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महासागर हमारा सागर उनका

चीन की विस्तारवादी नीति के मुकाबले के लिए हमारी प्राथमिकता नौसैनिक ताकत में इजाफा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी पहुंच बढ़ाने की होनी चाहिए.यह ऐसा खेल है जो दो खिलाड़ी खेल सकते हैं, इसलिए भारतीय नौसेना के अभियान के दर्शन का केंद्र बिंदु 'समुद्र नियंत्रण’ है.हिंद महासागर, राष्ट्रीय सुरक्षा, ऐंटी-बैलिस्टिक मिसाइल, डायरेक्टेड-एनर्जी,

चीनी नौसेना की पहरेदारी 2008 से जारी; इस वक्त 22वीं पट्रोल मोर्चे पर है
चीनी नौसेना की पहरेदारी 2008 से जारी; इस वक्त 22वीं पट्रोल मोर्चे पर है
अपडेटेड 21 जुलाई , 2020

चीन नीतिः चीन की अंतर्कथा

एडमिरल (रिटायर्ड) अरुण प्रकाश

अतीत में भारत में सत्ता बदलाव में नौसैनिक और नौवहन क्षेत्र की अहम भूमिका रही है और भविष्य की चुनौतियां भी उसी हलके से आएंगी. लिहाजा, यही क्षेत्र इलाकाई शक्ति संतुलन और हमारी नियति तय करता रहेगा. बदकिस्मती से देश के राजनैतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभ्रांत तबके के लिए नौवहन ताकत खास अहमियत नहीं रखती. इससे इस धारणा को (जो नौसैनिकों में प्रचलित है) बल मिला है कि उन्हें समंदर की रतौंधी है. लेकिन क्या उत्तरी सीमा पर चीन से तकरार के वक्त यह विषय उठाने का सही समय है?

कूटनीतिक और सैन्य वार्ताओं का दौर जारी है, लेकिन अतीत में चीन की घुसपैठ और बढ़-चढ़कर दावों के मद्देनजर इसकी उम्मीद कम ही है कि चीनी पीछे हटेंगे या किसी सुलह पर राजी होंगे. इसलिए चीन-भारत तनाव जारी रह सकता है और भारत अगर अपनी जमीन नहीं छोडऩा चाहता तो उसे अपनी नौसैन्य शक्ति समेत तमाम क्षेत्रों में अपनी ताकत बढ़ाकर 'व्यापक राष्ट्रीय शक्ति का इजहार करना होगा, ताकि मजबूती से मोलतोल किया जा सके.

जमीन पर भारत-चीन शक्ति संतुलन और संभावित चीन-पाकिस्तान गठजोड़ के मद्देनजर चीन के हक में यही है कि तनाव हिमालय तक सीमित रहे और भारत 'दक्षिण एशिया के चौखटे’ में ही उलझा रहे. लिहाजा, इस दलील में दम है कि भारत को टकराव 'समुद्र’ की ओर ठेलने की कोशिश करनी चाहिए, जहां संतुलन काफी हद तक उसके हक में है.

2001 में भारत ने जब सेना के तीनों अंगों के अंडमान-निकोबार कमान (एएनसी) का गठन किया, तो बीजिंग की नजर में वह बंगाल की खाड़ी में दबदबा कायम करने और मलक्का जलडमरूमध्य पर नियंत्रण करने की कोशिश थी. एएनसी अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पाई. लेकिन उसका असर यह हुआ कि 2003 में राष्ट्रपति हू जिंताओ ने 'मलक्का पेच’ का हवाला देकर चीन के समुद्री मार्ग से होने वाले व्यापार की रक्षा के लिए रणनीतियां बनाने की अपील कर डाली.

हू जिंताओ की चेतावनी से चौकन्ना चीन ने न सिर्फ हिंद महासागर के इलाके में 'अड्डे और ठिकाने’ बनाए, बल्कि पीएलए की नौसेना (पीएलएएन) में भी भारी बढ़ोतरी देखी गई. पिछले दशक में चीन ने अपने 70 एटमी और डीजल पनडुब्बियों के बेड़े में दो विमान वाहक पोत, दर्जनों विध्वंसक पोत और टैंकर वगैरह जोड़ लिए. यह समुद्र में नौसैन्य शक्ति में एकाधिकार हासिल करने के नजरिए से किया गया और हम जल्दी ही अपने पड़ोस में पीएलएएन की 'हिंद महासागर टुकड़ी’ को गश्त लगाते देख सकते हैं.

