उन्होंने चार साल तक बात नहीं की. अवसाद (डिप्रेशन) और एकाकीपन के चार साल, जब वे अपना सबकुछ गंवा बैठी थीं. उनकी शादी टूट गई, दोस्त जाते रहे, पीएचडी नामंजूर हो गई, लेखन और संगीत छूट गया. एक के बाद दूसरे डॉक्टरों ने उनकी जांच की और हरेक की राय और इलाज विरोधाभासी थे. उनका घर ऐसी दवाओं से भर गया, जिनके नाम भी वे ठीक से नहीं ले पाती थीं. लेकिन इन दवाओं में से कुछ उन्हें मुर्दों की तरह सुला देतीं और कुछ ने उनके शरीर और मन पर बुरा असर डाला. क्या वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और तर्क करने में समर्थ थीं. कोई इस बारे में कुछ नहीं जानता. जानता है तो बस इतना ही कि वे बिस्तर पर पड़ी रहती थीं. कृशकाय, चुपचाप और भीतर से खाली. अभी उन्होंने जीवन के कुल 30 बसंत ही पूरे किए थे.
क्या हम या हमारे देशवासी उन्हें जानते हैं? वे हर चार में से एक महिला और 10 पुरुषों में एकपुरुष की भीड़ में शामिल हैं. उस भीड़ में शामिल एक और जिंदगी, जो अकेलेपन और हताशा की भेंट चढ़ गई. एक और नष्ट हुआ जीवन, एक और खत्म हो गया व्यक्तित्व. खासकर जीवन के उस दौर में जब वह समाज और देश को बहुत कुछ दे सकता था. 12 करोड़ लोगों के बीच एक और चेहरा. अवसाद के शिकार इतने लोग. महाराष्ट्र जैसे विशालकाय राज्य में समा जाएं, इतने. काम के बोझ और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते. व्यथित मन और मूड से लड़ते. अपनों का दिल तोड़ते, डॉक्टरों के लिए चुनौती बनते. क्या देश को उनकी परवाह है?
यह तो हताशा के समुद्र में डूबे युवाओं का एक मामूली हिस्सा भर है. दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मनोचिकित्सा के प्रोफेसर और केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण के सचिव डॉ. राजेश सागर कहते हैं, ''डिप्रेशन यानी हताशा ऐसा रोग है, जिसके बहुत कम रोगी डॉक्टर के पास आते हैं. सिर्फ 10 फीसदी ही डॉक्टर के पास जाते हैं. 90 फीसदी लोग तो चिकित्सकीय सहायता न मिल पाने की वजह से इस रोग की गिरफ्त में रहते हैं. कइयों के रोग की पहचान ही गलत होती है. बहुत सारे रोगी पुरानी रिपोर्ट और प्रिस्क्रप्शिन साथ लेकर आते हैं. एक से दूसरे डॉक्टर के पास जाते रहते हैं, अपनी परेशानियों के जवाब तलाशते हैं. कइयों को अपने अवसाद की स्थिति का एहसास तक नहीं होता.''
खतरे की घंटी
खुशहाल देश के नागरिकों के लिए यह खतरे की घंटी है. हैप्पीनेस यानी खुशहाली के सर्वेक्षणों में भारत का स्कोर काफी ऊपर रहता है. वर्ष 2014 हैप्पी प्लेनेट इंडेक्स में अपने नागरिकों को लंबा और खुशहाल जीवन देने
में भारत 151 देशों में चौथे नंबर पर था.
अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है, भुगतान संतुलन सुधर रहा है और राजस्व घाटा कम हो रहा है. 2014 के मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स के मुताबिक, 64 फीसदी से भी अधिक भारतीय अपनी नौकरी, काम और निजी जीवन के संतुलन से खुश हैं.
