आप उन्हें शहरों में हर जगह देखेंगे—इमारतों की मचानों और चबूतरों से झूलते, फैक्ट्रियों में भारी बोझ ढोते, घरों की रखवाली करते, नल दुरुस्त करते, घरेलू कामकाज करते या फल और सब्जियां बेचते. फिर भी, वे अदृश्य-से रहते हैं. ज्यादातर वे ग्रामीण भारत से आए होते हैं और भारत की जीडीपी में करीब 10 फीसद का योगदान देते हैं.

इसके बावजूद हमारी राष्ट्रीय चेतना में उन्हें महसूस करने और हमारे सामूहिक अंत:करण को झकझोरने के लिए एक महामारी और उसके बाद लॉकडाउन की जरूरत पड़ी. कई तस्वीरें सामने आईं. एक मां अपना सूटकेस घसीटते हुए सड़क पर चली जा रही है और उस सूटकेस पर उसका थका-मांदा बच्चा सोया है. सूरत से उत्तर प्रदेश में अपने घर के लिए निकले एक नौजवान ने थकान के आगे जिंदगी हार चुके अपने दोस्त को गोदी में ले रखा है.
साइकिल पर अपने असमर्थ पिता को लेकर 1,200 किमी दूर अपने घर लौटती 15 बरस की एक लड़की. ज्यों-ज्यों ये तस्वीरें सामने आईं और टीवी पर चौतरफा दिखाई गईं, एक महात्रासदी का खुलासा करने लगीं. सुप्रीम कोर्ट के लिए इतना काफी था कि उसने 26 मई को केंद्र और राज्य सरकारों से मजदूरों और कामगारों की मदद के लिए उठाए गए कदमों के बारे में दो दिन में रिपोर्ट पेश करने को कहा.

केंद्र सरकार ने 28 मई को कहा कि उसने 1 मई और 27 मई के दरम्यान 91 लाख प्रवासी मजदूरों को घर भिजवाया—50 लाख को रेल से और 41 लाख को सड़क के रास्ते. शीर्ष अदालत ने अब प्रवासी मजदूरों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं और केंद्र तथा राज्यों से उनका पालन करने को कहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोधी उन्हें 24 मार्च को चार घंटों के नोटिस पर देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान करने का दोषी ठहराते हैं, जिसके चलते दिहाड़ी मजदूरों को बेकारी के दिनों की तैयारी के लिए कोई वक्त ही नहीं मिल सका.

जानकार सरकारी अफसरों का कहना है कि उस वक्त जोर आजीविकाओं से ज्यादा लोगों की जानें बचाने पर था. स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी सरकार को सख्ती से सलाह दी थी कि मजदूरों के अपने गृह राज्य लौटने से कोविड-19 गांवों में दाखिल हो सकता है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा बेहद लचर है. आखिर में कुछ सरकारी अफसर स्वीकार करते हैं कि उनके पास प्रवासी मजदूरों के बारे में स्पष्ट आंकड़ों की कमी थी और उन्होंने यह सोचा नहीं था कि शुरुआती तीन हफ्तों के लॉकडाउन का नतीजा बड़े पैमाने पर लोगों के घर लौटने के रूप में आएगा, जो आजादी के बाद अब तक नहीं हुआ था—यहीं उनका अंदाजा पूरी तरह गड़बड़ा गया.

विशेषज्ञ हालांकि यह मानने को तैयार नहीं हैं कि सरकार के पास प्रवासी मजदूरों के आंकड़े नहीं थे कि वह उनकी त्रासद वापसी को आसान बना पाती. नई दिल्ली के एक थिंक-टैंक रिसर्च ऐंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज में प्रतिष्ठित फेलो प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के मुताबिक, देश में फिलहाल 6.5 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, जिनमें से 33 फीसद कामगार हैं. इनमें सड़कों पर खोमचे लगाने वालों को भी जोड़ लें, जो डेटा में नहीं हैं तो 1.2 से 1.8 करोड़ लोग और हो जाते हैं.

आर्थिक सर्वेक्षण 2017 के मुताबिक, राज्यों के बीच हर साल नब्बे लाख लोगों की आवाजाही होती है. दरअसल, उसी साल इस सर्वे में और केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की प्रवासियों पर कार्यकारी समूह की रिपोर्ट में उनकी मजबूरी की विस्तृत चर्चा की गई थी. प्रवासियों की दुर्दशा से जुड़ी उनकी सिफारिशों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया गया.
