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यह हुई न बात, राहुल की तीखी टिप्पणियां कर गईं कमाल

नए जोश के साथ कमान संभालने वाले राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने मुकाबला करने का माद्दा तो दिखाया है, लेकिन क्या वह सचमुच भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कर पाएगी

चंद्रदीप कुमार
चंद्रदीप कुमार

महीने के अंत में राज्य के उपचुनावों के लिए प्रचार करते हुए राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट ने ट्वीट किया, ''महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी राजस्थान के ग्रामीण और शहरी हिस्सों में बहुत बड़े मुद्दे हैं. भाजपा सरकार के पास इन ज्वलंत मुद्दों का कोई जवाब नहीं है. जनता अब बदलाव चाहती है."

चुनाव के मद्देनजर पायलट का यह एक भले ही सामान्य ट्वीट लगता है, लेकिन यह ट्वीट केवल राजस्थान के लोगों का ही नहीं बल्कि देश के मूड को भी प्रतिबिंबित करता है. इंडिया टुडे समूह के जनवरी 2018 के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में 23 प्रतिशत—पिछले साल के मुकाबले 10 प्रतिशत ज्यादा—उत्तरदाताओं ने कहा कि वे महंगाई से सबसे ज्यादा परेशान हैं. 29 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बेरोजगारी को सबसे बड़ी समस्या बताया. ऐसे उत्तरदाताओं की संख्या एक साल पहले 32 प्रतिशत थी, इस तरह इसमें मामूली-सी गिरावट आई है.

     

लेकिन तेल की कीमतें जब मई 2014 के समय—जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली थी—ऊंची कीमतों के बराबर पहुंच गई हैं. 2018 का गैलप सर्वेक्षण बताता है कि कम कुशल श्रमिकों की मजदूरी में कमी आई है, ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अगर महंगाई और बेरोजगारी को मुद्दा बना रहे हैं तो यह उनकी अच्छी राजनैतिक रणनीति मालूम होती है.

2017 में जीएसटी और उससे पहले नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था को झटका लगने के बाद प्रधानमंत्री के खिलाफ राहुल गांधी की तीखी टिप्पणियों का फायदा होता नजर आता है—22 प्रतिशत लोग उन्हें 2019 के आम चुनावों के लिए सबसे अच्छा प्रधानमंत्री मानते हैं. एक साल पहले के मुकाबले यह सीधे 10 प्रतिशत की उछाल है. लेकिन मोदी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष को अभी लंबा रास्ता तय करना होगा क्योंकि 53 प्रतिशत उत्तरदाताओं के लिए मोदी पहली पसंद हैं.

उत्तरी क्षेत्र में दोनों के बीच यह अंतर और भी ज्यादा है जहां 60 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मोदी के पक्ष वोट दिया और राहुल के पक्ष में केवल 13 प्रतिशत ने. सर्वेक्षण में जिन पांच राज्यों—पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान—को शामिल किया गया था, उनमें कुल मिलाकर 135 सीटें हैं और इस समय कांग्रेस के खाते में इनमें से केवल 7 सीटें हैं.

हालांकि कांग्रेस ने पंजाब में मार्च 2017 में शिअद-भाजपा गठबंधन से सत्ता छीन ली लेकिन देश का मिज़ाज सर्वेक्षण से पता चलता है कि आज अगर आम चुनाव कराए जाएं तो कांग्रेस को केवल 69 सीटें मिलेंगी जबकि भाजपा को 264 सीटें. यह तीसरी बार है जब भाजपा की सीटों की संख्या बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों से कम होगी लेकिन इस नुक्सान से कांग्रेस को कोई बड़ा फायदा होता नहीं दिखाई देता है.

2014 के आम चुनाव में 44 सीटें पाने वाली कांग्रेस का आंकड़ा किसी भी सर्वेक्षण में तीन अंकों के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया है. हां, यूपीए के घटक दलों को मिलाकर यह आंकड़ा 102 तक पहुंच जाता है लेकिन एनडीए गठबंधन—अगर आज चुनाव हो जाएं तो उसे 309 सीटें मिलेंगी—का सामना करने के लिए ''अन्य" के साथ चुनाव-पूर्व समझौता करना जरूरी होगा जिसे यूपीए के अनुमानित 27 प्रतिशत वोटों के मुकाबले 33 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है.

