
भारत का कृषि क्षेत्र विरोधाभासों से भरा पड़ा है. सबसे पहले इस पर जुगाली कीजिए. हम दुनिया में दूध, तिलहन, दलहन, कपास, आम, पपीते और केले के सबसे बड़े उत्पादक देश हैं. इतना ही नहीं, भारत दुनिया भर में चावल, चीनी, चाय, सब्जियों और मछलियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है. भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के गोदामों में फिलहाल चावल और गेहूं का इतना पर्याप्त सुरक्षित भंडार है कि राशन के अनाज के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर हरेक भारतीय परिवार को अगले दो सालों तक खिलाया जा सकता है.
शानदार? तो जरा इन विरोधी बातों को पचाने की कोशिश कीजिए. कृषि का जीडीपी में महज 17 फीसद हिस्सा है, लेकिन यह देश के 56 फीसद कार्यबल को रोजगार देता है. जोत को टुकड़ों में बांटना बीते दो दशक में और बदतर हुआ है और 87 फीसद किसान अब औसतन मात्र 2 हेक्टेयर तक कृषि भूमि के मालिक हैं. वास्तविक मूल्यों के लिहाज से किसानों की कृषि से होने वाली निजी आमदनी बीते एक दशक से ठहरी हुई है और 52.5 फीसद भारतीय किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं.
ग्रामीण वित्तीय समावेशन पर नाबार्ड की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रति खेतिहर परिवार पर औसत बकाया कर्ज 1.04 लाख रुपए आंका गया है, जो उनके शहरी समकक्षों के मुकाबले 36 फीसद अधिक है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में रोज कृषि क्षेत्र में कार्यरत 28 व्यक्तियों ने आत्महत्या की और पूरे साल का यह आंकड़ा 10,281 था.

यह वाकई किसानों का देश नहीं है. आजादी के बाद पहले दो दशकों में भारत खाद्य सहायता मांगने के लिए भीख का कटोरा लेकर अमीर देशों के पास जाता था. मंगाकर पेट भरने की यह हालत तब खत्म हुई जब 1960 के दशक के आखिरी सालों में भारत की हरित क्रांति ने अगले एक दशक में देश को अनाज के मामले में सराहनीय हद तक आत्मनिर्भर बना दिया. फिर भी, जैसा कि नीति आयोग के सदस्य और शीर्ष कृषि विशेषज्ञ डॉ. रमेश चंद बताते हैं, 21वीं सदी के दो दशक बीतने के बाद भी हमारे किसान 20वीं सदी के कृषि ढांचे के तहत ही काम कर रहे हैं, जिसका खमियाजा खुद उन्हें और देश दोनों को भुगतना पड़ता है.
हमारे अन्न भंडार लबालब भरे हैं, इसके बावजूद किसान इतनी भारी मात्रा में फसलें उगाने में जुटे हैं कि उन्हें हम गोदामों में भरकर रखने की उम्मीद नहीं कर सकते. हम अपनी महज 10 फीसद कृषि उपज संसाधित कर पाते हैं, वह भी ज्यादातर प्राथमिक उत्पादों के लिए, जिनमें कीमत के लिहाज ज्यादा मूल्य संवर्धन नहीं होता. खाने की चीजों की बर्बादी अब सालाना 1 लाख करोड़ रुपए या जीडीपी के 0.5 फीसद के नजदीक पहुंच गई है. जब दुनिया भर को कृषि निर्यातों की बात आती है, तो जरूरत से बहुत ज्यादा उत्पादन होने के बावजूद, भारत महज कुल 2.5 फीसद का निर्यात करता है और ब्राजील की चौथी पायदान के मुकाबले 13वीं पायदान पर है.
यह निराशाजनक हालत दशकों से बड़े सुधारों के लिए चीख-पुकार मचा रही है. 1991 के सुधारों के बाद उद्योगों ने नाटकीय बदलाव देखे और जीडीपी की धमाकेदार वृद्धि दी, वहीं खेती-किसानी जलता हुआ राजनैतिक अंगारा बनी हुई है जिसे अंगुलियां जलने के डर से एक के बाद एक सरकारों ने छूने से परहेज किया.