केंद्र सरकार ज्यों-ज्यों लॉकडाउन बढ़ाती रही, प्रवासी कामगार और खासकर दिहाड़ी मजदूर घर लौटने के लिए बेताब होते गए. रोजगार और आमदनी के स्रोत सूखते जा रहे थे और संकट से पार पाने में मदद के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा भी नहीं थी, ऐसे में उनके पास न तो खाना खरीदने के लिए पैसा रह गया था और न किराया चुकाने के लिए. शहरों में गुजारा करने की कोई सूरत न रही. कुंडू बताते हैं, ''उनमें 45 फीसद लोग एक कमरे में पांच-पांच की तादाद में रहते हैं.

करीब 40 फीसद सामुदायिक पानी का इस्तेमाल करते हैं. लॉकडाउन ने उन्हें अपनी रहने की तंग जगहों में घिरे रहने को मजबूर कर दिया, क्योंकि बाहर जाने का मतलब था पुलिस की यातनाएं झेलना.’’ उधर, गांवों में उनका परिवार था, किराया चुकाने का झंझट नहीं था, खाने को खाना था. ताज्जुब क्या कि वे घर के लिए निकल पड़े. सीधे 80 फीसद तो उत्तर प्रदेश और बिहार में अपने घरों के लिए.

इन श्रमिकों में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की होती है, जो खेती के मौसम को छोड़कर शहरों में काम की तलाश में आते हैं और बरसात के बाद लौट जाते हैं. कुंडू कहते हैं, ''वे जून-जुलाई में वापस जाते हैं. रेलवे के डेटा से पता चलता है कि उस वक्त करीब 40 लाख लोग जाते हैं. लॉकडाउन ने उनकी वापसी को एक या दो महीने पहले कर दिया. हैरानी है कि सरकार इस आवाजाही का अंदाजा नहीं लगा सकी.’’
ब्रिटेन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स में माइग्रेशन और विकास की प्रोफेसर प्रिया देशिंगकर कहती हैं कि उनका दिखाई न देना ही वह वजह है जिसके चलते अनौपचारिक क्षेत्र के ये शहरी गरीब और प्रवासी मजदूर केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों के रडार के दायरे में नहीं आ पाए. वे कहती हैं, ''कई अध्ययनों से पता चलता है कि 80 फीसद प्रवासियों के पास पहचान और मूल निवास के दस्तावेज नहीं हैं. वे इसलिए भी अदृश्य रह जाते हैं क्योंकि उनकी भर्तियां ठेकेदारों और दलालों सरीखे श्रम बाजार के बिचौलियों के हाथों की जाती हैं.’’

प्रधानमंत्री ने 14 अप्रैल को लॉकडाउन बढ़ाया, तब तक हालात और ज्यादा बिगड़ चुके थे. केंद्र से कहीं ज्यादा बिहार सरीखे राज्य कोविड के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी के डर से लोगों को वापस लेने के इच्छुक नहीं थे. न ही उनके पास जांच और क्वारंटीन की पर्याप्त सुविधाएं थीं जो उन्हें लोगों की बाढ़ को संभालने का आत्मविश्वास दे पातीं.

संक्रमण के डर से गांव भी लौटने वालों को जगह देने के लिए तैयार नहीं थे. उधर अफसरशाही, जिस पर नीतियों को अमल में लाने के लिए केंद्र और राज्य निर्भर हैं, प्रवासियों की उत्तर प्रदेश वापसी को सुगम बनाने की कोशिश करने के लिए दिल्ली की मुख्य सचिव रेणु शर्मा को निलंबित कर दिए जाने के बाद और भी सुस्त हो गई. मुंबई के एक एडवोकेसी ग्रुप इंडिया माइग्रेशन नाउ (आइएमएन) के संस्थापक वरुण अग्रवाल कहते हैं, ‘‘नीतियां जितने तदर्थ और बेतरतीब ढंग से बनाई जाती हैं, असल दिक्कत वही है.’’
