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आवरण कथाः बस जीत भर गए

गुजरात में भाजपा की मामूली जीत से विपक्ष में नई जान लौटी. लिहाजा, यह पार्टी के लिए 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले मुश्किलें कम करने में मददगार नहीं हो पाएगी.

गुजरात और हिमाचल विजय के बाद भाजपा संसदीय दल की बैठक में नरेंद्र मोदी का स्वागत करते अमित शाह
गुजरात और हिमाचल विजय के बाद भाजपा संसदीय दल की बैठक में नरेंद्र मोदी का स्वागत करते अमित शाह
अपडेटेड 27 दिसंबर , 2017

गुजरात विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान खत्म होने से दो दिन पहले, 12 दिसंबर को, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आत्मविश्वास से लबालब थे. अहमदाबाद के बाहरी छोर पर पार्टी के विशाल मुख्यालय ''कमलम" में सोफे पर विराजमान शाह ने कहा, ''गुजरात में हमें हराना नामुमकिन है और वह भी तब जब हमारे पास मोदी जी सरीखा नेता मौजूद है और जो हमारा चुनावी शुभंकर है."

शाह ने राज्य में पार्टी की गहरी जड़ों की बात की और 130 से ज्यादा सीटें जीतने की भविष्यवाणी की. 18 दिसंबर की सुबह जब एक-एक करके नतीजे आने शुरू हुए, तब शाह सही तो साबित हुए, पर सिर्फ एक हद तक ही. मोदी-शाह की जोड़ी ने अपने खिलाफ मोर्चे पर डटे विपक्ष की धार को वाकई भोथरा कर दिया और लगातार छठी जीत हासिल की, जो पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की लगातार सात जीतों से महज एक कम है, मगर वे किसी तरह जीत की लकीर को बस पार भर कर सके. पार्टी की झोली में कुल 99 सीटें आईं, जो साधारण बहुमत के लिए जरूरी सीटों से महज सात ज्यादा थीं, बल्कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की झोली में आई 80 सीटों से महज 19 ही ज्यादा थीं.

भाजपा ने 49.1 फीसदी वोट हासिल किए, जो 2012 में उसे मिले वोटों से एक फीसदी अंक ज्यादा हैं, पर उसने 16 सीटें गंवा दीं. वहीं वोट हिस्सेदारी में महज तीन फीसदी अंकों की बढ़ोतरी के साथ कांग्रेस की सीटों में 16 सीटों का इजाफा हुआ, जो 1985 के बाद उसका बेहतरीन प्रदर्शन है. भाजपा ने जो 16 सीटें गंवाईं, उनमें से ज्यादातर सीटें इसलिए गंवाईं क्योंकि मोहभंग का शिकार हो चुके उसके समर्थकों ने ''उपरोक्त में कोई नहीं" या ''नोटा" का विकल्प (2015 में ईवीएम में जोड़ा गया) चुना.

इन सभी सीटों पर नोटा का बटन दबाने वाले मतदाताओं की तादाद भाजपा की हार के अंतर से ज्यादा थी. मसलन, उत्तर गुजरात के मोडासा में भाजपा 200 वोटों से हारी, जबकि नोटा पर 3,515 वोट पड़े. लिहाजा, अगर इन 16 सीटों पर ये कुल 5,51,615 मतदाता वोटिंग मशीन पर नोटा की बजाए पंजे का बटन दबा देते, तो 22 साल में पहली बार भाजपा आज विपक्ष में बैठी होती. तो भी यह अकेला सबूत नहीं है जो बताता है कि भाजपा को इस बार गुजरात में कितने कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ा.

