कहते हैं संघर्ष चरित्र का निर्माण करता है और संकट उसे परिभाषित करता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2020 में दोनों से ही जोर-शोर से जूझना पड़ा और इसके नतीजतन वे राजनैतिक तौर पर ज्यादा ताकतवर होकर उभरे. महामारी ने हर शासन प्रमुख का इम्तिहान लिया. भारत के प्रधानमंत्री भी अपवाद नहीं थे. मगर जहां कुछ डगमगाए और कुछ ने वायरस की अनदेखी की, मोदी ने मुस्तैदी और दूरदर्शिता के साथ कदम उठाए. 24 मार्च को संपूर्ण लॉकडाउन के उनके आह्वान की शुरुआत में खासी आलोचना की गई, खासकर इसलिए कि इससे बड़े पैमाने पर नौकरियां चली गईं, प्रवासी मजदूरों को अपने गांव लौटने के लिए शहरों से हृदयविदारक ढंग से कूच करना पड़ा और जीडीपी नए रसातल में पहुंच गया. बीमारी से 1.02 करोड़ लोगों के संक्रमित होने के साथ भारत अब कोविड संक्रमणों की तादाद के लिहाज दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर है और ऐसे में मोदी के आलोचक भीषण बंदी के नतीजों को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
मगर दो आंकड़े अलहदा दिखाई देते हैं: हमारी रिकवरी दर 95.9 फीसद है जो 70.2 फीसद की वैश्विक औसत से काफी अधिक है. वहीं, संक्रमितों में मृत्युदर यहां 1.4 फीसद है जो 2.7 के वैश्विक औसत से कम है. यही नहीं, भारत में स्वास्थ्य सेवा के दयनीय ढंग से नाकाफी ढांचे को देखते हुए लॉकडाउन ने राज्यों को, चुनौती के बेकाबू होने से पहले ही, बिस्तरों की क्षमता और इलाज की सुविधाएं बढ़ाने का वक्त दे दिया. विशेषज्ञ एक और पूर्णबंदी नहीं लगाने की सलाह देते हैं, लेकिन वे स्वीकार करते हैं कि लॉकडाउन ने संक्रमण के फैलाव को धीमा करके कई जानें बचाईं. प्रधानमंत्री की कोशिशों की सराहना की झलक अगस्त 2020 में इंडिया टुडे के देश का मिजाज सर्वे में भी मिली, जिसमें उनका अनुमोदन करने वालों की संख्या में उछाल दर्ज किया गया.
महामारी से बदहाल अर्थव्यवस्था से निपटने में मोदी ने दुस्साहस से ज्यादा सतर्कता बरती. फौरन असर करने वाली मौद्रिक उपायों से गिरती अर्थव्यवस्था को टेका लगाने के बजाए उन्होंने किस्तों में उपाय देना बेहतर समझा. 27 अरब डॉलर (करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए) का प्रोत्साहन पैकेज, जिसमें गरीबों के लिए खैरातें और कारोबार के लिए कर्ज लेने में आसानी के उपाय शामिल हैं, उम्मीदों से बहुत कम रहा. पर फैसले का वक्त अभी नहीं आया है, क्योंकि कृषि में मजबूत वृद्धि के बल पर आखिरी तिमाही ने विशेषज्ञों में उम्मीदें जगा दी हैं कि जीडीपी में गिरावट उतनी भीषण नहीं भी हो सकती है जितनी अपेक्षा की जा रही थी.
मानो महामारी ही काफी न हो, लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन की बेवजह आक्रमकता ने, जिसमें 45 वर्षों में पहली बार दोनों तरफ सैनिक हताहत हुए, मोदी को बैकफुट पर ला दिया, खासकर तब जब शी जिनपिंग के साथ उनके रिश्ते अच्छे माने जाते थे. मगर सशस्त्र बलों को एलएसी के दूसरे हिस्सों में पहाड़ियों की फायदेमंद जगहों पर कब्जा करने की इजाजत देकर मोदी ने कुछ हद तक पहल फिर अपने हाथ में ले ली. साथ ही, उन्होंने चीन पर काबू पाने के लिए बनाए गए चार देशों के समूह क्वाड (अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ) में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाकर जोरदार कूटनीतिक संदेश दिया. उन्होंने चीनी निर्यातों पर ब्रेक लगाकर आर्थिक दबाव भी बढ़ा दिया.
चीनियों को उनके ही खेल में हराने के लिए उन्हीं की कहावत, ''संकट खतरनाक हवाओं पर सवार अवसर है''—पर अमल से बेहतर क्या होता? मोदी ने महामारी से उत्पन्न उथल-पुथल का इस्तेमाल अपना आत्मनिर्भर अभियान लॉन्च करने के लिए किया, जो निर्माण में ज्यादा आत्मनिर्भरता और भारत में बने साजो-सामान की खरीद पर जोर देता है. उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि लोकल के लिए वोकल हों. इसके बाद मोदी ने रक्षा से लेकर श्रम तक, प्रमुख क्षेत्रों में लंबे वक्त से टलते आ रहे सुधारों को अंजाम दिया.
अलबत्ता कृषि सुधारों का पंजाब-हरियाणा के किसानों ने जितने गुस्से से विरोध किया, उसने मोदी को भी हैरान कर दिया. यह देखते हुए कि करीब 60 फीसद भारतीय कृषि पर निर्भर हैं और आंदोलन ज्यादा फैलने की आशंका पैदा कर रहा था, मोदी ने संकेत दिया कि वे इन कानूनों में संशोधन पर विचार करने के लिए तैयार हैं लेकिन उन्हें रद्द करने के लिए नहीं. इसमें वे उस उक्ति पर चलते दिखाई देते हैं जो मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कही थी, ''सच्चा नेता सर्वानुमति की खोज नहीं करता बल्कि उसे गढ़ता है.'' साल 2021 के लिए मोदी का काम तय हो चुका है.