मध्य प्रदेश के एक शीर्ष सरकारी अफसर कहते हैं, ''हमने सोचा कि लॉकडाउन पहले तीन हफ्तों के बाद खत्म हो जाएगा. जब दूसरा दौर शुरू हुआ, हमने सोचा कि यह आखिरी होगा. लॉकडाउन के बार-बार बढ़ाए जाने से, जहां अधिकारी यह भी नहीं बता रहे थे कि यह आखिरी होगा या आगे और बढ़ाया जाएगा, लोग बेसब्र हो गए.’’ वे यह भी खुलासा करते हैं कि जब मजदूरों की पहली दफा वापसी हुई तो राज्य सरकार कतई तैयार नहीं थी, फिर भी उन्हें संभालने और कोविड को फैलने से रोकने का काम अच्छे ढंग से किया. वे कहते हैं, ''लेकिन जब दूसरी लहर शुरू हुई, सरहदों पर वाहनों का तांता लग गया और पैदल तथा ट्रेन से आने वाले पहुंचने लगे, तब संसाधनों का अभाव खटकने लगा.’’

| प्रवासी अर्थव्यवस्था * आर्थिक सर्वे 2016-17 के मुताबिक प्रवासी मजदूर हर साल घरों को 1,50,000 करोड़ रु. भेजते हैं * इसमें से 60 फीसद एक से दूसरे राज्य में भेजी जाती है. कुल रकम में से 80 फीसद गांवों में जाता है. * खपत पर होने वाले खर्च का 30 फीसदी प्रवासी मजदूरों की कमाई पर निर्भर होता है * 30 फीसद रकम असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की ओर से भेजी जाती है. स्रोत: चिन्मय तुंबे की किताब माइग्रेशन ऐंड रेमिटेंसेज इन इंडिया: हिस्टोरिकल, रिजनल, सोशल ऐंड इकोनॉमिक डायमेंशंस |
इस बीच केंद्र सरकार ने अपनी ऊर्जा नकद हस्तांतरण के जरिए लोगों को खाना और राहत मुहैया करने पर केंद्रित करना शुरू किया. लॉकडाउन के दो दिन बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 1.7 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज का ऐलान किया. इसमें राशन कार्ड धारकों को तीन माह के लिए मुफ्त अनाज और जन धन खाता धारक महिलाओं को तीन माह के लिए 500 रुपए का नकद हस्तांतरण शामिल था. राज्यों को अपने भवन तथा निर्माण श्रमिक कल्याण कोष से निर्माण मजदूरों को राहत देने का निर्देश दिया गया.
हालांकि इन प्रावधानों का लक्ष्य सीधे प्रवासी मजदूर नहीं थे, लेकिन सरकारी सूत्रों ने दावा किया कि उनमें से कइयों को इनमें शामिल किया गया. असम और ओडिशा सरीखे राज्यों ने परेशानहाल लोगों को सीधे नकद भुगतान किया, हालांकि उनमें कितने लोगों को यह मिला और कितना मिला, इसको लेकर विवाद है. प्रवासियों के बीच संकट ज्यों-ज्यों बढ़ता गया, केंद्र ने प्रवासी मजदूरों को खाना और आश्रय देने के लिए राज्यों को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कोष (एनडीआरएफ) के तहत अपने आवंटन का इस्तेमाल करने का अधिकार दे दिया. 3 अप्रैल तक एनडीआरएफ के 11,092 करोड़ रुपए राज्यों को जारी कर दिए गए थे.
अलबत्ता जहां ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर आदतन अपने राशन कार्ड अपने परिवार के पास छोड़ जाते हैं और एक राष्ट्र एक राशन कार्ड योजना अभी लागू नहीं हुई थी, ऐसे में कइयों ने पाया कि वे इसका लाभ नहीं उठा सकते. दूसरे, राज्य की सहायता के बावजूद घर जाना चाहते थे. प्रवासन विशेषज्ञ और भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद में प्रोफेसर चिन्मय तुम्बे कहते हैं, ‘‘आमदनी में सहायता के बगैर तीन महीनों के लिए खाद्यान्न देने का विचार गलत धारणा पर आधारित था.