क्रांति के बीज
कृषि सुधारों का मुश्किल काम हाथ में लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी कोविड-19 महामारी के बढ़ते प्रकोप की जरूरत पड़ी. पुरानी और बेकार हो चुकी कृषि प्रथाओं को उलटने के लिए जुलाई में उन्होंने फटाफट तीन अध्यादेशों को अंजाम दिया और उसके बाद सितंबर में संसद के मॉनसून सत्र के दौरान इन्हें बाकायदा कानून बना दिया. कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी ने इनकी भूरि-भूरि तारीफ करते हुए कहा, ‘‘कृषि में सुधारों के लिए 1991 सरीखा लम्हा, एक गेमचेंजर जिसने कृषि क्रांति की शुरुआत कर दी है.’’ ये तीनों कानून भारतीय किसानों को केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के दमघोंटू शिकंजे से आजाद करते हैं. ऐसा वे जिन बड़े बदलावों के जरिए करते हैं, वे इस प्रकार हैं:
किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सुविधा) अधिनियम 2020 किसानों को अपनी पैदावार भारत में कहीं भी बेचने की इजाजत देता है ताकि उन्हें बेहतर दाम मिल सके और उस चीज का सूत्रपात हो सके जिसे केंद्रीय कृषि सचिव ''एक राष्ट्र, एक बाजार’’ कहते हैं. पहले ज्यादातर किसानों को (बिहार और केरल को छोड़कर) अपनी उपज अपने-अपने राज्यों की पंजीकृत कृषि उपज मंडी समितियों (एपीएमसी) को ही बेचनी पड़ती थी. नया कानून राज्य सरकारों को एपीएमसी इलाकों से बाहर कोई भी बाजार शुल्क, उपकर या उगाही वसूल करने से भी रोकता है. किसानों और खरीदारों दोनों को इस कदम का लाभ मिलना तय है, जो अभी 2 से 8 फीसद के बीच रकम अदा करते हैं.
मूल्य आश्वासन पर कृषक (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता तथा कृषि सेवा अधिनियम 2020 कॉर्पोरेट क्षेत्र को देश भर में ठेके पर खेती के कामों में शामिल होने की इजाजत देगा. साथ ही यह किसानों का शोषण रोकने के लिए सख्त शर्तें आयद करता है. यह कृषि जोतों के लगातार बंटते जाने की समस्या से उबरने के लिए लाया गया है. ऐसा करने के लिए यह खेती-किसानी की खातिर कृषि भूमि के समेकन या चकबंदी की कानूनी इजाजत देता है ताकि कम लागत में अधिक उत्पादन की अर्थव्यवस्था का निर्माण हो सके.
अनिवार्य वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020 अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल और आलू को अनिवार्य वस्तुओं की सूची से हटाता है और केंद्र सरकार को केवल युद्ध, अकाल या कीमतों में तेज उछाल सरीखी गैर-मामूली परिस्थितियों में ही कुछ निश्चित खाद्य पदार्थों की आपूर्ति शृंखला को विनियमित करने की इजाजत देता है. यह निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है, जो बाजार में केंद्र सरकार की बारंबार दखलअंदाजी की वजह से अभी न के बराबर है. सरकार उपभोक्ताओं को ऊंची कीमतों से बचाने और किसानों को किल्लत के वक्त का फायदा उठाने से रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप करती रही है.

इन सुधारों का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री ने कई मंचों पर कहा कि ''पहले केवल खाद्य उत्पादन बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता थी. लोग किसानों की आमदनी के बारे में भूल ही गए थे. पहली बार इस सोच को बदला गया है. आज खेती और किसानों को अन्नदाता की भूमिका से निकालकर उद्यमी की भूमिका में लाने के लिए अवसरों का निर्माण किया गया है.’’ अलबत्ता इन बदलावों के कानून बनने से पहले भी प्रधानमंत्री को विरोध का सामना करना पड़ा. इनमें से कुछ तो अप्रत्याशित हलकों से हुए. केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने विरोध में इस्तीफा दे दिया और वे जिस अकाली दल की नुमाइंदगी करती हैं, उसने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन से नाता तोड़ लिया.
सबसे ज्यादा अशांति पंजाब में भड़की जो हरित क्रांति 1.0 में सबसे अगुआ रहा था. यहां कई किसानों को डर है कि नए कृषि कानूनों से उन्हें वित्तीय नुक्सान होगा. कृषि चूंकि राज्य का विषय है इसलिए राज्य सरकार ने केंद्र पर आरोप लगाया कि उसने ये कानून बनाकर संघीय ढांचे का उल्लंघन किया है. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 21 अक्तूबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया और केंद्र के बनाए तीन कानूनों में से दो में राज्य के लिए खास संशोधन पारित करवा लिए.
इनमें अन्य बातों के अलावा अनाजों की बिक्री केवल एपीएमसी के माध्यम से करने को अनिवार्य बना दिया गया और खरीदारों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम पर अनाज खरीदने पर रोक लगा दी गई, यहां तक कि उल्लंघन करने वालों के जेल की सजा तक का प्रावधान किया गया.
पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने इन कानूनों के बारे में कहा, ''केंद्र ने उस व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ क्यों की जो वक्त की कसौटी पर खरी उतरी है और जिसने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया है? पंजाब उस काम को अंजाम देने वाला प्रमुख राज्य है. हम इतना कह रहे हैं कि हितधारकों से सलाह-मशविरा करें और दुबारा सोचें. मोदी सरकार में इतना घमंड क्यों, जो सोचती है कि बस वे ही सबसे अच्छा जानते हैं.’’
एक और कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल की अगुआई वाली सरकार ने विधानसभा में इसी से मिलते-जुलते संशोधन पारित किए. कांग्रेस शासित राजस्थान ने भी ऐसा ही करने के इरादे का ऐलान किया. इससे गद्दीनशीन भाजपा और कांग्रेस के बीच खाई साफ हो गई. इस बीच, किसानों के कुछ बड़े संगठनों और समर्थकों ने, जिनमें आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) से जुड़े संगठन भी शामिल हैं, इन सुधारों के खिलाफ देश भर में आंदोलन छेडऩे का फैसला किया.
हालांकि, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरे पर अपने पारंपरिक भाषण में प्रधानमंत्री के कृषि सुधारों का समर्थन किया, लेकिन संघ की ही एक शाखा स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) ने कानून में संशोधन की मांग की. एसजेएम के सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने कहा: ''हम कृषि विधेयकों का स्वागत करते हैं.
लेकिन चूंकि किसान बनिस्बतन कमजोर हैं, इसलिए हम किसानों को ज्यादा से ज्यादा लाभ दिलवाने और कोई भी नुक्सान हटाने के लिए उनमें बदलाव चाहते हैं.’’ एसजेएम एमएसपी अनिवार्य बनाने की पंजाब की मांग का समर्थन करता दिखता है लेकिन इसी बात को अलग ढंग से रखते हुए उसने कहा कि गेहूं और चावल सरीखे अनाजों के लिए न्यूनतम आरक्षित मूल्य की जरूरत है जिसके नीचे किसी भी बिक्री की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए.

हालात जहां मोदी सरकार से कुछ हद तक मान लेने का तकाजा कर रहे हैं, वहीं कृषि सुधार जिस दिशा में बढ़ रहे हैं उसमें इससे कोई बदलाव नहीं आएगा. राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के सीईओ अशोक दलवई कहते हैं, ‘‘पहला बदलाव तो उत्पादन-उन्मुख व्यवस्था से हटकर ऐसी व्यवस्था की तरफ बढऩा है जो किसानों की आमदनी बढ़ाने पर जोर दे और उगाई जाने वाली फसलों के लिए मांग-आधारित फैसलों में सहायता दे.’’ कई विशेषज्ञ इन तीन कानूनों को कृषि क्रांति की लंबी राह में पहला बड़ा कदम मानते हैं. सुधारों को फास्ट-ट्रैक पर लाने के लिए मोदी सरकार और प्रमुख हितधारकों को जो कुछ करने की जरूरत है, वह इस प्रकार है:
अनाज के फंदे से बचें
कृषि सुधारों का सूत्रपात करते हुए प्रधानमंत्री ने कृषि के मौजूदा ढांचे और खासकर एपीएसी तथा एमएसपी की व्यवस्था हटाने से सावधानी बरती. इसके बजाए वे समानांतर व्यापार प्रणाली लेकर आए जो खुद को निजी क्षेत्र के लिए खोलती है और कृषि उपजों के दाम बाजार के हिसाब से निर्धारित होने देती है. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा करते हुए मोदी ने अतीत से पूरी तरह नहीं कटकर ऐसी नीति पर चलने का रास्ता चुना जो खुले आसमानों की उस नीति से मिलती-जुलती है जिसने 1990 के दशक के भारत के विमानन क्षेत्र को बदलकर रख दिया.
निजी एयरलाइनों को संचालन की इजाजत देकर इस नीति ने इंडियन एयरलाइंस के एकाधिकार को खत्म कर दिया और उपभोक्ताओं के लिए हवाई सेवाओं में भारी सुधार का मार्ग प्रशस्त कर दिया. जरूरत उत्तरोत्तर धीरे-धीरे बदलाव के रास्ते की है, ताकि किसानों को अनाजों के उत्पादन के फंदे में फंसे रहने और हमेशा सरकारी खैरातों पर निर्भर रखने के बजाए ज्यादा आमदनी दे सकने वाली फसलें चुनने में समर्थ बनाया जा सके.