पाटीदार आंदोलन ने पार्टी को पटेलों के दबदबे वाले सौराष्ट्र-कच्छ इलाके में खासी चोट पहुंचाई, जहां वह 54 में से महज 23 सीटें ही जीत सकी (जबकि 2012 में उसने 35 सीटें जीती थीं). वह तो राज्य के चार बड़े शहरों—अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट में भाजपा ने जिस तरह बुहार लगाई, उसी की बदौलत आखिरकार उसकी नैया पार लग सकी. इन शहरों की 55 में से 46 सीटें भाजपा की झोली में गईं, जबकि बाकी 127 सीटों में से वह सिर्फ 53 जीत सकी और इनमें से 71 सीटें कांग्रेस ने हासिल कीं. अगर इन चार शहरों में भाजपा ने इतना शानदार प्रदर्शन नहीं किया होता, तो वह गुजरात गंवा चुकी थी. हालांकि भाजपा की ग्रामीण चुनौती विकट है. राज्य के 33 जिलों में से सात में भाजपा एक भी सीट नहीं जीत सकी और दूसरे आठ जिलों में से हरेक में उसे महज एक-एक सीट से तसल्ली करनी पड़ी.

गुजरात ने पार्टी के लिए चेतावनी का बिगुल बजा दिया है. इसकी कीमत पार्टी को केंद्र और राज्य, दोनों में ज्यादा जोशो-खरोश से भरी कांग्रेस की शक्ल में चुकानी पड़ सकती है. जीत का यह कम अंतर ही है जिसकी वजह से गांधीनगर में नेतृत्व में बदलाव की अटकलें मंडराने लगी हैं.

विकास की राजनीति

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 59.1 फीसदी वोट हिस्सेदारी के साथ गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटें जीती थीं. विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के हिसाब से इन जीत के आंकड़ों को देखने पर 165 सीटों पर जीत की संभावना जताई गई थी. उसके वोटों का छितराना तब शुरू हुआ जब नोटबंदी और जीएसटी के जुड़वां नतीजे हिंदुस्तान के इस सबसे अव्वल औद्योगिक सूबे में दिखाई देने लगे और वोट हिस्सेदारी में यह गिरावट चलती रही. एक प्रतिष्ठित जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक, कांग्रेस और भाजपा के वोटों में अंतर चुनाव के पहले महज 6 फीसदी पर आ गया.

इससे पहले, राज्य के मतदाताओं में 14 फीसदी के आसपास हिस्सेदारी रखने वाले ताकतवर पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर 2015 में शुरू हुआ पाटीदार आंदोलन जंगल की आग की तरह फैल गया था, जिसकी लपटें चुनाव की तरफ बढ़ रहे गुजरात में भाजपा के किले की दीवारों को घेरने लगी थीं. इस आंदोलन की कोख से हार्दिक पटेल सरीखा करिश्माई युवा नेता पैदा हुआ, जिसने गिरफ्तारी और सेक्स टेप का बहादुरी से मुकाबला करते हुए भाजपा के खिलाफ जबरदस्त जज्बाती उभार को हवा दी. उना और उसके बाद दलितों पर हुए हमलों ने जिग्नेश मेवाणी के फलक पर उभरने का रास्ता साफ कर दिया. इसके साथ भाजपा के रवैए में तानाशाही की आम धारणा, खेती-किसानी का गहरा संकट और जीएसटी के असर ने साफ कर दिया था कि गुजरात भाजपा के लिए फूलों की सेज साबित नहीं होने जा रहा था.

सितंबर में वायरल हुआ ''विकास गांडो थायो छे (विकास पागल हो गया है)" मेमे, जिसमें भाजपा के विकास के दावों का मजाक उड़ाया गया था, इतना मारक हो गया कि भाजपा के कार्यकर्ता विकास की बात करने में शर्माने लगे. हैरान-परेशान मोदी और शाह ने दो बैठकें कीं और रणनीति को लेकर माथापच्ची की. एक भाजपा नेता कहते हैं, ''प्रधानमंत्री चाहते थे कि विकास हिंदुस्तान की चुनावी राजनीति का मुख्य आधार हो."

नुक्सान पर काबू पाने की कोशिशें अक्तूबर में शुरू हुईं.

