चारों तरफ व्यापम घोटाले का शोर था. करोड़ों लोगों के कान इस बात के लिए तरस रहे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शायद मध्य एशिया के पांच देशों की यात्रा पर रवाना होने से पहले मध्य प्रदेश के इस खूनी घोटाले पर अपने लब खोलें. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. अगले दिन सुबह 10 बजे भोपाल के श्यामला हिल्स के मुख्यमंत्री आवास में फोन की घंटी बजी. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह दूसरी तरफ लाइन पर थे. करीब पांच मिनट शिवराज सिंह चौहान से बात हुई. आधे घंटे के भीतर मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को बुला भेजा और घोषणा कर दी कि वे मध्य प्रदेश हाइकोर्ट से गुजारिश करेंगे कि व्यापम घोटाले की जांच सीबीआइ को सौंप दी जाए.
हर मुख्यमंत्री की जिंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है, जब उसे इस तरह के फैसले लेने पड़ते हैं जो सियासत में भूचाल ला देते हैं. लेकिन सत्ता के शीर्ष पर एक दशक पूरा करने जा रहे 56 वर्षीय शिवराज ने उन कुछ घंटों की सियासी उठा-पटक के बाद एक ऐसा फैसला लिया जो बरसों में गढ़ी गई उनकी पाक-साफ छवि को मिट्टी में मिलने से कुछ हद तक बचाने की उनकी आखिरी कोशिश थी. यह भी हकीकत है कि मेडिकल दाखिलों और सरकारी भर्तियों में हुए अब तक के सबसे भयानक घोटाले में शिवराज पर सीधे कोई दाग नहीं लगा है और न उन पर कोई मामला दर्ज है. कम से कम अभी तक तो वे इस तरह रंगे हाथ नहीं पकड़े गए हैं कि एक और राजनैतिक शख्सियत के पतन का जश्न मनाया जा सके. लेकिन व्यापम में हो रही मौतों ने ऐसा माहौल बना दिया, जहां चौहान की दलीलों की कोई सुनवाई नहीं थी. अंत में उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वे मामले की जांच एक ऐसी बाहरी एजेंसी के हाथ में जाने दें, जो सियासी हवाओं का रुख भांपने में माहिर मानी जाती है.
लेकिन सीहोर के छोटे से गांव से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले शिवराज अगर ठहरकर घोटाले के कैलेंडर पलटें तो पाएंगे कि चिडिय़ों को खेत चुगाने के लिए वे खुद भी जिम्मेदार हैं. और तब वे इस एहसास से सिहर उठेंगे कि कहीं उन्होंने अपने करियर में पलीता तो नहीं लगा लिया. इंडिया टुडे की पड़ताल बताती है कि 2008 से 2013 के दरम्यान कई ऐसे मौके आए जहां नजर मिलाए बिना बात करने वाले शिवराज गच्चा खा गए. सनद रहे, 2008 से 2012 के बीच व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) को नियंत्रित करने वाला स्वास्थ्य शिक्षा विभाग उन्हीं के पास था.
इसके बावजूद जैसे-जैसे व्यापम की मौतों का आंकड़ा बढ़ता गया, वे छाती ठोक-ठोककर यह कहते रहे कि व्यापम का खुलासा करने वाले असली 'व्हिसलद्ब्रलोवर' वे खुद हैं, आखिर उन्होंने ही तो 2013 में व्यापम की जांच की जिम्मेदारी मध्य प्रदेश के विशेष कार्य बल (एसटीएफ) को दी थी. लेकिन मुख्यमंत्री की इस 'मासूम' दलील की काट भी कम नहीं हैं. मसलन, रतलाम से पूर्व निर्दलीय विधायक और व्यापम महाघोटाला किताब के लेखक पारस सकलेचा याद दिलाते हैं कि वे तो बहुत पहले, जुलाई 2009 में, यह मामला मध्य प्रदेश विधानसभा में उठा चुके थे. अगर याद न हो तो मुख्यमंत्री खुद विधानसभा की कार्यवाही के रिकॉर्ड खंगाल लें. उधर, सरकारी डॉक्टर और मामले के व्हिसलद्ब्रलोवर डॉ. आनंद राय बताते हैं कि उन्होंने तो 6 जुलाई, 2009 को ही पीएमटी में धांधली की शिकायत इंदौर क्राइम ब्रांच में कर दी थी.
