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अंतिम मोर्चे की मुहिम

अंतरिक्ष में 2022 तक मानव मिशन भेजने की महती महत्वाकांक्षा देश को चौथी अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की शेखी बघारने से कहीं अधिक बेहतर स्थिति में पहुंचा देगी

इलेस्ट्रशनः नीलांजन दास
इलेस्ट्रशनः नीलांजन दास
अपडेटेड 13 नवंबर , 2018

तमिलनाडु की नीलगिरि पहाडिय़ों में बसे खूबसूरत हिल स्टेशन कुन्नूर में अपने कॉटेज में बैठे राकेश शर्मा स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण का प्रसारण देख रहे थे. प्रधानमंत्री की एक घोषणा से शर्मा खुशी से झूम उठे थे. मोदी ने घोषणा की, "हमने एक सपना देखा है, हमारे वैज्ञानिकों ने एक सपना देखा है. हमने तय किया है कि 2022 तक, जब भारत अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा, या इससे पहले भी, निश्चित रूप से हमारे कुछ युवा लड़के और लड़कियां अंतरिक्ष में तिरंगा लहराएंगे... मुझे यह घोषणा करते हुए गर्व हो रहा है कि देश के मानव अंतरिक्ष मिशन के अंग के रूप में, हम अंतरिक्ष यात्रा पर भारतीयों को भेजेंगे. हमारे अनुभवी वैज्ञानिक इस सपने को साकार कर दिखाएंगे. हम सफल मानव अंतरिक्ष मिशन शुरू करने वाला दुनिया का चौथा देश बनेंगे.''

अप्रैल 1984 में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक हक्रते तक पृथ्वी की कक्षा में अंतरिक्ष यात्री के नाते पहले और इकलौते भारतीय होने का राकेश शर्मा का रिकॉर्ड जल्द ही टूट सकता है. लेकिन वे राहत महसूस कर रहे हैं और बेहद उत्साहित हैं. उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री की इस घोषणा से बहुत राहत महसूस हुई. मैं 34 साल से ऐसी किसी घोषणा का इंतजार कर रहा हूं क्योंकि मेरे जाने के बाद से लेकर अब तक हमारे पास कोई भी मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम नहीं रहा है. मैं बेहद रोमांचित हूं कि आखिरकार यह होने वाला है.'' क्या उन्हें इस बात का कोई गुरेज होगा कि उनका अपना अंतरिक्ष रिकॉर्ड जल्द ही टूट जाएगा? वे छूटते ही कहते हैं, "नहीं, बिल्कुल नहीं, यह रिकॉर्ड जितनी ज्यादा बार टूटे उतनी ही खुशी होगी.'' (देखें हमारा पहला अंतरिक्ष पुरुष)

बेंगलूरू में, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुख्यालय और देशभर में बिखरे अंतरिक्ष केंद्रों पर, प्रधानमंत्री की इस घोषणा के साथ ही खुशी की लहर दौड़ गई थी. 2006 से, जब इसरो ने औपचारिक रूप से केंद्र सरकार के समक्ष एक मानव अंतरिक्ष मिशन का प्रस्ताव रखा था, तब से ही उसके वैज्ञानिक इस तरह की किसी घोषणा का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. इसरो के अध्यक्ष डॉ के. सिवन कहते हैं, "प्रधानमंत्री ने हमें एक बड़ा उपहार दिया है. हम इन वर्षों में मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए अपनी प्रौद्योगिकी को बेहतर करते रहे हैं और इसलिए हमें विश्वास है कि हमारे लिए 2022 की जो समय सीमा तय की गई है, उसमें हम ऐसा करने में सफल होंगे.'' प्रधानमंत्री ने इसे मिशन गगनयान का नाम दिया है और इसमें तीन भारतीयों को एक सप्ताह के लिए पृथ्वी की कक्षा में भेजने की योजना है.