अक्तूबर और नवंबर में जीएसटी परिषद ने 178 चीजों को 28 फीसदी से हटाकर 18 फीसदी कर दर में लाने का ऐलान किया. खुद शाह ने नवंबर के मध्य से गुजरात में तंबू गाड़ दिया. वे ''कमलम" से काम करने लगे और पार्टी के बूथ प्रबंधन तथा विज्ञापन रणनीति को उन्होंने निजी तौर पर खुद संभाल लिया. उन्होंने तकरीबन रोज-ब-रोज मोदी के साथ नजदीकी तालमेल बनाते हुए विजुअल ऐड की रणनीति को अंजाम दिया—जितने दिनों वे गुजरात में पड़ाव डाले रहे, तकरीबन हर रोज एक फोन कॉल प्रधानमंत्री को सुबह करते और एक फोन शाम को करते.

इस जोड़ी ने जो रणनीति तय की, उसमें भाजपा के राजकाज पर जोर दिया गया और लोगों को देश के हर घर में पहली बार चौबीस घंटों बिजली मुहैया करने सरीखे प्रयोगों की याद दिलाई गई. शाह ने मोदी के नए नारे—''हूं छू विकास, हूं छू गुजरात (मैं हूं विकास, मैं हूं गुजरात)" को प्रचार की रणनीति में बदल दिया. इस जोड़ी को लगा कि यह सकारात्मक कैंपेन खासकर राज्य के असरदार एनआरआइ लोगों में गुजराती अस्मिता के जज्बे को जगाएगा.

यह कैंपेन मूविंगपिक्सेल के चार मिनट के छोटे-छोटे वीडियो की शृंखला में घूमता था. इसने गुजराती गौरव की भावना को जगाया और उस नकारात्मक मुहिम को भोथरा किया जो हार्दिक और कांग्रेस ने छेड़ रखी थी. पांच छोटी फिल्मों में दिखाया गया था कि उनमें एक मुख्य किरदार विकास के बारे में भाजपा के दावों पर सवाल उठाता है और दूसरे लोग तुर्शी-ब-तुर्शी उसका जवाब देते हैं, जिसका अंत इस दावे के साथ होता है कि ''मुझे अपने गुजराती होने पर गर्व है."

आखिरकार कांग्रेस ने भी नकारात्मक कैंपेन से तौबा कर ली. मगर उसने इतना तो किया ही कि गुजराती फिल्म अदाकार हितु कनोडिया, जिन्होंने एक ही दिन में 1 करोड़ व्यू हासिल करने वाली इन फिल्मों में से एक में नायक का किरदार अदा किया था, इधर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत गए.

चुनाव के आखिरी दौर में मोदी ने जबरदस्त अभियान चलाया. 27 नवंबर से शुरू और राज्य भर में 34 रैलियों में भूमिपुत्र की भावनात्मक अपील से वाबस्ता इस अभियान के बाद जीत पकड़ में दिखाई देने लगी. मोदी ने कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की ''नीच" टिप्पणी को खासी कामयाबी के साथ बूमरैंग में बदल दिया, सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या का फैसला 2019 के लोकसभा चुनाव तक मुल्तवी करने को कहने के लिए कपिल सिब्बल पर जोरदार हमला बोला और यहां तक कि अय्यर के घर पर एक भोज में शामिल होने के लिए, जिसमें पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी सहित पाकिस्तानी अफसर भी मौजूद थे, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी निशाना बनाया. मोदी ने अपने रैलियों में गरजते हुए कहा, ''क्या कांग्रेस ने पाकिस्तानियों को मुझे हटाने की श्सुपारी्य दी है?"; ''क्या एक ''नीच" प्रधानमंत्री नहीं बन सकता?" अगर ये गर्जनाएं नहीं होतीं, तो पार्टी यह चुनाव हार सकती थी.

कांग्रेस ने बूथ रणनीति तैयार करने के दावे तो किए थे, पर उनके बावजूद वह शाह की बिल्कुल अनूठी मैदानी चुनावी मशीनरी के पासंग भी साबित नहीं हो सकी. 9 और 18 दिसंबर के मतदान के दोनों दिन भाजपा के कार्यकर्ता चुनावी बूथों से मतदाताओं के घरों के बार-बार चक्कर लगाते रहे और अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक ले जाकर उनके वोट डलवाने के शाह के निर्देश को अमली जामा पहनाते रहे.

