प्रधानमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के ज्यादातर वक्त नरेंद्र मोदी कृषि में धीमे-धीमे बढ़ते सुधारों से संतुष्ट थे. उनके आलोचकों ने उन पर आरोप लगाया था कि जरूरी बदलावों पर निशाना साधने के लिए वे महज एयर राइफल का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनके दूसरे कार्यकाल का अभी एक साल भी नहीं हुआ था कि कोविड-19 महामारी के तेजी से बढ़ते प्रकोप के बीच मोदी ने सुधार प्रक्रिया तेज करने का मौका ताड़ लिया.
इस बार उन्होंने एक तरह से तोप निकाली और जून 2020 में अध्यादेश के गोले दाग दिए. उन्हें यकीन था कि ये कृषि क्रांति 2.0 का सूत्रपात करेंगे. इनमें शामिल थे किसानों को अपनी उपज केवल राज्य-नियंत्रित मंडियों में बेचने के लिए मजबूर करने वाली पाबंदियां हटाना, ठेके पर खेती करवाने के लिए कॉर्पोरेट क्षेत्र का रास्ता आसान बनाना और पुराने तथा बेकार हो चुके अनिवार्य वस्तु कानून को खत्म करना.
झटका तब लगा जब सितंबर में उनकी सरकार ने इन अध्यादेशों को कानून में बदलने के लिए इन्हें संसद से हड़बड़ी में पारित करवा लिया. सबसे पहले उनकी खाद्य (प्रसंस्करण) मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने गुस्से में इस्तीफा दे दिया और उनकी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने, जिसका पंजाब में मजबूत जनाधार है और जो दशकों से भाजपा की करीबी सहयोगी पार्टी रही है, सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से रिश्ते तोडऩे का फैसला कर लिया.
पंजाब, जहां किसानों ने हरित क्रांति 1.0 की अगुआई की थी, विद्रोह में उठ खड़ा हुआ. मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की अगुआई में राज्य सरकार ने कृषि उपज बेचने और ठेके पर खेती से जुड़े दो केंद्रीय कानूनों को नकारते हुए राज्य विधानसभा से कानून पारित करवाए. दूसरे कांग्रेस-शासित राज्य भी उन्हीं के रास्ते पर चल पड़े और राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ ने कानून के मुख्य हिस्सों को बेअसर करने के लिए अपनी-अपनी विधानसभाओं में प्रस्ताव पेश कर दिए.
ये घटनाएं समूचे क्षेत्र में खदबदा रहे विरोध की छटपटाहट की शुरुआत थीं. जब मोदी सरकार ने रियायत देने से इनकार कर दिया तो पंजाब और देश भर के 40 किसान संगठनों ने विरली एकता का प्रदर्शन करते हुए दिल्ली को घेर लिया और राजधानी के प्रमुख रास्तों को जाम कर दिया. यह मुहिम पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की तकलीफों के इर्द-गिर्द केंद्रित आंदोलन की शक्ल में शुरू हुई थी.
लेकिन देखते ही देखते इसने विपक्षी दलों से जुड़े संगठनों के अलावा देश भर के किसान संगठनों का समर्थन हासिल कर लिया. यह एकता 8 दिसंबर के भारत बंद के दौरान साफ दिखाई दी. अगर मोदी दूसरी हरित क्रांति के महान कर्णधार बनने की उम्मीद कर रहे थे तो वैसा कुछ नहीं हुआ जैसी मनसूबा बनाया गया था. उलटे उस किसान समुदाय के साथ प्रधानमंत्री के टकराव का खतरा पैदा हो गया जो देश की आबादी का 60 फीसद है. लंबा खिंचता आंदोलन मोदी के प्रधानमंत्री काल की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक साबित हो रहा था.