इसरो सफल मानव अंतरिक्ष मिशन से अंतरिक्ष महाशक्तियों की उस मंडली में शामिल हो जाएगा, जिसमें फिलहाल अमेरिका, रूस और चीन (इस विशेष क्लब में शामिल होने वाला सबसे नया) की अंतरिक्ष एजेंसियां ही शुमार हैं. 1969 में अपनी स्थापना के बाद इसरो का प्रदर्शन सार्वजनिक क्षेत्र के चुनिंदा उपक्रमों जैसा रहा है. इतने दशकों में इसने अंतरिक्ष-उन्मुख देशों के लिए आवश्यक परिष्कृत और जटिल रॉकेट और उपग्रह प्रौद्योगिकी में महारत हासिल कर ली है. आज, इसे सभी मुख्य प्रकार के रॉकेट—ठोस-ईंधन, तरल-ईंधन या क्रायोजेनिक ईंधन वाले रॉकेट—में उत्कृष्टता हासिल है. इसने दुनिया के कुछ सबसे भारी लॉन्च वीहिकल भी तैयार किए हैं.

यह संचार, मौसम विज्ञान, नेविगेशन और सैन्य जरूरतों समेत कई अन्य प्रकार के कार्यों के लिए अत्याधुनिक और भारत में निर्मित भारतीय उपग्रर्हों को कक्षा में स्थापित कर

ने जैसी शानदार उपलब्धियों पर इतरा भी सकता है. हाल के वर्षों में, यह चंद्रमा और मंगल की कक्षा के लिए मानव रहित अंतरिक्ष यान भेजकर अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है. मंगल पर तो इसे अपने पहले ही प्रयास में और सबसे कम लागत पर अंतरिक्ष यान भेजने का गौरव प्राप्त है.

मानव अंतरिक्ष मिशन इसरो की अगली महत्वाकांक्षा है. यह मानव अंतरिक्ष इंटरफेस में विशेषज्ञता बनाने का अवसर है और इसे सबसे जटिल तकनीकों में से एक माना जाता है जिसमें दक्षता का इसरो ने लक्ष्य रखा है. सिवन का मानना है कि यह भारतीय विज्ञान और तकनीकी प्रगति को काफी ऊंचाई पर ले जाएगा. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, "यह सिर्फ इसरो का प्रोजेक्ट नहीं है बल्कि यह एक राष्ट्रीय परियोजना है, क्योंकि इसमें हमें कई एजेंसियों, संस्थानों और संस्थाओं की आवश्यकता होगी. उनकी दक्षता, क्षमता और ताकत से हम इस अभियान को सफल बना सकेंगे.'' (देखें बातचीत)

फिर भी, मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए हरी झंडी दिखाने के पीछे सरकार की सोच और इरादे को लेकर भी कई संदेह जताए गए हैं. उनमें कुछ उचित भी लगते हैं. प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक वी. सिद्धार्थ ने कथित तौर पर बीबीसी से कहा, "अंतरिक्ष में भारतीयों को भेजना अजूबा और बेवकूफाना विचार है, खासकर नील आर्मस्ट्रांग के चंद्रमा पर उतरने के 50 साल बाद.'' उनका तर्क हैः रोबोटिक मिशन अब इनसानों को भेजने में शामिल जोखिम के अलावा अंतरिक्ष में बहुत कुछ ऐसा कर सकते हैं जो कोई अंतरिक्ष यात्री कर सकता है.

एक अन्य प्रतिष्ठित अंतरिक्ष और सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ किरण कार्णिक का कहना है कि इस मिशन को प्रतिष्ठा और गौरव के साथ जोडऩे में राजनीति ज्यादा दिखती है. उनका मानना है कि मानव अंतरिक्ष मिशन की तभी सार्थकता है जब मकसद विनाशकारी जलवायु परिवर्तन या परमाणु युद्ध के कारण होने वाले विनाश से बचने के लिए या फिर पर्यावरण के लिए हानिकारक उद्योगों को चंद्रमा या सौर मंडल के अन्य हिस्सों में स्थानांतरित करने की तैयारी की दीर्घकालीन योजना हो.

