यह 1950 के दशक के मध्य की बात है जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पिता शी झांगशुन की तिब्बत के युवा दलाई लामा से पेकिंग में मुलाकात हुई थी और दोनों में दोस्ती हो गई थी. दलाई लामा ने उन्हें एक घड़ी भेंट की थी जो वे 1980 तक पहनते रहे थे. इस बात की पुष्टि दलाई लामा के एक राजदूत ने की थी जब वे उस वक्त बीजिंग में शी से मिले थे. इन बीच के वर्षों में शी झांगशुन को माओ के क्रांतिकारियों ने अकेला छोड़ दिया था और उनके बेटे को सूअरों की देखभाल करने के लिए एक गुफा में भेज दिया गया था. शी झांगशुन ने खुद को बचा लिया और उनका बेटा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में एक दिन सबसे ताकतवर होकर उभरा.
कैलिफोर्निया में रहने वाले सशक्त तिब्बती समुदाय के बीच 6 जुलाई को अपना 80वां जन्मदिन मनाने के लिए दलाई लामा इस हफ्ते जब अमेरिका जा रहे थे, तो रास्ते में उन्होंने इंडिया टुडे से एक खास बातचीत में बताया कि वे अपने घर तिब्बत वापस जाने की इच्छा रखते हैं और उनकी इच्छा अपने दोस्त शी झांगशुन के बेटे राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने की भी है.
इस दो-टूक बातचीत के जरिए दलाई लामा ने चीन की सरकार को जो संकेत भेजे हैं, उसे देखते हुए कुछ लोग कह सकते हैं कि बीजिंग के साथ वार्ता बहाली में दिलचस्पी का यह सबसे साफ बयान है. बेशक, तिब्बत के इस नेता ने अपने लोगों के हित में एक सम्मानजनक समझौते की गुहार लगाई है, जिन्हें 1950 में चीन के जबरन कब्जे के बाद से लगातार कई दशकों तक प्रताड़ित और कलंकित किया गया है.
कुछ और लोग इस बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि दलाई लामा के पास अब और विकल्प नहीं बचे हैं और यह बयान इस बात की परोक्ष रूप से स्वीकारोक्ति है. या फिर यह भी हो सकता है कि वे खुले में अपने सारे पत्ते यह जानते-बूझते हुए बिखेर रहे हों कि 1959 में जब भागकर वे भारत आए थे, तब से लेकर आज की तारीख में चीन कहीं ज्यादा ताकतवर और पैसे वाला हो गया है. रणनीतिक विश्लेषकों की राय यह हो सकती है कि यह कोई समझदार चाल नहीं है, दूसरे एक आध्यात्मिक गुरु से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह एक कम्युनिस्ट नेता की शतरंजी चालों का पूर्वानुमान लगा ले जिसने अपने राष्ट्रपति बनने के बाद पिछले दो वर्षों में चीनी फौज, पार्टी, अर्थव्यवस्था और राज्य के भीतर छह अन्य अहम पदों पर कब्जा जमा लिया है.
यह मुकाबला अगर तिब्बती बौद्ध धारा के सबसे पवित्र व्यक्तित्व तेंजिन ग्यात्सो और शी जिनपिंग के बीच होता तो हम कह सकते थे कि मुकाबला शुरू होने से पहले ही खत्म हो चुका है, लेकिन ऐसा नहीं है. दलाई लामा ने इस सर्वाधिक असामान्य चुनौती को उछालते हुए न सिर्फ चीनियों को अपना सबसे कटु प्रतिद्वंद्वी मानने से इनकार कर दिया है, बल्कि वे वास्तव में ऐसे चीनी बौद्धों की बढ़ती संख्या के समर्थन पर भरोसा कर रहे हैं जो “बाहर से नास्तिक हैं लेकिन भीतर से आध्यात्मिक हैं.”& उनके मुताबिक जिनकी संख्या नागरिकों और सैन्य प्रतिष्ठान में कुल मिलाकर 40 करोड़ के आसपास है और यह संख्या उनके और तिब्बतियों के पक्ष में सत्ता का संतुलन झुकाने के लिए पर्याप्त है.
