गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की दोहरी जीत के कुछ ही घंटों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समर्थकों का अभिवादन स्वीकार करने के लिए नई दिल्ली में पार्टी मुख्यालय पहुंचे. सरकार और पार्टी के वरिष्ठ सहयोगी उनके साथ थे. मोदी ने जो भावोत्तेजक विजयी भाषण दिया उसमें जीत का जोश था, संतुष्टि का भाव था और विकास को लेकर उनकी प्रतिबद्धता का होशियारी भरा दोहराव भी.
''भारत माता की जय" के उद्घोष के साथ भाषण समाप्त करने की आदत के अलावा इस दफा उन्होंने असामान्य तरीके से वहां मौजूद लोगों से अपने साथ यह नारा भी लगवाया कि ''जीतेगा भाई जीतेगा, विकास ही जीतेगा". ऐसा करके वे आगे की बड़ी लड़ाइयों के लिए भी एजेंडा तय कर दे रहे थे जिनमें 2019 के आम चुनावों में फिर से जीत हासिल करने की कोशिश से पहले कुछ अहम राज्यों के विधानसभा चुनाव शामिल हैं.
जीत का लुत्फ लेते हुए भी मोदी की अपने विरोधियों से कई कदम आगे जाकर सोचने की काबिलियत ही उन्हें इस सदी में देश का सबसे प्रमुख नेता बना देती है. मार्च में उत्तर प्रदेश में भाजपा की निर्णायक जीत और उस समय हुए चार राज्यों के चुनावों के बाद तीन राज्यों में सरकार बनाते समय मोदी ने अपनी विजय रैली में घोषणा की थी कि 2022 तक, जब देश अपनी आजादी की 75वीं सालगिरह मना रहा होगा, वे एक नया भारत बना देंगे जो देश की युवा आबादी के सपनों को पूरा करेगा, वे युवा जो भारत की आबादी का 65 फीसदी हैं.
यह कहते हुए उन्होंने नई पीढ़ी के लिए एक परिकल्पना को रूप दे दिया और परोक्ष रूप से उनसे यह अपील भी कर डाली कि वे इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें दूसरे कार्यकाल के लिए भी चुन लें. गुजरात की जीत के बाद मोदी पार्टी कार्यकर्ताओं को संकेत दे रहे थे कि 2019 के लिए उनका मुख्य दारोमदार पहले विकास पर होगा, हिंदुत्व पर नहीं.
नए साल की चुनौतियों और जरूरतों से प्रधानमंत्री किसी और के मुकाबले कहीं ज्यादा वाकिफ हैं. गुजरात की जीत ने उन्हें भाजपा की अस्मिता बनाए रखने में भले मदद दे दी हो पर अपने कार्यकाल के बाकी बचे 18 महीनों के लिए उन्हें कई सारी चिंताएं और चेतावनियां भी दे डाली हैं.

पहले गुजरात की जीत. मोदी के गृह प्रदेश में भाजपा के लिए जो एक आसान-सी जीत होनी चाहिए थी, वह एक कड़े संघर्ष में नजदीकी मुकाबले में तब्दील हो गई. एक ढीले-ढाले राज्य नेतृत्व, बागी हार्दिक पटेल को मिल रहे समर्थन और ईंट का जवाब पत्थर से देने को तत्पर जुझारू राहुल गांधी के कारण यह नजदीकी जीत हासिल करने के लिए मोदी को राजनैतिक रणनीतिकार और वक्ता के अपने समूचे कौशल और अमित शाह की संगठनात्मक दक्षता का पूरा इस्तेमाल करना पड़ा.
बेशक राज्य में भाजपा की रिकॉर्ड छठी जीत पक्की करके मोदी ने बड़ा काम किया है. मोदी-शाह की जोड़ी ने मिलकर 2014 के बाद से 14 विधानसभा चुनावों में से 11 में भाजपा को जीत दिलाई है. पहली बार भाजपा देश के 29 राज्यों में से 19 में सत्ता में मौजूद है, कांग्रेस को उसने पांच राज्यों में समेट दिया है और अब वह कांग्रेस की जगह देश की अकेली राष्ट्रव्यापी पार्टी हो गई है.
