भारत की विदेश रणनीति के चरम उत्कर्ष के तौर पर 2005 और 2006 को हमेशा याद किया जाएगा. ये ऐसे वर्ष थे जब अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने आखिरी मौके पर भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी के तहत उसे अहम रियायतें दीं और ऐतिहासिक एटमी करार 18 जुलाई, 2005 को कर डाला. पहली बार ऐसा हुआ कि अमेरिका और रूस, दोनों ने मिलकर न्यूक्लियर आपूर्तिकर्ता समूह जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत के हितों को आगे बढ़ाने का काम किया. चीन ने भी हालात को भांपते हुए भारत की ओर कदम बढ़ाए और साल भर के भीतर भारत के साथ सीमा विवाद को सुलझाने के लिए समझौता करने का वादा कर डाला था.
आज जब इन बातों को एक दशक बीत चुका है, तो परिदृश्य कुछ निराशाजनक है. लगातार दो साल से जीडीपी की वृद्धि दर पांच फीसदी से नीचे के स्तर पर बनी हुई है, एटमी करार पूरा होने के बावजूद जवाबदेही अधिनियम के चलते पटरी से उतर चुका है, सिद्धांतों की अपनी-अपनी व्याख्या के चलते चीन के साथ सीमा विवाद पर वार्ता गतिरोध का शिकार हो चुकी है और व्यापार संबंधी व्यवस्थाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं क्योंकि पश्चिमी देश खेल के नियमों को बदलने के लिए नई वैश्विक संधियों को लागू करने की कवायद कर रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय माहौल भी इस बीच काफी बदल चुका है. अपने रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के उद्देश्य से रूस यथास्थिति पर सवाल खड़ा करने को तैयार दिखता है जबकि अमेरिका उसका जवाब देने को बेताब है. ऐसे में भारत जैसे देशों के लिए कठिन सवाल पैदा हो गया है कि किसका साथ लें. अफगानिस्तान समेत पश्चिमी एशिया से मध्य एशिया तक सुरक्षा के हालात नाजुक बने हुए हैं और पाकिस्तान का भविष्य अनिश्चय में लटका है क्योंकि वहां के आतंकी समूहों ने पंजाब तक अपने पैर पसार लिए हैं.
ऐसे निर्णायक वक्त में भारतीय जनता ने अतीत से रिश्ता तोड़ते हुए करीब दो दशकों में इस बार सर्वाधिक निर्णायक जनादेश दे डाला है. यहीं एक अवसर है जो अंधेरे में एक रोशनी का काम कर सकता है.
बहुमत का असर
मोदी सरकार के लिए राजनैतिक रूप से स्थिर भारत ही उसकी विदेश नीति की सबसे बहुमूल्य थाती है. वास्तव में यह इकलौता कारक था जिससे हर पड़ोसी देश ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का न्योता स्वीकार किया और मोदी को पहले ही दिन से शीर्षस्थ स्तर पर संवाद करने का मौका मिला.
इसकी प्रतीकात्मक उपयोगिता को एक किनारे रख दें तो लोकसभा में 280 सीटों का आंकड़ा मोदी को निर्णय लेने में ज्यादा स्पष्टता व सहजता प्रदान कर रहा है जो भारत के कई सहयोगियों के लिहाज से एक राहत की बात होगी. लेकिन यहीं मोदी के ऊपर एक जिम्मेदारी भी आ जाती है कि वे बाहर के देशों के साथ रिश्तों को कुछ इस तरह से तय करें जो भारत के अनुकूल हो और युवा आबादी की बढ़़ती महत्वाकांक्षाओं को भी संबोधित कर सके. यानी विदेश नीति के आधार पर एक ऐसा आर्थिक एजेंडा गढ़ा जाए जो भारत को अहम वैश्विक खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर सके.