गहरे कत्थई रंग का लबादा ओढ़े इस बुढ़ाते भिक्षु के प्रति चीन में एक विशेष किस्म का आक्रोश अब भी व्याप्त है. वहां उन्हें हर तरह की गालियां दी गई हैं. दलाई लामा की मेजबानी को रोकने या फिर शांति, सुख व भाईचारे जैसे उनके अजीबोगरीब प्रवचनों के प्रसार को बाधित करने के लिए चीनी लोगों ने सरकारों पर दबाव डाला है, नागरिक समाज को डराया-धमकाया है और स्वयंसेवी संस्थाओं को धमकाया है कि अगर उन्होंने ऐसा कुछ किया तो उनसे सहयोग वापस ले लिया जाएगा. दलाई लामा हालांकि आज अपनी उम्र के 80वें पड़ाव पर भी एक रॉकस्टार बने हुए हैं और बराक ओबामा से लेकर रिचर्ड गेरे और डेसमंड टुटु तक हर प्रभावशाली व्यक्ति उन्हें बराबर सम्मान देता है.
असलियत यह है कि दलाई लामा ने 1959 में निर्वासन में शुरू हुए एक बिखरे हुए आंदोलन को अकेले दम पर दुनिया में वैधता और मान्यता दिलवाई है, साथ ही वे दुनिया में ऐसे अकेले शख्स हैं जो चीनियों की कमजोर नस को प्यार से दबा सकते हैं.
अपना नाम न छापने की शर्त पर चीन में भारत के एक पूर्व राजदूत कहते हैं, “भले ही उन्होंने दशकों पहले तिब्बत को छोड़ दिया था, लेकिन वहां उनके चाहने वालों की तादाद काफी बड़ी है. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपने अलावा किसी और संगठन या नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकती, जिसका जनाधार इतना बड़ा हो.”
भिक्षु के साथ मन की बात
दिलचस्प बात है कि दलाई लामा के बारे में चीनियों जितना सशंकित दुनिया में सिर्फ एक और नेता है और उसका नाम नरेंद्र मोदी है. पिछले साल सितंबर में शी जिनपिंग के दिल्ली दौरे से पहले 20 अगस्त, 2014 को मोदी और दलाई लामा के बीच एक मुलाकात हुई जिसके बारे में माना जा रहा है कि वह सुखद नहीं रही. भारत सरकार के सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि उस शाम दलाई लामा को “तकरीबन अपहृत” करके काले शीशे वाली एक अनजान कार में बैठाकर प्रधानमंत्री के आवास 7 रेसकोर्स तक ले जाया गया था.
इस बैठक के बारे में पूछे जाने पर दलाई लामा ने हंसते हुए कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. सूत्रों की मानें तो इस मुलाकात से वे “हिल गए” थे. ऐसा लगता है कि उन्हें लेने के लिए मोदी बाहर नहीं आए, जैसा कि इसके पहले दूसरे प्रधानमंत्री करते रहे हैं. इसके अलावा वे उनसे हिंदी में बात करते रहे जिसका अनुवाद अंग्रेजी में किया गया. दलाई लामा अंग्रेजी में ही जवाब देते रहे. उन दोनों ने चीन समेत तमाम मसलों पर बात की.
ऐसा कहा जा रहा है कि दलाई लामा, उनके सलाहकार और हांगकांग में रहने वाले उनके एक चीनी व्यापारी दोस्त शी जिनपिंग की दिल्ली यात्रा के दौरान दलाई लामा के साथ उनकी मुलाकात की संभावनाओं पर विचार कर रहे थे. माना जा रहा है कि सरकार इस घटनाक्रम से खुश नहीं थी और उसने दलाई लामा के लोगों तक अपनी राय पहुंचा दी थी.