भारत 1962 से ही उत्तरी सीमा पर चीन की लगातार बढ़ती सैन्य मौजूदगी पर जवाबी कार्रवाई भर करता रहा है. अगर दक्षिणी समुद्री सीमा पर भी नौसैनिक दबाव बढ़ा तो इसके खतरे व्यापक होंगे. इसीलिए भारत को अपनी नीति पर पुनर्विचार का वक्त है. खुशकिस्मती से भारतीय उपमहाद्वीप ही हिंद महासागर में प्रमुख है, जिसका मतलब है कि यहां 'आंतरिक लाइन के भीतर समुद्री संचार’ की गुंजाइश है जबकि चीन की नौसेना को 8,000-10,000 किमी लंबी 'बाहरी लाइन’ का सफर तय करना है.

हिंद महासागर समुद्री संचार लाइन (एसएलओसी) के तहत चीन का 'आर्थकि गलियारा’ भी है, इसलिए अमूमन यह सुझाव आता है कि भारत उसे धमका सकता है. हालांकि युद्धक रणनीति के मामले में 'नौवहन नाकेबंदी’ और दुश्मन के मालवाही जहाजों को रोकना कारगर तो हो सकता है लेकिन शांति काल में बीच समुद्र में मालवाही जहाजों की आवाजाही में दखल देना नियम विरुद्ध है.

व्यापार युद्ध उपयोगी तो हो सकता है लेकिन उसका असर दिखने में काफी वक्त लगता है. यह ऐसा खेल है जो दो खिलाड़ी खेल सकते हैं, इसलिए भारतीय नौसेना के अभियान के दर्शन का केंद्र बिंदु 'समुद्र नियंत्रण’ है. मतलब हमारे अहम व्यापार की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि 'समुद्री आवाजाही पर रोक’, 'ताकत का इजहार’ और पनडुब्बी युद्ध (एएसडब्ल्यू) जैसे अभियान भी हैं.

भारत की 2015 की नौसैनिक रणनीति में नौसैनिक निगरानी और/या टकराव के लिए जरूरी कार्रवाई की तैयारी का जिक्र है. उसके मुताबिक, बहुमुखी युद्ध क्षमता के लिए कई विमानवाहक पोत समेत संतुलित बेड़े की दरकार है. समुद्र में हवाई ताकत वाले पोत की चौबीस घंटे उपलब्धता, पूर्व चेतावनी, वायु प्रतिरक्षा, ऐंटीशिप और पनडुब्बी युद्ध क्षमता ही पीएलएएन की घुसपैठ रोकने में भारत के पक्ष में पलड़ा झुकाने में अहम रोल निभाएगी.

दरअसल, ज्यादातर के लिए नौसेना हलके की समझ धुंधली है तो नौसेना की हवाई ताकत के मामले में और भी कम समझ है. अमूमन उसके बारे में कई भ्रांत धारणाएं हैं. यह बात हाल ही में मीडिया की एक बातचीत में जाहिर हुई. रक्षा हलके के एक आला अफसर ने नौसेना की विमानवाहक पोत की जरूरत को खारिज कर दिया और कहा कि ''...सतह पर हर गतिविधि को सैटेलाइट भांप सकते हैं और उस पर मिसाइल दाग सकते हैं, इसलिए नौसेना को विमानवाहक पोत के बदले पनडुब्बियों की अधिक जरूरत है.’’ विमानवाहक पोत के आलोचक अमूमन तीन पहलुओं का जिक्र करते हैं, उसकी कथित कमजोरियां, बदलते युद्धक्षेत्र में उसकी प्रासंगिकता और उसकी कीमत.

किसी जहाज की लड़ाकू क्षमता और उसके बचे रहने की ताकत टेक्नोलॉजी, खुफिया सूचनाओं और रणनीतिक कौशल पर निर्भर करती है. चीन ने अमेरिकी नौसैन्य पोतों पर निशाना साधने के लिए 'ऐंटी एक्सेस एरिया डिनायल’ (ए2एडी) रणनीति का विकास किया है, जो लंबी दूरी से जहाज पर निशाना साधने के लिए दूसरे उपायों के अलावा ऐंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल पर आधारित है.

इससे शुरुआत में हड़कंप तो मचा लेकिन पाया गया कि ऐंटी-बैलिस्टिक मिसाइल, डायरेक्टेड-एनर्जी अस्त्र और सटीक मारक क्षमता वाले हथियार इस नए कॉन्सेप्ट को नाकाम करने में कारगर हैं. ए2एडी से चौंकाने वाले चीन ने 6-7 जहाजों के पोत निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना से भी सबको हैरान कर दिया, इसमें बेशक कुछ हिंद महासागर क्षेत्र में तैनात किए जाने हैं.