पंजाब इसका केंद्र बिंदु था और देश के अग्रणी खेतिहर राज्य से उठे इन मुद्दों से मोदी के निपटने के तरीके से तय होगा कि उनके दूसरे कार्यकाल के बचे हुए साल कितने कामयाब रहेंगे. मामला ज्यादा नाजुक इसलिए है क्योंकि पंजाब सीमा पर बसा राज्य है और पाकिस्तान हमेशा भारत की मुश्किलों से फायदा उठाने की ताक में रहता है. वह खासकर युवाओं के बीच किसी भी असहमति का फायदा उठाकर खालिस्तान की उन्हीं भावनाओं को फिर से जिंदा कर सकता है जिन्होंने 1980 के दशक में जबरदस्त परेशानियां पैदा की थीं.
पंजाब केंद्र बिंदु क्यों है
राज्य के तौर पर पंजाब की आबादी महज 2.8 करोड़ या भारत की आबादी की मात्र 2.2 फीसद है. यह देश के महज 1.53 फीसद भौगोलिक क्षेत्र और 2.7 फीसद खेती योग्य क्षेत्र पर बसा है. तो भी भारत के गेहूं उत्पादन में इसका योगदान 11.9 फीसद और चावल उगाने में 12.5 फीसद है. भारत की खाद्य सुरक्षा के लिहाज से देखें तो यह सालाना बफर स्टॉक में एक-तिहाई से ज्यादा का योगदान देता है, जो इसे सबसे अहम अनाज उत्पादक राज्य बना देता है.
अभी, अग्रणी कृषि आपूर्तिकर्ता के तौर पर इसकी हैसियत हाल के दिनों में लगातार चुनौतियां झेल रही है. मध्य प्रदेश ने इस साल पहली बार पंजाब को केंद्रीय भंडार में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले राज्य की पदवी से बेदखल कर दिया. यह इसके बावजूद हुआ कि पंजाब की प्रति हेक्टेयर गेहूं उत्पादकता मध्य प्रदेश के मुकाबले कम से कम 50 फीसद ज्यादा है. मध्य प्रदेश का उभार बीते दो दशकों में गेहूं के रकबे में जबरदस्त बढ़ोतरी का नतीजा है.
धान की खेती में, पंजाब केंद्रीय पूल के लिए खरीदे गए भंडार में करीब 25 फीसद का योगदान देता है, लेकिन इसका हिस्सा धीरे-धीरे कम हो रहा है, क्योंकि पड़ोसी हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश ने अपनी पैदावार में लगातार इजाफा किया है. बदतर यह कि राज्य के धान उगाने वाले कई इलाकों में भूमिगत जलस्तर तेजी से नीचे गिर रहा है, जिससे इस फसल को लगातार उगाते रहना लंबे वक्त में व्यावहारिक नहीं रह जाएगा.
गेहूं-धान के दुष्चक्र में फंसकर पंजाब की प्रति व्यक्ति आय लगातार घट रही है और 1.35 लाख रुपए के अखिल भारतीय औसत के मुकाबले अब 1.66 लाख रुपए है. पिछले साल नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने इशारा किया था कि राज्य के ग्रामीण परिवार के ऊपर औसतन 2.1 लाख रुपए का कर्ज था जो देश के सभी राज्यों में सबसे ज्यादा था.
मोदी सरकार की तरफ से लाए गए कृषि कानूनों ने इसी खदबदाते कृषि, आर्थिक और सामाजिक संकट के बीच राज्य को चोट पहुंचाई है. तीनों कृषि कानूनों में सबसे विवादास्पद किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन तथा सुविधा) कानून 2020 है. यह किसानों के लिए अपनी उपज केवल सरकार नियंत्रित कृषि उपज मंडी समितियों (एपीएमसी) को बेचने की पाबंदियां हटाकर उन्हें एक राष्ट्र एक बाजार की सहूलत देता है.
