बजट 2018 यकीनन मोदी का खास अवसर था. इसमें कहीं कोई शक की गुंजाइश नहीं. उन्होंने वह सब सिर्फ किया ही नहीं, बल्कि आश्वस्त किया कि यह सभी जान लें. संसद में केंद्रीय बजट पेश होने के फौरन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक हाथ में कलम और दूसरे में नोटपैड लिए टीवी पर पहुंच गए और बड़े चाव से अच्छे-खासे 25 मिनट तक उसकी मुख्य बातें गिनाते रहे. मोदी के जेहन में यह बात थी कि उनकी सरकार का यह आखिरी पूर्ण बजट है.
उनका हर लफ्ज देश के मतदाताओं को यह संदेश दे रहा थारू मैं आपका प्रधान सेवक हूं, मुझे आपकी फिक्र है, मुझे देश की फिक्र है, मैं आपकी समस्या दूर करने आया हूं, मैं अगले आम चुनाव की नहीं, अगली पीढ़ी की सोच रहा हूं. मोदी ने कहा कि बजट में पेश योजनाओं से देश में रोजगार की अपार संभावनाएं बनेंगी.
नरेंद्र मोदी बड़ी सोच, बड़े नारे देने की काबिलियत पहले ही जाहिर कर चुके हैं. उनका अब सबसे नया नारा है 2022 तक ''न्यू इंडिया", ''सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र" की बहाली और ''जीवन की सहूलियत" में इजाफा. उनमें जोखिम उठाने का भी बड़ा माद्दा है. चाहे पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करना हो, या काले धन के खिलाफ नोटबंदी की मुहिम, या माल और सेवा कर (जीएसटी) पर अमल, हर मामले में मोदी ने दिखाया है कि चाहे जो कीमत अदा करनी पड़े, वे ऐक्शन चाहते हैं. वे आगे बढऩे से नहीं हिचकेंगे.
नोटबंदी सियासी कामयाबी तो लेकर आई मगर अर्थव्यवस्था को गुड़-गोबर कर गई. जीएसटी अर्थव्यवस्था की जरूरत थी मगर सियासी संकट का सबब भी. एक के बाद एक इन दो आर्थिक झटकों से देश की वृद्धि गोता लगाने लगी तो नरेंद्र मोदी की अपराजेय छवि भी दरकने लगी.
लेकिन प्रधानमंत्री ने दिखाया कि वे हमेशा मोर्चे पर डटे रहने को तैयार हैं, गलतियों से सीखकर फौरन सुधार करने को तत्पर हैं. फिर, बजट 2018 ने तो साफ तौर पर जाहिर भी कर दिया कि अर्थव्यवस्था और राजनीति की विसंगतियों और विरोधाभासों को संभालते हुए भी उनमें बड़े जोखिम उठाने का माद्दा बरकरार है.
बजट के लिए आर्थिक अनिवार्यताएं बिल्कुल साफ थीः देश के नौजवानों और बढ़ते बेरोजगारों के लिए नौकरियों और रोजगार का जुगाड़ करने की जरूरत है. कृषि क्षेत्र को भारी बदहाली से उबारने और पैदावार बढ़ाने तथा संभावनाएं जगाने की जरूरत है.
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुख्य सामाजिक क्षेत्रों में फौरन सुधार की दरकार थी, ताकि हुनरमंद और स्वस्थ कार्यबल तैयार हो सके. अगर मोदी सत्ता दिलाने वाले ''अच्छे दिन" के वादे को निभाना चाहते हों तो निजी क्षेत्र के निवेश और निर्यात को बढ़ावा देकर आर्थिक वृद्धि की दर तेज करने के उपाय अपनाने थे. और यह सब ऐसे करना था जिससे कि कोई वह न कहे, जिसे एक सलाहकार ने ''याराना समाजवाद" या ''दागदार पूंजीवाद" का नजरिया बताया है.
सियासी मजबूरियां तो और भी जोरदार और फौरी थीं. इंडिया टुडे और दूसरे ताजा जनमत सर्वेक्षणों से पता चला था कि मोदी की निजी लोकप्रियता तो बुलंद है मगर उनकी सरकार की छवि खासकर आर्थिक मोर्चे पर गिरावट की वजह से धीरे-धीरे गोता लगाने लगी है. अगर भारतीय जनता पार्टी को अगले आम चुनाव में अपना बहुमत बनाए रखना है तो आबादी के बड़े तबके का दिल जीतना ही होगा.