ज्यादातर इसलिए चले गए क्योंकि उनके मकान मालिकों ने उन्हें निकाल दिया और उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं रह गई थी.’’ लॉकडाउन की अवधि को लेकर अनिश्चितता ने असुरक्षा को और तीव्र कर दिया. जागरूकता का अभाव एक और अड़चन बना. एक स्वयंसवी संगठन जन सहज के सर्वे से पता चला कि 62 फीसद मजदूरों को सरकार के राहत उपायों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी और 37 फीसद को पता नहीं था कि वह कैसे मिलेगा.
बहुत कम, बहुत देरी से
जब प्रवासियों का लौटना जारी था, उस पर नजर रखने के लिए राज्यों का ऑनलाइन डैशबोर्ड नेशनल माइग्रेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम बनाने में केंद्र सरकार को लॉकडाउन के बाद पूरे 53 दिन लगे. 29 मार्च को जो 11 उच्च अधिकारों से लैस समूह बनाए गए थे, उनमें से एक भी प्रवासियों की बदहाली से निबटने के लिए नहीं था. केंद्र सरकार के 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की पांचवीं किस्त के आने तक मई में कहीं जाकर प्रवासी मजदूरों को कुछ राहत दी गई, वह भी आसान कर्ज सुलभ करवाने की शक्ल में, सीधे नकद हस्तांतरण की शक्ल में नहीं.
सरकार के मई के प्रोत्साहन पैकेज में मुफ्त राशन योजना का लाभ सार्वजनिक वितरण प्रणाली—जिसमें 81 करोड़ लोग समाहित हैं—से बाहर रह गए और 8 करोड़ लोगों तक बढ़ा दिया गया. अलबत्ता इसे राज्य सरकार पर छोड़ दिए जाने से इसके अमल को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी. पंजीकरण और कागजी कार्रवाई का मतलब यह है कि प्रवासियों की बड़ी तादाद—मुख्य तौर पर छोटी अवधि के मजदूर—फंसी ही रहेगी क्योंकि उनमें से ज्यादातर के पास आधार कार्ड सरीखे दस्तावेज नहीं हैं.
उधर, 1 मई से आगे के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रेलों से प्रवासियों की आवाजाही की इजाजत दे दी. शीर्ष रेलवे अफसरों का कहना है कि उन्होंने करीब 30 लाख प्रवासियों को ले जाने का अंदाज लगाया था, लेकिन अधबीच उन्हें एहसास हुआ कि यह संख्या बहुत ज्यादा होगी. 26 मई तक रेलवे 40 लाख लोगों को पहुंचा चुकी थी, तिस पर भी भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी. ज्यादातर प्रवासी उत्तर प्रदेश जाने वाले थे, ऐसे में तमाम बड़े जंक्शन अवरुद्ध होने लगे और नतीजतन ट्रेनों के पहुंचने में देरी हुई और उनके रास्ते बदलने पड़े.
केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तोहमत का खेल अलग शुरू हो गया, जिसमें केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कई राज्यों पर आरोप लगाया कि उन्होंने ट्रेनों के लिए अनुरोध नहीं भेजे और बदले में इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उन्हें उनके अनुरोध की अनदेखी करने का दोषी ठहराया.
उधर, ठीक उस वक्त जब लॉकडाउन की पाबंदियों में ढील दी जाने लगी हैं, प्रवासियों को भेजने में देरी से अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचना तय है. उनके लौटने की संभावना अब मॉनसून के बाद ही है. ऐसे में मजदूरों की कमी का संकट शहरों में मुंहबाए खड़ा है. पंजाब में प्रवासियों का जाना इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि खरीफ की बुआई का सीजन शुरू हो चुका है, जबकि धान की खेती का काम, जिसमें बहुत ज्यादा मजदूरों की जरूरत पड़ती है, 10 जून से शुरू होगा. पड़ोसी हरियाणा में गुरुग्राम, फरीदाबाद, पानीपत और करनाल की औद्योगिक पट्टियां क्षमता से कम पर काम करने को मजबूर हैं क्योंकि मजदूरों का बड़ा हिस्सा घर जा चुका है.