अब बात चिंताओं की. गुजरात के नतीजों ने भाजपा की कमजोरियां भी उजागर कर दीं. 2018 में जब वह राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनावों के लिए खुद को तैयार करेगी तो ये कमजोरियां उसे परेशान करेंगी. वोट बटोरने वाले नेता के रूप में मोदी के ऊपर जरूरत से ज्यादा निर्भरता है और दूसरी कतार का नेतृत्व उभरकर सामने नहीं आ रहा. वोट की प्रवृत्ति में भी शहरी-ग्रामीण भेद साफ नजर आ रहा है. गांवों में कांग्रेस ने भाजपा को मात दे दी क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी किसानों की दिक्कतों और ग्रामीण गरीबी को दूर करने जैसे मसलों से निबटने में नाकाम रही.
युवाओं और बेरोजगारों में भी मोहभंग की स्थिति बढ़ रही है, जिन्हें राहुल और हार्दिक ने कारगर तरीके से एकजुट किया. यह मान लेना जी को दिलासा देना ही होगा कि मतदाताओं ने अर्थव्यवस्था में सुस्ती लाने के बावजूद नोटबंदी और जीएसटी का अनुमोदन किया है. गुजरात के शहरों ने मोदी का साथ दिया है तो बस इसलिए कि बाकी लोगों की तुलना में वे अब भी मोदी को ही मौजूदा आर्थिक हालात से देश को बाहर निकालने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति मानते हैं. इस वजह से भी कि केंद्र सरकार ने जीएसटी संबंधी उन कई दिक्कतों को हटाने के लिए अपने कदम वापस खींच लिए जिनके कारण राज्य के व्यापारी विरोध में खड़े हो गए थे.
आखिर में, पार्टी के लिए चेतावनियां. उसमें सत्तारूढ़ होने का घमंड साफ दिखा और फिर इस यकीन के कारण कि किसी राज्य को केंद्रीय नियंत्रण से भी चलाया जा सकता है, ऐसा लगता है, भाजपा उसी जाल में फंसती जा रही है जो हमेशा से कांग्रेस की खूबी रही है. हर कीमत पर जीत हासिल करने के उसके दृष्टिकोण के चलते वह दूसरी पार्टियों से आ रहे दलबदलुओं को प्रोत्साहित कर रही है.
इससे वह उस वैचारिक शुद्धता से समझौता कर रही है जिसका वह दंभ भरा करती थी. पार्टी के निष्ठावानों में भी इससे असंतोष पैदा हो रहा है. इसकी मिसाल राज्यसभा चुनावों से ठीक पहले अहमद पटेल को हराने की कोशिश में शंकरसिंह वाघेला और उनके समर्थकों को पार्टी में शामिल किए जाने के तौर पर देखी जा सकती है. वह टर्निंग पॉइंट बना और कांग्रेस ने खुद को एकजुट करते हुए हार्दिक समेत तीन युवा नेताओं के साथ गठजोड़ बना जोरदार मुकाबला खड़ा कर लिया.
फिर मोदी और भाजपा ने जीतने की बेताबी में गुजरात में प्रचार के आखिरी दौर में गुजरात के विकास मॉडल की बातों को किनारे करके सांप्रदायिक तौर पर विभाजनकारी बातों को केंद्र में कर लिया. मोदी ने भी प्रधानमंत्री की गरिमा से नीचे उतरकर अपने पूर्ववर्ती डॉ. मनमोहन सिंह पर देशद्रोह का आरोप मढ़ डाला. इस बात पर कि उन्होंने एक पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री के लिए अपने पूर्व मंत्रिमंडलीय सहयोगी मणिशंकर अय्यर के दिए निजी भोज में शिरकत की थी. नतीजाः कांग्रेस राख से जी उठी और भाजपा की प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाली मुक्चय विपक्षी पार्टी के रूप में हरकत में आ गई.