ऐसा भी नहीं है कि सरकार को इन बातों का पता नहीं है. शिकायतें मिलने के बाद राज्य सरकार ने 17 दिसंबर, 2009 को पुलिस दल से मामले की जांच करने को कहा था. इसके बाद 31 मार्च, 2011 को चौहान ने खुद विधानसभा को बताया कि व्यापम घोटाले की जांच चल रही है. उस साल जुलाई और नवंबर में उन्होंने फिर यही बात सदन में दोहराई और दूसरी बार उन्होंने कहा था कि 114 संदिग्ध छात्रों की पहचान कर एफआइआर दर्ज करा दी गई है. लेकिन इससे व्यापम घोटाले का क्या बिगडऩा था. आंकड़े बताते हैं कि इधर पुलिस कछुआ चाल से जांच करती रही और उधर घोटाले का सांड तगड़ा होता गया. व्यापम के दस्तावेज बताते हैं कि फर्जीवाड़े के चलते 2008 में जहां 42 मेडिकल दाखिले रद्द करने पड़े, वहीं 2009 में 85, 2010 में 90, 2011 में 98, 2012 में 286 और 2013 में 439 मेडिकल दाखिले रद्द कर दिए गए. 2014 में तो सरकार ने परीक्षा रद्द कर अपनी लाज बचाई. डॉ. राय तंज कसते हैं, ''सरकार घोटाले की जांच नहीं कर रही थी, वह तो घोटालेबाजों को संरक्षण दे रही थी.''
चौहान पर सगे-संबंधियों का हित साधने के भी आरोप लगे. जब उनकी भानजी रितु चौहान एमपीपीएससी-2008 परीक्षा पास कर डिप्टी कलेक्टर बन गईं, तो कांग्रेस को इसमें साजिश की बू आई. मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता के.के. मिश्र याद दिलाते हैं, ''मैंने जब 2011 में यह मुद्दा उठाया तो बजाए मामले की जांच करने के मुख्यमंत्री ने मेरे पास संदेशा पठा भेजा कि सियासत में परिवार को घसीटना अच्छी बात नहीं है.'' जहां सरकार का कहना है कि एमपीपीएससी एक स्वायत्ता संस्था है और इसके कामकाज में बाहरी दखल नहीं दिया जाता, वहीं मिश्र का दावा है कि रितु को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों में बदलाव किया गया. वे बताते हैं कि परीक्षा की कॉपियां और मेरिट लिस्ट हासिल करने के लिए उन्होंने कई बार आरटीआइ अर्जी लगाई, लेकिन जवाब नहीं मिला. परीक्षा की कॉपियां 10 साल तक सुरक्षित रखने का नियम था लेकिन नियमों को 2011 से 2013 के बीच छह बार संशोधित किया गया. अंत में परीक्षा की कॉपियां तीन महीने के बाद नष्ट करने का प्रावधान कर रितु से जुड़े दस्तावेज खत्म कर दिए गए.
चौहान की पत्नी साधना सिंह का नाम भी घोटालों में उछाला गया. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि परिवहन आरक्षक भर्ती परीक्षा 2012 में साधना के पैतृक जिले गोंदिया (महाराष्ट्र) के 17 लोगों की भर्ती मध्य प्रदेश के फर्जी पते बताकर हुई. यही नहीं, पहले जहां 198 भर्तियों का विज्ञापन निकाला गया, वहीं बाद में 332 भर्तियां कर ली गईं. यह बात भी गौर करने लायक है कि बाद में धांधली के आरोप में 39 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए और कथित तौर पर गोंदिया के बताए जा रहे 17 लोगों को नौकरी ज्वाइन नहीं करने दी गई. परीक्षा के संदेह के घेरे में आने और गंभीर आरोप लगने के बावजूद किसी की हिम्मत साधना सिंह से पूछताछ करने की नहीं हुई. जुलाई 2014 में इंडिया टुडे से खास बातचीत में चौहान ने कहा था, ''विपक्ष मेरी प्रतिमा खंडित करना चाहता है. मेरे खिलाफ जब कांग्रेस को कुछ नहीं मिला तो वे मेरी पत्नी और भानजी का झूठा मामला घसीट लाए.''