खाद्य सुरक्षा की तलाश में एक के बाद एक सरकारों ने अनाजों और खासकर गेहूं और धान का उत्पादन बढ़ाने पर खासा जोर दिया. केंद्र सरकार ने किसानों को कीमतों में मौसमी उतार-चढ़ावों से बचाने के लिए शुरुआत में केवल अनाजों के लिए एमएसपी की व्यवस्था भी कायम की. हालांकि बाद में एमएसपी की व्यवस्था 23 उपजों तक बढ़ा दी गई, लेकिन इसमें आज भी गेहूं और चावल का दबदबा है. सरकारी खरीद में 80 फीसद हिस्सा गेहूं और चावल है, जबकि बाकी में दलहन और तिलहन आते हैं. एमएसपी का असर कुल खेतिहर समुदाय के 6 फीसद पर पड़ता है, लेकिन पंजाब और हरियाणा में बहुसंख्यक किसान इस पर निर्भर हैं.
साल 2019-20 में कुल 10.6 करोड़ टन गेहूं उत्पादन में से 3.4 करोड़ टन राज्य सरकारों ने खरीदा जो कुल उपज का एक-तिहाई था. इस खरीद में 60 फीसद से ज्यादा हिस्सा पंजाब और हरियाणा का था. धान के मामले में, 11.7 करोड़ टन के कुल उत्पादन में से 5 करोड़ टन राज्य सरकारों ने खरीदा, जिसमें इसका पांचवां हिस्सा पंजाब के खाते में गया.
अनाज का बहुत ज्यादा उत्पादन नफे के बजाए नुक्सान देने लगा है. मसलन, इस साल जून में एफसीआइ के गोदामों में 8.6 करोड़ टन से ज्यादा अनाज भरा पड़ा था. महामारी के दौरान लाई गई नई मुफ्त अनाज वितरण योजना के लिए जरूरी अनाज बांट देने के बाद भी उसके गोदामों में अगला खरीद सीजन आने के वक्त 5 करोड़ टन अनाज अतिरिक्त होगा. एक अनुमान के मुताबिक, केंद्र अनाज की खरीद पर 2 लाख करोड़ रुपए या जीडीपी का 1 फीसद खर्च करता है.
फल और सब्जियां प्रति हेक्टेयर कहीं ज्यादा आमदनी दिलवाती हैं, फिर भी किसान अनाज ही उगाते रहते हैं क्योंकि उन्हें बाजार के उतार-चढ़ावों से नहीं गुजरना पड़ता और उन्हें बंधे-बंधाए मुनाफे का भरोसा रहता है. पिछले साल एक प्रतिष्ठित कृषि पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में रमेश चांद ने हिसाब लगाया था कि बिजली, उर्वरक और कर्ज पर आर्थिक सहायता सरीखी इनपुट सब्सिडियां 2015-16 में बोए गए प्रति हेक्टेयर क्षेत्र पर 14,639 रुपए जितनी ज्यादा थीं. इनमें 75 फीसद से ज्यादा हिस्सा बिजली और उर्वरक की सब्सिडी का था. उस साल के दौरान कृषि पर कुल इनपुट सब्सिडी के तौर पर सरकार ने 2.05 लाख करोड़ रुपए चुकाए जो भारत के जीडीपी का 1 फीसद था.
यही नहीं, अनाज उगाने पर बहुत ज्यादा जोर देने से पंजाब और हरियाणा में भूमिगत जल का स्तर साल में औसतन सीधा 7 मीटर नीचे चला जाता है. जरूरत से ज्यादा उगाए गए अनाज का बड़ा हिस्सा या तो सड़ता है या बर्बाद होता है या पीडीएस प्रणाली में भेजते वक्त बड़े पैमाने पर लूट में चला जाता है.
अनाज के इस फंदे से निकलने के लिए विशेषज्ञ अब प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) की तरफ जाने की वकालत कर रहे हैं, जिसमें किसानों को ज्यादा से ज्यादा आमदनी देने वाली मनचाही फसल उगाने के लिए हर सीजन में एकमुश्त प्रोत्साहन राशि दी जाती है. इससे बिजली और उर्वरक पर दी जाने वाली सब्सिडी धीरे-धीरे घटती जाएगी और सरकारी खरीद में भी अच्छी-खासी कमी आएगी. मसलन, हरियाणा में किसानों को गेहूं या धान नहीं उगाने और अन्य फसलें अपनाने के लिए प्रोत्साहन राशि के तौर पर हर सीजन प्रति एकड़ 7,000 रुपए दिए जा रहे हैं. इसके नतीजे भी दिखाई देने लगे हैं.
21वीं सदी के इन्फ्रास्ट्रक्चर की दरकार
एपीएमसी हाल तक कृषि संरचना की मुख्य आधार थीं. अतीत में उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयास हुए लेकिन खास सफलता नहीं मिली. एपीएमसी का गठन 1970 के दशक में किया गया था और इसने शुरुआत में खरीदारों का पंजीकरण और शीघ्र भुगतान सुनिश्चित करके किसानों के लिए उचित व्यापार की सुविधा प्रदान की थी. हालांकि, कई राज्यों में एपीएमसी का स्वरूप बिगड़कर जमींदारी जैसी संस्थाओं में बदल गया, जहां आढ़तियों (बिचौलिये) ने ऐसे संघ बना लिए जो उन्हें मोटा मुनाफा कमाने में सक्षम बनाते थे.
