वैष्णव साधु अनंतदास ने सोलहवीं सदी के अंत में कबीर दास की पहली जीवनी लिखी थी. इस जीवनी में एक जगह वे याद करते हैं कि किस प्रकार काशी के पंडितों और मौलानाओं का एक प्रतिनिधिमंडल सिकंदर लोधी के पास कबीर दास की स्वच्छंदता की शिकायत लेकर गया था.
धर्म में आस्था रखने वाले इन गुरुओं ने शिकायत की थी कि एक तर्कवान भारतीय होने के नाते कबीर किसी भी पवित्र ग्रंथ के ईश्वरीय होने को मानने से इनकार करते हैं, और दिन-प्रति दिन के जीवन से मिली आम समझ और बुद्धिमानी की कसौटी पर इन सभी वचनों और परंपराओं को कसने पर जोर देते हैं.
स्वाभाविक है कि वे सब लोग कबीर दास से खफा थे. काशी के असरदार लोगों ने कहा कि यह सब नहीं चल सकता और कबीर को काशी से बाहर निकालना होगा, क्योंकि ''जब तक यह जुलाहा काशी में रहता है, कोई भी हमारी बात नहीं मानेगा.''
सभी अधिनायकवादी विचारधाराएं सवाल पूछने वाले लोगों—बुद्धिजीवियों—को खतरा मानती हैं. इसके विपरीत, ऐसे लोगों से डर और घृणा साफ तौर से अधिनायकवादी विचारधारा का संकेत है, चाहे वह अपने को मुनासिब ठहराने के लिए धर्म, इतिहास या राष्ट्र का सहारा ही क्यों न ले. ऐसी विचारधाराएं अपने स्वभाव और सुनियोजित तरीके से सार्वजनिक जीवन में जुनून भड़काती हैं और 'दूसरे' के प्रति अधीरता, आक्रामकता और घृणा की भावना तथा बुद्धिजीवियों के प्रति चिढ़ पैदा करना चाहती हैं.
अमेरिकी साइंस फिक्शन राइटर और एस्ट्रोफिजिसिस्ट ग्रेगोरी बेनफोर्ड ने अपने न्यूकॉक्वब-बेनफोर्ड लॉ की पैरोडी 'लॉ ऑफ कंट्रोवर्सी' में बताया है कि अधिनायकवादी सोच जुनून पर निर्भर होती हैः ''जुनून वास्तविक उपलब्ध सूचना के विलोम अनुपाती होता है.''
राजनीति प्रेरित हिंदुत्व भी इसका अपवाद नहीं है, यह हो भी नहीं सकता. यह स्वीकार्य तभी रह सकता है, जब जुनून आसमान पर हो, लिहाजा अधीरता पैदा करने की लगातार कोशिश होती है और यह लगातार उन भावनाओं का आग्रह करे जिनका तथ्य या सूचनाओं से कोई लेना-देना न हो.
'हिंदू भावनाओं' के नाम पर सब कुछ जायज हो जाता है. दूसरे धर्मों के अपने समकक्षों की तरह 'हिदुत्व' दावा करता है कि वह अपने अनुयायियों की संस्कृति और उनके हितों का प्रतिनिधित्व करता है, इसे 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' कहा जाता है जो कि 'भौगोलिक राष्ट्रवाद' से काफी अलग है. भारतीय राष्ट्रवाद के ज्यादा समावेशी स्वरूप को दर्शाने के लिए 'भौगोलिक राष्ट्रवाद' शब्द का मजाक बनाया जाता है. और वी.डी. सावरकर तो इसे खुलेआम कहते हैं: 'हिंदुइज' हिंदुत्व का एक व्युत्पन्न मात्र, एक हिस्सा, एक टुकड़ा ही है.''
सावरकर ऐसे पहले और संभवतः एकमात्र हिंदुत्व विचारक थे जिन्होंने हिंदुत्व को परिभाषित करने का कष्ट किया और 1928 में ''हिंदुत्वः हिंदू कौन है?'' शीर्षक एक पुस्तिका जारी कर इसके घटकों और ओरिएंटेशन की व्याख्या की. (इस पत्र को सबसे पहले 1923 में 'एक मराठा' छद्मनाम से हिंदुत्व के लिए आधारभूत तथ्य के रूप में प्रकाशित किया गया.
सावरकर हिंदू परंपरा की समृद्धि और जटिलता से परिचित थे—हर हिंदुत्व विचारक अपने तर्क को महत्व देता है—लेकिन वे इस समृद्धि को किसी संपदा की जगह एक उत्तरदायित्व का बोझ ही समझते थे. सावरकर इसके लिए बेचैन थे कि हिंदुत्व के समृद्ध सांचे को एकांगी परिभाषा के तहत लाया जाए.
पूरी तरह से समसामयिक राजनैतिक चिंताओं से प्रेरित होने की वजह से वे हिंदुत्व की ऐतिहासिक रूप से विकसित विषय वस्तु और ढांचे के प्रति असंवेदनशील थे. वे लिखते हैं: हिंदुत्व वैसा नहीं है, जैसा कि अस्पष्ट तरीके से हिंदुइज्म शब्द से संकेत मिलता है.
इसके अलावा 'इज्म' का आम तौर पर मतलब किसी ऐसे सिद्धांत या संहिता से होता है जो कुछ हद तक किसी आध्यात्मिक सिद्धांत या व्यवस्था पर निर्भर करता हो. लेकिन जब हम हिंदुत्व के अनिवार्य महत्व को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं, तो प्राथमिक रूप से या मुख्यतः हमारा मतलब किसी खास ईश्वरीय धर्मतंत्र सिद्धांत या पंथ से नहीं होता.
