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2019 में यूपीए महागठनबंधन क्या एनडीए को दे पाएगा चुनौती?

क्या कांग्रेस की अगुवाई वाला यूपीए महागठबंधन 2019 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती दे सकेगा?

2019 की तैयारी
2019 की तैयारी
अपडेटेड 30 जनवरी , 2018

अगले लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, क्या यह अभी से साफ दिख रहा है? भाजपा की अगुवाई वाला एनडीए अपनी मौजूदा अजेय छवि को बरकरार रखते हुए 2014 की जीत को 2019 में भी दोहरा पाएगा? उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने एक ट्वीट किया थाः ''इस तरह तो हमें 2019 को भूल जाना चाहिए और 2024 से ही कुछ उम्मीद रखते हुए उसकी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.'' आम मानस भी उमर अब्दुल्ला वाला राग ही अलाप रहा है.

क्या कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए महागठबंधन, वह सच में आकार ले सका तो, 2019 में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के चुनावी वर्चस्व को चुनौती दे पाएगा? इस प्रश्न का उत्तर तो 2015 के बाद से ही विपक्ष की ऊंची आकांक्षाओं और गहरी निराशा के बीच झूल रहा है.

दिल्ली और फिर बिहार में भाजपा की हार के बाद इस विचार ने आकार लेना शुरू किया था. 1977 के बाद से ही देश में राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधनों का लंबा इतिहास रहा है पर किसी मुख्य राष्ट्रीय दल से टक्कर लेने को राज्य स्तरीय महागठबंधन का विचार एकदम नया था.

अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति करने वाले बिहार के धुर विरोधियों, जनता दल (युनाइटेट) के नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के मुखिया लालू प्रसाद गले मिले. दोस्ती के इस असर को और गहरा करने के लिए कांग्रेस भी साथ आ खड़ी हुई. यहीं से विपक्ष के लिए आशा की एक किरण फूटी. मई 2016 में बंगाल में हुए चुनाव में ममता बनर्जी की प्रचंड जीत से इस विचार को और बल मिला.

एक इंटरव्यू में लालू प्रसाद ने आशा से दमकते चेहरे के साथ गर्वीले अंदाज में कहा था, ''पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब में यूपीए एकजुट हो गया तो हम भाजपा नीत एनडीए को 2019 में बहुमत का आंकड़ा छूने नहीं देंगे.''

इस बात का आधार यह है कि लोकसभा की कुल 543 में से 175 सीटें इन चारों राज्यों से आती हैं. 2014 में एनडीए ने यहां से 112 सीटें जीतीं जो लोकसभा में एनडीए की कुल ताकत का एक तिहाई है. बहरहाल, यह फॉर्मूला तभी कारगर हो सकता है जब दो स्तरों पर महागठबंधन बने—पहला, इन चार अहम प्रदेशों के वे सभी दल एकजुट हो जाएं जो एनडीए के बाहर हैं; दूसरा, बाकी प्रदेशों के लिए एक अन्य गठबंधन बने. राज्यस्तर पर महागठबंधन बिखरा तो राष्ट्रीय स्तर पर इसे धराशाई होने से कोई रोक नहीं सकता.

बहरहाल, भाजपा ने मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज की और विपक्षी दलों का उत्साह निराशा में बदल गया. उत्तर प्रदेश में महागठबंधन कारगर नहीं रहा. त्रिकोणीय मुकाबले में विपक्षी दलों को करारी शिकस्त मिली. अखिलेश यादव के नेतृत्व वाला कांग्रेस-सपा गठबंधन बुरी तरह हारा.

मायावती की बहुजन समाज पार्टी का तो उत्तर प्रदेश के राजनैतिक परिदृश्य से सफाया हुआ ही जान पड़ता है. नीतीश का बाद में एनडीए का हाथ थामना, पहले से ही चरमराए महागठबंधन पर अंतिम प्रहार साबित हुआ.

 

गुजरात ने फिर जगा दी आस

कांग्रेस गुजरात में भाजपा के हाथों भले फिर हार गई पर नतीजे पार्टी के लिए थोड़े सकारात्मक संकेत लेकर आए और विपक्षी खेमे में आशाएं फिर से कुलबुलाने लगीं. जनेऊधारी ब्राह्मण होने के प्रमाण के साथ राहुल गांधी तिलक लगाकर पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से लबरेज तीन नौसिखुए साझीदारों—हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर—के साथ चुनावी समर में उतरे. इस 'मिनी-महागठबंधन' में मंडल, कमंडल, दोनों ही एजेंडे को साथ-साथ जगह मिलती दिखी.