दूसरी तरफ कांग्रेस के बूथ, यहां तक कि सूरत में पटेल-बहुल वराछा इलाके सरीखे पार्टी के मजबूत किले भी, या तो सूने पड़े थे या बिल्कुल खाली थे. शाह की चुनावी बूथ प्रबंधन रणनीति ने भाजपा की वोट हिस्सेदारी में एक फीसदी अंकों का इजाफा किया, बावजूद इसके मतदान का कुल प्रतिशत 2012 के 68.7 फीसदी से 2.6 फीसदी नीचे आ गया. राजनैतिक विश्लेषक जगन पाठक इसे बिना शर्त ''मोदी की कड़ी मेहनत और हुनरमंद प्रचार मुहिम और शाह के बूथ मैनेजमेंट" की जीत करार देते हैं.

कांग्रेस के लिए एक और झटका चुनाव में उसके शीर्ष नेताओं का सफाया होना है. तीन दशकों में अपने बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद उसके तमाम बड़े नेता—शक्तिसिंह गोहिल, अर्जुन मोढवाडिया, सिद्धार्थ पटेल और तुषार चौधरी—हार गए. इसके मुकाबले मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल सहित भाजपा के शीर्ष मंत्री इस चुनावी तूफान में खुद को बचाने में कामयाब रहे. हालांकि सात मंत्री चुनाव हारे, जिनमें बिजली मंत्री चिमन सपारिया और स्वास्थ्य मंत्री शंकरभाई चौधरी भी शामिल हैं.

मोदी-शाह की जोड़ी जाहिरा तौर पर वोटर को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रही कि उनसे तमाम छोटी-मोटी भूल-चूक हुई है, पर अब भी भाजपा ही उनके लिए सबसे अच्छा दांव है. शहरों के वोटिंग पैटर्न से पता चलता है कि जीएसटी में किए गए सुधारों ने भाजपा को हो रहे नुक्सान को थामा. उत्तर और दक्षिण गुजरात दोनों में, जहां पार्टी ने क्रमशः 15 और 35 सीटें जीतीं, वह अपनी 2012 में जीती गई सीटों के करीब पहुंचने में कामयाब रही.

पाटीदार आंदोलन का असर सौराष्ट्र तक सीमित रहा और दूसरे क्षेत्रों के पटेल-बहुल इलाकों तक नहीं फैला. कुल जमा 52 सीटों में से, जहां 15 फीसदी से ज्यादा पाटीदार आबादी है, भाजपा ने 32 सीटें जीतीं और कांग्रेस ने 20. अलबत्ता ओबीसी, जिन पर भाजपा ने उम्मीदें टिका रखी थीं, एक हद तक उसके पाले में आए.

शहरी-ग्रामीण बंटवारे में—जिसमें शहरी भाजपा के हक में गए और ग्रामीण कांग्रेस के हक में-पहले के चुनावों के रुझान की ही झलक दिखाई दी. यह सबसे ज्यादा सौराष्ट्र—कच्छ में जाहिर हुआ. कांग्रेस को जहां पटेल वोटों के अपने पाले में आने का फायदा मिला, वहीं शहरी वोटों ने भाजपा की नैया डूबने से बचाई.

भाजपा को इस सितंबर में कांग्रेस नेता अहमद पटेल को हराने के लिए किए गए दांवपेचों की भी कीमत चुकानी पड़ी. वह 13 कांग्रेस विधायकों को लुभाकर अपने पाले में लाई थी, पर पटेल को राज्यसभा में दोबारा चुने जाने से नहीं रोक सकी थी. सात में से जिन पांच विधायकों को उसने टिकट दिया, वे हार गए. अमूल डेयरी कोऑपरेटिव के ताकतवर अध्यक्ष राम सिंह परमार भी हारे. मतदाताओं का संदेश साफ थाः दलबदल की राजनीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

