scorecardresearch

जिनसे बदल गया राजनीति का चेहरा

16वीं लोकसभा में पहली बार चुनकर आए 315 सांसद पेशे और शख्सियत से भले ही जुदा हों, लेकिन सियासत की डोर उन्हें एक करती है. ये नए नवेले सांसद न सिर्फ देश की जनता के दिल में उठी बदलाव की लहर की निशानी हैं, बल्कि वे राजनीति पर छाने की खुद की ख्वाहिश के भी प्रतीक हैं.

अपडेटेड 25 अगस्त , 2014
एक पूर्व विधायक जिसके पास अपने मतदाताओं के जन्मदिन और शादी की सालगिरह का पूरा ब्योरा है. एक पूर्व राज्यमंत्री जो हिंदी पर पकड़ मजबूत करने से पहले दिल्ली के तौर-तरीके सीख गया है. राजपरिवार का एक साधारण सदस्य जो नागरिक उड्डयन मंत्री होने के बावजूद हवाई अड्डों पर लाइन में खड़ा होता है.

एक पूर्व पुलिस आयुक्त जिसने खाकी छोड़कर रंगीन कुर्ते और गन्ना किसानों के बकाया के भुगतान का मुद्दा उठाया है. एक पूर्व सेनाध्यक्ष, एक पूर्व गृह सचिव, पांच पूर्व मुख्यमंत्री, दर्जनों किसान, कारोबारी और सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, डाक्टर, शिक्षक, मनोरंजन जगत के प्रतिनिधि. ये सब आपस में बिल्कुल वैसे ही अलग हैं, जैसे इनके पेशे एक-दूसरे से जुदा हैं. लेकिन वे सब राजनीति की डोर से बंध गए हैं.

इस साल जब भारत के सियासी धरातल की तस्वीर बदली और तीन दशक बाद किसी राजनैतिक दल को पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता मिली, तब यही नेता राजनैतिक परिवर्तन के सेनानी हैं. स्त्री-पुरुषों की यह जमीन अतीत से पिंड छुड़ाती दिखती है. 16वीं लोकसभा के ये नए-नवेले सांसद न सिर्फ देश की जनता के दिल में उठी बदलाव की लहर की निशानी हैं, बल्कि वे राजनीति पर छाने की खुद की ख्वाहिश के भी प्रतीक हैं.

315 की संख्या अपने आप में रिकॉर्ड नहीं है. 1967, 1977 और 1980 में इससे कहीं अधिक सांसद पहली बार लोकसभा में चुनकर आए थे. 2009 में भले ही कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई हो लेकिन तब भी 302 सांसद पहली बार चुने गए थे. बहरहाल 2014 का चुनाव इसलिए भी अलग है क्योंकि इस बार दिल्ली की गद्दी को दिल्ली से बाहर का शख्स चुनौती दे रहा था. इन 315 में से ही एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के बाद इस मुद्दे पर जोर दिया था.

बदली नेतागीरी
अपने मतदाताओं के जन्मदिन और शादी की सालगिरह का हिसाब रखने वाले पूर्व विधायक का उदाहरण ही ले लें. 51 साल के ओम बिड़ला राजस्थान में कोटा से चुनकर आए हैं. तीन बार के बीजेपी विधायक बिड़ला पहली बार जीते सांसद के बारे में बनी धारणाओं से अलग हैं. भारतीय जनता युवा मोर्चा के छात्र कार्यकर्ता के रूप में राजनैतिक जीवन की शुरुआत करने वाले बिड़ला कई भावी सांसदों के सलाहकार हो सकते हैं और उन्हें चुनाव जीतने के एक-दो गुर भी सिखा सकते हैं.

बूथ स्तर पर अपने चुनाव प्रचार के प्रबंधन में इस्तेमाल तरीकों का जिक्र करते हुए बिड़ला कहते हैं कि वे आज भी जन्म दिन, शादी की सालगिरह और लोगों की बरसी का पता लगाने के लिए इसका उपयोग करते हैं. अपने मतदाताओं के संपर्क में रहने के लिए उन्हें इन अवसरों पर मौजूद रहना होता है.