''अन्य" की श्रेणी के बड़े खिलाडिय़ों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), बीजद, टीआरएस, एआइएडीएमके, सपा, बसपा और वामपंथी पार्टियां आती हैं. 2015 में बिहार में महागठबंधन—जो पिछले साल नीतीश कुमार के पाला बदलकर भाजपा के साथ जाने से टूट गया था—की जबरदस्त कामयाबी से उत्साहित कांग्रेस के सी.पी. जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने कई बार कांग्रेस के इर्दगिर्द इंद्रधनुषी गठबंधन बनाने का इरादा जाहिर किया है. लेकिन यह कागज के पन्ने पर ही कहना आसान लगता है क्योंकि राहुल के लिए एक-दूसरे की कट्टर विरोधी पार्टियों को एक साथ लाना बड़ी चुनौती साबित हो सकती है.

एमसी और वाममोर्चा, सपा और बसपा, डीएमके और एआइएडीएमके को एक छतरी के नीचे लाना टेढ़ी खीर साबित होगी. इसके अलावा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी इस तरह का गठबंधन बनाने में अड़चन साबित होगी. लेकिन राहुल के लिए यह सांत्वना की बात हो सकती है कि 45 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने उन्हें मोदी का सबसे अच्छा विकल्प बताया है जबकि केवल 9 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने ममता का समर्थन किया है.

कांग्रेस के लिए उत्साहजनक बात यह है प्रधानमंत्री पद की पसंद के तौर पर मोदी की लोकप्रियता में पिछले साल 12 प्रतिशत की गिरावट आई है. लेकिन कांग्रेस के लिए यह ज्यादा खुशी की बात नहीं है जो इस समय केवल पांच राज्यों में सत्ता में है जबकि भाजपा 19 राज्यों में सत्ता में है.

कांग्रेस के हाथ कुछ और राज्यों के निकलने का भी खतरा हो गया है क्योंकि उसके शासन वाले दो और राज्य—मेघालय और कर्नाटक—में इस साल चुनाव होने वाले हैं. हालांकि, कांग्रेस के नेताओं को पूरा यकीन है कि वे न सिर्फ इन दो राज्यों में सत्ता बरकरार रखेंगे बल्कि उन तीन राज्यों—मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़-में भी भाजपा से सत्ता छीन लेंगे जहां इस साल चुनाव होने वाले हैं.

राज्यसभा सांसद अहमद पटेल कहते हैं, ''राहुल के अध्यक्ष चुने जाने से पार्टी के कैडरों में नई ताकत आ गई है. इस बात ने युवा नेताओं को जिम्मा संभालने के लिए उत्साहित कर दिया है." सोनिया  गांधी के रिटायर होने और पटेल जैसे उनके भरोसेमंद सहयोगियों के साथ राहुल के अच्छे रिश्तों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए लगभग सर्वसम्मत पसंद बना दिया है—54 प्रतिशत लोग उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस के सबसे अच्छे नेता के तौर पर देखते हैं.

यह एक बड़ी उछाल है क्योंकि अगस्त 2017 में केवल 25 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने उनका समर्थन किया था. यह शायद नवनिर्वाचित पार्टी अध्यक्ष के जोखिम उठाने की हिम्मत को भी दिखाता है, भले ही वह पार्टी के पारंपरिक रुख से हटने का मामला क्यों न हो.

भाजपा की छवि हिंदुओं की पार्टी के तौर पर बनने से चिंतित कांग्रेस भी कुछ समय से खुद को गांधीवादी सिद्धांतों और समावेशी विचारधारा के साथ हिंदूवादी पार्टी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है. इसीलिए स्वयं को शिव का उपासक बताने वाले राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान 25 मंदिरों का दौरा किया जिसके चलते न सिर्फ कांग्रेस की सीटों की संख्या में 16 सीटों का इजाफा हो गया बल्कि पार्टी ने दो दशकों में पहली बार भाजपा को दो अंकों के आंकड़े पर रोक दिया.

देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में भी यह बात देखने को मिली क्योंकि 47 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने स्वीकार किया कि राहुल के मंदिर जाने से हिंदुत्व पर भाजपा के एकाधिकार को चुनौती मिली है. उधर, 48 प्रतिशत मुस्लिम उत्तरदाता भी राहुल को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं जबकि केवल 19 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी का समर्थन करते हैं.

कांग्रेस को उस समय बड़ा सहारा मिला जब दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने 2जी मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया. इस मामले ने यूपीए सरकार को भ्रष्टाचार का पर्याय बना दिया था.

जहां 44 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि इस फैसले से कांग्रेस को फायदा होगा, वहीं यह सर्वेक्षण एक अलग ही सोच को दर्शाता है—केवल 17 प्रतिशत उत्तरदाता ही भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित दिखे, पिछले साल जनवरी में यह संख्या 21 प्रतिशत थी.

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