लेकिन यह उल्लास और खुशहाली अपने भीतर एक गहरा राज छिपाए है. अवसाद की विकरालता, जिसकी कोई साफ वजह नजर नहीं आती. यह रोग दिमाग पर कब्जा कर बैठता है, व्यक्तित्व को खा जाता है और जीवन को नष्ट कर देता है. निमहैंस, बंगलुरू में मनोचिकित्सा के प्रोफेसर डॉ. वाइसी जनार्दन रेड्डी कहते हैं, ''क्लिनिकल डिप्रेशन के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय किए गए लक्षणों में से पांच या अधिक लक्षणों का लगातार दो हफ्ते तक बने रहना जरूरी है.'' इनमें हताशा से भरे मूड से लेकर नकारात्मक विचार हावी रहना और नींद, व्यवहार, वजन और भूख में बदलाव शामिल हैं. यहां तक कि भोजन और यौन संबंधों में भी बदलाव देखा गया है. 'डेली' (डिसेबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर ऑर हेल्दी लाइफ लॉस्ट टु प्रिमेच्योर डेथ ऑर डिसेबिलिटी) में आंका जाने वाला यह रोग 1990 में बड़े रोगों का चौथा बड़ा कारण था. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि 2020 तक यह सबसे बड़ा कारण बन जाएगा.
कोई नहीं बचा है इससे
मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल ऐंड मेडिकल रिसर्च सेंटर में मनोचिकित्सा सलाहकार डॉ. अशित शेठ कहते हैं, ''पैसा, जवानी, सफलता और प्रतिष्ठा, इसमें से कुछ भी आपको हताशा के चंगुल से नहीं बचा सकता.'' मरीन ड्राइव स्थित उनके चैंबर में हर रोज विभिन्न आयु वर्ग और पृष्ठभूमि के 15-20 लोग इलाज के लिए आते हैं. रोगियों की विभिन्नता तो कई बार हैरान करने वाली होती है. एक अमीर युवा पारिवारिक झगड़ों में फंसा था. हताशा में वह अपने व्यवसाय की तरफ भी ध्यान नहीं दे पा रहा था. उसकी शिकायत थी, ''मैं हर किसी से भला बना रहता हूं. मुझे कोई नहीं समझता.'' एक बुजुर्ग ने 11वीं मंजिल से कूदने की कोशिश की, लेकिन ऐन मौके पर उनके बेटे ने बचा लिया. परीक्षा से भयाक्रांत 10वीं का होनहार छात्र, बिना कोई ब्रेक लिए लगातार तीन साल तक काम करने वाला बहुराष्ट्रीय कंपनी का अधिकारी, जो अब इतना थक चुका है कि जीवन का आनंद ही नहीं ले पा रहा. छोटे बच्चे की तलाकशुदा मां, जो सुबह बिस्तर से उठ ही नहीं पाती. उसकी कोई भी नौकरी छह माह से ज्यादा नहीं टिक पाती. लॉ का युवा छात्र, जो कनाडा की यूनिवर्सिटी से कोर्स के बीच में ही लौट आया क्योंकि वहां के वातावरण से तालमेल बिठाने में उसे कठिनाई हो रही थी. डॉ. शेठ कहते हैं, ''समाज के संभ्रांत और समृद्ध तबके से आने वाले लोगों ने जीवन में बहुत दुख नहीं उठाए होते. इसलिए जीवन की सचाइयों से सामना होने पर वे उन्हें झेल नहीं पाते.''
