इंडिया टुडे
यह साल सोशल मीडिया को सीमाओं से परे जाकर खबरें पहुंचाने के जरिये की खालिस अच्छाई के रूप में सराहा गया था, जहां आम लोगों को भी बड़े पाठक-दर्शक तक पहुंच मिल सकती थी. पर दशक के दूसरे हिस्से में सोशल मीडिया दूसरों के खिलाफ दादागीरी, खेमाबंदी और झूठ फैलाने का कूड़ाघर बन गया है.