इसी तरह चौहान के तत्कालीन निजी सचिव प्रेमचंद्र प्रसाद को लेकर भी उंगलियां उठीं जिन पर पीएमटी 2012 में गलत तरीके से अपनी बेटी का दाखिला कराने का आरोप लगा. मामला दर्ज होने के बावजूद उनसे कभी सख्ती से पूछताछ नहीं की गई और उन्होंने आसानी से 21 जून, 2014 को अग्रिम जमानत ले ली. कांग्रेस उन पर अपनी बेटी के अलावा 200 और लोगों की गलत ढंग से भर्ती का आरोप लगाती है.
विरोधी क्यों छोड़ें हाथ आया मौका
घोटाले के थपेड़ों से जूझ रहे शिवराज आज पहले से कहीं कमजोर नेता हैं. आज बनावटी आत्मविश्वास के साथ टीवी कैमरों का सामना करते हुए वे सोचते होंगे कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की 'चाचा नेहरू' वाली छवि की तर्ज पर उन्होंने जो 'मामा जी' की छवि बनाई थी, वह किस तेजी से छीज रही है. घोटाले की मार पडऩे के बाद पार्टी ने उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी तो बख्श दी, लेकिन हैसियत घटा दी. वैसे राज्य में उनके सियासी रकीब नाजुक सियासी वक्त को आलाकमान से कहीं पहले ताड़ गए थे. तभी तो प्रदेश के गृह मंत्री बाबूलाल गौर ने तपाक से कहा कि घोटाले की कोई फाइल उनकी आंखों के सामने से नहीं गुजरती. बुजुर्ग नेता ने कहा कि व्यापम घोटाले में राज्यपाल के खिलाफ दर्ज एफआइआर को खत्म करने के हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं देने के निर्णय में भी उनकी सलाह नहीं ली गई. उधर, चौहान के उदय के बाद प्रदेश से राजनैतिक निर्वासन झेल रहीं केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी बीते दिनों का हिसाब चुकता करने में देर नहीं लगाई. इंडिया टुडे टीवी से उन्होंने कहा, ''मुझे डर लगता कि किसी दिन मेरी धज्जियां न उड़ जाएं. मध्य प्रदेश में पुलिस वाले मेरा पीछा करते हैं.''
उधर, कांग्रेस फिकरा कसती है कि जब यूपीए के सारे राज्यपाल बेवजह हटा दिए गए तो, दागी यादव मोदी के इतने सगे क्यों हो गए? चौहान ने राज्यपाल को हटाने के मामले में हमेशा नरम रुख अख्तियार किया. इस मुद्दे पर, बुजुर्गों के लिए तीर्थ दर्शन योजना शुरू करने वाले, शिवराज की दलील है कि उन्होंने 86 साल के यादव के गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए संवेदनशील रुख अपनाया. व्यापम के आरोपी बेटे शैलेष की इस साल मार्च में संदिग्ध मौत के बाद से उनकी तबीयत ऊपर-नीचे होती रहती है.
वैसे, मध्य प्रदेश में शिवराज का जनसमर्थन पहले कभी कम नहीं रहा. इसीलिए लोकसभा चुनाव 2014 में मध्य प्रदेश में सूपड़ा साफ करा चुकी कांग्रेस को लग रहा है कि जो करना है अभी कर लो, क्योंकि जनभावनाओं को अपनी तरफ मोडऩे का इससे अच्छा मौका उसे शायद ही फिर कभी मिले. पार्टी ने 16 जुलाई को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है. शहर-कस्बों में कांग्रेस कार्यकर्ता जुलूस निकालकर 'मामा-मामी, हाय-हाय' के नारे लगाने वाले हैं. अक्सर वीरान नजर आने वाले कांग्रेस दफ्तरों में आमदो-रफ्त बढ़ गई है. कांग्रेसियों को 12 साल बाद सत्तासुख की आस बंधी है.
