानकारी है, उसी के साथ कार्रवाई शुरू करनी चाहिए.

देखिए कि जब अन्य नेता कठोर कार्रवाई में संकोच कर रहे थे, तब मोदी ने कैसे संपूर्ण लॉकडाउन को चुना. मोदी के सलाहकारों का कहना है कि उन्होंने यह निर्णय विशेषज्ञों से सलाह-मशविरे के बाद लिया, जिन्होंने देश भर में महामारी के तेजी से फैलने की चेतावनी दी थी और सलाह दी थी कि लॉकडाउन से स्वास्थ्य क्षेत्र को बीमारी के इलाज की क्षमताएं बढ़ाने का समय मिल सकेगा.
फिर, मोदी ने 'सहनीय हानि’ के सिद्धांत का पालन किया, यह आकलन करते हुए कि क्या उनकी प्रभावोत्पादक कार्रवाई के नकारात्मक पक्ष स्वीकार्य हैं. सरकार का तर्क था कि ‘अर्थव्यवस्था को होने वाले नुक्सान को तो कम किया जा सकता है, लेकिन जानें गईं तो स्थायी हानि होगी.’ हालांकि, जब लॉकडाउन के कारण भारी आर्थिक नुक्सान होने लगे, तो मोदी ने 'नींबू पानी’ सिद्धांत का इस्तेमाल किया, जो लचीला होने की बात करता है. यह काम उन्होंने धीरे-धीरे लॉकडाउन हटाते हुए या अपने 'जान भी, जहान भी’ के फैसले के माध्यम से किया.
मोदी ने इस क्रम में ‘क्रेजी क्विल्ट’ सिद्धांत का भी इस्तेमाल करते हुए संयुक्त भविष्य निर्माण के लिए संगठनों और लोगों के साथ भागीदारियां कीं. इसका सबसे अच्छा उदाहरण वह था जिसमें प्रधानमंत्री ने ‘निजी सुरक्षा उपकरणों’ के उत्पादन का स्वदेशीकरण करने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया, जिसने जल्द ही भारत को इस मामले में आत्मनिर्भर बना कर उनका निर्यात करने की स्थिति में ला दिया.
इन सभी कामों में मोदी का ध्यान लगातार उसी बात पर केंद्रित था जिसे 'विमान में पायलट’ सिद्धांत के रूप में जाना जाता है और जिसमें कोई व्यक्ति जानता है कि कौन सी चीजें उसके नियंत्रण में हैं और वह उनका प्रभावी उपयोग करता है. इसके उदाहरणों में 20 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक प्रोत्साहन राशि और आत्मनिर्भर भारत अभियान के माध्यम से अवसर का उपयोग आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर देने के लिए करना शामिल है. ये सारी बातें उन प्रमुख कारणों में शामिल हो सकती हैं जिनके चलते उत्तरदाताओं ने कोविड महामारी से निपटने में मोदी और उनकी सरकार के तरीकों पर उच्च स्तर की संतुष्टि व्यक्त की है.

यह स्वीकारते हुए कि मोदी की नेतृत्व शैली को समझने का 'काम जारी है’, प्रबंधन विशेषज्ञ एल. गुरुनाथन का तर्क है कि कोविड जैसी अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना होने पर अच्छे नेता सामान्यत: दो प्रमुख गुणों का प्रदर्शन करते हैं. इनमें पहला गुण है, अनिश्चित परिस्थितियों से निपटने में निश्चितता की भावना दिखाने की क्षमता. इसके उदाहरण के रूप में, वे उल्लेख करते हैं कि कैसे विंस्टन चर्चिल अपने लोगों को आश्वासन देते रहे थे कि उन्हें पता है कि क्या होने वाला था और कि वे युद्ध के लिए तैयार हैं.
ऐसे नेताओं के पास जब किसी समस्या के सारे हल नहीं भी होते हैं, तब भी वे विश्वास प्रदर्शित करते हैं कि वे समस्या से प्रभावी ढंग से निपटेंगे. दूसरा गुण है, उच्च कोटि संप्रेषक होना, जिसे गुरुनाथन एक ऐसी भाषा में लोगों से संवाद करने की क्षमता के रूप में परिभाषित करते हैं जिसे लोग समझ सकते हों और जो उन्हें सीधे लोगों की मुख्य भावनाओं से जोड़ती है.
