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देश का मिज़ाज/सामाजिक नीतियांः भाजपा का सोशल नेटवर्क

सत्तारूढ़ दल की कल्याणकारी योजनाओं, विशेष रूप से उज्ज्वला योजना और स्वच्छ भारत, का संचार माध्यमों और देश पर प्रभाव पड़ा है.

जून 2019 में चौपाटी, मुंबई में समुद्र तट की सफाई का अभियान
जून 2019 में चौपाटी, मुंबई में समुद्र तट की सफाई का अभियान
अपडेटेड 29 जनवरी , 2020

सोनाली आचार्जी

एक वक्त था जब केवल कृतज्ञ-से दिख रहे किसी व्यक्ति को बड़ा सा चेक सौंपकर सरकारी योजनाओं का आरंभ किया जा सकता था. प्रधानमंत्री मोदी ने इस रवैये को बदल दिया. उदाहरण के लिए, 2016 में जब उन्होंने आठ करोड़ मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देने वाली उज्ज्वला योजना का पूर्वी उत्तर प्रदेश उद्घाटन में किया तो उन्होंने इसमें अपने प्रचार अवसरों को बहुत सावधानी से चुना. बुर्का पहने एक महिला को कार्डबोर्ड से बना एलपीजी सिलिंडर देने की उनकी चार साल पुरानी यह फोटो आज भी महिलाओं, मुसलमानों और गरीबों के उत्थान के लिए उनकी प्रतिबद्धता के प्रमाण के तौर पर पेश की जा रही है. भारतीय जनता पार्टी के सामाजिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने का उनका अभियान आज भी जिंदा है.  

वर्तमान में सरकार की कुल 439 सब्सिडी योजनाएं हैं जिनमें डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर का उपयोग किया जाता है. सन् 2014-15 से इन योजनाओं के माध्यम से 7.23 ट्रिलियन (72.3 खरब) रु. की सब्सिडी का गरीबों के खाते में सीधे ट्रांसफर किया जा चुका है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इसमें से 33,314 करोड़ रु. का ट्रांसफर तो 2019-20 में हुआ है. इंडिया टुडे के देश का मिजाज सर्वेक्षण से इस पहुंच के बारे में पता चलता है. सर्वेक्षण में लिए गए लगभग आधे (48 प्रतिशत) लोगों ने दावा किया कि उन्हें सीधे खाते में सब्सिडी मिली है, जबकि 29 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें कोई सब्सिडी नहीं मिली है. उज्ज्वला योजना का लाभ सर्वाधिक (27 प्रतिशत) लोगों को मिला है.

स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) की सफलता को भी एमओटीएन सर्वेक्षण में देखा जा सकता है. लगभग आधे उत्तरदाताओं ने इसे सफल बताया. इसके बाद 37 प्रतिशत लोगों ने इस मिशन की सफलता को औसत माना जबकि केवल 9 प्रतिशत लोगों ने इसे असफल बताया.

एसबीएम की सफलता के लिए जो बात अंशत: जिम्मेदार है वह यह है कि सरकार ने शौचालयों को सामाजिक मुद्दे के रूप में पेश किया न कि ढांचागत संरचना से जुड़े अथवा आर्थिक मसले के रूप में.

समुदायों में स्वच्छता के बारे में अब खुलकर चर्चा होती है और लड़कियां अपने माता-पिता से निजी और साफ-सुथरे शौचालयों के अधिकार के बारे मे बात करती हैं.

2018 में 4,00,000 छात्रों ने एसबीएम के समर इंटर्नशिप कार्यक्रम में पंजीयन करवाया था. ग्रामीण भारत को खुले में शौच से मुक्त घोषित करते हुए बीते अक्तूबर में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर मोदी ने यह भी कहा था कि इस मिशन से देश भर में लगभग 75 लाख रोजगार अवसरों का सृजन भी हुआ है.

गुजरात में गांधीजी के साबरमती आश्रम के निकट 20,000 ग्राम प्रधानों की सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ''पूरी दुनिया हमें पुरस्कृत कर रही है कि हमने 11 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके 60 महीने में 60 करोड़ लोगों को शौचालय उपलब्ध करवाए हैं. दुनिया अचंभे में है.''

2017 में यूनिसेफ ने अनुमान लगाया था कि शौचालय वाला प्रत्येक परिवार प्रति वर्ष चिकित्सा व्ययों में लगभग 50,000 रु. की बचत करता है.

लेकिन जब भी इस समीकरण में धर्म का प्रश्न शामिल होता है तो भाजपा की कल्याणकारी योजनाएं, खास तौर पर डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर वाली, लडख़ड़ा जाती हैं.

सर्वेक्षण में शामिल उत्तरदाताओं में से 50 प्रतिशत हिंदुओं ने विभिन्न योजनाओं से सब्सिडी भुगतान पाने की बात स्वीकार की जबकि केवल 27 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें कोई सब्सिडी भुगतान नहीं मिला.

दूसरी ओर मुसलमानों के मामले में ऐसे भुगतान केवल 39 प्रतिशत लोगों को मिले और 40 प्रतिशत लोगों ने ऐसा भुगतान पाने से इनकार किया.

अन्य धर्मों से जुड़े लोगों में भी 35 प्रतिशत लोगों ने सरकार से कोई डायरेक्ट ट्रांसफर न पाने की बात कही जबकि 38 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें ऐसे भुगतान मिले हैं.

हालांकि बहुमत भाजपा के सामाजिक कल्याण कार्यों को स्वीकार करता लगता है, लेकिन इस सर्वे के आधार पर कहा जा सकता है कि इन लाभों को अल्पसंख्यकों की ओर बेहतर तरीके से लक्ष्यकेंद्रित करने की जरूरत है. योजनाओं को आरंभ करने भर से लक्ष्य नहीं पाए जा सकते.

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