इस बीच, खरबपति निजी निवेशकों ने भी इस क्षेत्र में कदम रख दिए हैं, जो इसरो की उपलब्धियों की चमक को कुछ फीका कर रहे हैं. रिचर्ड ब्रैनसन के वर्जिन गैलेक्टिक, एलन मस्क के स्पेसएक्स और जेफ बेजोस के ब्लू ओरिजिन ने बहुत कम समय में शानदार अंतरिक्ष कौशल का प्रदर्शन किया है. स्पेसएक्स को तो नेशनल एयरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) की ओर से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में पहुंचने के लिए स्पेस शटल की जगह एक कैप्सूल विकसित करने का ऑर्डर भी मिला है. टेस्ला के सीईओ मस्क ने मंगल ग्रह के लिए मानव मिशन भेजने की अपनी योजना की घोषणा की है.

अमेजन के संस्थापक और अब दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बेजोस ने तो ब्लू ओरिजिन के लक्ष्य को जाहिर करते हुए कहा कि उनकी योजना है कि अब "लाखों लोग अंतरिक्ष में ही निवास करें और वहीं से काम करें.'' उनकी कंपनी न्यू शेपर्ड नामक एक रॉकेट तैयार कर रही है, जिसमें बड़ी-बड़ी खिड़कियां होंगी जिससे खगोल-पर्यटक शानदार नजारा ले सकेंगे. और वर्जिन गैलेक्टिक तो एक उप-कक्षीय लॉन्चर को शुरू करने के करीब है और मात्र 2,50,000 डॉलर में यह लोगों को अंतरिक्ष का भ्रमण कराएगा.

हालांकि, इसरो के सिवन इन निजी उद्यमों के साथ भारत के अंतरिक्ष मिशन की तुलना या भारत की अंतरिक्ष योजनाओं के आलोचकों से नाराज हैं. उनका मानना है कि इसरो ने पहले से ही टेक्नोलॉजी की एक विस्तृत शृंखला विकसित की है जो मानव मिशन की लागत को कम करती है. इस मिशन की लागत का वर्तमान अनुमान 10,000 करोड़ रु. का है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे उद्यम की लागत का आधा कहा जाता है. अमेरिका और रूस दोनों की सरकारों ने मनुष्यों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना को फिर से शुरू कर दिया है और चीन भी अपनी योजनाओं को विस्तार दे रहा है.

इसलिए ऐसा नहीं है कि रोबोट जल्द ही पूरी तरह से मनुष्यों की जगह ले लेगा. सिवन यह भी कहते हैं कि इसरो ने भी अपनी तकनीक और प्रोद्यौगिकी से जुड़े बहुत से कामों में धीरे-धीरे देसी निजी उद्योगों को लगाया है.

रॉकेट लॉन्चर के 60 प्रतिशत पुर्जे निजी एयरोस्पेस उद्यमों द्वारा निर्मित किए जाते हैं और उपग्रहों के लिए यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक है. उनका मानना है कि मानव अंतरिक्ष मिशन देश के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देगा और नई तकनीकी क्रांति का सूत्रधार बनेगा जिसका आगे चलकर आम जनता को लाभ मिलेगा.

महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर अत्याधुनिक चुनौतियां न हों तो इसरो के वैज्ञानिक इस नए दौर की अंतरिक्ष रेस में या तो पिछड़ जाएंगे या फिर सुस्त पड़ जाएंगे. वे कहते हैं कि मानव मिशन हमारे ज्यादा से ज्यादा युवाओं को विज्ञान की ओर आने के लिए प्रेरित करेगा.

तो, हमारे स्त्री-पुरुषों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए क्या चाहिए? पहली तो, इसे एक बड़े रॉकेट की आवश्यकता होती है जो सात मारुति-सुजुकी सीआज कारों के बराबर वजन वाले कैप्सूल को उठा सके. हाल के वर्षों में इसरो ने अपने भारी लिफ्ट लॉन्चर, जियो-सिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन (जीएसएलवी) मार्क 3 को बहुत उन्नत बना लिया है. लेकिन इसे कक्षा में बड़े उपग्रहों को स्थापित करने के लिए डिजाइन किया गया है.