जाहिर है, बीते एक साल में दिल्ली में बहुत कुछ बदला है. नए प्रधानमंत्री को इतिहास के अधूरे अध्यायों को पूरा करने का एहसास है और वे भारत के सबसे बड़े पड़ोसी देश के साथ अच्छे रिश्ते बनाना चाहते हैं, खासकर औद्योगिक निवेश को लेकर उनकी चिंताएं बड़ी हैं. प्रधानमंत्री यह भी जानते हैं कि चीन के साथ एक टिकाऊ रिश्ता दलाई लामा और निर्वासित तिब्बती समुदाय के प्रश्न को अधूरा नहीं छोड़ सकता. इसकी वजह भारत के कूटनीतिक जखीरे में कथित “तिब्बत कार्ड” नाम का हथियार नहीं है, जिस पर वैसे भी दलाई लामा के आगमन के बाद के दशकों के दौरान दिल्ली में पानी फिर चुका है, बल्कि इसलिए क्योंकि चीन का नेतृत्व दलाई लामा को अपनी प्रमुख कम्युनिस्ट पहचान के लिए ही बड़ा खतरा मान रहा है, जो उसके लिए खास महत्व का है.
यह बात सभी मानते हैं कि 1959 में दलाई लामा के तिब्बत से पलायन ने न सिर्फ भारत और चीन के बीच के गिरते रिश्तों को और खराब किया था बल्कि जिसके चलते 1962 में सीमा विवाद पनपा और बाद के दशकों में भी लगातार तनाव जारी रहा. यह आज तक जारी है. आज एक बार फिर जब चीन अपने उभार पर है तो वहां तिब्बत और शिंजियांग की विरोधी संस्कृतियों के खिलाफ नए सिरे से एक राष्ट्रवादी उभार देखने में आ रहा है. चीन में भारत के एक पूर्व राजनयिक नलिन सूरी कहते हैं, “दलाई लामा को लेकर चीन की मुख्य समस्या यह है कि वह चाहता है कि वे स्वीकार कर लें कि तिब्बत हमेशा से चीन का अभिन्न अंग रहा है. कोई भी दलाई लामा इसे स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह ऐतिहासिक रूप से विवादित तथ्य है.”
हिंदी चीनी भाई भाई पार्ट-2
अगस्त 2014 में दलाई लामा से हुई मुलाकात में मोदी शायद यह सोच रहे होंगे कि शी के साथ वे जो नया रिश्ता बनाने जा रहे हैं, उसमें एक 80 साल का बूढ़ा तिब्बती नेता अनावश्यक रूप से खटाई डाल देगा, जिससे वैसे भी चीन के लोग नफरत करना पसंद करते हैं और जो इस देश में रह रहा है. सचाई चाहे जो हो, लेकिन कहा जा रहा है कि चीनी नेतृत्व के साथ अहमदाबाद, दिल्ली, शिआन और बीजिंग में हुए मोदी के संवाद ने उन्हें अपने इस विशालकाय पड़ोसी देश के साथ जटिल रिश्तों की तह में जाने का मौका दिया है और एक खास नजरिया निर्मित करने में मदद की है.
भारत में बहुप्रतीक्षित आर्थिक निवेश को बढ़ाने में चीन काफी उत्साहित नजर आ रहा है लेकिन हाल के वर्षों में उसने सीमा विवाद पर एक “यथास्थितिवादी समाधान” को संज्ञान में लेने से इनकार किया है&वह यह, कि भारत और चीन अपने-अपने इलाकों को अपने नियंत्रण में ही रखें यानी क्रमशः अरुणाचल प्रदेश और अक्साइ चिन को, जैसा कि अतीत में दो बार झाउ एन लाइ और देंग शियाओ पिंग ने तय किया था. इसकी बजाए चीन इस बात पर जोर देता रहा है कि भारत के साथ कोई भी समझौता तवांग समेत अरुणाचल के कुछ और हिस्से को लेकर ही संभव हो पाएगा.
जाहिर है, चीन के हवाले कुछ इलाके करने की राजनैतिक कुव्वत एक ऐसी मजबूत सरकार में ही हो सकती है जिसके पास पर्याप्त बहुमत हो. अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में अक्सर तवांग और तिब्बत के बीच एक “नरम सीमा” की बात उछलती थी&यह जम्मू-कश्मीर में एलओसी को “नरम सीमा” में तब्दील करने के प्रस्ताव जैसी ही थी&जो जल्द ही अपनी स्वाभाविक मौत मर गई. दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच 2003 से लेकर अब तक 18 दौर की वार्ता हो चुकी है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है. इस दौरान चीन की अर्थव्यवस्था कई गुना बढ़ी है जिसने न सिर्फ पूर्वी तटवर्ती इलाकों का कायाकल्प कर डाला है बल्कि चीन के भीतरी इलाकों की भी तस्वीर बदल दी है. पहली बार बीजिंग से ल्हासा की ट्रेन 2006 में शुरू होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने तिब्बत के शहरों में हान चीनियों को बसाना शुरू कर दिया.