अवसाद के रोगियों की तरह इस रोग के भी कई आयाम होते हैं. इस पर जरा गौर करें. लगभग 10-20 फीसदी भारतीय क्लिनिकल अवसाद की गिरफ्त में होते हैं. अब जरा उन मानसिक रोगों पर गौर करें, जो अवसाद की संभावना बढ़ा देते हैं- बाइपोलर डिसऑर्डर और डेमेंशिया से लेकर शिजोफ्रेनिया तक 2-3 भारतीयों को अपनी गिरफ्त में लिए रहते हैं. अब इसमें भावात्मक विकारों के शिकार 10 फीसदी उन रोगियों को भी जोड़ लीजिए, जिनका इलाज नहीं हुआ. इसके अलावा गंभीर रोग जैसे हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और गठिया से पीडि़त रोगी भी हैं. इनसे ग्रस्त लगभग 50 फीसदी रोगी भीषण दुख और हताशा से गुजरते हैं (हृदय रोग और मधुमेह तो अवसाद के जोखिम को तीन गुना कर देते हैं. डायग्नोस्टिक ऐंड स्टेटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर के मुताबिक, ''हमेशा थोड़े-बहुत अवसाद या डिस्थीमिया में रहने वाले लोग भी हैं, जिनमें इसके लक्षण दो साल तक रह सकते हैं. रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाला यह सर्वाधिक सामान्य विकार है, जो प्रत्येक 20 में से एक व्यक्ति को प्रभावित करता है. लगभग 3 फीसदी लोगों में डिस्थीमिक डिसऑर्डर अवसाद के अन्य लक्षणों के साथ मौजूद रहते हैं, जिसे 'डबल डिप्रेशन' भी कहते हैं.
मैंने हार मानी
अवसाद के और भी पहलू हैं. हर चार मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है. भारत में 30 साल से कम उम्र के युवाओं की मौत तो आत्महत्या की वजह से होती है. एक दशक पहले की तुलना में अब यह आंकड़ा चार गुना हो गया है. नई दिल्ली के फोर्टिस हेल्थकेयर में मेंटल हेल्थ केयर ऐंड बिहेवियरल साइंसेस के डायरेक्टर डॉ. समीर पारेख कहते हैं, ''आत्महत्या करने वाले सौ लोगों में से 90 लोग आत्महत्या के समय किसी-न-किसी मानसिक विकार से पीडि़त होते हैं. इनमें भी 75 के पास अवसाद की वजह मामूली ही होती है.''
महानगर मुंबई की एक आंख अगले बड़े लक्ष्य पर टिकी रहती है. दक्षिण मुंबई तो बड़ी संख्या में धनी लोगों के रहने की वजह से देश का सर्वाधिक धनी निर्वाचन क्षेत्र है. लेकिन लगभग एक साल पहले यहां एक अंतिम संस्कार में 800 लोग जुटे थे, जिसके कारण भारी ट्रैफिक जाम लग गया था. वे सभी 32 साल की दीप्ति की याद में जमा हुए थे. एक प्रतिभाशाली और करिश्माई महिला, जो भीषण अवसाद से गुजर रही थी. उसे लगता था कि वह इस दुनिया में अकेली रह गई है. चेहरे पर हमेशा बनी रहने वाली मुस्कान और चमकीली आंखों के कारण सब उससे प्यार करते थे, लेकिन वह खुद को मोटी और बदसूरत मानती थी. मोटापे को दूर करने के लिए वह खीरे और ऑलिव ऑयल की खुराक पर उतर आई. लोगों को समझ ही नहीं आ रहा था कि सबकुछ होते हुए भी वह इतनी अवसादग्रस्त क्यों थी.
यदि आत्महत्या से अवसाद की गहराई का पता चलता है तो इसे दूर करने वाली दवाओं से इस तकलीफ की व्यापकता का. भारत ही नहीं, दुनिया भर में फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बाजार एंटीडिप्रेसेंट (अवसाद दूर करने वाली दवाएं) का ही है. 1990 के दशक में प्रोजेक के बाजार में आने से ऐसी दवाओं के प्रयोग में भारी वृद्धि हुई है. 16 अरब डॉलर की एंटीडिप्रेसेंट दवाओं के बाजार में अकेले अमेरिका में ही इसकी खपत एक तिहाई है. भारत में अवसाद दूर करने वाली दवाओं की खपत बहुत तेजी से बढ़ रही है. फार्मास्युटिकल मार्केट रिसर्च संगठन एआइओसीडी एडब्लूएसीएस के अनुसार 2001 में जहां इसका बाजार 136 करोड़ रु. था, वहीं अब 12 फीसदी की वार्षिक वृद्धि की दर से यह 855 करोड़ रु. का हो गया है.
