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महिला वोटरों का विरोधाभास

चुनावों में महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी में लगातार बढ़ोतरी और पुरुषों के मुकाबले वोट डालने का अंतर घटने के बावजूद संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व बेहद थोड़ा है, तो क्या 2019 के आम चुनाव में यह रुझान पलटेगा और पार्टियां अधिक महिला उम्मीदवारों को उतारती दिखेंगी? या लंबित महिला आरक्षण विधेयक ही एकमात्र विकल्प है?

2014 के आम चुनाव में अधिक महिला उम्मीदवार उतारने वाली राजनैतिक पार्टियों ने अधिक सीटें जीतीं
2014 के आम चुनाव में अधिक महिला उम्मीदवार उतारने वाली राजनैतिक पार्टियों ने अधिक सीटें जीतीं

देश में महिला मतदान एक अजीब विरोधाभास सामने लेकर आता है. राष्ट्रीय और राज्य चुनावों में वोट डालने में महिलाओं की हिस्सेदारी में तो लगातार इजाफा हो रहा है लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधित्व में खास गति नहीं दिख रही है. 1971 में महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी महज 48 फीसदी थी, जबकि 1984 में यह आंकड़ा बढ़कर 60 प्रतिशत तक हो गया. मोटे तौर पर उस साल महिला वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी की वजह इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर थी. हालांकि 1991 में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई, मगर उसके बाद से महिला मतदान प्रतिशत में लगातार नाटकीय बढ़ोतरी देखी गई.

पिछले दशक में, खासकर 2009 के बाद, महिला मतदाताओं पर विशेष फोकस बढ़ा तो संसदीय और विधानसभा चुनावों में उनकी हिस्सेदारी का पुरुषों के मुकाबले अंतर काफी कम हो गया है. 2014 के लोकसभा चुनाव में, 67.1 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान 65.3 प्रतिशत था. इसलिए जहां 1967 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से 11.2 प्रतिशत कम था, 2014 तक दोनों के बीच के मतदान प्रतिशत का अंतर घटकर मात्र 1.8 प्रतिशत रह गया.

फिर भी, देशव्यापी राजनैतिक तंत्र में अब भी काफी हद तक पुरुषों का दबदबा बरकरार है और वह पितृसत्ता का गढ़ बना हुआ है. लिहाजा, संसद और विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधित्व काफी कम है. महिला लोकसभा सदस्यों की तादाद 1952 में 4.7 प्रतिशत से बढ़कर 2014 में 11.4 प्रतिशत हो पाई है. हालांकि राज्यसभा में 2014 में महिला सांसदों की संख्या थोड़ी अधिक 15 प्रतिशत थी.

लोकसभा में महिला सांसदों का प्रतिशत 1962 में 6.3 प्रतिशत और 1977 में 3.5 प्रतिशत था (अब तक का सबसे कम). 1984 में, जब चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी, कांग्रेस से बड़ी संख्या में महिला उम्मीदवार निर्वाचित (42 में से 38) हुईं और महिला सांसदों का प्रतिशत 7.9 प्रतिशत तक हो गया. अगले चुनाव में इस संख्या में गिरावट आई. लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत से धीरे-धीरे वृद्धि हुई है.

2009 में, संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत थी जो 2014 में मामूली बढ़त के साथ 11.4 प्रतिशत हो गई. सभी चुनावों में, महिला सांसदों का निर्वाचन प्रतिशत महिला उम्मीदवारों के प्रतिशत से अधिक रहा है. राजनैतिक दल दावा करते हैं कि वे पुरुषों की तुलना में कम महिला उम्मीदवारों को इसलिए उतारते हैं क्योंकि महिलाओं के जीतने की संभावना कम होती है. फिर भी, महिला उम्मीदवारों की तुलना में जीतने वाली महिला सांसदों के अनुपात का आंकड़ा बताता है कि महिला प्रत्याशियों की चुनाव 'जीतने की क्षमता' पुरुषों की तुलना में बहुत अधिक है.

यह विरोधाभास राज्यों में और भी अधिक तीखा है. हाल के दिनों में, प्रमुख विधानसभा चुनावों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान प्रतिशत अधिक रहा है. फिर भी, विधानसभाओं में महिला विधायकों का प्रतिशत संसद की तुलना में लगातार कम होता रहा है.

यह भारी विरोधाभास मतदाताओं के अन्य वर्गों के मतदान रुझान और उनके प्रतिनिधित्व के अनुपात से एकदम उलट है. मसलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद पिछड़ी जाति के मतदाताओं के बढ़ते मतदान प्रतिशत के साथ संसद और विधानसभाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का प्रतिनिधित्व बहुत बढ़ा है.

उच्च मतदान के बावजूद महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व की तुलना बस अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों से ही की जा सकती है जो भारी मतदान के बावजूद संसद या विधानसभाओं (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) में अपना प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ा सके हैं.

ज्यादा महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारने के दबाव में राजनैतिक दल अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में महिला प्रत्याशियों को उतार कर इतिश्री कर ले रहे हैं. नॉर्वे इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स की राजनीति विज्ञानी फ्रांसेस्का आर. जेनसेनियस का कहना है, ''राजनैतिक दल आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष नेताओं को अन्य क्षेत्रों के मुकाबले तुच्छ मानते हैं. पार्टियां अक्सर अपने संगठन के भीतर जाति व्यवस्था के पदानुक्रम का ही अनुसरण करती हैं." कार्नेगी एंडोमेंट के जेम्स सी गैथर फेलो जेमी हिंस्टन का आकलन है कि 1980 और 2014 के बीच, लोकसभा की सात प्रतिशत आरक्षित सीटों पर महिलाएं उम्मीदवार थीं तो सामान्य सीटों पर यह आंकड़ा केवल 4.8 प्रतिशत था.

राजनैतिक दल आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में अधिक महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारते हैं, इसलिए लोकसभा चुनाव जीतने वाली महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं सीटों से है. हिंस्टन के मुताबिक, ''1980 के बाद से, आरक्षित लोकसभा क्षेत्रों में औसतन 16.2 प्रतिशत महिला उम्मीदवार विजयी रही हैं जबकि सामान्य सीटों पर 11.5 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों की जीत हुई है."

1952 और 1991 के बीच, आरक्षित और अनारक्षित सीटों के बीच महिलाओं की उम्मीदवारी दरों में बड़ा अंतर नहीं है. 1991 के बाद अयोध्या और नौकरियों के लिए जाति-आधारित आरक्षण जैसे मुद्दे ध्रुवीकरण का कारण बने और राजनैतिक दलों के बीच भारी प्रतिस्पर्धा शुरू हुई जिसका असर चुनावी समर में महिला और पुरुषों की संख्या के अंतर के रूप में भी दिखा.

1996 से महिला आरक्षण विधेयक के लिए संघर्ष शुरू हुआ. परिणामस्वरूप, महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित और अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के बीच का अंतर और स्पष्ट हो गया है.

 महिलाओं के मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी के बावजूद काफी कम प्रतिनिधित्व का यह विरोधाभास पंचायत चुनावों में नहीं दिखता क्योंकि पंचायतों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई से लेकर आधी सीटें तक आरक्षित हैं.

1996 से महिला आरक्षण विधेयक के पक्षधर लोकसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण की मांग कर रहे हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही, इस विधेयक के पक्ष में होने का दावा करती हैं फिर भी यह विधेयक अधर में लटका हुआ है.

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