अपने चुनाव प्रबंधन सॉफ्टवेयर की नुमाइश करते हुए बिड़ला ने बताया, ‘‘इस डाटाबेस में मेरे पास वोटरों की सारी जरूरी जानकारी है और सॉफ्टवेयर मुझे नई से नई जानकारी देता रहता है. मैं इन अवसरों पर उन्हें बधाई संदेश भेजता हूं या फोन करता हूं या खुद जाकर उन्हें शुभकामनाएं देता हूं. इससे मुझे अपने मतदाताओं से बेहतर संपर्क रखने में मदद मिलती है.’’

लेकिन बिड़ला मैनेजर से राजनेता नहीं बने हैं जो टेक्नोलॉजी और साधनों के दम पर चुनाव जीतते हैं. असल में वे तो खांटी राजनेता हैं जो नीचे से ऊपर आए हैं. पहला विधानसभा चुनाव लडऩे और जीतने से पहले 2003 तक वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे और अब उन्हें लोकसभा में पार्टी का सचेतक नियुक्त किया गया है. वे सदन के नये स्वरूप की आदत डाल रहे हैं जहां विभिन्न संस्कृतियों से आए सदस्य अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं.

एक और नए सांसद जो राज्य स्तर पर कामयाबी पा चुके हैं, उनका नाम है मोहन कुंदिडय़ा. गुजरात से बीजेपी के 62 साल के सांसद चार बार के विधायक हैं और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री रह चुके हैं. दिल्ली में कुंदडिय़ा का हिंदी में पकड़ भले ही तंग हो लेकिन सांसद के रूप में अपनी नई भूमिका से वे अच्छी तरह परिचित हैं.

हाइ स्कूल तक पढ़े और खेती को अपना पेशा बताने वाले इस सांसद ने मोदी सरकार के शपथग्रहण करने के कुछ हफ्ते बाद कृषि भवन में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह से मुलाकात की जो खुद चार बार लोकसभा के सदस्य रहे हैं. वे सरकार की कृषि बीमा योजना में फालतू बातों की तरफ  इशारा करना चाहते थे. वहां जाकर पता चला कि मंत्री महोदय को तब तक इस विषय की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी.

ओम बिड़ला और मोहन कुंदडिय़ा जैसे नेताओं का चुनाव लोकसभा में 315 नए सांसदों की उपस्थिति को महत्वपूर्ण राजनैतिक संदर्भ देता है. कम-से-कम 122 पहली बार के सांसद विधायक रह चुके हैं यानी करीब 40 फीसदी नए सांसद चुनाव लड़ चुके हैं. इनमें से पांच मुख्यमंत्री रह चुके हैं. लोकसभा में उनका प्रवेश उनकी राजनैतिक यात्रा में तार्किक प्रगति कहा जा सकता है. परिवर्तन में यह निरंतरता का पुट है.
नए सांसद
शाही आम आदमी
अपने चुनाव प्रचार में मोदी ने इस लड़ाई को यूपीए की खानदानी राजनीति को चुनौती का रंग देने का एक भी मौका नहीं छोड़ा. इसके बावजूद कम-से-कम पहली बार 95 सांसद ऐसे चुनकर आए जिनके निकट संबंधी या रिश्तेदार पहले से राजनीति में हैं. छह नए सांसदों का संबंध भारत के रजवाड़ों से है जो एक अलग तरह की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं और कुछ विद्वानों के खानदानी लोकतंत्र के सिद्धांत की पुष्टि कर रहे हैं.

कुलीन खानदान के ये छह नए सांसद हैं-अशोक गजपति राजू (टीडीपी, विजयनगरम), महबूब अली कैसर (लोकजनशक्ति पार्टी खगडिय़ा), नागेंद्र सिंह (बीजेपी, खजुराहो), अरका केशरी सिंह (बीजेडी, कालाहांडी), हेमेंद्र चंद्र सिंह (बीजेडी, कंधमाल) और कुंवर सर्वेश कुमार (बीजेपी, मुरादाबाद). इनमें से राजू, कैसर, नागेंद्र सिंह और कुंवर सर्वेश कुमार को अपने-अपने राज्यों में अच्छा-खासा विधायी अनुभव है. राजू को राष्ट्रीय राजनीति में आते ही नागरिक उड्डयन मंत्री बना दिया गया.