यही वजह है कि प्रवासियों के घर पहुंचने से पहले ही उन्हें वापस लाने की चीख-पुकार बढ़ने लगी. भारतीय मजदूर संघ के अध्यक्ष सी.के. साजी नारायणन कहते हैं कि उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से प्रवासी मजदूरों के पुनर्वास की योजनाएं बनाने के लिए कहा है. पंजाब सीआइआइ (भारतीय उद्योग परिसंघ) के चेयरमैन राहुल आहूजा कहते हैं, ‘‘शुरुआत में वापस चले गए मजदूर अब वापस आना और काम से जुडऩा चाहते हैं. उन्हें वापस लाने की कुछ व्यवस्थाएं की जानी चाहिए.’’
विकल्पों का अभाव
कई विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवासी वापस आएंगे, हालांकि उनके लौटने में कुछ महीनों की देर हो सकती हैं. तुम्बे कहते हैं, ''प्रवासी अब नाराज और निराश हैं. लेकिन उन्होंने जो झेला है उसकी पीड़ा से मानसिक रूप से उबरने के बाद ही वे वापस आना शुरू करेंगे और इसकी वजह पूरी तरह से उनकी आर्थिक विवशता ही होगी.’’ दूसरों का मानना है कि ग्रामीण बुनियादी ढांचे की अतिरिक्त बोझ को सहने की अक्षमता उन्हें वापस लौटने के लिए मजबूर करेगी. केरल स्थित एक गैर-लाभकारी केंद्र सेंटर फॉर माइग्रेशन ऐंड इनक्लूसिव डेवलपमेंट के कार्यकारी निदेशक बिनॉय पीटर कहते हैं, ''लॉकडाउन के बाद, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकट कई गुना बढ़ेगा और यह शहरी क्षेत्रों की ओर अधिक प्रवास को गति प्रदान कर सकता है.’’
वास्तव में, प्रवासियों के लिए काम के नुक्सान का ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर एक व्यापक प्रभाव पड़ेगा. प्रवासियों के पैतृक घरों में रहने वाले परिजन उनके भेजे गए पैसे पर आश्रित रहते हैं. तुम्बे का अनुमान है कि प्रवासियों की ओर से अपने घरों को भेजी गई रकम 2007-08 में लगभग 50,000 करोड़ रुपए रही होगी. इनमें से साठ फीसद रकम एक राज्य से दूसरे राज्य में भेजी गई थी और लगभग 80 फीसद रकम ग्रामीण घरों में भेजी गई थी. वैसे 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, प्रवासी मजदूर हर साल अपने घरों को करीब 1.50 लाख करोड़ रु. भेज रहे थे. आय के इस स्रोत के सूखने के साथ, ग्रामीण भारत में आर्थिक विकास और भी चरमरा जाएगा.
कुंडू का मानना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लौटे लोगों में से एक-चौथाई को भी काम देने की क्षमता नहीं है. फिलहाल, अधिकांश राज्य काम मुहैया कराने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) पर निर्भर हैं. केंद्र सरकार ने 2020-21 के लिए इस योजना के मद में मौजूदा 61,500 करोड़ रुपए के बजट में अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपए का आवंटन किया है. सभी राज्यों ने लौटकर आने वाले उन श्रमिकों को जॉब कार्ड जारी करना शुरू कर दिया है जिनके पास पहले से जॉब कार्ड नहीं हैं. मनरेगा रोजगार के आंकड़े बताते हैं कि श्रमिक फिलहाल इस योजना के तहत काम कर रहे हैं, भले ही इसकी मजदूरी शहरों में मिलने वाली मजदूरी की तुलना में बहुत कम हो. विशेषज्ञों का तर्क है कि यह भी उन्हें वापस शहरों में लेकर जाएगा.
किसी ने सुध ही न ली
कोविड संकट ने केंद्र और राज्य सरकारों की प्रवासियों के प्रति उपेक्षा को उजागर कर दिया है. चुनाव आते ही उनको लेकर भावनात्मक राजनैतिक आख्यान शुरू किए जाएंगे, लेकिन प्रवासी शायद ही कभी किसी सरकारी नीति के दायरे में रहे हों. आइएमएन के अग्रवाल कहते हैं, ‘‘प्रवासियों के पास लगभग कोई राजनैतिक आवाज नहीं है क्योंकि वे जहां रहते हैं वहां उन्हें वोट करने की अनुमति नहीं है और आम तौर पर चुनावों के दौरान वे घर पर होते नहीं हैं.