इसे साकार करने के लिए चार रणनीतिक साझेदारियां निर्णायक होंगी-अमेरिका, रूस, चीन और जापान के संग. इनमें से प्रत्येक के साथ द्विपक्षीय साझेदारी को गुणात्मक रूप से परिवर्तित करना भारत के आर्थिक भविष्य के लिहाज से अनिवार्य होगा, खासकर जो अपने हित में नए व्यापारिक इंतजाम को प्रभावित कर सके. एक ऐसे वक्त में जबकि ये ताकतें एक-दूसरे के खिलाफ तनी हुई हैं, ऐसा कर पानाकूटनीतिक चुनौती होगी.

अमेरिका के साथ रिश्ते
यह स्पष्टतः सबसे अहम शक्ति संतुलन का रिश्ता है. बीजेपी सरकार ने इसे काफी शुरुआत में ही भांप लिया था जब इराक में जंग छिड़ी और भारतीयों को वहां से वापस लाने का सवाल उठा. दिल्ली को आइएसआइएस के स्थानीय कमांडरों के साथ संवाद का एक पुल चाहिए था और इसका सबसे विश्वसनीय स्रोत सऊदी अरब या कतर के जरिए हो सकता था. भारत के हालांकि इन देशों से अच्छे संबंध हैं, लेकिन गुप्तचर सहयोग दूसरे तरीके से काम करते हैं जहां वॉशिंगटन का एक इशारा अकेले किसी अभियान में काफी वजन डाल देता है. माना जाता है कि इराक से भारतीय नर्सों को वापस लाने में ये माध्यम काफी अहम साबित हुए थे.
लेकिन यह साझेदारी धीरे-धीरे सियासी दिशाहीनता का शिकार हो गई है. रक्षा और आर्थिक सहयोग का विस्तार करने के मामले में भारत के ढुलमुलपन को लेकर अमेरिका निराश रहता है. यूपीए-2 के दौर में अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने की हर पहल पर घरेलू राजनीति में प्रतिक्रिया होती थी जिससे अविश्वास और बढ़ जाता था. मनमोहन सिंह को कांग्रेस के भीतर मौजूद वाम रुझान वाली आवाजों से प्रतिरोध झेलना पड़ा, तो मोदी को यह रिश्ता आगे बढ़ाने में संघ परिवार की ओर से दिक्कतें आएंगी. चूंकि संसद में बीजेपी का बहुमत किसी भी संभावित प्रतिरोध को शांत करने में सक्षम है, लिहाजा मोदी के पास एक अवसर है कि वे एटमी करार को वापस पटरी पर ला सकते हैं, रक्षा सहयोग के लिए नए दरवाजे खोल सकते हैं और एक मजबूत आर्थिक साझेदारी की ठोस नींव रख सकते हैं.
रूस के साथ संतुलन
इस साल के अंत में नाटो फौज की संभावित वापसी के मद्देनजर जब अफगानिस्तान अपने भविष्य का खाका खींच रहा है, तो ऐसे में भारत के लिए अपने पुराने सहयोगी रूस के साथ रिश्ता बहाल करना अहम हो गया है. यूपीए सरकार के सत्ता से बाहर जाने के दो माह पहले ही दोनों देशों ने एक गोपनीय करार किया था जिसके तहत अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों की मौजूदगी कम होने के बाद अफगान नेशनल आर्मी को हथियार मुहैया करवाए जाएंगे. इस व्यवस्था के अनुसार रूस उपकरण मुहैया कराएगा और भारत उसका खर्च भरेगा.
रूस के साथ विशिष्ट किस्म के रिश्ते का यह बस एक उदाहरण है. ऐसा भरोसा और समझदारी रक्षा, अंतरिक्ष, एटमी और ऊर्जा आदि संवेदनशील क्षेत्रों में भी मौजूद है. फिर भी मोदी के सामने एक चुनौती है-इस अनिवार्य रिश्ते को उन अवसरों के साथ कैसे संतुलित किया जाए जिनका दोहन अमेरिका से किया जाना है. अमेरिका चाहता है कि यूक्रेन में मॉस्को अपनी भूमिका के चलते एक राजनैतिक कीमत अदा करे और जैसे-जैसे व्लादीमिर पुतिन का हठ इस मामले में बढ़ता जा रहा है, सहयोग के लिए अमेरिका भारत पर और ज्यादा निर्भर होता जाएगा. दिल्ली में मौजूद एक मजबूत सरकार अपने लाभ में इस स्थिति को भुना सकती है लेकिन यहीं मोदी की राजनैतिक और कूटनीतिक समझदारी की परीक्षा भी होनी है.

(मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग)
चीन की दीवार
भारत के लिए चीन खतरा भी है और अवसर भी है. मोदी को मिला 280 सीटों का जनादेश उन्हें मौका देता है कि वे सीमा विवाद पर वार्ता को आगे बढ़ाएं. चीन के साथ रिश्तों का मुख्य आधार तो आर्थिक संवाद ही होगा. मोदी ने खुद इस बारे में कहा है लेकिन उन्हें इस द्विपक्षीय रिश्ते पर आंच डालने वाले सुरक्षा मसलों से पहले निपटना होगा. द्विपक्षीय व्यापार चूंकि असमान रूप से चीन के हित में है, लिहाजा भारत को साहसिक और अलोकप्रिय किस्म के कुछ फैसले लेने होंगे ताकि बीजिंग को बुनियादी ढांचा क्षेत्र में दीर्घावधि निवेशों पर वचनबद्ध किया जा सके. एक सरकारी सूत्र बताते हैं, आधुनिक चीन का निर्माण अधिकांश जापान के निवेश से हुआ था. क्या भारत ऐसा रणनीतिक कदम उठा सकता है? भारत के पास जापान समेत और भी विकल्प मौजूद हैं लेकिन चीन का विकल्प उसे सस्ता पड़ेगा. दीर्घावधि निवेशों के चलते द्विपक्षीय रिश्तों में चीन की हिस्सेदारी गुणात्मक रूप से बढ़ जाएगी, विवादित मसलों पर संवाद के लिए दोनों के बीच संभावना बढ़ेगी. पर मोदी के लिए यह मौका जोखिम भरा है.
जापान के साथ तालमेल
अगर कोई अन्य प्रधानमंत्री जापान के अपने दौरे की घोषणा करके आखिरी मौके पर उसे रद्द कर देता और मेजबान देश को सबसे पहले इसकी खबर मीडिया से लगती, तो कूटनीतिक जगत में बवाल मच जाता लेकिन मोदी सस्ते में छूट गए. उनकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी प्रधानमंत्री कार्यालय के इस फैसले से काफी हताश थीं लेकिन जापान के प्रधानमंत्री को खूबसूरत शब्दों में लिखे मोदी के एक पत्र ने इस नुकसान की भरपाई कर डाली.
जाहिर है, मोदी जापान से पर्याप्त परिचित हैं और यही उनके लिए बड़ा अवसर है. वास्तविक परिणामों, व्यापार संधियों और प्रत्याशित कारोबारी माहौल पर केंद्रित मोदी का आर्थिक कूटनीति का एजेंडा टोक्यो में जाकर पहली पनाह पा सकता है. हालांकि चीन और जापान दोनों के साथ आर्थिक राह खोलने के कुछ रणनीतिक नतीजे भी सामने आएंगे. पूर्वी एशिया में गहराते और तीखे होते राजनैतिक विभाजन के मद्देनजर मोदी के सामने कहीं ज्यादा प्रतिकूल वातावरण होगा जिससे निपटने की चुनौती उनके सामने होगी.
तात्कालिक खतरा
इस रणनीतिक समीकरण में हालांकि अनिश्चय का एक ही कारक है रू पाकिस्तान-अफगानिस्तान का केंद्रीय मंच. मोदी के शपथ ग्रहण समारोह से कई दिन पहले हेरात के वाणिज्यिक दूतावास में भारतीय कर्मचारियों को बंधक बनाए जाने की घटना उस खतरे को रेखांकित करती है जो इस इलाके में काम कर रही आतंक की मशीनरी से मोदी के एजेंडे को है. अगर बंधक बनाने की मंशा कामयाब हुई होती तो शपथ ग्रहण की सुर्खियां कुछ और ही होतीं जो राजनैतिक स्थिरता के संदेश को फीका कर देतीं.