विमानवाहक पोत के आलोचक उसके नाकाम होने की बात करते हैं क्योंकि वे सिर्फ जंग के हालात में ही उसका आकलन करते हैं लेकिन शांतिकाल में उसकी भूमिका बड़ी है. 99 फीसद वक्त तो शांतिकाल में ही यथास्थिति बनाए रखने की जरूरत होती है और ऐसे में निगरानी तंत्र के लिए विमानवाहक तंत्र ही जरूरी हैं. पोत बिना कोई गोली दागे अपनी 'मौजूदगी’, 'ताकत के इजहार’, 'दबदबे’ मात्र से शांति और यथास्थिति कायम रखता है और उसके दबाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता.

यह भी एक किस्म की भ्रांत धारणा है कि पोत को 'रक्षा के लिए हथियार प्रणाली’ की जरूरत होती है. ज्यादातर मामलों में होता यह है कि वह दूसरी इकाइयों को अपनी हवाई ताकत से सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे उसे गजब की रफ्तार, पहुंच और लचीलापन हासिल होता है. पोत निर्माण में वक्त भी अच्छा-खासा लगता है इसलिए उसे हासिल करने में कई वित्त वर्ष लग जाते हैं. नौसैन्य ताकत पर भरोसा करने वाले हमेशा यही कहेंगे कि कीमत की बात तो खैर अलग है लेकिन डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट या जंगी पनडुब्बियां युद्ध में हो या फिर शांति काल में, पोत के दबदबे का मुकाबला करना उनके लिए असंभव होता है.

शी जिनपिंग बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) के जरिए अपने 'चीनी सपने’ को साकार करने का साफ नजरिया लेकर चल रहे हैं. बीआरआइ के 'समुद्री सिल्क रोड’ की जरूरत की खातिर उन्होंने चीन के लिए 'विश्व-स्तरीय नौसेना’ की योजना बनाई है, ताकि देश से दूर इलाके में सैन्य ताकत का इजहार किया जा सके. भारत के लिए वन्न्त बीत रहा है. उसे अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए चीन के बरअक्स रणनीति बनाने की जरूरत है. यही वक्त है कि अपने नौवहन इलाके पर गौर किया जाए और अपनी नौसेना को मजबूत किया जाए. इसी के साथ शांति और सह-अस्तित्व के लिए अपने क्षेत्रीय मित्र देशों की गोलबंदी की जाए.

रणनीति के योजनाकारों को यह जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि अमेरिका या क्वाड्रिलेटरल या आसियान सामरिक संधि में भारत अपने टैंक या जंगी विमानों की ताकत से आकर्षक साझेदार नहीं बन सकता. उसे आकर्षक तो नौसैनिक ताकत के जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी दूर तक पहुंच की क्षमता ही बनाएगी.

—एडमिरल अरुण प्रकाश पूर्व नौसेना प्रमुख हैं.

खौफ एक निर्णायक तत्व है. आलोचक यह बात भूल जाते हैं कि एयरक्राफ्ट कैरियर शांति काल में भी एक गोली तक चलाए बगैर कितनी कारगर भूमिका निभा सकते हैं.

लहरों पर दबदबा किसका

तीन सौ युद्धपोतों और पनडुब्बियों के साथ चीन की नौसेना दुनिया में सबसे बड़ी है. ऊपर से उसका और विस्तार जारी है. ङ्क्षहद महासागर में 2008 से ही सक्रिय रहकर उसने अड्डों का पूरा नेटवर्क बना लिया है. 'मलक्का पेच’ से उबरने के लिए वह अग्रिम मोर्चों पर तैनातियों के साथ नागरिक बंदरगाहों पर निवेश कर रहा

चीनी नौसेना की पहरेदारी

2008 से जारी; इस वक्त 22वीं पट्रोल मोर्चे पर है

मेडागास्कर

मॉरिशस

मुंबई

कारवाड़

मराव द्वीप (मालदीव)

कोच्चि

डिएगो गार्सिया

विशाखापत्तनम

हंबनटोटा

पो क्याक्क्रयू कोलंबो (श्रीलंका)

(म्यांमार) र्ट ब्लेयर

पोर्टक्लांग

क्वांतन

(मलेशिया)

प्रमुख अमे मिलक्का जलडमरूमध्य रकी नौसैन्य/हवाई ठिकाने

नागरिक चीन के ठिकाने बंदरगाहों और परियोजनाओं पर चीन का निवेश भारतीय नौसैन्य ठिकाने

भारतीय नौसैन्य निगरानी पोस्ट

मलक्का का पेच

चीन का करीब 80 फीसद ईंधन मलक्का जलडमरूमध्य के इसी संकरे रास्ते से होकर आता है

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