अगस्त 2013 में भारतीय वायु सेना ने चीन की सीमा से लगे लद्दाख सेक्टर में दुनिया के सबसे ऊंचे विमान बेस दौलत बेग ओल्डी पर अपना सी-130जे हरक्यूलिस विमान उतार दिया. एक अवकाश प्राप्त भारतीय राजनयिक कहते हैं, “इस हरकत ने चीन को बेहद चौकन्ना कर दिया.” 1962 की हार के बाद से जो दूसरी हवाई पट्टियां बिना इस्तेमाल के बेकार पड़ी हुई थीं, उन्हें दुरुस्त किया गया. यह काम पश्चिमी सेक्टर में चुशूल और पूर्वी सेक्टर में तेजपुर पर किया गया और यहां सुखोई लड़ाकू विमान तैनात कर दिए गए.
एक अवकाश प्राप्त विदेश सचिव कहते हैं, “सवाल यह है कि आप कमजोर दांव के साथ कहीं ज्यादा ताकतवर चीनियों के साथ खेल कैसे खेल सकते हैं? इसका जवाब यह है कि उन जगहों पर अपनी मारक क्षमता को तैनात करिए जिसका पता चीनियों को भी हो.”
मंडारिन भाषा जानने वाले पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन मानते हैं कि दलाई लामा ने “भारत में एक विशिष्ट आध्यात्मिक विरासत को वापस लाने का काम किया है जो बीच की सदियों में गायब हो गई थी और हम उससे वंचित हो गए थे. हम सियासी लाभ या हानि के संदर्भ में दलाई लामा के महत्व या मूल्य को नहीं आंक सकते. इतने बरस उनके यहां रह जाने के बाद मैं गर्व के साथ उनके बारे में कह सकता हूं कि वे भी अब भारत के ही हैं.”
मई में अपने चीन दौरे की पूर्व संध्या पर दलाई लामा से तय मुलाकात को आखिरी वक्त पर रद्द करने वाले मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी अब ऐसा लगता है कि अपनी कट्टर राय पर दोबारा विचार कर रहे हैं. मैकलियोडगंज में 21 जून को हुए दलाई लामा के जन्मदिवस समारोह पर मोदी ने केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू को भेजा था. शर्मा ने कहा, “सरकार परम पूजनीय को आश्वस्त करना चाहेगी कि वह उन्हें सर्वाधिक सम्मान देती है.”
इंडिया टुडे के साथ अपनी बातचीत के अंत में दलाई लामा ने संकेत दिया कि वे शायद दलाई लामा की परंपरा में आखिरी होंगे, जहां यह परंपरा अपने आप खत्म हो जाएगी. वे कहते हैं कि 600 साल पुरानी संस्था को अपने साथ खत्म कर देना कहीं बेहतर होगा (चूंकि वे काफी लोकप्रिय हैं) बजाए इसके कि “15वें दलाई लामा के साथ इसे जारी रखा जाए जो इस संस्था को कहीं कलंकित न कर डाले.”
अपनी इस टिप्पणी के बाद वे बच्चों की तरह खुलकर हंसे, लेकिन वे भीतर से बहुत गंभीर थे. वे शायद ये सारी टिप्पणियां बीजिंग को ध्यान में रखते हुए कर रहे थे ताकि उसे एक अन्य पावन संस्था का अपमान करने देने से महरूम किया जा सके.
चीन के साथ छद्म युद्ध के इस खेल में दलाई लामा के पक्ष में कुछ भी नहीं दिखता, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वे अब भी 80 साल के हैं, हंस-बोल रहे हैं और अपने श्रोताओं को नागार्जुन जैसे नालंदा के दार्शनिकों के संदेशों की ओर प्रवृत्त करने में लगातार जुटे हुए हैं. भारत में और बाकी आजाद विश्व में उनके इतने साल बिताने का शायद यही असल मूल्य है.