लेकिन चौहान का भविष्य अब इस बात पर निर्भर है कि इंदौर के व्हिसलद्ब्रलोवर प्रशांत पांडेय ने जो एक्सेल शीट अदालत को सौंपी है, वह कितनी भरोसेमंद है. पांडेय का दावा है कि व्यापम के मास्टरमाइंड नितिन मोहेंद्रा से जद्ब्रत असली एक्सेल शीट में 48 जगह मुख्यमंत्री का नाम लिखा था, लेकिन एसटीएफ तक पहुंचने से पहले ही इंदौर क्राइम ब्रांच ने एक्सेल शीट से छेड़छाड़ कर मुख्यमंत्री की जगह उमा भारती, राज्यपाल और बहुत सी जगह मंत्री नाम लिख दिया. इन आरोपों पर बीजेपी का घिसापिटा तर्क है कि पांडेय कांग्रेस के एजेंट हैं. हालांकि दूसरे व्हिसलद्ब्रलोवर आनंद राय पर इसी तरह का आरोप लगाने के बाद बीजेपी की तब सांप-छछूंदर जैसी गत हो गई जब राय ने खुलासा किया कि वे तो आरएसएस के प्रतिबद्ध स्वयंसेवक रहे हैं. वैसे पांडेय का दावा है कि उनकी एक्सेल शीट न सिर्फ पूरी तरह सही है, बल्कि वे बेंगलुरु के प्रतिष्ठित ट्रुथ लैब से इसकी सत्यता प्रमाणित भी करा चुके हैं.
पांडेय इससे पहले साधना सिंह और व्यापम के आरोपी सुधीर सिंह के बीच कथित एसएमएस संवाद का द्ब्रयोरा भी जारी कर चुके हैं. इन एसएमएस में मुख्यमंत्री की पत्नी कथित तौर पर व्यापम में सेलेक्शन के लिए प्रतियोगियों के नाम फॉरवर्ड कर रही हैं. एसटीएफ ने अब तक इन एसएमएस को यह कहकर खारिज किया है कि ये गलत तरीके से हासिल किए गए हैं, लिहाजा, ये जांच में विचार करने लायक ही नहीं हैं.
वैसे, जब तक जांच पुलिस के हाथ में थी, तब तक इसकी आंच किसी भी रूप में शिवराज की चौखट तक नहीं फटकी. लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआइ को सौंप दी है तो उनकी किस्मत अधर में है. अगर सीबीआइ प्रशांत पांडेय के साक्ष्यों को सही मान लेती है तो निश्चित तौर पर शिवराज के लिए सारे रास्ते बंद हो जाएंगे. वैसे, सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का मानना है, ''एसटीएफ से सीबीआइ को सारे मामले ट्रांसफर होने की प्रक्रिया में छह महीने से एक साल का वक्त लग सकता है.'' इसके अलावा व्यापम की मौतों के मामले की जांच सीबीआइ को अलग-अलग थानों से अपने पास लेनी होगी. यानी शिवराज के पास अभी थोड़ा वक्त है, जिसमें वे छवि की मरम्मत करने की कोशिश करेंगे. इस बात पर भी नजर रखनी होगी कि पार्टी ने शिवराज की किस्मत लिखने का फैसला प्रधानमंत्री के देश से बाहर जाने के बाद सुनाया. लेकिन न तो मोदी हमेशा विदेश में रह सकते हैं और न ही चौहान के पास दाग छिपाने की कोई आड़ बची है. अब जो होना है, चैराहे पर होना है.
