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आवरण कथाः तिकड़ी की ताकत

हार्दिक पटेल के बदला लेने के आह्वान  ने भाजपा को चोटिल तो किया मगर बेदखल नहीं कर सका, अब इस युवा नेता की अगली रणनीति क्या होगी?

हार्दिक पटेल (तिकड़ी की ताकत)
हार्दिक पटेल (तिकड़ी की ताकत)
अपडेटेड 27 दिसंबर , 2017

गुजरात का 2017 का चुनाव अगर किसी एक बात के लिए याद किया जाएगा, तो वह है ताकतवर भाजपा के खिलाफ नौजवान हार्दिक पटेल की ललकार. वे न केवल भाजपा के खिलाफ पटेल समुदाय की नाराजगी का मुख्य प्रतीक बनकर उभरे, बल्कि वही सबसे अहम वजह थे जिसने भाजपा की सीटों को तीन दशकों में पहली बार दहाई अंकों पर धकेल दिया.

चुनाव खत्म होने के बाद सबकी निगाहें अब पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) के इस 24 वर्षीय नेता के ऊपर टिकी हैं. अहमदाबाद में 25 अगस्त, 2015 को पटेल आरक्षण समर्थक रैली में हुई हिंसा के बाद जब हार्दिक पर राजद्रोह के मुकदमे ठोक दिए गए, तब पटेलों को अपने पीछे जुटाकर वे उनका पोस्टर बॉय बन गए. न तो जेल में बिताए आठ महीने और न ही आठ महीनों के लिए गुजरात से बाहर निकालना उन्हें तोडऩे में कामयाब हो सका.

उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. हार्दिक का कहना है कि उन्होंने कांग्रेस को समर्थन इसलिए दिया ताकि वे भाजपा के अहंकार को तोड़ सकें और 2015 की पुलिस गोलीबारी में 14 पटेलों की मौत का बदला ले सकें. उन्होंने कहा था कि पटेल आंदोलन का सियासी पार्टियों से कोई लेना-देना नहीं था, उन्होंने तो बस आरक्षण हासिल करने के लिए ऐसा किया. उन्होंने कहा कि गुजरात के नतीजों के बाद भी उसका आंदोलन जारी रहेगा.

भाजपा के खिलाफ हार्दिक के लगातार तीखे अभियान का कोई असर मध्य और दक्षिण गुजरात के पटेलों पर नहीं पड़ा. उत्तर गुजरात में भी उनको देखने के लिए जो भारी भीड़ जुटती थी, उसने भी विपक्ष की झोली अंधाधुंध वोटों से नहीं भरी. सौराष्ट्र में अलबत्ता उन्होंने भाजपा को 12 सीटों से हाथ धोने को मजबूर कर दिया और उसकी कुल सीटों में खासी सेंध लगाई. लगता है, पटेलों के मसले पर भाजपा की मुश्किलें अभी कायम रहेंगी.

लिहाजा, अगर पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी नैया पार लगानी है, तो उसके लिए बेहद जरूरी है कि वह इस आंदोलन की आग पर पानी डाले. हार्दिक आरक्षण के मसले पर खुद को साधने की पार्टी की कोशिशों को ठुकरा चुके हैं—भाजपा ने आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों को 10 फीसदी आरक्षण देने का विधेयक पारित किया है, जिसे आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की 49 फीसदी की ऊपरी सीमा की रोशनी में गुजरात हाइकोर्ट में चुनौती दी गई है.

हार्दिक ने भाजपा के कदम को यह कहकर खारिज कर दिया कि पटेल केवल ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण चाहते हैं. हालांकि उन्होंने गुजरात चुनावों की पूर्वसंध्या पर इसी के बदले हुए रूप में कांग्रेस की तरफ से की गई पेशकश स्वीकार कर ली. साफ था कि हार्दिक ने भाजपा की हार पक्की करने का बीड़ा उठा लिया था. अपने मकसद में तो वे नाकाम रहे, पर उन्होंने भगवा पार्टी को बुरी तरह झकझोर दिया है.

सियासी पंडित पसोपेश में हैं कि चुनाव के बाद पटेल आंदोलन में वही तेजी आ पाएगी या नहीं, खासकर इस बात को देखते हुए कि वह भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में नाकाम हो चुका है.

फिर भी आंदोलन ने हार्दिक को एक मंच मुहैया करा दिया है. सियासत में औपचारिक कदम रखने के लिए अभी उनकी उम्र कम है और अगली जुलाई में ही विधानसभा सीट की पात्रता हासिल कर सकेंगे. सियासी उथलपुथल मचाने वाले उसके साथी अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी विधायक बन चुके हैं. अल्पेश कांग्रेस के विधायक हैं और जिग्नेश कांग्रेस के समर्थन से जीते निर्दलीय विधायक हैं.

2022 में अगले चुनाव तक, जब वे चुनाव लडऩे की पात्रता हासिल करेंगे, सियासी मैदान में खुद को टिकाए रख पाना हार्दिक के लिए मुश्किल साबित हो सकता है. इन चुनावों में उन्होंने अपने समुदाय के लोगों से 2015 की पुलिस गोलीबारी में मारे गए 14 पटेलों की मौत का बदला लेने के लिए भाजपा के खिलाफ वोट देने की गुजारिश की थी. मगर बदला ऐसी चीज है जो आप दो बार नहीं ले सकते. बेशक अब तक के उनके सफर को देखते हुए हार्दिक कुछ अप्रत्याशित भी कर सकते हैं.

जिस कांग्रेस पार्टी से पटेलों ने बीते दो दशकों से दूरी बनाए रखी थी, उसी कांग्रेस के साथ उसका जुडऩा अभी कुछेक और साल जारी रह सकता है. फिलहाल 2017 के गुजरात चुनावों के तमाशे का परदा गिर चुका है. मगर जब तक वह दृश्य पर है, हार्दिक भाजपा के लिए चिंता का सबब बने रहेंगे.

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