बड़ी ताकतों के साथ भारत की कामयाब कूटनीति पाकिस्तान की सरकार से उसे निपटने का हौसला दे सकती है, शांति प्रक्रिया की राह भी खोल सकती है लेकिन इससे प्रतिक्रिया की भी आशंका है. हमने देखा है कि 2005-06 में रिश्तों की बहाली का सिला 26/11 के आतंकी हमलों के रूप में 2008 में मिला था और अफगानिस्तान में तमाम भारतीय परिसंपत्तियों पर भी हमलों की कोशिश हुई थी. कैसे तय हो कि भारत में आतंकी हमले करने वाले उसकी कीमत भी चुकाएं. बड़ी ताकतों के साथ सुरक्षा सहयोग और आंतरिक सुरक्षा में सुधार इस दिशा में शुरुआती कदम हो सकते हैं, लेकिन मोदी जानते हैं कि इस मामले में हम बहुत वक्त गंवा चुके हैं.
संभावनाओं का दोहन
एक ऐसी नीति बनाना और उसे लागू करना जो इन प्रत्येक साझीदारियों का प्रभावी दोहन कर सके, एक तरीके से घरेलू राजनैतिक ताकत को अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक ताकत में तब्दील करने का रोडमैप होगा जो पड़ोस में और दूसरे देशों में भारत को देखे जाने के नजरिए पर असर डालेगा.
ऐसा लगता है कि मोदी पहले ही इस दिशा में सोच रहे हैं. साल बीतने से पहले वे जापान और अमेरिका का दौरा कर चुके होंगे जबकि चीन और रूस के राष्ट्रपति भारत का दौरा करके जा चुके होंगे. वे ब्रिक्स में पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से पहले ही मुलाकात कर चुके हैं.
आज जब इन बातों को एक दशक बीत चुका है, तो परिदृश्य कुछ निराशाजनक है. लगातार दो साल से जीडीपी की वृद्धि दर पांच फीसदी से नीचे के स्तर पर बनी हुई है, एटमी करार पूरा होने के बावजूद जवाबदेही अधिनियम के चलते पटरी से उतर चुका है, सिद्धांतों की अपनी-अपनी व्याख्या के चलते चीन के साथ सीमा विवाद पर वार्ता गतिरोध का शिकार हो चुकी है और व्यापार संबंधी व्यवस्थाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं क्योंकि पश्चिमी देश खेल के नियमों को बदलने के लिए नई वैश्विक संधियों को लागू करने की कवायद कर रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय माहौल भी इस बीच काफी बदल चुका है. अपने रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के उद्देश्य से रूस यथास्थिति पर सवाल खड़ा करने को तैयार दिखता है जबकि अमेरिका उसका जवाब देने को बेताब है. ऐसे में भारत जैसे देशों के लिए कठिन सवाल पैदा हो गया है कि किसका साथ लें. अफगानिस्तान समेत पश्चिमी एशिया से मध्य एशिया तक सुरक्षा के हालात नाजुक बने हुए हैं और पाकिस्तान का भविष्य अनिश्चय में लटका है क्योंकि वहां के आतंकी समूहों ने पंजाब तक अपने पैर पसार लिए हैं.
ऐसे निर्णायक वक्त में भारतीय जनता ने अतीत से रिश्ता तोड़ते हुए करीब दो दशकों में इस बार सर्वाधिक निर्णायक जनादेश दे डाला है. यहीं एक अवसर है जो अंधेरे में एक रोशनी का काम कर सकता है.
बहुमत का असर
मोदी सरकार के लिए राजनैतिक रूप से स्थिर भारत ही उसकी विदेश नीति की सबसे बहुमूल्य थाती है. वास्तव में यह इकलौता कारक था जिससे हर पड़ोसी देश ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का न्योता स्वीकार किया और मोदी को पहले ही दिन से शीर्षस्थ स्तर पर संवाद करने का मौका मिला.