अकेलेपन की बीमारी
इंटरनेट के अंधेरे कोने में भारत की पहली इमोशनल नेटवर्किंग साइट है—SharingDard.com अजनबी पुरुष और महिलाएं यहां अपना अवसाद बांट रहे हैं. अवसाद काम से लेकर दिल टूटने तक से जुड़ा हुआ है. यह साइट लांच करने का विचार चार आइआइटी छात्रों को तब आया, जब 'आइ एम लोनली' वाक्य को एक दिन में औसतन 46,000 बार सर्च किया गया.
छोटे लोगों का छोटा जीवन हमेशा खबर नहीं बनता. जनवरी, 2015 में एक खबर ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं, ''दीपिका पादुकोण ने अवसाद से लड़ने की निजी लड़ाई के बारे में बताया.'' यह अवसाद इतना गहरा था कि उन्हें मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी. दीपिका के बारे में सामान्य प्रतिक्रिया यही हो सकती है कि ''आखिर आप क्यों अवसादग्रस्त हैं? आपके पास हर चीज है.'' लेकिन अवसाद का सरोकार किसी चीज के होने या न होने से नहीं है.
सामाजिक मनोविज्ञानी आशीष नंदी कहते हैं, ''इसकी वजह शहरों में बढ़ता एकाकीपन है. नौकरी, सूचना, मनोरंजन और दुनिया में सफलता की कसौटी माने जाने वाले मानकों में हमारा जीवन जितना उलझता जाएगा, अंतरंगता के लिए उतनी कम जगह बचेगी. और जो हमें वास्तव में प्यार करते हैं, उनके साथ जीवन के सुख-दुख बांटने की संभावना उतनी ही कम होगी.'' आज शहरों में बहुत भीड़ हो गई है, फिर भी लोग अकेले हैं. तलाक के मामले बढ़ रहे हैं. एक ही बच्चे वाले दंपतियों की संख्या बढ़ रही है. एमआइटी में सोशल स्टडीज ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी की प्रोफेसर शैरी टर्कल ने 2011 में प्रकाशित अपनी पुस्तक अलोन टुगेदर: व्हाय वी एक्सपेक्ट मोर फ्रॉम टेक्नोलॉजी ऐंड लेस फ्रॉम ईच अदर में लिखा है कि इस तरह धीरे-धीरे संबंधों की डोर कमजोर हो जाती है और हम 'व्यस्तता' का जीवन जीते हुए अधिक काम करते हैं, कम सोते हैं और टेक्नोलॉजी को ही अंतरंगता का जरिया बना लेते हैं.
नाजुक मिजाज युवा
एम्स के टीचिंग ब्लॉक में चौथी मंजिल के कमरा नंबर 4090 में 22 वर्षीय डॉक्टर अपनी डायरी के पन्ने पलट रही है. डॉक्टर मंजू मेहता मनोचिकित्सा की प्रोफेसर हैं. यह डायरी उनके पेशे का अभिन्न अंग है. उनकी विशेषज्ञता कॉग्निटिव बिहेवियर थैरेपी (सीबीटी) है. यह साइकोलॉजिकल थैरेपी है, जहां डॉक्टर अवसादग्रस्त और नकारात्मक विचारों वाले रोगियों को दुराग्रहपूर्ण सोच के चंगुल से छुड़ाने का प्रयास करते हैं. डॉ. मेहता के पास आने वाली एक युवा महिला है. प्रेम संबंध के कटु अंत के बाद वह बेहद हताश थी. उसके माता-पिता उस पर कहीं और शादी करने का भी दबाव भी बना रहे थे. डॉ. मेहता कहती हैं, ''सीबीटी के जरिए हमने उसकी परेशानी कम करने की कोशिश की. उसका आत्मविश्वास बढ़ाने का प्रयास किया. दवाओं का प्रश्न तो बाद में उठता है. हो सकता है, उसे इसकी जरूरत पड़े, हो सकता है कि न भी पड़े.'' अब उस युवा महिला ने अपनी एक डायरी बना ली है. उसे जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उन्हें वह एक डायरी में नोट करती है और उनका हल ढूंढ़ती है. मिसाल के तौर पर उसे अपनी मां को बताना पड़ता है कि अभी वह शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है. अभी उसे काफी कुछ सीखना है. डॉ. मेहता इसके लिए लाइफ स्टाइल मैनेजमेंट का सुझाव देती हैं क्योंकि अपर्याप्त नींद और श्रम की कमी व्यक्ति की चयापचय प्रक्रिया (मेटाबोलिक प्रोसेस) को सुस्त कर उसे अवसाद की ओर धकेल देती है.