यह नया कानून एपीएमसी के इलाकों से बाहर बाजार शुल्क, उपकर या लेवी वसूलने पर रोक लगाता है और व्यापारियों को लाइसेंस के बगैर और सबूत के तौर पर केवल पैन कार्ड के साथ काम करने की इजाजत देता है. केंद्र के अफसरों का कहना है कि यह कानून किसानों और खरीदारों दोनों के लिए फायदेमंद होगा, जिन्हें अभी 2 से 8 फीसद बाजार शुल्क चुकाना होता है और कृषि उपज बेचने पर व्यापारी संघों का जो शिकंजा कायम है, उसे तोडऩे में मदद करेगा. साथ ही, किसान अपनी उपज अपने जिले या राज्य तक सीमित रहने के बजाए देश में कहीं भी सबसे अच्छे दामों पर बेचने के लिए आजाद हो जाएंगे.
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को अलबत्ता केवल खतरे की घंटियां ही सुनाई देती हैं. वे कहते हैं कि समानांतर मंडी व्यवस्था स्थापित करके केंद्र मौजूदा राज्य-संचालित एपीएमसी की जड़ें खोद देगा और उन्हें तहस-नहस कर देगा. वे बताते हैं कि एपीएमसी से बाहर बिक्री पर शुल्क वसूल नहीं करने की वजह से निजी व्यापारियों को बेजा फायदा मिलेगा और राज्य सरकार उस राजस्व से हाथ धो बैठेगी जिसकी उसे राज्य विकास के अलावा कृषि ढांचे को बनाए रखने के लिए जरूरत है. (एपीएमसी के शुल्कों से पंजाब सालाना करीब 3,900 करोड़ रुपए कमाता है).
वे यह भी कहते हैं कि जिन ‘आढ़तियों’ ने बीते दशकों के दौरान किसानों के साथ करीबी रिश्ता विकसित किया है और गाढ़े वक्त में उनकी मदद की है, वे हाथ मलते रह जाएंगे. अमरिंदर ने इंडिया टुडे से कहा, ''केंद्र मंडी व्यवस्था को हटाना चाहता है, जिसका असर किसानों और आढ़तियों दोनों पर पड़ेगा और बदले में राज्य में गवर्नेंस का हरेक पहलू प्रभावित होगा.’’ (देखें बातचीत: ‘‘पंजाब की अनदेखी मत कीजिए’’)
एमएसपी है नया यूएसपी
राज्य को होने वाले राजस्व के नुक्सान के अलावा, पंजाब की कई किसान एसोसिएशन को गहरा संदेह है कि नया कृषि कानून न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था को आखिरकार खत्म करने का ही एक रास्ता है. केंद्र इसी एमएसपी की व्यवस्था के जरिए केंद्रीय भंडार के लिए अनाज खरीदता है और अनाज की कीमतों को स्थिर रखता है. (हालांकि केंद्र हर साल 23 कृषि वस्तुओं के एमएसपी का ऐलान करता है लेकिन मुख्य रूप से गेहूं और चावल और कुछ हद तक दलहनों और तिलहनों की खरीद में इनका असर दिखाई देता है.)
पंजाब के किसानों की 80 फीसद से ज्यादा पैदावार भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) सरीखी केंद्रीय एजेंसियां खरीद लेती हैं और ऐसे में किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले पंजाब के किसान एमएसपी की व्यवस्था पर कहीं ज्यादा गहराई तक निर्भर हैं. रबी और खरीफ के पिछले सीजन में केंद्र और राज्य की एजेंसियों ने पंजाब के किसानों की उपज खरीदने पर 52,000 करोड़ रुपए खर्च किए. मोदी और उनके मंत्रियों के तमाम आश्वासनों के बावजूद कि एमएसपी की व्यवस्था जस की तस कायम रहेगी, किसान बदतरीन की आशंका से डरे हुए हैं.