लोकसभा चुनाव आज कराए जाएं तो नतीजे क्या होंगे? इसे समझने के लिए हुए इंडिया टुडे-कार्वी इन्साइट्स के साझा उपक्रम 'देश का मिजाज सर्वेक्षण' में दो परिदृश्य उभरकर सामने आए (इस सर्वे में हर छह महीने पर पूरे देश के सियासी मिजाज को टटोलने की कोशिश होती है).

पहला परिदृश्य, यूपीए अगर अपने तीन मुख्य सहयोगियों सपा, बसपा और तृणमूल के बिना लड़े, तो उसे सिर्फ 102 सीटें मिलने की संभावना है. दूसरा परिदृश्य, यूपीए का इन तीनों सहयोगियों के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन हो जाए तो उसे 202 सीटें तक मिल सकती हैं.

पहले परिदृश्य में एनडीए को 309 सीटें जबकि दूसरे परिदृश्य में 258 सीटें मिलने की संभावना है, जो बहुमत के 272 के आंकड़े से कुछ ही कम है. आज जबकि पंजाब में कांग्रेस की सरकार है और बिहार में नीतीश के पाला बदलने से समीकरण बदल चुके हैं, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल ही दो प्रमुख राज्य हो सकते हैं जहां गठबंधन हो जाने की सूरत में यूपीए के लिए संभावनाओं के द्वार खुलते हैं.

यह संभावना वास्तविकता के कितने करीब दिखती है? क्या ममता और मायावती अपना अहंकार छोड़कर राहुल गांधी के साथ काम करने को राजी होंगी जिन्हें वे राजनीति का नौसिखुआ मानती हैं? नवंबर 2017 में, सपा, बसपा और कांग्रेस अगले लोकसभा चुनावों के लिए क्रमशः 30, 30 और 20 सीटों की साझेदारी के लिए सहमत होती दिखीं. सपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''अखिलेश मुलायम नहीं हैं, वे मायावती को 'बुआजी' कहकर संबोधित करते हैं.

बेशक उनका आपसी तालमेल बहुत अच्छा नहीं रहा है पर दोनों एक दूसरे का सम्मान करते हैं. सपा-बसपा, दोनों अनुभव कर रही हैं कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा राजनैतिक हालात में दोनों ने समझौता न किया तो दोनों का सफाया हो जाएगा.'' मथुरा से कांग्रेस के नेता प्रदीप माथुर कहते हैं, ''अखिलेश और राहुल के बीच पहले से ही दोस्ताना संबंध रहे हैं और यूपी चुनावों के दौरान इसमें और परिपक्वता आई है.''

सोनिया गांधी की करीबी होने के नाते ममता इस गठबंधन की धुरी हैं. उन्होंने संसद में विरोध प्रदर्शन के दौरान राहुल के साथ काम किया है और उनका मानना है कि अरविंद केजरीवाल को भी इस गठबंधन में शामिल किया जाना चाहिए. सर्वे में ममता को लगातार दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया.

एक और बात बहुत सावधानी से समझने की जरूरत है. सर्वेक्षण के दूसरे परिदृश्य में यूपीए की अगुवाई वाले महागठबंधन के लिए जो भविष्यवाणी है, उसे 2019 में यूपीए की जीत की भविष्यवाणी समझने की भूल नहीं करनी चाहिए.

तीन साझेदारों वाला यूपीए का महागठबंधन जीत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए पर्याप्त न होगा. सर्वे इस स्थिति में एनडीए को ही बड़ा खिलाड़ी मानता है. करीब चार साल तक सत्ता में होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 53 पॉइंट्स के साथ राहुल गांधी (22) से लोकप्रियता में अब भी कहीं आगे हैं. फिर भी सर्वेक्षण से यह तो पता चलता ही है कि यूपीए साझेदारों को एकजुट करने में कामयाब रहा तो एनडीए अपने दम पर सरकार बनाने के लिए 272 सांसदों के जादुई आंकड़े से पीछे रह जाएगा. नवीन पटनायक के समर्थन और दक्षिण भारत में डीएमके सरीखे क्षत्रपों को साथ लाने से यूपीए के सीटों की संख्या बढ़ेगी.