युवा जिस आसानी से अवसाद और आत्महत्या की गिरफ्त में आ रहे हैं, वह डॉ. समीर पारेख के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. वर्ष 2000 में जब उन्होंने प्रैक्टिस शुरू की थी, तभी से वे स्कूली बच्चों के साथ काम कर रहे हैं. अपने अस्पताल के सहयोग से वे इस समस्या को गहराई से जानने के लिए दिल्ली और आसपास के स्कूलों का सर्वेक्षण करते आ रहे हैं. पिछले कुछ साल के सर्वेक्षणों के आधार पर उन्हें बच्चों में अवसाद के कई स्तर देखने को मिले. इनमें खुद को नुक्सान पहुंचाने से लेकर आत्महत्या करने जैसे लक्षण नजर आए. वे कहते हैं, ''2012 में 13 से 19 साल तक के किशोरों में से 45 फीसदी में हताशा के लक्षण सामने आए. इनसे निबटने के लिए वे एल्कोहल या मादक पदार्थों का सेवन करते थे. पूछने पर 75 फीसदी छात्रों की शिकायत थी कि स्कूल में मजाक उड़ना या झगड़ा तनाव की मुख्य वजह थी.''
उदासी का विज्ञान
हैरत की बात है कि वैज्ञानिकों को इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि आखिर हताशा होती ही क्यों है. बेंगलूरू में नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेस में सेंटर फॉर ब्रेन डेवलपमेंट ऐंड रिपेयर चलाने वाले डॉ. सुमंत्र चटर्जी कहते हैं, ''यह सिर्फ दिमाग के एक ही हिस्से को प्रभावित नहीं करता, बल्कि दिमाग की कई गतिविधियों पर असर डालता है.'' ब्रेन इमेजिंग अध्ययन बताते हैं कि हताशा से ग्रस्त व्यक्तियों के मस्तिष्क के अगले भाग प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स में असामान्य रूप से धीमी गतिविधियां पाई गईं. इनमें किसी चीज को समझना, योजना बनाना और सही फैसले लेना शामिल है. जबकि प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स का आधा दायां हिस्सा नकारात्मक विचार स्थापित करने में शामिल पाया गया. यह हताशा से ग्रस्त लोगों में कमजोरी का संकेत है. चटर्जी कहते हैं, ''मस्तिष्क के मध्य में हिप्पोकैंपस भावनाओं का केंद्र होता है और यह बहुत सिकुड़ जाता है. यह भावनाओं, मूड और याद्दाश्त को नियमित करता है. मूड को नियंत्रित करने में तीन न्यूरोट्रांसमीटर महत्वपूर्ण होते हैं—डोपामाइन, नोरपाइनफ्राइन और सैरोटोनिन. अवसाद से ग्रस्त रोगियों में इन्हें अधिक सक्रिय पाया गया. चटर्जी कहते हैं, ''अवसाद में मॉलेक्यूल्स और न्यूरॉन के बीच जो 'संवाद' चलता है, उससे सामान्य मस्तिष्क का नेटवर्क असंतुलित हो जाता है.''
यह तर्क भी दिया जाता है कि क्या अवसाद वंशानुगत होता है? चटर्जी की राय है, ''हम जानते हैं कि गहन हताशा के मुख्य कारण हमारे परिवेश से जुड़े होते हैं यानी जीवन की नकारात्मक घटनाएं और तनाव पर नियंत्रण न कर पाना उनमें प्रमुख है.'' लेकिन माना जाता है कि वंशानुगत कारकों का भी योगदान होता है. क्लिनिकल प्रैक्टिस में डॉक्टरों के पास ऐसे रोगी भी आते हैं, जिनके यहां आत्महत्या या बाइपोलर डिसऑर्डर का पारिवारिक इतिहास होता है. चटर्जी कहते हैं, ''तो वंशानुगत योगदान को नकारा नहीं जा सकता. हालांकि अभी तक हम ऐसे जींस की तलाश नहीं कर पाए हैं, जो अवसाद से गहरे जुड़ी हो.''