भाजपा को आर्थिक मोर्चे पर अपनी कमियों की भी कीमत चुकानी पड़ी. दीवाली के पहले मूंगफली और कपास की पैदावार के लिए जो समर्थन मूल्य घोषित किया गया, वह खासा कम था. उसने खेती के संकट को बढ़ाने में अहम योगदान दिया. अलबत्ता, इसी के साथ केंद्र और राज्य सरकारों की कुछ इनी-गिनी योजनाओं ने पार्टी को भारी फायदा पहुंचाया. मुद्रा योजना में गुजरात के सुतार, लुहार, किराना दुकानदारों सरीखे 28 लाख छोटे-मोटे पेशेवरों और उद्यमियों को गैर-जमानती कर्ज दिए गए. उज्ज्वला योजना में गुजरात के 13 लाख गरीब परिवारों को सस्ते दर पर रसोई गैस की किट मिली.

ख्यमंत्री विजय रूपाणी के अनूठे सेवा सेतु कार्यक्रम—जिसमें सरकार ने गरीबों के दरवाजे पर जाकर योजनाओं के फायदे पहुंचाए—का भी असर पड़ा हो सकता है. भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव सरोज पांडेय इसे सटीक ढंग से बयान करती हैं, ''राज्य में 22 साल की ऐंटी-इनकमबेंसी के बाद भी हम सरकार बना रहे हैं, यह कोई छोटी बात नहीं है. यह साफ है कि प्रधानमंत्री मोदी की अपील अपराजेय है. अगर हमने कोई कीमत चुकाई, तो वह विकास की राजनीति पर टिके रहने की और कांग्रेस के जाति और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नकारात्मक राजनीति खेलने की कीमत थी."

आसन्न चुनौतियां

चुनावी जीत ने गुजरात में भाजपा की चिंताओं को जरा भी कम नहीं किया है. कृषि संकट, पटेलों को ओबीसी के तौर पर आरक्षण के लिए जोर देने वाले पीएएएस आंदोलन ने, जिसे हार्दिक पटेल ने जारी रखने का संकल्प लिया है, और अल्पेश और जिग्नेश जैसे युवा नेताओं के विधानसभा में प्रवेश जैसे मुद्दों ने पार्टी की चुनौतियों में वृद्धि ही की है.

पार्टी कार्यालय में मुख्यमंत्री विजय रूपाणी

2014 में मोदी के राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्थान के बाद खाली हुए नेतृत्व को हार्दिक जैसे नए नेताओं ने भर दिया है. उन्हें चुनौती देने के लिए नई निर्वाचित सरकार से एक सशक्त, निर्णायक नेतृत्व की अपेक्षा की जाती है. भाजपा वास्तव में रूपाणी को बरकरार रखती है, तो उन्हें अपनी झिझक समाप्त करनी होगी और नौकरशाही से निबटने में अधिक मुखर होना होगा, हालांकि उनकी छवि साफ रही है और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ उनके संबंध बिल्कुल ठीक हैं.

नई सरकार को मतदाताओं को भी लुभाना होगा, विशेष रूप से युवाओं और किसानों को, जिन्होंने इस चुनाव में कांग्रेस को वोट दिया है. नई सरकार को राज्य के पूर्व उद्योग और विद्युत मंत्री सौरभ पटेल जैसे दिग्गजों को वापस लाने की आवश्यकता होगी, जिन्हें मंत्रालय में 14 साल के कार्यकाल के बाद रूपाणी ने हटा दिया था.

पहली चुनौती अगले साल अप्रैल में पेश आएगी, जब गुजरात के चार राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल समाप्त होगा. इनमें केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली, केंद्रीय सड़क और भूतल परिवहन राज्यमंत्री मनसुख मांडविया, केंद्रीय कृषि, किसान कल्याण, पंचायती राज राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रूपाला और शंकरभाई वेगाड हैं. भाजपा की दो सीटें पक्की हैं, लेकिन कांग्रेस की संख्या में बढ़ोतरी से दो अन्य सीटों के लिए कठिन संघर्ष भी पक्का हो गया है.