—साथ में अनूप दत्ता
हर मुख्यमंत्री की जिंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है, जब उसे इस तरह के फैसले लेने पड़ते हैं जो सियासत में भूचाल ला देते हैं. लेकिन सत्ता के शीर्ष पर एक दशक पूरा करने जा रहे 56 वर्षीय शिवराज ने उन कुछ घंटों की सियासी उठा-पटक के बाद एक ऐसा फैसला लिया जो बरसों में गढ़ी गई उनकी पाक-साफ छवि को मिट्टी में मिलने से कुछ हद तक बचाने की उनकी आखिरी कोशिश थी. यह भी हकीकत है कि मेडिकल दाखिलों और सरकारी भर्तियों में हुए अब तक के सबसे भयानक घोटाले में शिवराज पर सीधे कोई दाग नहीं लगा है और न उन पर कोई मामला दर्ज है. कम से कम अभी तक तो वे इस तरह रंगे हाथ नहीं पकड़े गए हैं कि एक और राजनैतिक शख्सियत के पतन का जश्न मनाया जा सके. लेकिन व्यापम में हो रही मौतों ने ऐसा माहौल बना दिया, जहां चौहान की दलीलों की कोई सुनवाई नहीं थी. अंत में उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वे मामले की जांच एक ऐसी बाहरी एजेंसी के हाथ में जाने दें, जो सियासी हवाओं का रुख भांपने में माहिर मानी जाती है.
लेकिन सीहोर के छोटे से गांव से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले शिवराज अगर ठहरकर घोटाले के कैलेंडर पलटें तो पाएंगे कि चिडिय़ों को खेत चुगाने के लिए वे खुद भी जिम्मेदार हैं. और तब वे इस एहसास से सिहर उठेंगे कि कहीं उन्होंने अपने करियर में पलीता तो नहीं लगा लिया. इंडिया टुडे की पड़ताल बताती है कि 2008 से 2013 के दरम्यान कई ऐसे मौके आए जहां नजर मिलाए बिना बात करने वाले शिवराज गच्चा खा गए. सनद रहे, 2008 से 2012 के बीच व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) को नियंत्रित करने वाला स्वास्थ्य शिक्षा विभाग उन्हीं के पास था.

ऐसा भी नहीं है कि सरकार को इन बातों का पता नहीं है. शिकायतें मिलने के बाद राज्य सरकार ने 17 दिसंबर, 2009 को पुलिस दल से मामले की जांच करने को कहा था. इसके बाद 31 मार्च, 2011 को चौहान ने खुद विधानसभा को बताया कि व्यापम घोटाले की जांच चल रही है. उस साल जुलाई और नवंबर में उन्होंने फिर यही बात सदन में दोहराई और दूसरी बार उन्होंने कहा था कि 114 संदिग्ध छात्रों की पहचान कर एफआइआर दर्ज करा दी गई है. लेकिन इससे व्यापम घोटाले का क्या बिगडऩा था. आंकड़े बताते हैं कि इधर पुलिस कछुआ चाल से जांच करती रही और उधर घोटाले का सांड तगड़ा होता गया. व्यापम के दस्तावेज बताते हैं कि फर्जीवाड़े के चलते 2008 में जहां 42 मेडिकल दाखिले रद्द करने पड़े, वहीं 2009 में 85, 2010 में 90, 2011 में 98, 2012 में 286 और 2013 में 439 मेडिकल दाखिले रद्द कर दिए गए. 2014 में तो सरकार ने परीक्षा रद्द कर अपनी लाज बचाई. डॉ. राय तंज कसते हैं, ''सरकार घोटाले की जांच नहीं कर रही थी, वह तो घोटालेबाजों को संरक्षण दे रही थी.''
चौहान पर सगे-संबंधियों का हित साधने के भी आरोप लगे. जब उनकी भानजी रितु चौहान एमपीपीएससी-2008 परीक्षा पास कर डिप्टी कलेक्टर बन गईं, तो कांग्रेस को इसमें साजिश की बू आई. मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता के.के. मिश्र याद दिलाते हैं, ''मैंने जब 2011 में यह मुद्दा उठाया तो बजाए मामले की जांच करने के मुख्यमंत्री ने मेरे पास संदेशा पठा भेजा कि सियासत में परिवार को घसीटना अच्छी बात नहीं है.'' जहां सरकार का कहना है कि एमपीपीएससी एक स्वायत्ता संस्था है और इसके कामकाज में बाहरी दखल नहीं दिया जाता, वहीं मिश्र का दावा है कि रितु को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों में बदलाव किया गया. वे बताते हैं कि परीक्षा की कॉपियां और मेरिट लिस्ट हासिल करने के लिए उन्होंने कई बार आरटीआइ अर्जी लगाई, लेकिन जवाब नहीं मिला. परीक्षा की कॉपियां 10 साल तक सुरक्षित रखने का नियम था लेकिन नियमों को 2011 से 2013 के बीच छह बार संशोधित किया गया. अंत में परीक्षा की कॉपियां तीन महीने के बाद नष्ट करने का प्रावधान कर रितु से जुड़े दस्तावेज खत्म कर दिए गए.