वे उन नीतियों के निर्धारण में सहभागी नहीं हैं जो उन्हें प्रभावित करती हैं. हमारी कल्याण प्रणाली मुख्य रूप से गरीब ग्रामीण और स्थिर घरों के लिए डिजाइन की गई है, जबकि पिछले 20 वर्षों में, शहरी गरीबों विशेषकर प्रवासी श्रमिकों की संख्या में विस्फोट देखा गया है.’’ 2009 में श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और नौकरी की सुरक्षा प्रदान करने के लिए और असंगठित श्रमिकों का एक डेटाबेस बनाने के लिए, असंगठित क्षेत्र श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम पारित किया गया था. लेकिन यह अभी कागज पर ही है.
प्रवासी श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए, अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तें) अधिनियम 1979, न्यूनतम मजदूरी, यात्रा भत्ता, विस्थापन भत्ता, आवास, चिकित्सा सुविधाएं और सुरक्षात्मक कपड़ों के भुगतान की व्यवस्था प्रदान करता है. मौजूदा संकट से पता चला है कि केंद्रीय औद्योगिक संबंध विभाग को सौंपे गए इन प्रावधानों को कितने खराब तरीके से लागू किया गया है. 2016 और 2019 के बीच, अधिकारियों ने 23,908 निरीक्षणों में 2,67,040 अनियमितताएं पाईं, लेकिन केवल 5,839 यानी 2.1 प्रतिशत में ही दोषी ठहराया जा सका.
विशेषज्ञों का कहना है कि कड़े नियम, जो नौकरशाही को बहुत अधिक ताकत देते हैं, ही कानून के खराब अनुपालन के लिए जिक्वमेदार हैं. नियोक्ताओं और ठेकेदारों को प्रोत्साहित करने के लिए इन कानूनों को युक्तिसंगत बनाया जाना चाहिए. नए सरलीकृत केंद्रीय श्रम कानूनों के प्रस्तावित सामाजिक सुरक्षा कोड के तहत, केंद्र सरकार अब प्रवासी श्रमिकों को पंजीकृत करने की योजना बना रही है ताकि वे कर्मचारी राज्य बीमा निगम के तहत सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकें. महामारी के मद्देनजर, कई राज्यों ने उद्योगों की सहूलियत के लिए श्रम कानूनों को पूरी तरह या आंशिक रूप से निलंबित कर दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के उपाय श्रम विरोधी हैं और सरकारों को व्यापक श्रम सुधार पर ध्यान देना होगा.
निर्माण श्रमिकों, जिनमें से 40 प्रतिशत प्रवासी हैं, की मदद करने के लिए भवन और निर्माण श्रमिक कल्याण कोष के रूप में एक अन्य प्रावधान किया गया है. यह चिकित्सा सहायता, दुर्घटना कवर, पेंशन, मातृत्व लाभ, बच्चों के लिए शैक्षिक सहायता सहित कई सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करता है. हालांकि, राज्यों में एकत्रित और नियंत्रित इस फंड का इस्तेमाल बहुत कम किया गया है. उदाहरण के लिए, 31 मार्च 2019 तक राज्यों ने इस फंड में एकत्र किए गए 49,688 करोड़ रुपए में से अब तक केवल 19,380 करोड़ रुपए या 39 प्रतिशत ही खर्च किए हैं. इसके अलावा, 55 करोड़ निर्माण श्रमिकों में से करीब 20 करोड़ अधिनियम के प्रावधानों से बाहर रह जाते हैं क्योंकि इसका लाभ उठाने के लिए उन्हें बिल्डिंग ऐंड कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड में पंजीकरण कराना होगा, अधिकांश ठेकेदार जिसकी अनुमति नहीं देते.
प्रवासियों के अधिकार भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं. आइएमएन के अंतरराज्यीय प्रवासी नीति सूचकांक 2019 में, श्रम नीति, आवास, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और राजनैतिक भागीदारी जैसे मापदंडों पर निवासियों और प्रवासियों के लिए तर्कसंगत नीतियों के आधार पर राज्यों की रैंकिंग की गई थी. सात राज्यों में से, केरल शीर्ष पर रहा जिसने 100 में से 62 अंक हासिल किए, जबकि 33 अंकों के साथ दिल्ली सबसे निचले स्थान पर रही. यहां तक कि केरल में भी काफी सुधार की जरूरत थी. अध्ययन में पाया गया, विशेष रूप से राजनैतिक समावेश और आवास के लिए गैर-भेदभाव वाली नीति में केरल को बड़े सुधारों की जरूरत थी.