पंजाब जैसे राज्य जो उपकर और शुल्क के रूप में औसतन 8.5 प्रतिशत वसूलते हैं, की स्थिति तो ऐसी हो गई कि उसने एपीएमसी को ही राजस्व के स्रोत के रूप में ही देखना शुरू कर दिया. पंजाब को एपीएमसी से प्रतिमाह 3,500 करोड़ रुपए की कमाई होती है.
बिहार ने 2006 में साहसिक निर्णय लिया, जब मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में नीतीश कुमार ने बिचौलियों के हाथों किसानों का उत्पीडऩ समाप्त करने और बुनियादी ढांचे में निजी निवेश के लिए रास्ता बनाने की खातिर एपीएमसी समाप्त करने का निर्णय लिया. हालांकि शुरुआत में व्यापार में कुछ व्यवधान हुआ था, बाद में इससे कई निजी उद्यम संचालित विपणन मॉडल उभरे.
किसानों को एपीएमसी जाने के बजाए जैसा कि वे अन्य राज्यों में करते हैं, खेत से ही व्यापार होने लगा है. उदाहरण के लिए, पूर्णिया जिले में केले के खेती करने वाले किसान अपनी फसल सीधे व्यापारियों को बेचते हैं. व्यापारी उनके खेतों तक आते हैं जिससे परिवहन लागत और फसल की बर्बादी कम हो जाती है.
इस बीच, दो निजी कंपनियों ने राज्य भर में 200 से अधिक गोदाम स्थापित किए हैं और किसानों से शुल्क लेकर उपज के भंडारण की जगह तब तक के लिए उपलब्ध कराती हैं, जब तक किसान उपज को सर्वोत्तम मूल्य पर बेचने में सक्षम नहीं होते हैं. तमिलनाडु की एक खाद्य प्रसंस्करण कंपनी ने हाल ही में बिहार के किसानों से सामूहिक रूप से 1 लाख टन मक्का खरीदा.
किसानों ने फसलों में विविधता भी लाने की कोशिश की है और मखाना जैसी उपज भी ले रहे हैं जिसमें बिहार देश के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक बन गया है. बिहार के कृषि सचिव एन. सरवण कुमार कहते हैं, ‘‘किसान अपनी उपज बेचने के लिए एमएसपी पर अधिक निर्भर नहीं हैं और उन्हें बेहतर कीमत मिल रही है. किसानों को एपीएमसी की बेडिय़ों से मुक्त करना निश्चित रूप से मददगार रहा है.’’
ठेका कृषि को सक्षम करने वाले नए अधिनियम के साथ, देशभर में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के पुनर्जीवित होने की बातें शुरू हो गई हैं. एफपीओ सहकारी समितियों की तरह काम करते हैं. इसमें 100 से लेकर 1,000 तक किसान सदस्य होते हैं जो जमीन पर साझा खेती करके लागत घटा सकते हैं. देशभर में 5,000 से अधिक एफपीओ हैं, उनमें से ज्यादातर निष्क्रिय हैं. मोदी सरकार ने पांच वर्षों में एफपीओ की संख्या दोगुनी करके 10,000 तक पहुंचाने का वादा किया है और उन्हें आर्थिक सहायता देने के लिए 5,000 करोड़ रुपए निर्धारित किए हैं.
कुछ राज्यों में एफपीओ पहले से ही, काफी प्रभावी रहे हैं. नासिक में 2 करोड़ रुपए के प्रारंभिक निवेश और 500 किसानों की सदस्यता के साथ 2010 में गठित एफपीओ सह्याद्री फार्म्स (एसएफ), ने फलों और सब्जियों की खरीद से काम शुरू किया और फिर उसने खाद्य प्रसंस्करण में कदम रखते हुए विभिन्न फलों के रस, सॉस और जैम तैयार करना शुरू किया. इसके बाद एफपीओ ने अपनी खुदरा दुकानें खोलने के अलावा कई शहरों में प्रतिष्ठित रिटेल चेन ऑपरेटरों से संपर्क करके अपने उत्पाद बेचने शुरू किए.
एक दशक के भीतर एसएफ ने अपना पूंजी आधार बढ़ाकर 100 करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया, नेटवर्क में विस्तार करते हुए 8,000 किसानों को जोड़ा और उपयोग के लिए 6,000 टन भंडारण सुविधा की स्थापना की. आज यह भारत के सबसे बड़े अंगूर निर्यातकों में से एक है. इसकी सफलता का क्या राज है? एसएफ के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक विलास शिंदे कहते हैं, ''सह्याद्री सबसे छोटे किसान को भी बुनियादी ढांचा प्रदान करता है ताकि वह वैश्विक आपूर्ति मूल्य शृंखला का हिस्सा बनने में सक्षम हो सके.’’