गुजरात के सबक भाजपा के लिए ही नहीं हैं. नव-निर्वाचित पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के अधीन कांग्रेस ने भले जोरदार मुकाबला किया हो पर उसमें उस मारक प्रहार का अभाव नजर आया. उसका पार्टी संगठन भाजपा के लिए शाह के खड़े कर लिए गए ताकतवर संगठन के जवाब में कुछ भी नहीं. हर चुनाव भाजपा की तरह लडऩे की बजाए कांग्रेस का रुख बड़ा शिथिल है, जैसे कि वह किसी पीएचडी की थीसिस की तैयारी कर रही हो. गुजरात में ऐन चुनावों से कुछ महीने पहले जागने की बजाए उसे पूरे पांच साल सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए थी ताकि वह निरंतर राज्य सरकार की प्रामाणिकता में सेंध लगाती.
राहुल के नए जोश ने फिर से चमक तो पैदा की है पर उन्हें लंबा सफर तय करना है. सोशल मीडिया की जीत पोलिंग बूथ की जीत में तब्दील नहीं हो जाया करती. उसके लिए तो जमीन पर लोग चाहिए और मतदाताओं के साथ आखिरी मौके तक संवाद. राहुल को प्रतिबद्ध पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की एक कतार चाहिए ताकि वे आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की ताकत का मुकाबला कर सकें.
अच्छा संकेत है कि जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें उन्होंने मजबूत स्थानीय नेतृत्व खड़ा करने की दिशा में काम किया है जो चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से काफी पहले से लोगों कर पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है. उन्हें गठबंधन बनाने की एक नीति पर भी काम करना होगा ताकि साझा विपक्ष को इतनी सीटें मिल सकें कि वह भाजपा को प्रभावी चुनौती दे सके.
गुजरात में जब कांग्रेस ने विभिन्न समुदायों के नेताओं से गठजोड़ कायम कर जाति का कार्ड खेलना शुरू किया तो भाजपा परेशानी में पड़ गई थी. तब हिंदुत्व के बल पर एकजुट हिंदू वोट की धारणा को आगे बढ़ाने वाले संघ परिवार को भी अपनी संभावनाओं को आगे बढ़ाने के लिए जातिगत समीकरणों पर काम करना पड़ा.
अयोध्या विवाद में फैसला 2019 के मध्य में आने की उक्वमीद है और अगर यह उसके पक्ष में रहता है तो वह उसका इस्तेमाल हिंदुत्व को फिर से एजेंडे में लाने के लिए कर सकती है. लेकिन हिंदू हृदय सम्राट की पदवी हासिल करने के बाद भी साफ तौर पर मोदी राज्य विधानसभाओं या लोकसभा, किसी भी चुनाव में जीत के लिए मंदिर या हिंदुत्व की अपील का भरोसा नहीं कर रहे हैं. न ही वे जातिगत खेल खेलने से संतुष्ट हो सकते हैं.
प्रधानमंत्री को इस बात का अंदेशा है कि भाजपा 2014 में उसे बहुमत दिलाने वाले उत्तरी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में अपनी सीटों की संख्या को फिर से दोहरा पाने में सफल नहीं हो पाएगी. इसीलिए कट्टर हिंदुत्व वाला अपना समर्थक आधार बनाए रखकर भी मतदाताओं के बड़े दायरे को आकर्षित करने के लिए विकास का दांव खेला जा रहा है.
विकास के कार्ड को प्रभावी बनाने के लिए भी गुजरात से बड़ा संदेश यही मिल रहा है कि मोदी को आर्थिक विकास पर दोगुनी मेहनत करनी होगी. खास तौर पर किसानों की समस्याओं और आम रोजगार के मुद्दों पर ध्यान देना होगा. पांच तिमाहियों तक लगातार गिरावट के बाद हाल ही में जीडीपी के आंकड़ों में हुई वृद्धि सरकार के लिए बड़ी राहत की बात रही है. नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का मानना है कि ''सबसे खराब दौर अब बीत चुका है और धीमे-धीमे पर ठोस ढंग से अब हम ऊपर चढ़ रहे हैं. अगले साल तक हम 7.5 फीसदी की दर तक पहुंच जाएंगे."
