नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी विदेश नीति की सबसे बड़ी कामयाबियों में से एक पिछले साल 30 अक्तूबर को हासिल की जब उसने 11 लाख टन अनाज से लदे जहाज अफगानिस्तान के लिए रवाना किए थे. ऐसे चार जहाज गुजरात के कांडला बंदरगाह से रवाना हुए और फिर उन्होंने सीधे फारस की खाड़ी के मुहाने पर ईरान के चाबहार बंदरगाह में लंगर डाला. वहां इन अनाजों को उतारकर रेल और सड़क से अफगानिस्तान पहुंचा दिया गया.
इस पूरे सफर में महज एक सप्ताह से कुछ ज्यादा का वक्त लगा. बंदरगाह, सड़क और रेल का यह पूरा नेटवर्क हिंदुस्तान ने 50 करोड़ डॉलर की लागत वाली परियोजना के जरिए तैयार किया है, जिससे पहली बार पाकिस्तान जाए बगैर सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का एक नया रास्ता खुल गया है.
इसी तरह नई दिल्ली की कूटनीति भी पाकिस्तान को धता बताते हुए दुनिया भर तक पहुंच रही है और इस्लामाबाद के संबंध में अपनी इस आधिकारिक नीति पर अमल कर रही है कि ''बातचीत और आतंक साथ-साथ नहीं चल सकते."
पाकिस्तान के साथ रिश्ते भी जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले और उसी साल 18 सितंबर को सेना के 18 जवानों की जान ले लेने वाले उड़ी हमले के वक्त से ही ठंडे बस्ते में हैं. पठानकोट हमले के बाद ही रिश्तों में बर्फ जमने लगी थी, जबकि उड़ी हमले के बाद हिंदुस्तानी कमांडो ने सीमा पार जाकर पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर धावा बोला था.

33 फीसदी लोगों को लगता है कि सीमापार दहशतगर्द और देश के भीतर सक्रिय बागी आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, जबकि जनवरी 2017 के देश का मिजाज सर्वे में 44 फीसदी लोगों को ऐसा लगता था.
दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर कोई बातचीत नहीं है और जहां डावोस में प्रधानमंत्री मोदी के अपने पाकिस्तानी समकक्ष शाहिद खाकान अब्बासी से मिलने की बड़े पैमाने पर उम्मीद की जा रही है, वहीं इसकी वजह से रिश्तों की बर्फ पिघलने के ज्यादा आसार नहीं दिखाई नहीं देते, तो इसकी कई वजहें हैंरूसीमापार दहशतगर्दी जारी है और पाकिस्तान का असैन्य सियासी नेतृत्व मई में आम चुनाव की तरफ बढ़ते हुए उथल-पुथल से गुजर रहा है.
कथित हिंदुस्तानी जासूस कुलभूषण जाधव की धरपकड़ और मुकदमे ने भारत को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा खटखटाने को मजबूर कर दिया, जो कि पहले कभी नहीं हुआ था. डोनाल्ड ट्रंप ने 2 जनवरी को जब दहशतगर्दी से लडऩे में दोहरे मापदंड की वजह से पाकिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता में कटौती का ऐलान किया, तो भारत ने इसे जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित दहशतगर्दी को लेकर अपने रुख की तस्दीक के तौर पर देखा. अहम यह है कि 54 फीसदी लोगों को लगता है कि ट्रंप के राज में अमेरिका के साथ हिंदुस्तान के रिश्तों में सुधार आया है.
कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर और जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सरहदों पर 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से सरगर्मी बनी हुई है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में पाक फौजों ने 860 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया जो पिछले साल के 221 से करीब चार गुना था. कोई और वक्त होता तो ये आंकड़े किसी भी सरकार के लिए चिंता की बात होते और इसकी वजह से आम लोगों के भी कान खड़े हो जाते. मगर लोगों की धारणा सकारात्मक है.

बीते जून में हिंदुस्तानी सरहद के नजदीक भूटान के डोकलाम पठार पर हिंदुस्तानी और चीनी फौजें बिल्कुल एक-दूसरे के आमने-सामने आ गई थीं. हिंदुस्तान ने सरहद के हिंदुस्तानी इलाके में एक पहाड़ी की तरफ चीनी फौजियों के सड़क बनाने पर ऐतराज किया था.
टकराव का समाधान तकरीबन तीन महीने बाद 28 अगस्त को निकला जब चीनी फौज पीछे लौट गईं. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शरीक होने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा के ठीक पहले हुई इस सुलह को हिंदुस्तान की विदेश नीति की बड़ी फतह के तौर पर देखा गया. देश का मिजाज सर्वे में भाग लेने वाले लोगों में से ज्यादातर (42 फीसदी) को लगता है कि चीन के साथ हिंदुस्तान के रिश्तों में डोकलाम के बावजूद सुधार आया है.
सीरिया और इराक में आइएसआइएस की पराजय को हिंदुस्तानी सुरक्षा एजेंसियों नें राहत की तरह लिया. यह आतंकी धड़ा भारत की मुस्लिम आबादी को निशाना बनाकर चलाए जा रहे इस्लामवादी दुष्प्रचार का जबरदस्त स्रोत था. गोरक्षा के नाम पर की जा रही हिंसा, जिसमें अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया, ज्वलंत मुद्दे के तौर पर फीकी पड़ गई हैः केवल 2 फीसदी लोगों को लगता है कि यह चिंता की बात है, पिछले सर्वे में 4 फीसदी लोगों को ऐसा लगता था.
जब पूछा गया कि उनके लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात क्या है, तो सर्वे में भाग लेने वालों ने आतंकवाद को इस फेहरिस्त में सबसे नीचे रखा. महज 2 फीसदी को लगता है कि यह चिंता की बात है.
इसकी वजह शायद यह हो सकती है कि हाल के वर्षों में कोई बड़ा आतंकी हमला (कश्मीर के बाहर) नहीं हुआ है. रोजगार और नौकरी की सुरक्षा सरीखे मुद्दों ने आंतरिक सुरक्षा के खतरे को पीछे छोड़ दिया है. 29 फीसदी लोगों के लिए बेरोजगारी और 23 फीसदी के लिए भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चिंता की बात है (बेरोजगारी देश के पूर्वी हिस्सों में और 18-24 साल के आयु समूह के लोगों में सबसे बड़ी चिंता की बात है).
नौकरी से जुड़े मुद्दे (बेरोजगारी, छटंनी का डर) 32 फीसदी के लिए चिंता की बात है. पूरब में और 60 साल से ऊपर की आबादी के लिए महंगाई ज्यादा बड़ी चिंता की बात है. ऐसी बातों ने ही शायद सरकार को ज्यादा विदेशी निवेश को आकर्षित करके ठोस नतीजे देने वाली विदेश नीति पर जोर देने के लिए मजबूर किया है—ऐसी विदेश नीति जो निवेश और ज्यादा नौकरियों की तरफ ले जाए.

