उस विचार का क्या फायदा जो कभी सामने न आए या ऐसा तर्क जो कभी व्यवहार में न आए? ऐसा विचार जो अंकुरित न हो, या ऐसी परिकल्पना, जो दूसरों तक पहुंचाई न जाए? एक
भूले हुए सफर का क्या मकसद रह जाता है, ऐसी कहानी का क्या लाभ जो अनकही रह जाए? ऐसे नायक का क्या, जो कहीं गुमनामी में रह जाए, या ऐसी राह का क्या मतलब, जिसका कभी इस्तेमाल न हुआ हो?
इंडिया टुडे कॉनक्लेव दरअसल विचारों और तर्कों का अनोखा संगम है, उन विचारों और तर्कों का जो तेजी से बदलती दुनिया में सार्थक हो सकते हैं. 13 साल पहले जब इसका सफर शुरू हुआ था तो भारत एक अलग तरह का देश था, जो विविधताओं से भरा था. उस समय हम अवसरों से भरे देश के रूप में विकसित हो रहे थे और थोड़े-से लोग ही सुनहरे सपने देखने की हैसियत रखते थे. आज जब हम विश्व के विलक्षण लोगों और बड़े-बड़े सितारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की स्थिति में आ गए हैं तो आम भारतीय की जबान को कतरा नहीं जा सकता, भले कितनी ही बंदिशें लगा दी जाएं. आज हम बहस कर सकते हैं, झगड़ सकते हैं, विद्रोह तक कर सकते हैं. इस नई दुनिया में, जहां पुरानी व्यवस्था बिखर रही है और नए नेटवर्क अस्तित्व में आ रहे हैं, कॉनक्लेव के 14वें संस्करण में तरह-तरह के दमदार तर्क सामने आए और अनेक क्रांतिकारी तथा चौंकाने वाले विचारों का आदान-प्रदान हुआ.
कश्मीर की नई उम्मीदों के बीच एक नेता ने अपने विचार रखते हुए इसका उत्तर तलाशा कि झंझावातों में फंसी घाटी क्या वास्तव में किसी बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी है, हालांकि इस विषय पर विपरीत विचार भी सुनने को मिले. एक पूर्व सेना प्रमुख की उपस्थिति में एक केंद्रीय मंत्री ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि भारत की ठहरी हुई रक्षा व्यवस्था को बदलने की सक्चत जरूरत है. एक उत्साही अफसरशाह ने श्श्मेक इन इंडिया्य्य की राह में आने वाली बाधाओं की पूरी सूची ही सामने रख दी. एक प्रतिष्ठित सेल्फ हेल्प गुरु ने स्वस्थ जीवन के लिए विज्ञान और सकारात्मक सोच के बीच की रेखा को मिटा दिया. और बॉलीवुड के एक अभिनेता ने बताया कि सिनेमा ने हमारे जीवन को किस तरह प्रभावित किया है.
एक नए तरह के आतंक को बयान करते हुए जीवित बचकर निकल आए लोगों ने कैद में बिताए अपने दिनों की खौफनाक दास्तान सुनाई. उथल-पुथल से भरे देश के प्रमुख ने एक नए अफगानिस्तान के निर्माण की तस्वीर पेश की. विवादित सीमा के दोनों तरफ की कुछ नामी-गिरामी महिलाओं ने दोनों देशों के लोगों को जोड़ने के कुछ मूल्यवान सूत्रों से अवगत कराया. कुछ हास्य कलाकारों ने दूसरों पर हंसी-हंसी में कटाक्ष या व्यंग्य करने के अपने अधिकारों का बचाव किया. दो दिग्गज खिलाड़ियों ने अपनी उन खूबियों से परिचित कराया, जिनकी वजह से वे विश्व चैंपियन बने.
लेकिन तरह-तरह के विचारों वाले दो दिन के इस सम्मेलन में जो मुख्य बात निकलकर सामने आई, वह यह थी कि भारत की तकदीर उसके अपने हाथों में ही है. अंततः हमारे पास एक स्पष्ट दृष्टि है कि हम किस तरह का देश बनना चाहते हैं. अब हमारा सारा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि हम वह लक्ष्य कैसे हासिल करें. भारतीय लोग इस काबिल बनना चाहते हैं कि वे यह कह सकें कि वे क्या चाहते हैं, जो चाहें पहनें, जो खाना चाहें खाएं, जो देखना चाहें देखें, जिसकी पूजा करना चाहें, करें. वे एक ऐसा देश चाहते हैं, जो सुरक्षित हो और जहां महिलाओं तथा पुरुषों के बीच कोई भेदभाव न हो. सब मिल-जुलकर रहें और कंधे से कंधा मिलाकर काम करें. जहां वर्ग के आधार पर सेवाओं में किसी तरह का भेदभाव न किया जाए, जहां श्रम का सम्मान किया जाए, जहां बाजार पर सरकारी मशीनरी की बेड़ियां कतई न हों और जहां तंग दिमाग वाले लोग सिविल सोसाइटी के मुंह पर ताला न जड़ सकें. इतना ही नहीं, हम भारतीय लोग अब अपनी आकांक्षाओं के क्षितिज का दायरा बढ़ाना चाहते हैं.
आजादी और मौकों की धरती के रूप में भारत के तब्दील होने से पहले कई सरहदों को तोडऩे की जरूरत है. कौशल विकास और उद्यमिता राज्य मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने इस कॉनक्लेव में अपनी बात रखते हुए कहा, ''रविवार के वैवाहिक स्तंभों में अक्सर ऐसे दामाद की मांग की जाती है, जो बीए हो, एमए हो, वगैरह, वगैरह. लेकिन जिस दिन मैं किसी विज्ञापन में देखूंगा कि दामाद के रूप में किसी कुशल प्लंबर या इलेक्ट्रीशियन की मांग की गई हो, निश्चित रूप से तब हम कुछ खास हासिल कर चुके होंगे.''
भारत जो चाहता है, वह हमारी पहुंच के अंदर है. लेकिन उसे हासिल करने के लिए हमें अपने बांहों को फैलाने की जरूरत है.