इसके बाद 2014 में मोदी लहर पर सवार होकर जीती गईं सभी 26 सीटों को बरकरार रखने की भारी चुनौती का सामना करना पड़ेगा. अहमदाबाद के एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विश्लेषक अजय उमट कहते हैं, ''भाजपा को जड़ता से निकलना होगा और 2019 की चुनौती का मुकाबला करने के लिए सरकार और पार्टी, दोनों में परिवर्तनों की झड़ी लगानी होगी."

अपनी साख सुदृढ़ करने के लिए, नई सरकार को मूल रूप से पांच प्रमुख मुद्दों से निबटने की जरूरत होगी. उसे किसानों को राहत देने के उपायों को लागू करना होगा. रूपाणी सरकार ने कपास और मूंगफली की फसल के लिए जो 900 रु. का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया था, वह किसानों की 1,300 रु. की उम्मीदों से कम है. अगली फसल के लिए समर्थन मूल्य में वृद्धि की आवश्यकता होगी. फसल बीमा योजना के खराब कार्यान्वयन को भी ठीक करना होगा और सुपुर्दगी की प्रणाली को आमूलचूल सुधारना होगा.

हालांकि, नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पाटीदार आंदोलन को शांत करने की होगी. अगड़ी जातियों में से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की पेशकश को हार्दिक 2016 में ही खारिज कर चुके हैं. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि एक संभव समाधान हार्दिक सहित सभी पाटीदार आंदोलनकारियों के खिलाफ मामलों को बिना शर्त वापस लेना हो सकता है.

चुनावी जीत के तुरंत बाद जिग्नेश ने भाजपा को घेरने के लिए एक संयुक्त रणनीति बनाने के लिए हार्दिक के साथ बैठक की. उत्तरी गुजरात के दलितों पर जिग्नेश की पकड़ ने इस क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण उम्मीदवारों की हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. विधायक बनने के बाद जिग्नेश भाजपा के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं, क्योंकि उन्होंने वडगाम सीट सिर्फ दलितों के बूते नहीं जीती है; उनके साथ भारी-भरकम मुस्लिम समर्थन भी है.

पार्टी को गुजरात में एक विश्वसनीय और प्रभावी नेतृत्व का निर्माण भी करना होगा. भाजपा के कई सीटों पर हारने का एक कारण यह है कि उसने पुराने, थके हुए विधायकों को फिर मैदान में उतारा. भाजपा ने कम से कम तीन होनहार नेताओं—अमित ठाकर, 45 वर्ष; भरत पंड्या, 50 वर्ष; और जिगर इनामदार, 40 वर्ष—की कथित तौर पर भाई-भतीजावाद के कारण अनदेखी की. उदाहरण के लिए पंड्या और ठाकर पर इसलिए भरोसा नहीं किया जा रहा है क्योंकि वे एक समय मोदी के प्रतिद्वंद्वी रहे संजय जोशी के करीब थे. दूसरी ओर इनामदार राज्य नेतृत्व के एक वर्ग की उलझन में फंस गए.  

भाजपा को हार्दिक-अल्पेश-जिग्नेश की तिकड़ी की चुनौती का सामना करने के लिए गुजरात में एक युवा नेतृत्व की भी जरूरत है. इसके अलावा 80 सीटों पर जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस का नया नेतृत्व अपने तेवर और आक्रामक ही करेगा. कांग्रेस विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद के लिए पहले ही तीन नामों पर विचार कर रही है. इनमें अमरेली के सक्रिय विधायक परेश धाहनी (41 वर्ष) हैं, जो सौराष्ट्र में पटेल समुदाय में एक बड़ा नाम हैं और राहुल गांधी के करीबी हैं.

एक 62 वर्ष के कुंवरजी बावलिया हैं, सौराष्ट्र के वरिष्ठ कोली नेता, जो अपने हमलावर तेवरों और मतदाताओं के साथ अपने जुड़ाव के लिए जाने जाते हैं. वे जशदान सीट से जीते हैं. तीसरा नाम 60 वर्षीय डॉ. अनिल जोशीयारा का है, जो भीलोदा विधानसभा क्षेत्र से एक जनजातीय नेता और विधायक हैं, और 1990 में शंकरसिंह वाघेला के साथ भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए थे.

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