राजू सात बार विधायक रहे हैं और उन्होंने पहला चुनाव 1978 में जनता पार्टी की उम्मीदवारी पर जीता था. फिर तेलुगु देशम पार्टी बनी तो उसमें शामिल हो गए. वे एनटी रामाराव और चंद्रबाबू नायडू के मंत्रिमंडल में आबकारी, राजस्व और वित्त मंत्री रह चुके हैं. आम धारणा है कि राजवंशी सत्ता के तेवर आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन विजयनगरम के इस राजा ने खुद को हमेशा पीछे रखा है. टीडीपी की तरफ से मोदी मंत्रिमंडल के लिए मनोनीत किए जाने तक दिल्ली में बहुत कम लोग जानते थे कि वे शाही परिवार के सदस्य हैं.

तेलुगु देशम पार्टी संसदीय दल कार्यालय के सचिव सत्यनारायणन ने बताया, ‘‘हमें यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ. सत्र के दौरान वे सदन की बैठक शुरू होने से पहले हमेशा संसद में पार्टी कार्यालय में आते हैं और आम कार्यकर्ताओं, नेताओं तथा मेहमानों से मिलने के बाद ही अपने संसदीय कार्य पूरे करते हैं.

इससे पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा का प्रमाण मिलता है.’’ राजू अपने साधारण तौर-तरीकों के लिए सुर्खियों में रहे हैं जबकि पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री हवाई अड्डों पर अति विशिष्ट व्यक्ति की सुविधा और सम्मान पाने की जिद करे तब अगर मौजूदा मंत्री सुरक्षा जांच की कतार में खड़ा हो और टर्मिनल के बीच तथा विमान तक आने-जाने के लिए लोगों के साथ बस में चढ़े तो किसे हैरानी नहीं होगी.

राजू का मानना है कि राजनीति में हिस्सा लेने के इच्छुक लोगों पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए क्योंकि एजेंडा व्यक्ति नहीं राजनैतिक दल तय करते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि भारत राजवंशी लोकतंत्र बनेगा. प्रधानमंत्री के पद पर नरेंद्र मोदी का चुनाव इसका प्रमाण है.’’

दिल्ली और नागरिक उड्डयन मंत्री तक अपने राजनैतिक सफर को भी राजू खास अहमियत नहीं देते. उनका कहना है, ‘‘मैं लंबे समय तक आंध्र प्रदेश में विधायक रहा. आठ बार चुनाव लड़ा और सात बार जीता. इसलिए संसदीय प्रक्रिया के लिए नया नहीं हूं. फर्क बस इतना है कि राज्यों की तुलना में यहां विषय कुछ अलग हैं. मैं राज्य में सरकार में और विपक्ष में भी रहा हूं, इसलिए सब देखा-सुना है.’’
सत्यपाल सिंह
(बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह)
खुलती खिड़कियां
अगर पुराने राजपरिवारों के सदस्य चुनाव में हिस्सा लेकर अपना दबदबा कायम रखना चाहते हैं, तो सरकारी नौकरी करने वाले कुछ लोगों ने भी राजनीति में शामिल होकर अपना कद बढ़ाने की कोशिश की है. लोकसभा में पहली बार चुनकर आए सांसदों में 15 सरकारी सेवा में रह चुके हैं. पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह और पूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह सबसे नामी हस्ती हैं.

बीजेपी में शामिल होने से पहले ये दोनों सेवानिवृत्त हो चुके थे, लेकिन सत्यपाल सिंह ने मुंबई पुलिस आयुक्त का पद छोड़कर जनवरी में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और बीजेपी में शामिल होकर राजनीति में शान से कदम रखा.