नतीजतन, 'हर मर्ज के लिए एक दवा' तैयार करने वाली व्यवस्था यहां सफल नहीं रही. इसलिए एक के बाद दूसरी दवाएं तैयार करने वाला विज्ञान 1970 के दशक में वैलियम और 1990 के दशक में प्रोजेक के बाद इस मामले में कमोबेश स्थिर ही रहा है. लेकिन जेनेटिक टेस्टिंग और अवसाद के पीछे छिपी जटिल जैव संरचना को सीक्वेंसिंग ऐंड एडिटिंग से समझा जा सकता है. सिर्फ टेक्नोलॉजी ही नहीं, नई थ्योरियां भी सामने आ रही हैं. वैज्ञानिक इस पर शोध कर रहे हैं कि अवसाद किसी बीमारी का लक्षण है, अपने आप में कोई बीमारी नहीं. मोटापा और तनाव (खासकर अकेलेपन से उपजा) ऐसे कारण हैं, जो मस्तिष्क को बीमार कर देते हैं. डाइजेस्ट न्यूरो पर्सपेक्टिव के मुताबिक कुछ ही वर्षों में अत्यधिक तनाव वाली दवाएं बाजार में आ सकती हैं.
खुशी कैसे आई
वह किसी खास घटना की वजह से अवसाद से ग्रस्त नहीं हुई थी. न ही उसके परिवार में किसी को यह बीमारी थी. वह कक्षा 11 की छात्रा थी, जब उसे अहसास हुआ कि उसके साथ कुछ गलत हो गया है. चंडीगढ़ की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत 29 वर्षीया आकृति कश्यप याद करती हैं, ''मेरे साथ कुछ बड़ी गड़बड़ हुई. मैं ठीक से सो नहीं पाती थी. मैंने लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया. अपना ख्याल रखना छोड़ दिया. मैं हताशा के गर्त में गहरे डूब गई थी.''
हालांकि बचपन से वह अवसाद के बारे में शिकायत करती थी, लेकिन माता-पिता ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया. वे बताती हैं, ''हमारे देश के दूसरे माता-पिता की तरह मेरे व्यवसायी पिता और गृहिणी मां ने इसके लिए मुझे ही दोषी ठहराया. दुख की बात है कि आज भी वे यही समझते हैं कि अवसाद से उबरने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति की ही जरूरत होती है.''
कश्यप जब 2005 में इंजीनियरिंग की छात्रा थीं तो पहले चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन ऐंड रिसर्च के मनोचिकित्सक के पास गईं. तब तक हालात बिगड़ चुके थे. आज एक दशक बाद भी उनका इलाज चल रहा है. वे कहती हैं, ''डॉक्टर ने मुझे दूसरा जीवन दिया है. मुझे जीवन भर ये दवाएं लेनी पड़ेंगी और ऐसे दिन भी देखने पड़ेंगे, जब दवा लेने के बावजूद मैं खुश नहीं रहूंगी.'' उन्हें सिर्फ इस बात का अफसोस है कि उनका इलाज समय पर नहीं हो पाया. वे कहती हैं, ''इससे मैं काफी कष्ट उठाने से बच जाती.''