चौहान की पत्नी साधना सिंह का नाम भी घोटालों में उछाला गया. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि परिवहन आरक्षक भर्ती परीक्षा 2012 में साधना के पैतृक जिले गोंदिया (महाराष्ट्र) के 17 लोगों की भर्ती मध्य प्रदेश के फर्जी पते बताकर हुई. यही नहीं, पहले जहां 198 भर्तियों का विज्ञापन निकाला गया, वहीं बाद में 332 भर्तियां कर ली गईं. यह बात भी गौर करने लायक है कि बाद में धांधली के आरोप में 39 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए और कथित तौर पर गोंदिया के बताए जा रहे 17 लोगों को नौकरी ज्वाइन नहीं करने दी गई. परीक्षा के संदेह के घेरे में आने और गंभीर आरोप लगने के बावजूद किसी की हिम्मत साधना सिंह से पूछताछ करने की नहीं हुई. जुलाई 2014 में इंडिया टुडे से खास बातचीत में चौहान ने कहा था, ''विपक्ष मेरी प्रतिमा खंडित करना चाहता है. मेरे खिलाफ जब कांग्रेस को कुछ नहीं मिला तो वे मेरी पत्नी और भानजी का झूठा मामला घसीट लाए.''
इसी तरह चौहान के तत्कालीन निजी सचिव प्रेमचंद्र प्रसाद को लेकर भी उंगलियां उठीं जिन पर पीएमटी 2012 में गलत तरीके से अपनी बेटी का दाखिला कराने का आरोप लगा. मामला दर्ज होने के बावजूद उनसे कभी सख्ती से पूछताछ नहीं की गई और उन्होंने आसानी से 21 जून, 2014 को अग्रिम जमानत ले ली. कांग्रेस उन पर अपनी बेटी के अलावा 200 और लोगों की गलत ढंग से भर्ती का आरोप लगाती है.

घोटाले के थपेड़ों से जूझ रहे शिवराज आज पहले से कहीं कमजोर नेता हैं. आज बनावटी आत्मविश्वास के साथ टीवी कैमरों का सामना करते हुए वे सोचते होंगे कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की 'चाचा नेहरू' वाली छवि की तर्ज पर उन्होंने जो 'मामा जी' की छवि बनाई थी, वह किस तेजी से छीज रही है. घोटाले की मार पडऩे के बाद पार्टी ने उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी तो बख्श दी, लेकिन हैसियत घटा दी. वैसे राज्य में उनके सियासी रकीब नाजुक सियासी वक्त को आलाकमान से कहीं पहले ताड़ गए थे. तभी तो प्रदेश के गृह मंत्री बाबूलाल गौर ने तपाक से कहा कि घोटाले की कोई फाइल उनकी आंखों के सामने से नहीं गुजरती. बुजुर्ग नेता ने कहा कि व्यापम घोटाले में राज्यपाल के खिलाफ दर्ज एफआइआर को खत्म करने के हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं देने के निर्णय में भी उनकी सलाह नहीं ली गई. उधर, चौहान के उदय के बाद प्रदेश से राजनैतिक निर्वासन झेल रहीं केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी बीते दिनों का हिसाब चुकता करने में देर नहीं लगाई. इंडिया टुडे टीवी से उन्होंने कहा, ''मुझे डर लगता कि किसी दिन मेरी धज्जियां न उड़ जाएं. मध्य प्रदेश में पुलिस वाले मेरा पीछा करते हैं.''