भाषायी अड़चन नहीं होती तो हिंदुत्व के समानांतर और हिंदुत्व के करीब 'हिंदूनेस शब्द बेहतर विकल्प होता' (पेज 4, हिंदुत्वः हू इज...).
सावरकर की परिभाषा इस उलझन को सुलझा सकती है कि आखिर गोवा और मेघालय में गोमांस खाना क्यों उचित है, जबकि हिंदी पट्टी में तो हाल यह है कि सिर्फ इस संदेह पर कि आपके फ्रिज में गोमांस है, आपको भीड़ की हिंसा का शिकार बनाना उचित वजह माना जा सकता है.
गोरक्षा कोई पुनीत भावना नहीं है, ऐसा लगता है कि यह 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के एक निश्चित ब्रॉन्ड का राजनैतिक फायदा उठाने की बात है. सावरकर का हिंदुत्व बौद्धिक दृढ़ता से उतना संबंधित नहीं है जितना कि जुनून को भड़काए रहने से. उनकी सोच किसी तरह से मुस्लिम और ईसाइयों को राष्ट्र के दायरे से बाहर रखने की थी, इसलिए वे 'पुण्य भूमि' के विचार को देशभक्ति की असल कटौती के रूप में सामने लेकर आए.
वे सवाल करते हैं: 'हिंदू कौन है?' और उनके जवाब का सार संस्कृत के एक 'लोक में है, जिसमें प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान की पवित्रता का सहारा लिया गया है. यह 'लोक कहता है' 'जो भी सिंधु (नदी) से सिंधु (महासागर) तक फैली इस भारत भूमि को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पवित्र भूमि मानता है, वह हिंदू है.'
परंपरागत ज्ञान/संस्कृत के आवरण में पेश किया गया उनका 'हिंदुत्व' का विचार वास्तव में विदेशी है, यह राष्ट्रीय समुदाय के यूरोपीय/ईसाइयत वाले विचार के समरूप ही है जिन्हें भाषा, संस्कृति, इतिहास और धर्म की एकरूपता के पदों में परिभाषित किया जाता है.
एम.एस. गोलवलकर अपनी पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स (1966) में इसे अगली तार्किक परिणति तक ले जाते हैं, जब वह गरीबी, अभाव और संरचनागत अन्याय की जगह 'मुसलमानों', 'ईसाइयों' और 'कम्युनिस्टों' को राष्ट्र के लिए 'आंतरिक खतरा' मानते हैं (अध्याय 12).
स्वाभाविक है कि उनके लिए भारत का स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन अपने आप में 'प्रतिक्रियावादी' था, 'क्योंकि इसमें ब्रिटिश विरोध को देशभक्ति और राष्ट्रवाद माना जा रहा था (पेज 143)'. हिंदुत्व की महिला पक्षधरों को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि गोलवलकर महिला सशक्तीकरण (हिंदुओं सहित सभी) के विचार को सांप्रदायिकता और जातिवाद से जोड़ते हैं: ''अब 'महिलाओं के लिए समानता' और 'मर्दों के प्रभुत्व से उनकी मुक्ति' का नया कोलाहल शुरू हो गया है! सत्ता के विभिन्न पदों पर महिलाओं के अलग लिंग के आधार पर सीटों के आरक्षण का दावा किया जा रहा है, इस प्रकार जातिवाद, संप्रदायवाद और भाषावाद के क्रम में एक नया 'वाद्यलिंग वाद जुड़ गया है.' (पेज 117)
सावरकर यह कल्पना नहीं कर पाए कि उनके विचारों को तार्किक परिणिति तक पहुंचाया जाए तो हिंदू खुद ही उलझन के शिकार हो जाएंगे. साल 2002 की बात है, मैं कोलंबिया यूनिवर्सिटी में छात्रों के एक समूह को संबोधित कर रहा था. एक भड़के हुए युवा हिंदू अमेरिकी ने सवाल कियाः 'आखिर मुस्लिम और ईसाई (उसका मतलब भारत में रहने वालों से था) मक्का या रोम की जगह भारत को अपनी पवित्र भूमि क्यों नहीं मानते?'' मैंने उससे पूछा कि क्या उसने कभी गंगा में डुबकी लगाई है? उसने कहा कि नहीं, उसने तो नहीं लेकिन उसके मां-बाप हर साल गंगा में डुबकी लगाते हैं.
इस पर मैंने पूछा, ''वे अमेरिका के प्रति अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए हडसन में डुबकी क्यों नहीं लगाते?'' वह युवक भौचक रह गया, उसे संभवतः पहले कभी इस तरह से आईना नहीं दिखाया गया था. मैंने उससे कहा कि वह ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद दे कि उसके साथी अमेरिकी नागरिक हिंदुत्व के इस विचार का ईसाई संस्करण नहीं अपना रहे.
न केवल उस 'गर्वीले' एनआरआइ हिंदू को बल्कि दुनिया में कहीं भी रहने वाले हर संवेदनशील व्यक्ति को यह जान लेना चाहिए कि धर्म का राष्ट्रीयकरण न तो किसी धार्मिक पंथ के लिए अच्छा है और न ही राष्ट्र के विचार के लिए. नेहरू की यह चेतावनी हर समय के लिए प्रासंगिक हैः किसी देश के मामले राजनैतिक सिद्धांतों पर संचालित किए जाने चाहिए न कि धार्मिक भावनाओं के आधार पर.''
पुरुषोत्तम अग्रवाल लेखक, अकादमिक और राजनैतिक टीकाकार हैं
***