उन्हें शक है कि कई दूसरी केंद्रीय योजनाओं में जैसा किया गया है, उसी तरह मोदी सरकार उर्वरक और बीज सरीखी लागतों पर सब्सिडी देने और उनकी उपज मौजूदा व्यवस्था के अनुसार एमएसपी की प्रणाली के जरिए खरीदने के बजाए डीबीटी या नकद लाभ अंतरण के माध्यम से फसल उगाने के लिए नकद सब्सिडी देने का विकल्प चुन सकती है. ऐसा बदलाव केंद्र के लिए भले ही लागत प्रभावी हो, लेकिन किसानों का कहना है कि यह उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए बाजार की शक्तियों के उतार-चढ़ावों के भरोसे छोड़ देगा.
तना ही नहीं, अगर देश में सूखा पड़ जाता है तो केंद्र के पास, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सस्ते या मुफ्त अनाज कार्यक्रमों के अलावा, खाद्य सुरक्षा के जरूरी भंडार से करीब 40 फीसद ज्यादा बफर स्टॉक है. पंजाब के किसानों को डर है कि जब केंद्रीय पूल में योगदान देने के लिए मध्य प्रदेश सरीखे राज्य अतिरिक्त गेहूं उगा रहे हैं, ऐसे में उनकी उपज की केंद्र की ओर से तयशुदा खरीद पहले ही खतरे में पड़ गई है. एक कृषि विशेषज्ञ कहते हैं, ''पंजाब के किसानों के लिए एमएसपी ही अब उनकी यूएसपी (यूनिक सस्टेनिंग प्रोग्राम या विशिष्ट टिकाऊ कार्यक्रम) है.’’
किसानों के नेता और राज्य सरकार अब मांग कर रहे हैं कि एमएसपी को, जो अभी तक प्रशासनिक आदेश ही है, अनाजों की तमाम खरीद के लिए कानून बना दिया जाए और अगर व्यापारी एमएसपी से कम पर खरीदें तो उन्हें दंडित किया जाए. वे कहते हैं कि यह अनैतिक और निर्लज्ज कॉर्पोरेट कंपनियों से उनकी हिफाजत करेगा, जो उन्हें डर है कि गिरोहबंदी करके उन्हें लाभदायक कीमत से वंचित कर सकती हैं.
केंद्र सरकार लिखित आश्वासन देने को राजी है कि वह एमएसपी व्यवस्था को खत्म नहीं करेगी. मगर केंद्रीय अधिकारी जानते हैं कि उल्लंघन करने वालों के लिए सख्त सजाओं के प्रावधान के साथ इसे कानून बना देने से हालिया सुधारों की वह पूरी प्रक्रिया ही बेमतलब हो जाएगी जिसके जरिए कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए विशाल निजी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा रहा है. इसके अलावा निर्यात पर असर पड़ेगा क्योंकि घरेलू कीमतें इतनी ज्यादा हो जाएंगी कि निर्यात में कोई फायदा नहीं रह जाएगा.
साथ ही, केंद्र एक ऐसी स्थिति में फंसकर रह जाएगा जिसमें उसका खजाना हमेशा के लिए लगातार खाली होता जाएगा क्योंकि किसानों की फसल लागत कम रखने के लिए उर्वरक और बीज पर तो सब्सिडी लगातार देनी ही होगी. राज्य सरकार भी सब्सिडी पर खर्च कर रही है, जिसमें किसानों को मुफ्त बिजली देने के 12,000 करोड़ रुपए शामिल हैं और जिसे जन वित्त नीति विशेषज्ञ एम. गोविंद राव राज्य के खजाने पर बड़ा बोझ बताते हैं. जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी बताते हैं कि पंजाब के हरेक किसान परिवार को 2019-20 में सब्सिडी के तौर पर करीब 1.22 लाख रु. मिले, जो भारत में सबसे ज्यादा है.
ठेका कृषि: वरदान या अभिशाप?
