जिंदगी जीने का तरीका, धार्मिक विचार और विविध रीति-रिवाजों की प्राचीन परंपरा. एक अनोखी समावेशी संस्कृति और बेहद कर्कश और गोलबंदी की लफ्फाजी! भला कैसे हिंदू धर्म की समृद्ध विरासत उस विघटनकारी राजनीति का मंत्र बन गई है जिसके नजारे आज चौतरफा दिख रहे हैं?
हिंदू पहचान को हथियाने की संघ परिवार की ''हिंदुत्व " राजनीति जहां तेजी से परवान चढ़ी है और एनडीए सरकार को केंद्र—और अब 19 सूबों की भी सत्ता में काबिज होने में मददगार बनी है, वहीं उदार राजनैतिक ताकतें हाल के महीनों में खोई जमीन वापस पाने की भारी जद्दोजहद करती देखी गईं.
गुजरात चुनाव प्रचार में राहुल गांधी के मंदिर दर्शन, रजनीकांत की ''आध्यात्मिक राजनीति" की घोषणा, योगी आदित्यनाथ से सिद्धरामैया की जुबानी जंग, अमेठी में प्रधानमंत्री को रावण के तौर पर दिखाने वाले ताजातरीन पोस्टर—यानी ''हिंदू बनाम हिंदुत्व" की जंग में नए-नए तेवर देखने को मिल रहे हैं.
अब मुखर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने हिंदू धर्म की उदार विरासत पर किताब की शक्ल में नए सिरे से एक और धावा बोल दिया है. ऐसे में हमने समूचे राजनैतिक फलक के जाने-माने और इस विषय से जुड़े लेखकों से इस अफसाने की जांच-परख करने को कहा.
नतीजा दिमाग को रोशन कर देने वाली, और कभी-कभी हैरान-परेशान कर देने वाली भी, बहस की शक्ल में सामने आया, जिससे, हमारी राय में, हिंदू सांस्कृतिक परंपरा की समृद्धि की झलक ही मिलती है. इसे अनेकता में एकता भी कह सकते हैं. हिंदू बनाम हिंदुत्व की इस बड़ी बहस में शशि थरूर , गोपालकृष्ण गांधी, पुरोषोत्तम अग्रवाल, के.एन गोविंदाचार्य, डॉ. विनय सहस्रबुद्धे, देवदत्त पटनायक, मशहूर उपन्यासकार किरण नगरकर और लेखिका अर्शिया सत्तार जैसे विचारकों के लेख शामिल किए गए हैं.