कृषि के मामले में उनकी सलाह है कि अनाज पैदा करने और एमएसपी की संस्कृति से परे हटकर उस दिशा में बढऩा चाहिए जहां किसानों को कृषि-प्रसंस्करण मूल्यवर्धन शृंखला में गहराई से जोड़ा जाए. इसके लिए सरकार को कृषि ढांचा मजबूत करने और मंडियों के हाल दुरुस्त करने में खासा निवेश करना चाहिए. उसे भंडारण और प्रसंस्करण की सुविधाएं भी खड़ी करनी होंगी.
अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और रोजगार पैदा करने के लिए मोदी के सहायक से लेकर वरिष्ठ अफसर तक उस दिशा में भी काम कर रही है जिसे वह त्वरित कारक की संज्ञा देती है. मतलब यह कि आवासन, पर्यटन और टेक्सटाइल्स जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों में ऐसी योजनाएं तैयार करना जो तमाम बाधाओं को दूर करके थोड़े समय में खूब सारा रोजगार पैदा कर सकती हों. इसके अलावा सड़कों, हवाई अड्डों और रेल नेटवर्क को बढ़ाकर व्यापक ढांचागत तेजी लाने की कोशिश है.
चर्चा यह भी है कि निर्यात क्षेत्र पर ध्यान दिया जाए, जो फिर से हरकत में आने लगा है. उसे 12 फीसदी ईपीएफ सब्सिडी देने की भी चर्चा है. जिन अन्य क्षेत्रों पर सरकार के तुरंत ध्यान की जरूरत है उनमें एनपीए के मुद्दे को जल्द निबटाकर निजी निवेश को बढ़ावा देना भी है. एनपीए के चक्कर में बैंकों से कर्ज देने का काम बंद-सा हो गया है. एक अधिकारी का कहना था कि हम इन सारे मुद्दों का समाधान करने के लिए कई नए तरीकों पर काम कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री को उन तमाम स्कीमों के क्रियान्वयन में सुधार पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिन सबका ऐलान उनके सत्ता संभालने के बाद किया गया था. इनमें से कई, जैसे कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना, एलपीजी सिलेंडर की स्कीम, एलईडी बल्ब आपूर्ति, शौचालयों का निर्माण और गांवों में बिजली आपूर्ति का प्रावधान काफी सराहनीय कदम रहे हैं. इनका उन्हें चुनावी लाभ भी मिला है. एक सकारात्मक बात यह भी है, इस सरकार पर अब तक भ्रष्टाचार का दाग नहीं लगा है.
मोदी को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जो किसी गलती के कारण कामकाज पंगु करने की बजाए गलती को दुरुस्त करने में ज्यादा यकीन रखता है. जीएसटी में संशोधन इसका अच्छा संकेत है. अब प्रस्ताव यह भी है कि पेट्रोल को भी जीएसटी में ले आया जाए ताकि राज्य उपभोक्ताओं पर ज्यादा शुल्क न लगा सकें और इस तरह से पेट्रोल की कीमतें नीचे आ जाएं. इससे शहरी भारत में, खास तौर पर मध्यम वर्ग में उत्साह बढ़ सकता है जो फिलहाल जीएसटी की प्रक्रिया के कारण फिलहाल दुराव की स्थिति में है.
अर्थव्यवस्था को लग रहे झटकों के बावजूद हाल की चुनावी जीतों से यह जाहिर होता है कि मोदी को अब भी तीव्र विकास के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति माना जाता है. 2019 के चुनावों को जीतने की दौड़ में अभी वही सबसे आगे हैं बशर्ते वे विकास के सीधे रास्ते पर आगे बढ़ते रहें और छुटभैये भगवा संगठनों को अपनी परिकल्पना में अड़ंगा लगाने का मौका न दें.