सत्यपाल सिंह को 2 फरवरी को मेरठ में एक विशाल रैली में बीजेपी में शामिल किया गया था. रैली को मोदी ने संबोधित किया था. मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पुत्र और केंद्रीय मंत्री अजित सिंह को बागपत में हराया. पूर्व पुलिस प्रमुख ने दशकों से पहनी अपनी खाकी वर्दी उतार कर संसद में रंगीन कुर्ते पहनना शुरू कर दिया है और देखने से लगता है कि वे संसद की कार्यवाही को गंभीरता से लेते हैं. उन्होंने लोकसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाया का मुद्दा उठाया.

सत्यपाल सिंह का कहना था, ‘‘मैं सीख गया हूं कि राजनेता होना कितनी मेहनत का काम है. दिनरात काम करना पड़ता है. ‘‘उनका यह भी कहना था कि संसद में सीखने को बहुत कुछ है. अकसर सभी दलों के नेता काम के सुझव देते हैं. उनका मानना है कि पूर्व सरकारी अफसर नीतियों और कानूनों को लागू करने के गुर बताकर चर्चा में योगदान कर सकते हैं.  
बीजेपी सांसद मोहन कुंदडिया
(बीजेपी सांसद मोहन कुंदड़िया)
राजनीति का पेशा
यह भले ही संयोग हो लेकिन इस चुनाव में अच्छी-खासी तादाद में सेठ भी लोकसभा में चुनकर आए हैं. खुद प्रधानमंत्री पद के बीजेपी दावेदार मोदी कारोबार समर्थक नारे पर सवार होकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे हैं. 65 पहली बार सांसद कारोबारी हैं और 68 कथाकथित किसानों के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा समूह है.

रबिंद्र कुमार जेना (बीजेडी, बालेश्वर), केसीनेनी श्रीनिवास (टीडीपी, विजयवाड़ा) और कुंवर हरिवंश सिंह, (अपना दल, प्रतापगढ़) जैसे नए सांसदों के पास राजनैतिक जीवन का कोई खास अनुभव नहीं है. जेना खनन व्यवसायी हैं तो श्रीनिवास ट्रासंपोर्टर हैं और हरिवंश सिंह रियल एस्टेट का कारोबार करते हैं.

जेना के चाचा राजनीति में थे. लेकिन उद्योग में काम करते हुए उन्होंने कभी राजनीति में आने की इच्छा का संकेत नहीं दिया. 1990 में ट्रेनी के रूप में शुरुआत की और 2011 में वे बालेश्वर अलॉयज लिमिटेड के एमडी थे. उनका दावा है कि उनके सामाजिक कार्य को देखकर बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक ने उन्हें लोकसभा चुनाव में ओडिसा कांग्रेस के नेता, केंद्रीय मंत्री श्रीकांत जेना के विरुद्ध टिकट दे दिया. रबिंद्र कुमार जेना ने केंद्रीय मंत्री को हरा तो दिया, लेकिन उससे पहले कांग्रेस के नेता ने उन पर खनन घोटाले में शामिल होने के खूब आरोप लगाए.

रबिंद्र कुमार जेना ने बताया, ‘‘मैंने राजनीति में आने के बारे में कभी नहीं सोचा था. जब मैं राजनीति में नहीं था तो श्रीकांत जेना से अच्छे संबंध थे. लेकिन जब उन्हें पता चला कि मुझे उनके खिलाफ टिकट मिलेगा तो वे मेरे विरोधी हो गए और आरोप लगाने लगे.’’ वे इस बात से भी इनकार नहीं करते कि कुछ लोग कारोबारी हितों को आगे बढ़ाने के लिए राजनैतिक हैसियत का सहारा ले सकते हैं.

विश्लेषकों को कारोबार जगत के अनुभव वाले लोगों के इतनी बड़ी तादाद में राजनीति में आने पर कोई हैरानी नहीं है. उनकी राय में इससे पता चलता है कि कारोबारी उम्मीदवारों को राजनीति में कितना फायदा दिखाई देता है. अशोका विश्वविद्यालय में राजनीति के सहायक प्रोफेसर गिलिस वर्नियर्स का कहना है, ‘‘कई मायनों में टिकट पाने की होड़ खुद चुनावी मुकाबले से अधिक खूंखार होती है. अधिकतर दलों में उम्मीदवारों को अपने प्रचार का खर्च उठाने के साथ-साथ पार्टी फंड में भी पैसा देना पड़ता है.