अब इस लॉन्चर की रेटिंग इनसान के साथ भेजे जाने वाले लॉन्चर की श्रेणी में होगी. इसरो के पूर्व अध्यक्ष के. राधाकृष्णन बताते हैं कि जब आप मानव अंतरिक्ष उड़ान की बात करते हैं, तो लॉन्चर की विश्वसनीयता 98 प्रतिशत या उससे अधिक की होनी चाहिए. यानी, 100 लॉन्च में से केवल दो विफलताएं ही मान्य होंगी.

लॉन्चर को पूरी तरह कामयाब बनाने के लिए उसे अपने सभी महत्वपूर्ण हिस्सों की प्रचुरता में निर्माण के अलावा, इसरो को मार्क 3 लॉन्चर में बहुत से संशोधन भी करने होंगे ताकि इसे क्रू मॉड्यूल (ऐसा मॉड्यूल जिसमें चालक दल के सदस्य भी होते हैं) वाला बनाकर इसमें इनसान को बैठाया जा सके. यहां तक कि लॉन्च पैड में भी संशोधन करके उसे अंतरिक्ष यान के साथ गए अंतरिक्ष यात्रियों (जिन्हें हो सकता है कि "गगननॉट्स'' का नाम मिले) के चलने-फिरने लायक बनाना होगा.

इसरो के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा लॉन्च फेज के बाद किसी भी आपात स्थिति से निपटने की खातिर तैयार रहने के लिए एक क्रू एस्केप सिस्टम विकसित करना. आखिर, चालक दल लॉन्च के समय 200 टन से अधिक अत्यधिक ज्वलनशील ईंधन पर बैठा होगा; और यदि कोई खराबी आती है, तो उन्हें बिजली की गति से सुरक्षित दूरी पर निकाल लाने की जरूरत पड़ेगी.

इसी साल जुलाई में इसरो ने इस तरह की प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण किया जब मानव सहित अंतरिक्ष ऑर्बिटर के बराबर वजन वाले एक कैप्सूल को श्रीहरिकोटा लॉन्चपैड पर 2.7 किमी की ऊंचाई पर बाहर निकाला गया था और फिर पैराशूट का उपयोग करके धीरे-धीरे नीचे उतारा गया था. इसरो एक विशेष सेंसर भी विकसित कर रहा है जिसे रॉकेट कंट्रोल सिस्टम पर लगाया जाएगा. यह सेंसर किसी भी तरह की विफलता की अग्रिम चेतावनी देगा और क्रू मॉड्यूल को लॉन्चर से बाहर निकलने का कमांड देगा. इस तरह की प्रणाली की विश्वसनीयता का कड़ा परीक्षण होना चाहिए. 500 लॉन्च में से मात्र एक लॉन्च की विफलता जैसी उच्च दर की विश्वसनीयता होनी चाहिए.

इसरो के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऑर्बिटल मॉड्यूल विकसित करना और उन लोगों को प्रशिक्षण देना होगी जो चरम स्थितियों में इसे चला रहे होंगे. ऑर्बिटल मॉड्यूल को दो प्रणालियों में बांटा गया हैः एक क्रू मॉड्यूल जिसमें अंतरिक्ष यात्री होते हैं, और एक सर्विस मॉड्यूल जो सोलर सेल से उत्पन्न बिजली आपूर्ति के अलावा रॉकेट मोटर्स का उपयोग करके अंतरिक्ष यान की गति और ओरिएंटेशन को बनाए रखता है.

चालक दल के मॉड्यूल में आंतरिक वातावरण को बरकरार रखना बड़ी चुनौती होगी ताकि अंतरिक्ष में अपने एक सप्ताह के प्रवास के दौरान, तीन अंतरिक्ष यात्रियों के लिए इसे आरामदायक बनाया जा सके.

