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सुर्खियों के सरताजः खो गए राजकुमार

राहुल के लिए इससे भी बदतर यह रहा कि उन्होंने स्मृति ईरानी के हाथों परिवार की पुरानी सीट अमेठी गंवा दी. हालांकि केरल की वायनाड सीट से चुनाव जीतकर उन्होंने लोकसभा के लिए जगह बना ली.

थोड़ा विराम  महाराष्ट्र में बेहद जल्दीबाजी में भाजपा के सरकार बनाने के तुरंत बाद 25 नवंबर को संसद स
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अपडेटेड 1 जनवरी , 2020

राहुल गांधी, 49 वर्ष

कांग्रेसी सांसद

कौशिक डेका

कहते हैं शुरुआत अच्छी हो, तो समझो आधी जीत पक्की. लेकिन 2019 में राहुल गांधी के साथ ऐसा होता नहीं दिखा. साल की शुरुआत अच्छी रही. उनके अध्यक्ष रहते कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़, तीनों ही राज्य भाजपा से छीन लिए. सुस्त अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी और किसानों की परेशानी ने उन्हें मई में लोकसभा चुनाव से पहले, सत्तारूढ़ दल पर हमले करने के भरपूर अवसर प्रदान किए. उनके तरकश में तीन महत्वपूर्ण तीर थे, राफेल सौदे में 'भ्रष्टाचार', न्यूनतम आय योजना और नरम हिंदुत्व.

अपनी बेदाग छवि के बूते नरेंद्र मोदी एक बार फिर से कार्यकाल की मांग कर रहे थे और राहुल गांधी ने इंडिया टुडे के एक साक्षात्कार में उनकी इस छवि को ध्वस्त करने का इरादा जताया था. इसलिए जब मोदी ने खुद को देश का 'चौकीदार' बताया, राहुल ने पलटवार करते हुए 'चौकीदार चोर है' का नारा दिया. अप्रैल में कांग्रेस ने अपनी न्यूनतम आय गारंटी योजना 'न्याय' की घोषणा की. वहीं हिंदू वोटों पर भाजपा के एकाधिकार को तोडऩे के लिए, राहुल ने देशभर के मंदिरों में दर्शन किए और जनेऊधारी शिवभक्त के रूप में खुद को प्रचारित करने की कोशिश की.

पर उनके सभी प्रयास नाकाम हो गए क्योंकि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा 2014 से भी अधिक बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गई. राहुल के लिए इससे भी बदतर यह रहा कि उन्होंने स्मृति ईरानी के हाथों परिवार की पुरानी सीट अमेठी गंवा दी. हालांकि केरल की वायनाड सीट से चुनाव जीतकर उन्होंने लोकसभा के लिए जगह बना ली.

इन बातों से हताश राहुल ने पार्टी अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी मां सोनिया गांधी को फिर से पार्टी की बागडोर संभालनी पड़ी. वे विपश्यना, विदेशों में छुट्टियों के लिए चल गए और ट्विटर पर ही आक्रामक भूमिका चुनी. उनके लिए वक्त अनुकूल नहीं, पर वे कभी भी भारतीय राजनीति से बाहर नहीं होंगे. भाजपा को भी उनकी उतनी ही जरूरत है जितनी कांग्रेस को. भाजपा को अपनी बंदूकों के लिए एक निशाना चाहिए; जबकि कांग्रेस को उनकी जरूरत है क्योंकि नेहरू-गांधी परिवार का कोई शख्स इसकी कमान न संभाले तो यह पंगु हो जाती है.

सुर्खियों की वजह

उन्होंने अकेले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ तीव्र प्रचार अभियान चलाया, लेकिन अमेठी के अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र में ही हार गए

कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोडऩे वाले नेहरू-गांधी परिवार के पहले शख्स, फिर भी कांग्रेस पर भाजपा के हमले के केंद्र में राहुल ही रहते हैं.

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