वैसे, मध्य प्रदेश में शिवराज का जनसमर्थन पहले कभी कम नहीं रहा. इसीलिए लोकसभा चुनाव 2014 में मध्य प्रदेश में सूपड़ा साफ करा चुकी कांग्रेस को लग रहा है कि जो करना है अभी कर लो, क्योंकि जनभावनाओं को अपनी तरफ मोडऩे का इससे अच्छा मौका उसे शायद ही फिर कभी मिले. पार्टी ने 16 जुलाई को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है. शहर-कस्बों में कांग्रेस कार्यकर्ता जुलूस निकालकर 'मामा-मामी, हाय-हाय' के नारे लगाने वाले हैं. अक्सर वीरान नजर आने वाले कांग्रेस दफ्तरों में आमदो-रफ्त बढ़ गई है. कांग्रेसियों को 12 साल बाद सत्तासुख की आस बंधी है.
लेकिन चौहान का भविष्य अब इस बात पर निर्भर है कि इंदौर के व्हिसलद्ब्रलोवर प्रशांत पांडेय ने जो एक्सेल शीट अदालत को सौंपी है, वह कितनी भरोसेमंद है. पांडेय का दावा है कि व्यापम के मास्टरमाइंड नितिन मोहेंद्रा से जद्ब्रत असली एक्सेल शीट में 48 जगह मुख्यमंत्री का नाम लिखा था, लेकिन एसटीएफ तक पहुंचने से पहले ही इंदौर क्राइम ब्रांच ने एक्सेल शीट से छेड़छाड़ कर मुख्यमंत्री की जगह उमा भारती, राज्यपाल और बहुत सी जगह मंत्री नाम लिख दिया. इन आरोपों पर बीजेपी का घिसापिटा तर्क है कि पांडेय कांग्रेस के एजेंट हैं. हालांकि दूसरे व्हिसलद्ब्रलोवर आनंद राय पर इसी तरह का आरोप लगाने के बाद बीजेपी की तब सांप-छछूंदर जैसी गत हो गई जब राय ने खुलासा किया कि वे तो आरएसएस के प्रतिबद्ध स्वयंसेवक रहे हैं. वैसे पांडेय का दावा है कि उनकी एक्सेल शीट न सिर्फ पूरी तरह सही है, बल्कि वे बेंगलुरु के प्रतिष्ठित ट्रुथ लैब से इसकी सत्यता प्रमाणित भी करा चुके हैं.
पांडेय इससे पहले साधना सिंह और व्यापम के आरोपी सुधीर सिंह के बीच कथित एसएमएस संवाद का द्ब्रयोरा भी जारी कर चुके हैं. इन एसएमएस में मुख्यमंत्री की पत्नी कथित तौर पर व्यापम में सेलेक्शन के लिए प्रतियोगियों के नाम फॉरवर्ड कर रही हैं. एसटीएफ ने अब तक इन एसएमएस को यह कहकर खारिज किया है कि ये गलत तरीके से हासिल किए गए हैं, लिहाजा, ये जांच में विचार करने लायक ही नहीं हैं.
वैसे, जब तक जांच पुलिस के हाथ में थी, तब तक इसकी आंच किसी भी रूप में शिवराज की चौखट तक नहीं फटकी. लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआइ को सौंप दी है तो उनकी किस्मत अधर में है. अगर सीबीआइ प्रशांत पांडेय के साक्ष्यों को सही मान लेती है तो निश्चित तौर पर शिवराज के लिए सारे रास्ते बंद हो जाएंगे. वैसे, सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का मानना है, ''एसटीएफ से सीबीआइ को सारे मामले ट्रांसफर होने की प्रक्रिया में छह महीने से एक साल का वक्त लग सकता है.'' इसके अलावा व्यापम की मौतों के मामले की जांच सीबीआइ को अलग-अलग थानों से अपने पास लेनी होगी. यानी शिवराज के पास अभी थोड़ा वक्त है, जिसमें वे छवि की मरम्मत करने की कोशिश करेंगे. इस बात पर भी नजर रखनी होगी कि पार्टी ने शिवराज की किस्मत लिखने का फैसला प्रधानमंत्री के देश से बाहर जाने के बाद सुनाया. लेकिन न तो मोदी हमेशा विदेश में रह सकते हैं और न ही चौहान के पास दाग छिपाने की कोई आड़ बची है. अब जो होना है, चैराहे पर होना है.
—साथ में अनूप दत्ता