किसी राज्य को विकास के रास्ते पर मजबूती से स्थापित करना कोई आसान काम नहीं है. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का ही उदाहरण लें. अपने 14 साल के कार्यकाल की शुरुआत में, जब उनकी उम्र 65 साल के करीब थी, उन्होंने विश्व बैंक के कुछ अधिकारियों के साथ नृत्य तक किया, जिसे लेकर उन्हें अपनी पत्नी की नाराजगी भी झेलनी पड़ी थी. उन्होंने उन अधिकारियों को काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की सैर कराने का भी आदेश दिया ताकि कर्ज पाने के लिए उन्हें खुश किया जा सके. विशुद्धता पसंद लोगों को गोगोई के इन तरीकों पर भले ही ऐतराज हो, लेकिन मुख्यमंत्री अपने मकसद में कामयाब रहे. बहुराष्ट्रीय एजेंसियों से मिलने वाली आर्थिक मदद की वजह से असम ने बुनियादी ढांचे के विकास में लगातार जबरदस्त प्रदर्शन किया. गोगोई की मिसाल इस साल इंडिया टुडे के सर्वश्रेष्ठ राज्य के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तथ्य दिखाती है—नेतृत्व और कुछ अतिरिक्त प्रयास करने की योग्यता किसी राज्य के प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाती है. दो पूर्वी राज्यों असम और ओडिसा—जहां नवीन पटनायक पिछले 15 साल से मुख्यमंत्री हैं—ने पिछले साल से रैंकिंग में सबसे बड़ी छलांग लगाई है. पिछले साल 19वें स्थान पर रहने वाला असम सातवें पायदान पर आ गया है, जबकि ओडिसा 16वें स्थान से ऊपर चढ़कर पांचवें पायदान पर पहुंच गया है. इन दोनों ही राज्यों के उत्थान का श्रेय वहां के बुनियादी ढांचे में सुधार और सूक्ष्म अर्थव्यवस्था को जाता है.
दस छोटे राज्यों में सिक्किम, जिसके मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग पिछले दो दशकों से शासन कर रहे हैं, पिछले साल नौवें स्थान से पहले स्थान पर आकर अव्वल रहा है. यह राज्य 10 श्रेणियों में से चार में चोटी पर रहा है. भारत के तीन सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्रियों की सफलता की कहानी यह भी दिखाती है कि चुनाव जीतने का सबसे जांचा-परखा तरीका है, काम करके दिखाना. यह देश भर में चुनावी रणनीतिकारों को शायद यह भी याद दिलाता है कि अच्छा कामकाज ही वह एकमात्र राजनैतिक दांव है जो मतदाताओं को बार-बार आकर्षित करता है.
भले ही कभी-कभार वोटों की लड़ाई धार्मिक या सांप्रदायिक मंचों पर जीत ली जाए, लेकिन एक लंबी पारी खेलनी हो तो विकास का कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
निरंतरता भले ही वृद्धि के पथ को सुनिश्चित करती हो, लेकिन नेतृत्व में बदलाव राज्य को आगे भी ले जा सकता है और पीछे भी. चार राज्यों—गुजरात, हरियाणा, तमिलनाडु और गोवा, जहां 2014 और 2015 में नेतृत्व में बदलाव हुआ—के प्रदर्शन में नाटकीय परिवर्तन देखा गया है. नरेंद्र मोदी के बाद गुजरात का जिम्मा संभालना आनंदीबेन पटेल के लिए आसान नहीं था, लेकिन राज्यों का अध्ययन दिखाता है कि उन्होंने विकास के 'गुजरात मॉडल' को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है. 2012 के बाद गुजरात ने पहली बार सर्वश्रेष्ठ राज्य का पुरस्कार जीता है. हरियाणा की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण में सुधार दिखाई देता है, हालांकि मुसलमानों और गायों पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के विचार कट्टरपंथी रहे हैं.
लेकिन तमिलनाडु और गोवा का नेतृत्व परिवर्तन विपरीत परिणाम दिखाता है. सितंबर 2014 और मई 2015 के बीच मुख्यमंत्री जे. जयललिता जेल में रहीं और तमिलनाडु पिछले साल पहले स्थान से लुढ़ककर इस साल 20वें स्थान पर पहुंच गया. 2003 में जब से राज्यों का अध्ययन शुरू किया गया है तब से आज तक यह किसी भी राज्य का सबसे तेजी से होने वाला पतन है. इस पतन का कारण तीन श्रेणियों में उसका सबसे खराब प्रदर्शन है. यह कृषि की श्रेणी में सबसे ऊपरी पायदान से गिरकर 21वें स्थान पर आ गया, शिक्षा में तीसरे स्थान से गिरकर 13वें और बुनियादी ढांचे के विकास में 11वें स्थान से लुढ़ककर 17वें पायदान पर पहुंच गया.
इसी तरह गोवा का प्रदर्शन भी काफी हताश करने वाला रहा. गोवा 2013 और 2014 में लगातार दो साल छोटे राज्यों में अव्वल रहा था. इससे पहले मुख्यमंत्री रहे मनोहर पर्रीकर, जिन्होंने सभी श्रेणियों में पुरस्कार हासिल किया था, केंद्र में रक्षा मंत्री बना दिए गए थे. उनके हटने के बाद यह राज्य चोटी के स्थान से गिरकर नौवें स्थान पर पहुंच गया. वह सिर्फ एक श्रेणी में ही पहला स्थान हासिल कर पाया है.
दो अन्य राज्य जिन्होंने रैंकिंग में बड़ी गिरावट दिखाई है वे हैं पंजाब और उत्तराखंड. पंजाब, जहां दो साल से भी कम समय के भीतर चुनाव होने वाले हैं, दूसरे स्थान से गिरकर 11वें स्थान पर आ गया है और उत्तराखंड चौथे पायदान से लुढ़ककर सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है. इन दोनों राज्यों की गिरावट की वजह बुनियादी ढांचे के विकास में इनका खराब प्रदर्शन रहा है. असम, ओडिसा, पंजाब और उत्तराखंड की विपरीत दिशाएं इस बात का पर्याप्त संकेत हैं कि वृद्धि की कहानी का बुनियादी ढांचे से शुरू होना जरूरी है.
हमने राज्यों के आकलन के लिए तीन नई श्रेणियां भी शुरू की हैं—समावेशी विकास, पर्यावरण और स्वच्छता—और दूसरी श्रेणियों के कुछ मापदंडों में भी हेरफेर किया है. उदाहरण के लिए शासन की श्रेणी में हम सिर्फ पुलिस-जनता के अनुपात को ही नजर में नहीं रख रहे हैं, बल्कि स्थानीय स्व-शासन के हस्तांतरण पर भी विचार किया गया है.
यह अध्ययन आर्थिक रिसर्च फर्म इंडिकस एनालिटिक्स की ओर से किया गया है. इस फर्म का स्वामित्व अब नील्सन के पास है. यह अध्ययन सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों से प्राप्त वस्तुनिष्ठ प्रामाणिक डाटा पर आधारित है.