प्रवासी श्रमिकों के लिए कार्ययोजना
2015 में, प्रवासियों के मुद्दे को ध्यान में रखकर मोदी सरकार ने केंद्रीय आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के तहत एक 18-सदस्यीय कार्य दल के रूप में प्रवासन पर पहला टास्क फोर्स बनाया. जनवरी 2017 में पेश की गई रिपोर्ट में, पैनल ने कहा कि प्रवासी मजदूरों ने आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और यह आवश्यक है कि उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जाए.
प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशिष्ट कानून के बजाए, रिपोर्ट ने सभी सामाजिक कल्याण योजनाओं में पोर्टेबिलिटी प्रदान करने के ढांचा तैयार करने की सिफारिश की, ताकि अपने गृह राज्य में किसी योजना के तहत पंजीकृत प्रवासी काम के लिए जिस राज्य में गया हो वहां भी वह उस योजना का लाभ प्राप्त कर सके. महामारी होने तक, इनमें से अधिकांश सिफारिशें लागू ही नहीं की गई थीं. अब तक केवल केंद्र सरकार ने अगले साल मार्च तक एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड योजना को लागू करने की घोषणा की है.
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर सस्टेनेबल इंप्लॉयमेंट के निदेशक अमित बसोले का मानना है कि कोविड संकट आर्थिक विकास में क्षेत्रीय विषमताओं को समाप्त करने के प्रयासों को तेज करने का अवसर प्रदान करता है. वे कहते हैं, ''यूपी, बिहार और झारखंड जैसे राज्य अपने आर्थिक परिदृश्य को बदल सकते हैं और विविध आर्थिक गतिविधि के केंद्र के रूप में उभर सकते हैं, ताकि वहां के लोगों को काम के लिए न लंबी यात्रा करनी पड़े और न दयनीय परिस्थितियों में काम करना पड़े.’’
कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रवासियों के लिए लाभ पोर्टेबिलिटी के लिए, आंध्र के ईंट भट्टों में कार्यरत ओडिशा के प्रवासी मजदूरों के काम करने की स्थिति में सुधार के लिए ओडिशा और आंध्र प्रदेश के बीच 2012 के सहमति पत्र (एमओयू) की तर्ज पर मजदूरों के मूल और गंतव्य राज्यों के बीच अधिक समन्वय की जरूरत है. बिहार सरकार नियोन्न्ता राज्यों के साथ सहमति-पत्रों पर हस्ताक्षर करने के लिए एक मसौदा तैयार कर रही है. मध्य प्रदेश और राजस्थान ने बाहर जाने वाले प्रवासियों का डेटाबेस बनाने की योजना की घोषणा की है. देशिंगकर कहती हैं, ''इस तरह के कदम उत्साहजनक हैं. मुझे उम्मीद है कि शीर्ष पर बैठे लोग अपने मनमाने तरीके से कोई समाधान पेश करने के बजाए प्रवासियों से सीधे परामर्श करेंगे.’’
करोड़ों प्रवासियों ने अर्थव्यवस्था के इंजन को चलाने में मदद की है, फिर भी जब असाधारण स्थिति में असाधारण उपायों की जरूरत हुई, तो सरकार ने उनके जीवन और आजीविका पर पडऩे वाले प्रभाव के बारे में नहीं सोचा. महामारी ने इस अदृश्य आबादी की दुर्दशा से हमें परिचित कराया है. केंद्र और राज्य सरकारों को किफायती परिवहन और आवास प्रदान करने, सामाजिक सुरक्षा कवर का विस्तार करने और नियोक्ताओं को श्रम कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य करके, प्रवासियों के लिए शहरों को अधिक अनुकूल बनाने के लिए रोडमैप तैयार करने की आवश्यकता है. उनकी दुर्दशा राष्ट्रीय शर्म है.
—साथ में राहुल नरोन्हा, अनिलेश एस. महाजन, रोहित परिहार और महेश शर्मा
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