खासकर नाराज किसानों और खेतिहर मजदूरों को खुश करना होगा, जो सबसे बड़ा कार्यबल और मतदाता वर्ग है. मोदी को आबादी के दूसरे तबकों युवा, महिला, आदिवासी, दलित और छोटे कारोबारियों के बीच भी अपने प्रति सहानुभूति जगाए रखने की दरकार थी, जिनका वोट संख्या में अहम योगदान होता है. यह सब करते हुए उन्हें यह भी साबित करना था कि उनमें संघ परिवार के लिए हिंदुत्व वाले भारत को साकार करने की काबिलियत है.
मोदी के पास कोई आधे-अधूरे उपाय नहीं हैं. वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें बहादुर, निडर और बेहिचक दिखना चाहते हैं लेकिन यह बहुत सारे लोगों के लिए परेशान करने वाला भी हो सकता है. इसलिए बजट 2018 साहसिक है क्योंकि मोदी ने विभिन्न फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में डेढ़ गुना इजाफे का वादा करके किसानों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
उनकी टीम ने खासकर खाद्य प्रसंस्करण और बागबानी के वास्ते इन्फ्रास्ट्रक्चर में इजाफा करके बेहद जरूरी कृषि सुधारों को संभव बनाने के लिए काफी रकम छोड़ रखी है.
यह इसलिए भी दुस्साहन का काम था क्योंकि इन कदमों से महंगाई बढ़ सकती है जिससे पैदा होने वाले जाखिम को प्रधानमंत्री उठाने को तैयार हैं. इसलिए भी कि वे कॉर्पोरेट टैक्स न घटाकर और दीर्घावधिक निवेश के लिए पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेंस) टैक्स लाकर बड़े औद्योगिक घरानों की नाराजगी झेलने को तैयार हैं.
साथ ही उन्होंने प्रभावी मध्यवर्ग के लिए भी किसी तरह की कोई रियायत नहीं दी. बजट हिक्वमत वाला इसलिए है क्योंकि उसमें दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना ''आयुष्मान भारत" की शुरुआत की गई.
इस योजना के तहत सरकार करीब 10 करोड़ जरूरतमंद परिवारों के लिए 5 लाख रु. तक का सालाना मेडिकल खर्च उठाएगी. 10 करोड़ परिवारों को राहत देने के पीछे सरकार का मकसद उन परिवारों के 50 करोड़ सदस्यों तक पहुंचने का है. केंद्र सरकार ने मध्यवर्ग के लिए बहुत लोकप्रिय फैसले न लेकर स्पष्ट कर दिया है कि उसकी नजर मतदाताओं के बहुत बड़े वर्ग पर टिकी हुई है जो कि देश की आबादी का आधे से थोड़ा कम है.
मगर यह चिंताजनक भी है क्योंकि इससे मोदी की छवि के लोकलुभावन सुधारक की बनने का खतरा है. जिस अनहोनी का अंदेशा है, वह है पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी. मोदी सरकार के शुरुआती तीन साल के दौरान कच्चे तेल की गिरती कीमतों ने उन्हें कई इन्फ्रास्ट्रक्चर और कल्याण योजनाओं में रकम लगाने और राजकोषीय संतुलन बनाए रखने की मोहलत दी.
मगर तेल की कीमतों में उछाल जारी रहती है तो राजस्व की कमी से गरीब और किसानों को खैरात देने की उनकी योजनाएं ही नहीं प्रभावित हो सकती हैं, बल्कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी के साथ महंगाई के बेकाबू होने का भी खतरा है. फिलहाल कच्चे तेल की कीमतें एक स्तर पर टिकी हुई हैं.
मोदी रोजगार और निजी निवेश को बढ़ाकर आर्थिक वृद्धि दर तेज करने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर खासकर ट्रांसपोर्ट और आवास के क्षेत्र में अपनी सरकार के भारी निवेश पर भरोसा कर रहे हैं. मगर दोहरी बैलेंस-शीट जैसी कई चुनौतियां आड़े आ सकती हैं.
मतलब यह कि कई कॉर्पोरेट घराने भारी कर्ज में डूबे हैं और बैंकों पर डूबत कर्ज या गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) का भारी बोझ है. इन पर तवज्जो दी गई है लेकिन हालात सहज होने में कुछ वक्त लग सकता है. इसके साथ अतिरिक्त जोखिम यह भी है कि इस बजट में घोषित बड़ी योजनाएं भी सरकार के लिए मुश्किल का सबब हो सकती हैं.
लिहाजा, भारी नाराजगी उठ खड़ी हो सकती है और उनके दोबारा चुनाव जीतने की संभावनाओं में सेंध लग सकती है. इसलिए जोखिम भारी है और उसका पुरस्कार भी जोरदार, लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, भविष्य बहादुरों का ही साथ देता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि बजट 2018 में मोदी ने वह काबिलियत बेखौफ दिखाई है.
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