कई कॉर्पोरेट दिग्गजों ने भी भारतीय किसानों के साथ काम करते हुए जबरदस्त सफलता का प्रदर्शन किया है. आइटीसी का ई-चौपाल एक ऐसा ही सफल उदाहरण है. 2000 के दशक की शुरुआत में लॉन्च हुई यह पहल आज ग्रामीण भारत में इंटरनेट-आधारित सबसे बड़ी हस्तक्षेप सेवा बन गई है. यह 10 राज्यों के 35,000 से अधिक गांवों में विविध श्रेणी की फसलें उगाने वाले 40 लाख किसानों को कवर करता है.
संचालकों की ओर से चलाए जा रहे 6,100 से अधिक कियोस्क के साथ, कंपनी कृषि समुदाय को मौसम और बाजार की कीमतों पर आधारित जानकारियां प्रदान करती है, जलवायु अनुकूल टिकाऊ कृषि प्रथाओं का प्रसार करती है, कृषि आदानों (इनपुट) की बिक्री की सुविधा देती है और परिवहन तथा हैंडलिंग लागत को बचाने के लिए सीधे खेतों से ही कृषि उपज खरीदती है.
इन्हें नए जमाने की अब विश्वस्तरीय कृषि सहकारी समितियों के रूप में माना जाता है और प्रसिद्ध आशीर्वाद आटा ब्रांड इस मॉडल के सबसे लोकप्रिय उत्पादों में एक है. आइटीसी एग्री और आइटी बिजनेस के प्रभारी एस. शिवकुमार कहते हैं, ''ठेका कृषि प्रणाली सफलतापूर्वक काम करेगी अगर इसमें किसान और कारोबारी घराने दोनों के बीच पारस्परिक निर्भरता हो.’’ वे बाजार की जानकारी, मूल्य निर्धारण, एकत्रीकरण, रसद, काउंटर-पार्टी जोखिम बीमा और वित्त प्रबंध सहित एफपीओ के लिए कई प्रकार के समाधान प्रदान करने में स्टार्ट-अप कंपनियों के लिए शानदार अवसर देखते हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों नौकरियां बनाई जा सकती हैं.
पेप्सिको जैसे अन्य कॉर्पोरेट ने भी भारतीय व्यापार के लिए राह दिखाई है. कंपनी अपने चिप्स ब्रांड 'लेक्स’ के लिए कई राज्यों में किसानों से आलू खरीदती है. यह 27,000 से अधिक किसानों के साथ काम करती है, पूरे फसल चक्र में उनकी मदद करती है, किसानों के साथ सर्वोत्तम गुणवत्ता के बीज तैयार करती है, फिर आलू की बेहतर फसल के लिए वह बीज किसानों के बीच वितरित करती है और प्रचुरता के बावजूद उनकी फसल खरीदने का आश्वासन देती है या उनके नुक्सान की भरपाई के लिए बीमा कवर प्रदान करती है.
पेप्सिको के साथ अनुबंध करने वाले 98 प्रतिशत किसान कंपनी के साथ बने रहते हैं. इसकी मुख्य वजह यह है कि किसानों को उनकी उपज का भुगतान एमएसपी से ऊंचे दर पर होता है. जिस सीजन में आलू की आपूर्ति कम रहती है उस सीजन में भी जरूरत का आलू उपलब्ध रखने के लिए पेप्सिको ने कोल्ड स्टोर्स के साथ सब-कॉन्ट्रैक्ट किया है.
भारत बने दुनिया की खाद्य टोकरी
वैश्विक कृषि प्रचलनों में तीन प्रमुख बदलाव देखे जा रहे हैं जो भारत की कृषि क्रांति के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार करते हैं, जिसकी लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही है. कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अध्यक्ष प्रो. विजय पाल शर्मा का कहना है कि देश में और दुनिया के हर हिस्से में महंगे खाद्य पदार्थों, जिनमें स्वस्थ से जुड़े उत्पाद भी शामिल हैं, के लिए उपभोक्ता मांग में वृद्धि हुई है और यह कृषि क्रांति का प्रमुख वाहक बन सकता है.
अन्य विशेषज्ञ बदलते भू-राजनैतिक समीकरणों की ओर इशारा करते हैं क्योंकि बहुत से देश चीन पर अपनी निर्भरता पर पुनर्विचार कर रहे हैं जबकि कई अन्य देश खाद्य सुरक्षा को लेकर अपनी तलाश को नवीनीकृत करने को उत्सुक हैं.