अन्य कृषि अधिनियम जो विवाद की वजह बन गया है, वह है कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 जो अनुबंध या ठेके पर खेती को बढ़ावा देता है. यह कानून ज्यादातर राज्यों में भूमि जोतों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटे होने के कारण आने वाली समस्या को दूर करने और कॉर्पोरेट क्षेत्र को इन छोटे किसानों से अनुबंध करके बड़े आकार के जोत तैयार करके खेती कराने और किसानों को उनकी उपज की उचित कीमत देने के लिए प्रोत्साहित करने के वास्ते बनाया गया है. पंजाब में, लगभग 11 लाख परिवार कृषि पर निर्भर हैं और उनमें से लगभग 72 प्रतिशत के पास 5 एकड़ से कम भूमि है.
ठेका खेती पंजाब के लिए कोई नई चीज नहीं है. यह अनुबंध खेतों की स्थापना के लिए अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको और सुनील भारती मित्तल के भारती एंटरप्राइजेज को आमंत्रित करने वाले अग्रणी राज्यों में से था. वर्तमान में आइटीसी समेत कई बड़े बिजनेस घराने किसानों के साथ करार करके विभिन्न फसलों की खेती कर रहे हैं. भाजपा के पंजाब प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा कहते हैं, ''नया केंद्रीय कानून एक सुधार है क्योंकि यह निजी खिलाडिय़ों को पंजाब के पूर्व के कानून के विपरीत, केवल उपज के लिए ही अनुबंध की अनुमति देता है.
जबकि पंजाब के पुराने कानून के तहत किसान को भूमि के लिए अनुबंध करना पड़ता था. यह तर्क भी पंजाब के प्रदर्शनकारी किसान संघों को समझाने में विफल रहा है जो मानते हैं कि नए अधिनियम में, विवाद समाधान तंत्र कॉर्पोरेट संस्थाओं का पक्ष लेता है. एक विकास अर्थशास्त्री प्रोफेसर सुच्चा सिंह गिल कहते हैं, ''नया कानून विवाद के निपटारे का अधिकार अदालतों से छीनकर, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेटों (एसडीएम) और जिला कलेक्टरों को सौंपता है, जो अपने राजनैतिक आकाओं के दबाव में कार्य करने के लिए जाने जाते हैं या कॉर्पोरेट के दबाव में झुक जाएंगे.’’ केंद्र ने किसानों को आश्वासन दिया है कि वह कानून में संशोधन कर किसान को दीवानी अदालत जाने का विकल्प देने के लिए तैयार है.
फसल विविधता:अब यही है रास्ता
गेहूं-चावल पर पंजाब की बहुत अधिक निर्भरता से बाहर निकलने का एक तरीका, फसल उत्पादन में विविधता लाना हो सकता है. लेकिन तीन दशकों के प्रयासों का बहुत उत्साहजनक खास नतीजा नहीं रहा है. राज्य के कई हिस्सों में अब खट्टे फल, दालें, मक्का, तिलहन आदि उगाए जाते हैं; फिर भी राज्य के वार्षिक उत्पादन में उनका हिस्सा बमुश्किल 15 प्रतिशत ही हैं. एक तरीका यह है कि अनाज से इतर विविधीकरण को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जाए जैसा कि पड़ोसी राज्य हरियाणा प्रयास कर रहा है.
पिछले खरीफ सीजन के दौरान राज्य ने धान के अलावा अन्य फसलों की खेती करने पर प्रति एकड़ 7,000 रुपए नकद प्रोत्साहन राशि की पेशकश की थी. इस योजना को उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली थी. पंजाब स्थित खेती विरासत मिशन के कार्यकारी निदेशक उमेंद्र दत्त कहते हैं, ‘‘यदि इस आंदोलन को केवल कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के किसानों के गुस्से के रूप में समझना अनुचित होगा. यह चंडीगढ़ के साथ नई दिल्ली की एक बाद एक सरकारों के उस दोषपूर्ण तंत्र के खिलाफ आक्रोश था, जिसने किसान को एकल कृषि के चक्र में उलझाए रखा और एमएसपी पर निर्भर बना दिया.’’
इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट ऐंड कम्युनिकेशन (आइडीसी), चंडीगढ़ के निदेशक प्रमोद कुमार इससे सहमति जताते हैं और तर्क देते हैं कि फसल विविधीकरण को गति प्राप्त करने के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता है. उदाहरण के लिए, हरित क्रांति में पंजाब में उत्पादकता की अभूतपूर्व वृद्धि के पीछे कई कारकों की मौजूदगी थी.
इनमें नई उच्च उपज वाली बीज, केंद्र और राज्य का समर्थन, पानी और उर्वरकों की उपलब्धता के साथ उत्कृष्ट कृषि विस्तार कार्य शामिल हैं. प्रमोद कुमार कहते हैं, ‘‘अगर किसान फसलों में विविधताएं लाते हैं तो अभी कोई नई तकनीक नहीं है, कोई मानव संसाधन विकास नहीं है और न ही कृषि-प्रसंस्करण इकाइयों जैसे पर्याप्त विपणन विकल्प उपलब्ध है जो पंजाब की उपज को खरीद लें. कृषि विकास और उद्योग दोनों में ठहराव आ गया है.’’
वर्तमान में पंजाब के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में कृषि का योगदान 25 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय औसत 17 प्रतिशत है. दो दशकों के उग्रवाद के दौरान राज्य से कई उद्योग बाहर चले गए विशेष रूप से कई कपड़े और खेल का सामान बनाने वाली कंपनियां. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की पड़ोसी पहाड़ी राज्यों में निवेश करने वाले उद्योगों को कर छूट (टैक्स हॉलिडे) देने की योजना ने और नुक्सान पहुंचाया क्योंकि कर लाभ के लिए दवा बनाने वाली कंपनियों के साथ ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां पंजाब से हिमाचल प्रदेश के बद्दी और उत्तराखंड में पंतनगर के नए उद्योग हब में चली गईं.
उद्योग का अब जीडीपी में योगदान करीब एक-चौथाई ही है, जिसमें लघु उद्योग क्षेत्रों का दबदबा है. जब अमरिंदर ने 2017 में कार्यभार संभाला तो उन्होंने रियायतों के साथ नई औद्योगिक नीति पेश की जिससे पिछले तीन वर्षों में 70,000 करोड़ रुपए का निवेश हुआ. कौशल विकास एक और क्षेत्र था जिस पर सरकार ने बहुत जोर दिया. मुख्यमंत्री ने बड़े निजी खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना के साथ स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित करने और आइटी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया. लेकिन यह एक कठिन काम है.
इससे भी बदतर, जैसा कि प्रमोद बताते हैं, कृषि पर भारी सब्सिडी के कारण औद्योगिक अवसंरचना की लागत, चाहे वह भूमि, श्रम, बिजली या पानी के लिए हो, क्षेत्र में सबसे अधिक हो गई. कारखानों, मॉल, दुकानों और घरों के लिए बिजली की दरें महंगी हो गईं क्योंकि किसानों को मुफ्त बिजली प्रदान की जानी थी. पिछले तीन वर्षों से केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) राज्य नियामक को बिजली के लिए क्रॉस-सब्सिडी पर कटौती करने का दबाव डाल रहा है.
बातचीत के बिंदुओं के बीच किसान संगठन केंद्र से विद्युत अधिनियम में संशोधन को रोकने की मांग भी कर रहे हैं और नई बिजली दर नीति का विरोध कर रहे हैं, जो राज्यों को क्रॉस-सब्सिडी में कटौती करने और डीबीटी (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) का विकल्प चुनने के लिए प्रेरित करती है.
बात यहीं खत्म नहीं होती. नवंबर के पहले सप्ताह में, पंजाब वाटर रेगुलेशन ऐंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीडब्ल्यूआरडीए) ने वाणिज्यिक इकाइयों (कारखानों, मॉल, दुकानों आदि) पर भूजल दोहन शुल्क लगाने का फैसला किया लेकिन किसानों और आवासीय क्षेत्रों को इससे छूट दी गई. राज्य के 137 जलखंडों में से 103 अतिदोहन के शिकार हैं तो नौ खतरनाक स्तर पर हैं और केवल 25 ही सुरक्षित सीमा के भीतर हैं.