इसके लिए तापमान को 20 डिग्री सेंटीग्रेड में बनाए रखने की आवश्यकता होगी, भले ही बाहरी तापमान शून्य से 60 डिग्री नीचे या इससे भी कम हो. इसके अलावा वायुमंडलीय दबाव को भी नियंत्रित करना होगा क्योंकि यह पृथ्वी से 400 किमी की ऊंचाई पर कक्षा में 7 किमी प्रति सेकंड की गति से दौड़ता है. वैज्ञानिकों को मानव अपशिष्ट के प्रबंधन के अलावा, कैप्सूल में भोजन और पानी को स्टोर करने के लिए जगह भी रखनी होगी—शून्य गुरुत्वाकर्षण में सब कुछ तैरता रहता है इसलिए परेशानी ज्यादा होगी. पहली उड़ान के लिए, भारत रूसी या अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसियों से सहायता ले सकता है जिनके पास मानव अंतरिक्ष उड़ानों के प्रबंधन में विशेषज्ञता है.

वापसी यात्रा पर, उस सर्विस मॉड्यूल को जिसमें मोटर मॉड्यूल रहता है, ऑर्बिटर की गति को धीमा करने के लिए उपयोग किया जाएगा. क्रू मॉड्यूल से खुद को अलग करने से पहले अवरोहण के कोण को सही करना होगा.

सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब होता है जब क्रू मॉड्यूल, अपनी वापसी यात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में फिर से प्रवेश करता है. तब इसे लगभग 1000 डिग्री सेंटीग्रेड या स्टील के लिए पिघलकर उबलने जितने उच्च तापमान का सामना करना होगा. इसरो के वैज्ञानिकों ने दिसंबर 2014 में एक क्रू मॉड्यूल एटमोस्फियर री-एंट्री एक्सपेरिमेंट (केअर) किया. क्रू मॉड्यूल के वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान अंतरिक्ष यात्री को शांत और सुरक्षित रखने की तकनीक में महारत हासिल की.

एक जीएसएलवी रॉकेट का उपयोग करके एक नकली चालक दल मॉड्यूल को भेजा गया था और इसे उच्च तापमान और गुरुत्व-बल दोनों का अनुभव करने के लिए बनाया गया था जिसका इसे अपनी वापसी यात्रा में सामना करना होगा.

इसकी सतह पर कार्बन मिश्रित टाइल्स की लेप चढ़ाई गई थी जिसने इसे अत्यधिक तापमान का सामना करने और बिना किसी नुक्सान के बंगाल की खाड़ी में गोता लगाने में सक्षम बनाया. अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 2007 में कैप्सूल रिकवरी प्रयोग को पहले ही पूरा कर लिया था, जिसमें इसके पैराशूट खुलेंगे जो इसे समुद्र तट लैंडिंग के लिए सुरक्षित वेग तक धीमा कर देंगे. उन्होंने केयर प्रयोग में में भी रिकवरी क्षमता का परीक्षण किया. अगले दो वर्षों में, उन्होंने री-एंट्री और रिकवरी प्रणाली को अपग्रेड करने पर काम किया.

बेशक, सभी के लिए सबसे बड़ा कार्य होगा उन अंतरिक्ष यात्रियों का चयन जो कठिन परिस्थितियों में भी स्थिति को नियंत्रित करने की क्षमता रखते हों और चयन के बाद प्रशिक्षण भी बड़ा कार्य है. राकेश शर्मा जैसे भारतीय वायु सेना के पायलटों का चयन करना एक विकल्प तो है. लेकिन सिवन कहते हैं कि इसरो इसके लिए व्यापक स्तर पर तलाश अभियान चलाएगा. करीब 500 उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया जाएगा उसमें से छंटनी के बाद संख्या को 10 सदस्यों तक सीमित किए जाने की संभावना है और उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा.