महामारी के दौरान मोदी ने इन दोनों गुणों में उच्चस्तरीय दक्षता दिखाई. उन्होंने बार-बार यह भाव दिखाया कि चीजें उनके नियंत्रण में हैं और लोगों से सीधे संवाद करने के लिए अभिनव तरीकों का उपयोग किया—चाहे वह थाली बजा कर समर्थन प्रदर्शित करवाना रहा हो या लोगों को कोविड का प्रसार रोकने के लिए मास्क पहनने और दो गज दूरी बरतने की सलाह देना.
अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने एक महान नेता की विराट छवि पेश की है जिसकी लोकप्रियता पर अब मुद्दों का असर नहीं पड़ता. महान दृष्टि पर ध्यान केंद्रित करना और बड़े फैसलों को अंजाम देने की इच्छा रखना, जैसे अनुच्छेद 370 को रद्द करना या पाकिस्तान के बालाकोट में जवाबी हवाई हमले का आदेश देने जैसे वे काम करना जिनसे दूसरे लोग बचते थे, वे बातें हैं जिनसे उनकी विराट छवि और मजबूत हुई. इस प्रकार वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं जो कोई गलत काम कर ही नहीं सकता और जिसके अतिचारों को नजरअंदाज कर दिया जाता है.
प्रबंधन विशेषज्ञ बाला वी. बालाचंद्रन ने मोदी की निरंतर लोकप्रियता को समझाने के लिए पारंपरिक स्वॉट (ताकत-स्ट्रेंथ), कमजोरी (वीकनेस), अवसर(अपॉर्च्युनिटी) और खतरा (थ्रेट)) विश्लेषण का उपयोग किया. उनके लिए प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी ताकत उनकी प्रतिबद्धता और सत्यनिष्ठा है. उन्हें अदूषणीय (पक्के ईमानदार) के रूप में देखा जाता है और उनकी कोई वंशानुगत लागलपेट भी नहीं है. बालाचंद्रन कहते हैं कि मोदी में नेतृत्व के अनूठा सम्मिश्रण की सबसे अच्छी व्याख्या दो तमिल शब्दों ‘नल्लवन’ और 'वलियावन’ के माध्यम से की जा सकती है जिनका अर्थ है एक अच्छा आदमी जो जरूरत पडऩे पर ठोस निर्णय लेने के लिए तैयार है.
जहां तक खतरे की बात है तो मौजूदा नेताओं की खेप में से कोई भी उनके लिए खतरा नहीं है—न उनकी पार्टी के भीतर, न ही विपक्ष में. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण से पता चलता है कि राहुल गांधी वास्तव में अब मोदी के लिए कोई चुनौती नहीं रह गए हैं. कमजोरियों के रूप में बालाचंद्रन महामारी के कारण और तेजी से बढ़ी आर्थिक मंदी और बढ़ती बेरोजगारी को देखते हैं. अंत में अवसरों के बारे में वे कहते हैं कि ये संभावना भारत की युवा आबादी को महामारी से घिरे विश्व आर्थिक परिदृश्य में नाटकीय बदलावों का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करने में निहित है. हेनरी किसिंजर के शब्दों में, ''नेता का काम है लोगों को वे जिस जगह हैं वहां से उस जगह ले जाना जहां वे अभी नहीं गए हैं.’’
जनवरी 2021 का देश का मिज़ाज सर्वेक्षण भले मोदी के नेतृत्व की घनघनाती स्वीकृति प्रदर्शित करता हो, इससे वे गंभीर चिंताएं भी सामने आई हैं जिन पर मोदी को अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए ध्यान देने की आवश्यकता है. उत्तरदाताओं ने बेरोजगारी को मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता के रूप में सूचीबद्ध किया है, जो महामारी से और भी बढ़ी है.
वर्तमान सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं में से 60 प्रतिशत लोगों ने आय में कमी आने की बात कही है. पांच में से एक ने कहा कि उसकी अपनी नौकरी या व्यवसाय खत्म हो गया है. केवल एक-तिहाई लोगों ने कहा कि वे सरकार के आर्थिक प्रोत्साहन से लाभान्वित हुए हैं. मोदी सरकार को तत्काल आधार पर इन चिंताओं के समाधान की आवश्यकता है.