नेतृत्व का रगड़ा

महागठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा, यह असहमति का मुख्य मुद्दा बनेगा. ममता और मायावती जैसी दिग्गजों को अखिलेश या राहुल नेता के रूप में सहज स्वीकार न होंगे. सर्वे में इस मुद्दे पर भी एक प्रश्न था—आपकी नजर में गैर-भाजपा महागठबंधन को सबसे अच्छा नेतृत्व कौन दे सकता है? 23 प्रतिशत वोट के साथ राहुल पहली पसंद हैं, दूसरे नंबर पर रहीं ममता (10). प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे अच्छे विकल्प के रूप में आप किस नेता को देखते हैं?

इस प्रश्न के उत्तर में भी लोगों ने राहुल गांधी को ही सबसे बेहतर माना. संख्या के हिसाब से नेतृत्व का निर्णय करें तो वह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी पार्टी सबसे ज्यादा सीटें लेकर आती है. पर नेतृत्व का निर्णय हो जाने के बाद भी, इनमें से हरेक इलाकाई क्षत्रप वीटो पावर से लैस है. इनमें से कोई भी किसी भी मौके पर गच्चा दे सकता है.

मौजूदा वक्त में यूपीए के लिए महागठबंधन की संभावना जितनी क्षीण दिखती है, आने वाले दिनों में जो राजनैतिक परिदृश्य बनेंगे वे और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं. 2018 में राज्यों में होने वाले चुनाव, कांग्रेस के सामने चुनौतियों का अंबार खड़ा करने वाले हैं.

पार्टी को कर्नाटक में सत्ता विरोधी कारक को मात देते हुए फिर से राज्य की सत्ता में वापसी करनी होगी. इसके अलावा उसे भाजपा शासित तीन राज्यों—मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, जहां दिसंबर में चुनाव होने हैं—में से कम से कम दो को तो भाजपा से छीनना ही होगा. यदि कांग्रेस चारों राज्य हार जाती है तो 2019 के लिए सत्ता का संग्राम 2018 में ही खत्म हो जाएगा.

गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की है कि क्या वह दलितों, अल्पसंख्यकों, विद्रोही प्रभावशाली जातियों के वोटरों को एक साथ पिरोकर रखते हुए हिंदू मुख्यधारा के वोटों में सेंध लगा पाएगा, जिसे आकर्षित करने का प्रयास राहुल कर रहे हैं? इसका उत्तर इस पर निर्भर करता है कि गठबंधन कैसे और किस हद तक बिना बहुसंख्यक हिंदू वोटों को नाराज किए, एनडीए के हिंदुत्व एजेंडे को जोरदार चुनौती दे पाता है. साथ ही गठबंधन को अपना एक ऐसा एजेंडा भी देश के सामने रखना होगा जो वोटरों को लुभा सके और उन्हें गठबंधन के प्रति आकर्षित कर सके.

संख्याबल बढ़ाने के अवसरवादी खेल और हर बात पर एनडीए का बस रस्मी विरोध कर देने से आगे की सोचते हुए यूपीए के महागठबंधन को एक कारण की भी जरूरत होगी. सांप्रदायिकता बनाम गैर-सांप्रदायिकता का एजेंडा अब एक पिटा हुए फॉर्मूला हो चुका है जो अंततः वोटरों को भाजपा के पक्ष में लामबंद कर देता है. महागठबंधन को स्पष्ट तौर पर देश के लिए एक वैकल्पिक आर्थिक नजरिया सामने रखना होगा, साथ ही उसे एक जिताऊ चुनावी रणनीति और पटकथा की भी जरूरत होगी.

राहुल की अगुआई वाली कांग्रेस अगर संगठन दुरुस्त कर ले, संघीय मोर्चे को फिर से ठीक करने की कारगर तरकीब खोज लाए, महागठबंधन सरीखे गठजोड़ बनाती जाए, तो एनडीए को सत्ता से बेदखल करना उसके लिए कोरी कल्पनाभर नहीं रह जाएगा.

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