प्रशिक्षण में उन गुरुत्व-बलों को संभालना सिखाया जाएगा जिन्हें वे लॉन्च में और वापसी यात्रा में अनुभव कर सकते हैं और उन्हें शून्य गुरुत्वाकर्षण स्थितियों में भी काम करना सिखाया जाएगा. भारत में ऐसे कठोर और विशिष्ट प्रशिक्षण की सुविधा नहीं है, जैसे प्रशिक्षण के लिए सेंट्रीफ्यूज जी-फोर्स और शून्य गुरुत्वाकर्षण की स्थितियों में विमानों की स्थिति के अनुरूप बनाने की सुविधा; उन्हें हासिल करने में कुछ साल और लगेंगे.

सिवन ने संकेत दिया है कि पहली मानव उड़ान के लिए, इसरो अपने अंतरिक्ष यात्री को प्रशिक्षित करने के लिए किसी अन्य देश की मदद ले सकता है. अब अंतरिक्ष यात्रियों के लिए भोजन की बात आती है, तो भारत की रक्षा प्रयोगशालाओं ने शर्मा की उड़ान के लिए भोजन तैयार किया था. प्रयोगशालाएं एक खास भारतीय स्वाद के साथ एक बेहतर मेन्यू उपलब्ध कराने को तैयार हैं.

 मिशन में मानव जीवन के साथ-साथ देश की प्रतिष्ठा भी दांव पर होगी इसलिए इसरो भारत के पहले मानव मिशन को हर प्रकार की जोखिम से मुक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है. वे अंतरिक्ष में होने वाली मौत की जानकारी से अवगत हैं. यहां तक कि अमेरिका में भी कई प्रमुख दुर्घटनाएं हुईं जिसमें कल्पना चावला समेत कई अंतरिक्ष यात्री मारे गए थे.

2003 में अपनी वापसी यात्रा पर अंतरिक्ष शटल में विस्फोट हो गया था और कल्पना समेत सभी छह अन्य चालक दल की जान चली गई थी.

अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्रियों को सचमुच भेजने से पहले ड्रेस रिहर्सल होंगे जिसमें सभी तैयारियों के बाद दो मानवरहित मिशन किए जाएंगे ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि सारी तैयारियां ठीक हैं और मिशन अब अपने साथ मानवों को ले जाने के लिए तैयार है. दिसंबर 2021 में पहले भारतीय मानव मिशन को लॉन्च करने की योजना है.

"मैंने जब पहली बार पृथ्वी की कक्षा से भारत को देखा तो मेरे भीतर सारे जहां से अच्छा वाला भाव आया. कुछ दिनों बाद मैंने अंतरिक्ष से महसूस किया कि कोई भौगौलिक सीमाएं हैं ही नहीं. पूरी पृथ्वी एक है.''

राकेश शर्मा, अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय, इंडिया टुडे, 30 अप्रैल, 1984

"शून्य गुरुत्वाकर्षण में होने पर जो सबसे विस्मयकारी चीजें मैंने महसूस की हैं उनमें से एक तो यह है कि जब मैं सोना चाहती हूं, तो मुझे लगता है कि मेरे पास केवल अपने विचारों के अलावा और कुछ नहीं है जिसे महसूस  किया जाए क्योंकि आप भारहीन होते हैं, आप अपने पैर या अपने शरीर को महसूस नहीं करते. कह सकते हैं कि आपके पास अपने शरीर में अपने विचारों और बुद्धि के अतिरिक्त अनुभव करने को और कुछ नहीं है.''

कल्पना चावला, दिवंगत अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतिरक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला, इंडिया टुडे, 26 जनवरी, 1998

"एक छोटे-से स्पेसक्रैफ्ट में धरती के चारों ओर चक्कर काटते वक्त, हो सकता है कि आप जहां हैं और जो कर रहे हैं, उसका उतना मोल न समझ पाते हों जितना समझ पाएं. लेकिन गणेश और गीता वगैरह आपको घर की याद दिला देते हैं.''

सुनीता विलियम्स, अंतरिक्ष में रिकॉर्ड बनाने वाली अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और भारतीय मूल की महिला, इंडिया टुडे, 15 अक्तूबर, 2007

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