उन्हें कई बार तो बहुत पहले से राजनीति में प्रवेश के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है ताकि वे राजनैतिक दलों की नजरों में आ सकें. ऐसे हालात में कारोबार जगत से इतने नए खिलाडिय़ों के राजनीति में आने से कोई हैरानी नहीं होती. इतने सारे पूर्व विधायकों के चुनाव जीतने पर भी हैरानी नहीं होती.’’
टीडीपी सांसद केसीनेनी श्रीनिवास
(टीडीपी सांसद केसीनेनी श्रीनिवास)
प्रोफेशनल और समाजसेवी
कानूनी पेशा और कुछ हद तक शिक्षा जगत हमेशा से राजनीति की पौध तैयार करता रहा है. लेकिन इस बार 315 में से पहली बार चुने गए 19 नए सांसद डॉक्टर हैं जबकि 31 वकील और 15 शिक्षक हैं. मनोरंजन जगत के पेशेवर प्रतिनिधियों की संख्या 12 है जिनमें किरण खेर, परेश रावल, बाबुल सुप्रियो और मुनमुन सेन शामिल हैं. इसके उलट सिर्फ सात पहली बार के सांसदों ने राजनीति को अपना पेशा बताया है. असल में राजनेता अपने आप को सामाजिक कार्यकर्ता या किसान बताना पसंद करते हैं. इस बार 37 पहली बार के सांसदों ने अपना पेशा सामाजिक कार्य बताया है.

खानदानों और शाही परिवारों के सदस्यों, पूर्व सरकारी अफसरों और पेशेवर कर्मियों के प्रवेश से सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने लोगों या सड़कों पर भिडऩे वालों के कारनामों पर कोई असर नहीं पड़ा है. वे ही असली राजनैतिक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने यूनिवर्सिटी की राजनीति या युवा राजनीति अथवा मजदूर यूनियन में पापड़ बेले हैं. 16वीं लोकसभा के पहली बार के सांसदों में उनकी गिनती कम नहीं है.

इस श्रेणी पर सरसरी नजर डालें तो युवा कांग्रेस नेता राजीव सातव, भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता हरीश द्विवेदी, उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र नेता बल्का सुमन और एमटीएनएल मजदूर संघ नेता अरविंद सामंत जैसे नाम दिखाई पड़ते हैं. इसमें ऐसे भी लोग होंगे जिन्होंने 70 के दशक में जयप्रकाश के छात्र आंदोलन में हिस्सा लिया होगा, लेकिन संसद में प्रवेश 2014 में किया.

सातव और द्विवेदी युवा राजनीति में नीचे से ऊपर आए हैं और विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. या यों कहें कि वे राजनीति की शास्त्रीय परंपरा की उपज हैं. हालांकि बल्का सुमन सिर्फ  आंदोलन में भागीदारी से लोकसभा का टिकट पा गए. उस्मानिया विश्वविद्यालय के इस छात्र नेता ने तेलंगाना आंदोलन में हिस्सा लिया और पेडापल्ली से चुनाव लडऩे से पहले टीआरएस की छात्र शाखा के अध्यक्ष बने. इन चुनावों में तेलंगाना में अलग राज्य की मांग उठाने वालों को खास तवज्जो मिली.

दक्षिण मुंबई में कांग्रेस के मिलिंद देवड़ा को हराकर आए सावंत किसी भी मुद्दे पर हमेशा सड़क पर उतरने को तैयार रहते हैं. नए महाराष्ट्र सदन में इसकी बानगी देखने को मिली जब उन्होंने साथी शिवसेना सांसदों के संग मिलकर वहां ठहरे नए सदस्यों के लिए सुविधाओं की कमी का आरोप लगाते हुए कोहराम मचाया. सांप्रदायिक रंग ले चुके इस भद्दे विवाद पर सावंत ने कहा, ‘‘हम अन्याय सहन नहीं करते. बाला साहब ने हमें यही सिखाया है.’’
Advertisement
Advertisement