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) उन क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करने पर रोक लगाता है, जहां भूजल स्तर अनुशंसित स्तर से नीचे है. यह तर्क देते हुए कि खेती के मौजूदा मॉडल को बदलने और चुनौती देने का समय आ गया है ताकि उद्योग का गला न दबने पाए, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और पंजाब ऐंड सिंध बैंक के चेयरपर्सन चरण सिंह कहते हैं, ''धरती का ज्यादा पानी धान की फसल चूसती है और कीमत उद्योग को चुकानी पड़ती है.’’
मोदी सरकार की भूलें
भारतीय संविधान कृषि को राज्य सूची में रखता है लेकिन केंद्र ने इन दूरगामी कानूनों को लागू करने के लिए समवर्ती सूची में मौजूद अंतर-राज्य व्यापार प्रावधान की ताकत का उपयोग किया. कई राज्य सरकारों और किसान संगठनों ने अब संसद की विधायी क्षमता को चुनौती दी है कि उसने ऐसे विषय पर कानून बनाया है जो राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है. यह एक कारण हो सकता है कि किसान संगठन केंद्र के साथ एक समझौते पर पहुंचने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय, केंद्र के राज्य की शक्तियों का अतिक्रमण करने की वजह से नए कृषि कानूनों को रद्द कर देगा.
हालांकि पंजाब जैसे राज्य को कृषि सुधारों की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा लगता है कि शायद मोदी सरकार इस बात का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं लगा पाई कि इससे किसानों में कितना आक्रोश दिख सकता है. बादल का उनके मंत्रिमंडल से त्यागपत्र और शिरोमणि अकाली दल का एनडीए छोडऩा, प्रधानमंत्री के प्रयासों के लिए बड़ा झटका था. सरकार ने अध्यादेशों का सहारा लेकर जल्दबाजी दिखाई और अब सभी किसानों का भय दूर करने के लिए उपयुक्त संशोधनों की पेशकश कर रही है.
इसके बजाए, उनकी सरकार को मुख्यमंत्रियों, महत्वपूर्ण मंत्रियों और किसान संगठनों के साथ व्यापक विचार-विमर्श करना चाहिए था और उनकी चिंताओं को दूर करना चाहिए था. अमरिंदर कहते हैं, ''हम वह राज्य हैं जो केंद्रीय पूल को 40 फीसद अनाज देते हैं, लेकिन हमसे शायद ही कोई सलाह ली गई. आप पंजाब को इस तरह नजरअंदाज नहीं कर सकते.’’ बेहतर अनुपालन के लिए, केंद्र सरकार को अपने सुधारों की घोषणा के समय ही, पंजाब जैसे राज्यों के लिए रोडमैप देना चाहिए था. एक नीति की घोषणा होनी चाहिए थी कि केंद्र, गेहूं-चावल के जाल को तोडऩे के लिए फसलों के बड़े पैमाने पर विविधीकरण को बढ़ावा देगा. इसके लिए अब भी देर नहीं हुई है.
पंजाब के किसान संगठनों से बाद की बातचीत में भी मोदी सरकार और भाजपा से चूक हुई. पार्टी के एक वर्ग ने खालिस्तान मुद्दे को उठाने और सिखों और हिंदुओं के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिश की. बहुत कम लोगों ने यह समझने की कोशिश की कि अनेक आढ़तिए हिंदू हैं जो इन कानूनों से सिख किसानों की तरह ही बहुत प्रभावित होंगे.