अफसोस की बात है कि कृषि निर्यात पूरी तरह उपेक्षित रहा है. कृषि उपज की कई श्रेणियों में विश्व में अग्रणी होने के बावजूद, भारत का कृषि निर्यात मात्र 38.7 अरब डॉलर (2.9 लाख करोड़ रुपये) का है, जो इसके कुल उत्पादन का सिर्फ 7 प्रतिशत है और पिछले पांच वर्षों से स्थिर है. मोदी सरकार ने अब अगले पांच वर्षों में कृषि निर्यात को 100 अरब डॉलर (7.4 लाख करोड़ रुपए) तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है.
अगर सरकार देश में कृषि संबंधी बुनियादी ढांचे को पुनर्जीवित नहीं करेगी, तो यह लक्ष्य भी एक सपना बनकर ही रह जाएगा. असमानताओं का सिर्फ एक उदाहरण इसे समझने को पर्याप्त है: पिछले एक दशक में, भारत ने अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसद हिस्सा कोल्ड स्टोरेज में तो डाल दिया है लेकिन इस कोल्ड चेन के शेष घटक पूरी तरह से उपेक्षित रहे हैं. प्रशीतित कंटेनरों (रीफर) से युक्त ट्रक जरूरत के 85 प्रतिशत तक कम उपलब्ध थे.
हमारे पास बमुश्किल 10 प्रतिशत फसलों को पकाने वाली इकाइयां थीं और मांग को पूरा करने के लिए वस्तुत: कोई एकीकृत पैकहाउस नहीं था. इससे भी बदतर, अधिकांश खुदरा दुकानों में कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं थी. ऐसी ही कहानी मेगा फूड पार्क की भी है. एक दशक से अधिक पहले केंद्र सरकार ने देश में 42 फूड पार्कों मंजूरी दी थी. इन्हें खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात के केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना था.
इस साल जून तक उनमें से 20 ही चालू हो सके थे. देरी के कारणों में भूमि अधिग्रहण, सबलीज के मुद्दे और लॉजिस्टिक की समस्याएं शामिल थीं. मोदी सरकार ने घोषणा की है कि वह सुधारों को गति देने और विश्वस्तरीय कृषि बुनियादी ढांचे को स्थापित करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि काम तेजी से निष्पादित हो.
निजी निवेश विकास की कुंजी है, लेकिन अभी तक कृषि में कुल निवेश का केवल दो प्रतिशत निजी क्षेत्र से आया है. केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि वह खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों, खाद्य उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग और व्यापार के लिए ऑटोमेटिक रूट के तहत 100 प्रतिशत एफडीआइ की अनुमति दे रही है. लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. अन्य उपायों में किसानों को फसल बोने से पहले कीमतों की जानकारी में सक्षम बनाने के लिए कमोडिटी डेरिवेटिव बाजारों को मजबूत करना होगा. यह मौजूदा आपूर्ति-आधारित उत्पादन के बजाए मांग-संचालित उत्पादन को प्रोत्साहित करेगा.
भारत को दुनिया की खाद्य टोकरी बनाना है तो निर्यात बाजार में निवेश अधिक व्यवस्थित रूप से लेकर आने का लक्ष्य तय करने, नवाचार को प्रोत्साहित करने और सर्वोत्तम प्रथाओं को सुनिश्चित करने की जरूरत है. वियतनाम ने दो दशकों में चावल, कॉफी, काजू, मछली और काली मिर्च के पांच मूल्य शृंखलाओं को भौगोलिक समूहों के रूप में विकसित करके, कृषि जीडीपी चार गुना बढ़ा ली. आसियान और चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते करके अपने निर्यात को बढ़ाना सुनिश्चित किया.
15वें वित्त आयोग द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समूह (एचएलईजी) ने हाल में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक खाका प्रस्तुत किया है जिसमें उसने 22 फसल मूल्य शृंखलाओं की पहचान की है जिन्हें सरकार बढ़ावा दे सकती है. इसने सात फसलों को ''प्रकाशस्तंभ (लाइटहाउस)’’ के रूप में विकसित करने के लिए इससे जुड़ी मूल्य-शृंखलाओं को प्राथमिकता के आधार पर स्थापित करने का सुझाव दिया है. यह बड़ी उपलब्धि हो सकती है. इनमें चावल, झींगा, मसाले, भैंस, फल और सब्जियां, वनस्पति तेल और लकड़ी शामिल हैं.