अवसाद को पूरी तरह ठीक तो नहीं किया जा सकता, लेकिन इस पर काबू पाया जा सकता है. कम-से-कम डॉक्टरों की तो यही राय है. लेकिन इस उम्मीद से परे भी बहुत कुछ है. हर डॉक्टर को लोगों में नई मानसिकता दिखती है. एक सांस्कृतिक बदलाव जो लोगों को अपनी समस्याएं सामने रखने को प्रोत्साहित कर रहा है. मेडिकल टेक्नोलॉजी में भी काफी विकास हो रहा है. डॉ. सागर कहते हैं, ''अब बाजार में ऐसी नई दवाएं उपलब्ध हैं, जिनके दुष्प्रभाव बहुत कम होते हैं. ये बहुत प्रभावी हैं. खासकर तब जब कड़ी निगरानी में दी जाएं. पहले हमारे पास बहुत अधिक संख्या में रोगी आते थे. वह भी तब, जब उनका रोग पुराना होकर जड़ें जमा लेता था.'' डॉक्टर शेठ की राय है, ''अब अस्पताल में दाखिल होने वाले रोगियों की संख्या में कमी आई है. इलेक्ट्रिक शॉक वाले इलाज भी कम हुए हैं'' सीबीटी हालांकि समय लेने वाला इलाज है, लेकिन अवसाद के रोगियों के लिए यह बहुत कारगर है. कुछ मनोवैज्ञानिक टेस्ट, प्रोफाइलिंग और साइकोथेरेपी के अलावा हाइपनोसिस, रिलेक्सेशन ट्रेनिंग और ग्रुप थैरेपी भी राहत देने वाली होती है.
क्या भारत को है चिंता?
भारत में पर्याप्त संख्या में डॉक्टर नहीं हैं. देश में 8,500 मनोचिकित्सकों और 6,750 मनोवैज्ञानिकों की कमी है. इसके अलावा 22,600 सामाजिक कार्यकर्ताओं और 2,100 नर्सों की जरूरत है. देश ने तो यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि आजादी के छह दशक बाद असल में कितने लोग मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं.
सिर्फ विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक ही यह देश सर्वाधिक 'अवसाद ग्रस्त' देश है. 36 फीसदी अवसाद की दर वाकई डराने वाली है. रिपोर्ट को गलत बताकर भारत ने अब अपना सर्वेक्षण शुरू कर दिया है.
देश में आधिकारिक तौर पर स्वीकृत मानसिक स्वास्थ्य नीति नहीं है. यहां तक कि अक्तूबर, 2014 तक तो कागज पर भी इसका वजूद नहीं था. इसी समय मानसिक रोगों से जुड़ी बदनामी और आत्महत्या को रोकने के लिए नीति तैयार की गई. मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक अभी संसद में ही है, जिसमें ऐसे रोगियों की देखभाल और अधिकारों के संरक्षण का प्रावधान है. सरकार अपने स्वास्थ्य बजट का दसवां हिस्सा ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए रखती है. खास बात यह है कि पूरी दुनिया में भारत ही ऐसा देश है, जहां स्वास्थ्य पर जीडीपी का सबसे कम प्रतिशत खर्च होता है. अब दिसंबर, 2014 में स्वास्थ्य बजट में 20 फीसदी कटौती के बाद कैसे हालात होंगे, इसकी कल्पना ही की जा सकती है.
दुनिया भर के देशों में मनोविकार तेजी से फैलते जा रहे हैं. जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हो रहा है, रोगों में वृद्धि भी उसी अनुपात में हो रही है. महानगर आखिरकार एकाकीपन का केंद्र होते हैं. यहां मानसिक समस्याएं तेजी से पनपती हैं. 2050 तक भारत में तेजी से शहरीकरण हो चुका होगा तो क्या इससे जुड़ी समस्याएं हताशा और अवसाद निकट भविष्य में शहरीकरण का दूसरा नाम होगा?
(—साथ में सुकांत दीपक)
डिप्रेशन: दबे पांव आ पहुंची महामारी
उल्लास में झूमता दिखता यह मुल्क अपने अंदर उदासी और अकेलेपन का एक गंभीर मर्ज छिपाए है. दिमाग को अपने काबू में ले लेने वाला यह मर्ज हमारे व्यक्तित्व को खा जाता है, जीवन में घुन लगा देता है, स्वीकारने में फिर भी हिचक.

अपडेटेड 24 फ़रवरी , 2015
Advertisement
Advertisement