मोदी ने लोकलुभावनवाद के साथ संघ परिवार के एजेंडे को संतुलित करने की कोशिश की है. लेकिन आप खाली पेट लोगों को धार्मिक प्रवचन नहीं सुना सकते. जाति की ही तरह धर्म भी कभी राष्ट्रों को बांधे रखने वाली ताकत नहीं हो सकता. अतीत में ईसाई राष्ट्रों के विभाजन या हमारे अपने बगल की घटनाओं में इसके साक्ष्य देखे जा सकते हैं कि पूरी आबादी मुस्लिम होते हुए भी पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान को एक साथ बांध कर नहीं रखा जा सका.
देश को अब विकास की ओर गहन ध्यान देने के साथ ही विभाजनकारी एजेंडों पर कम ध्यान देने की जरूरत है. आर्थिक मोर्चे पर, प्रधानमंत्री की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल और समूचे स्वदेशी अभियान के आगे बढऩे की दिशा के संबंध में और अधिक स्पष्टता लाने की आवश्यकता है. अगर यह आरएसएस को निर्यात के लिए अर्थव्यवस्था को खोलने पर राजी करने के लिए मीठी गोली जैसा कुछ है तो ठीक है, लेकिन प्रधानमंत्री को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इससे संरक्षणवाद और अकुशल उद्योगों को बढ़ावा न मिले.
तरा उस बात का भी है जिसे नोबेल पुरस्कार विजेता डेनियल कान्हमैन ‘इनग्रुप बायस’ कहते हैं, जिसमें समझा जाता है कि समर्थक कोई गलती नहीं कर सकते और किसी देश को अद्वितीय लोकतंत्र बनाने वाली विविध आवाजें दबा दी जाती हैं. उदाहरण के लिए, राजनैतिक मोर्चे पर मुसलमानों को अलग करने के बजाए सरकार को उनकी वास्तविक चिंताओं का समाधान करने की आवश्यकता है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करना और समावेशी विकास का आश्वासन देना मोदी की बुद्धिमत्ता थी. उन्हें अब निर्णायक कार्रवाई के साथ अपने कहे को साबित करना चाहिए.
साथ ही, किसानों के आंदोलन ने साबित किया है कि महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय सरकार को अधिक परामर्शी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है. इसके लिए प्रधानमंत्री को अपने इर्दगिर्द एक मजबूत टीम बनाने की आवश्यकता होगी जो प्रतिध्वनि कक्षों के रूप में कार्य करने के बजायए उनके निर्णयों पर सवाल उठा सके. इसलिए, आने वाले वर्ष के लिए मोदी के लिए जो काम हैं, वे सामने हैं. वे या तो देश के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक बन सकते हैं या फिर देश को विभाजन और निराशा की विरासत दे सकते है. अब से पहले, शायद ही कभी देश सही चुनाव के लिए किसी नेता पर इतना निर्भर रहा हो.
सर्वे की विधि
इंडिया टुडे का देश का मिज़ाज (एमओटीएन) सर्वेक्षण मार्केट रिसर्च एजेंसी कार्वी इनसाइट्स ने 3 जनवरी, 2021 से 13 जनवरी, 2021 के बीच किया था. यह सर्वेक्षण पारंपरिक रूप से आमने-सामने बातचीत करके किया जाता रहा है. लेकिन सर्वेक्षण के इस संस्करण में कोविड की महामारी के कारण पैदा हुई अभूतपूर्व परिस्थिति के चलते एक मिश्रित प्रणाली का प्रयोग करना पड़ा—50 प्रतिशत आमने-सामने और 50 प्रतिशत टेलीफोन पर इंटरव्यू के माध्यम से—जिसमें एक स्टैंडर्ड संरचना वाली प्रश्नावली का इस्तेमाल किया गया था. इस प्रश्नावली का अनुवाद क्षेत्रीय भाषाओं में भी किया गया था.
कुल 12,232 इंटरव्यू किए गए थे—67 प्रतिशत ग्रामीण और 33 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में. इस सर्वेक्षण में 19 राज्यों—आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल—के 97 संसदीय और 194 विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया था.
प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में एक निश्चित संख्या में इंटरव्यू किए गए थे. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के लिए फील्डवर्क कार्वी इनसाइट्स के चेयरमैन रंजीत चिब की देखरेख में किया गया और इस काम में उनका सहयोग उपाध्यक्ष गिंटो कन्नोथ व उनकी टीम ने किया.