इनके लिए इनपुट, लॉजिस्टिक्स, बुनियादी ढांचा और प्रसंस्करण से लेकर बाजार तक, शुरू से अंत तक मूल्य शृंखलाएं बनाए जाने की जरूरत है. उत्पादकता में सुधार, लागत दक्षता, मूल्य प्रतिस्पर्धा और आयात को इच्छुक चिन्हित देशों के साथ बातचीत करके व्यापार की अनुकूल शर्तें तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे. आईटीसी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक संजीव पुरी कहते हैं, ''हमें उम्मीद है कि ये लाइटहाउस फसलें अन्य फसलों के लिए एक मिसाल बनेंगी. उसके लिए, राज्य और केंद्र सरकारों को उचित रूप से मूल्य-शृंखला हितधारकों को प्रोत्साहित करना चाहिए.’’
हमें निर्यात को बढ़ावा देने के साथ ही साथ उन खाद्य पदार्थों, विशेष रूप से तिलहन में तेजी से आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है. भारत खाद्य तेल का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है और घरेलू जरूरत का लगभग 70 प्रतिशत आयात करता है जिसकी लागत 60,000 करोड़ रु. है. इसमें से 80 प्रतिशत हिस्सा पाम ऑयल का है.
बाजार में पैदा हुई किल्लत के कारण उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कृषि उत्पादों की कीमतें नियंत्रित करने के लिए केंद्र और राज्य, दोनों ही सरकारें दोषी हैं जिसका खामियाजा किसान को उठाना पड़ता है. गन्ना इसका अच्छा उदाहरण है कि कैसे उद्योग पर सरकार के शिंकजे के कारण विसंगतियां पैदा हुईं हैं. सरकारें गन्ने की उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) तय करके किसान को अन्य फसलों की तुलना में 60-70 प्रतिशत अधिक लाभ सुनिश्चित करती रही हैं.
राज्य भी परामर्श मूल्य तय करते हैं. इस हस्तक्षेप का परिणाम: चीनी मिलें पिछले दो मौसम के गन्ने के 20,000 करोड़ रु. के बकाए का भुगतान नहीं कर पाई हैं और यह क्षेत्र संकटग्रस्त हो गया है. देश में चीनी के उत्पादन की लागत अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक है. त्रिवेणी ग्रुप के वाइस चेयरमैन और एमडी तरुण साहनी कहते हैं, ''हमारा भविष्य सुरक्षित रखने के लिए सरकार को आर्थिक तंत्र को कुछ प्रोत्साहन देने की जरूरत है.’’
पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन कहते हैं कि ''अगले 10 वर्षों में सरकार सुधारों को किस स्तर तक लेकर जाना चाहती है, उसे लेकर एक रोडमैप तैयार करने की जरूरत है.’’ प्रधानमंत्री को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने मनरेगा परियोजनाओं को परिसंपत्ति आधारित बनाने से लेकर डीबीटी योजनाओं के तहत किसानों को प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण तक, पिछले छह वर्षों में भारतीय खेती की दशा बदलने के लिए कुछ ठोस प्रयास किए हैं.
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा कहते हैं, ''ये सभी उपाय और योजनाएं, ग्रामीण भारत के परिवर्तन की नींव रख रही हैं.’’ अब, किसानों को समृद्ध बनाने की दिशा में एक लंबी छलांग सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार को अपनी ऊर्जा और अपने संसाधनों को कृषि क्षेत्र पर केंद्रित करने की आवश्यकता है. आखिरकार, भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी की आजीविका और कल्याण इन सुधारों पर निर्भर जो करता है.
एग्रो आयाम नासिक के पास टमाटर संग्रहण केंद्र; आइटीसी की हावड़ा स्थित मैन्युफैक्चरिंग इकाई और अमृतसर के पास उसके ह्वीट साइलो
‘‘पहला बदलाव है पैदावार केंद्रित व्यवस्था से हटकर ऐसी प्रणाली अपनाना जो किसान की आय बढ़ाए और जहां मांग के आधार पर फैसले हों’’
अशोक दलवई
सीईओ, नेशनल रेनफेड
एरिया अथॉरिटी
''कृषि कानून खेती के लिए 1991 जैसे मौके की तरह हैं यानी गेम चेंजर. इन कानूनों ने कृषि में एक बड़े सुधार के लिए रास्ता तैयार कर दिया है’’
अशोक गुलाटी,
कृषि के चेयर प्रोफेसर, आइसीआइआइईआर
‘‘इक्कीसवीं सदी के दो दशक बीत जाने के बावजूद हमारे किसान अब भी बीसवीं सदी के कृषि ढांचों पर काम कर रहे हैं. इसे बदलना ही होगा’’
रमेश चंद
सदस्य, नीति आयोग
‘‘ये सुधार किसानों को बाजार में आजादी प्रदान करेंगे, उद्यमिता को बढ़ावा देंगे और टेक्नोलॉजी तक पहुंच बनाएंगे. इनसे खेती आमूलचूल बदलेगी’’
डॉ. पी.के. मिश्र
प्रधानमंत्री के प्रधान सलाहकार