आइडीसी के प्रमोद कहते हैं, ''गैर-जाट और गैर-सिख कमिशन एजेंटों, दुकानदारों और उदार बुद्धिजीवियों की सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को धर्मनिरपेक्ष कलेवर प्रदान किया है और जाति तथा सांप्रदायिक आधार पर सामाजिक ध्रुवीकरण को रोका है. व्यावहारिक राजनीति और आर्थिक वास्तविकता ने कट्टरपंथी सिख नेताओं को हाशिये पर डाल दिया है.’’ वे बताते हैं कि महिलाओं ने आंदोलन का पूरी तरह समर्थन किया क्योंकि उन्हें डर था कि वे बेईमान कॉर्पोरेट संस्थाओं के हाथों अपनी जमीनें गंवा देंगी.
भाजपा ने जाट सिख बनाम दलित सिख कार्ड खेलने के भी प्रयास किए. जाट सिख, जिनकी आबादी 21 प्रतिशत है, राजनैतिक रूप से शक्तिशाली होने के साथ बड़े जमींदार भी हैं. दलित सिख 24 प्रतिशत से अधिक हैं, वे सीमांत किसान हैं या खेतों में मजदूरी करते हैं. भाजपा ने सोचा कि वह एक नया इंद्रधनुषी गठबंधन बनाएगी जैसा कि उसने जाटों को हराने के लिए हरियाणा में किया था.
लेकिन हर जाति और हर राजनैतिक आस्था वाले वर्ग में, नए कृषि कानूनों के कारण आजीविका के नुक्सान को लेकर चिंताएं थीं इसलिए दलितों और जाटों को विभाजित करने की कोशिश कामयाब नहीं रही. लगता है कि भाजपा ने खुद को अलग-थलग कर लिया है. सही समय पर सरकार और एनडीए से बाहर निकलकर, बादल पंथिकों के बीच एसएडी का मूल समर्थन बना रहना सुनिश्चित कर चुके हैं. नए कृषि कानूनों को अवरुद्ध करके और आंदोलन को समर्थन देकर अमरिंदर ने भी किसानों का भरोसा जीता है.
मोदी के लिए सबसे अच्छा विकल्प अब अधिनियमों में संशोधन करके प्रमुख सुधारों को कुंद किए बिना किसानों की आशंकाएं दूर कर आंदोलन को जल्द से जल्द खत्म कराना ही हो सकता है. इन कानूनों के कई प्रावधान प्रशंसनीय हैं, लेकिन मोदी सरकार ने उन्हें लागू करने में जल्दबाजी दिखाई जिससे अब उसे रक्षात्मक होना पड़ रहा है.
सरकार को अब तर्कशील दिखना होगा. आंदोलनकारी किसानों को भी, तीनों अधिनियमों को निरस्त करने की जिद छोडऩे की जरूरत है और उन्हें ऐसे संशोधनों से सहमत हो जाना चाहिए जो उपयुक्त सुरक्षा प्रदान करते हों. देश विकास की राह में एक महत्वपूर्ण चौराहे पर है. ऐसे में सबसे अच्छा परिणाम तभी मिलेगा जब विवाद का अंत हो, किसानों की चिंताएं भी दूर हो जाएं साथ ही कृषि सुधार और विकास का मार्ग भी अवरुद्ध न हो.
योजना अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दूसरी हरित क्रांति के महान अगुआ के रूप में पेश किए जाने की थी तो यही कहना होगा कि इसकी पटकथा उस तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाई जैसी कि योजना थी
इस साल केंद्रीय पूल में पहली बार सबसे ज्यादा योगदान पंजाब का नहीं बल्कि मध्य प्रदेश का रहा
केंद्र और राज्य मिलकर पंजाब में प्रति परिवार खेत पर औसतन 1.22 लाख रुपए की सब्सिडी दे रहे हैं. देश में दूसरे किसी भी राज्य के मुकाबले यह सबसे ज्यादा दी जाने वाली सब्सिडी है
जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार पंजाब में विविध किस्म की फसलें पैदा करने का एक पूरा खाका तैयार करे और उसे लागू करने को बाकायदा धन मुहैया करे.