इसकी प्रतीकात्मक उपयोगिता को एक किनारे रख दें तो लोकसभा में 280 सीटों का आंकड़ा मोदी को निर्णय लेने में ज्यादा स्पष्टता व सहजता प्रदान कर रहा है जो भारत के कई सहयोगियों के लिहाज से एक राहत की बात होगी. लेकिन यहीं मोदी के ऊपर एक जिम्मेदारी भी आ जाती है कि वे बाहर के देशों के साथ रिश्तों को कुछ इस तरह से तय करें जो भारत के अनुकूल हो और युवा आबादी की बढ़़ती महत्वाकांक्षाओं को भी संबोधित कर सके. यानी विदेश नीति के आधार पर एक ऐसा आर्थिक एजेंडा गढ़ा जाए जो भारत को अहम वैश्विक खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर सके.
इसे साकार करने के लिए चार रणनीतिक साझेदारियां निर्णायक होंगी-अमेरिका, रूस, चीन और जापान के संग. इनमें से प्रत्येक के साथ द्विपक्षीय साझेदारी को गुणात्मक रूप से परिवर्तित करना भारत के आर्थिक भविष्य के लिहाज से अनिवार्य होगा, खासकर जो अपने हित में नए व्यापारिक इंतजाम को प्रभावित कर सके. एक ऐसे वक्त में जबकि ये ताकतें एक-दूसरे के खिलाफ तनी हुई हैं, ऐसा कर पानाकूटनीतिक चुनौती होगी.

अमेरिका के साथ रिश्ते
यह स्पष्टतः सबसे अहम शक्ति संतुलन का रिश्ता है. बीजेपी सरकार ने इसे काफी शुरुआत में ही भांप लिया था जब इराक में जंग छिड़ी और भारतीयों को वहां से वापस लाने का सवाल उठा. दिल्ली को आइएसआइएस के स्थानीय कमांडरों के साथ संवाद का एक पुल चाहिए था और इसका सबसे विश्वसनीय स्रोत सऊदी अरब या कतर के जरिए हो सकता था. भारत के हालांकि इन देशों से अच्छे संबंध हैं, लेकिन गुप्तचर सहयोग दूसरे तरीके से काम करते हैं जहां वॉशिंगटन का एक इशारा अकेले किसी अभियान में काफी वजन डाल देता है. माना जाता है कि इराक से भारतीय नर्सों को वापस लाने में ये माध्यम काफी अहम साबित हुए थे.
लेकिन यह साझेदारी धीरे-धीरे सियासी दिशाहीनता का शिकार हो गई है. रक्षा और आर्थिक सहयोग का विस्तार करने के मामले में भारत के ढुलमुलपन को लेकर अमेरिका निराश रहता है. यूपीए-2 के दौर में अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने की हर पहल पर घरेलू राजनीति में प्रतिक्रिया होती थी जिससे अविश्वास और बढ़ जाता था. मनमोहन सिंह को कांग्रेस के भीतर मौजूद वाम रुझान वाली आवाजों से प्रतिरोध झेलना पड़ा, तो मोदी को यह रिश्ता आगे बढ़ाने में संघ परिवार की ओर से दिक्कतें आएंगी. चूंकि संसद में बीजेपी का बहुमत किसी भी संभावित प्रतिरोध को शांत करने में सक्षम है, लिहाजा मोदी के पास एक अवसर है कि वे एटमी करार को वापस पटरी पर ला सकते हैं, रक्षा सहयोग के लिए नए दरवाजे खोल सकते हैं और एक मजबूत आर्थिक साझेदारी की ठोस नींव रख सकते हैं.
रूस के साथ संतुलन
इस साल के अंत में नाटो फौज की संभावित वापसी के मद्देनजर जब अफगानिस्तान अपने भविष्य का खाका खींच रहा है, तो ऐसे में भारत के लिए अपने पुराने सहयोगी रूस के साथ रिश्ता बहाल करना अहम हो गया है. यूपीए सरकार के सत्ता से बाहर जाने के दो माह पहले ही दोनों देशों ने एक गोपनीय करार किया था जिसके तहत अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों की मौजूदगी कम होने के बाद अफगान नेशनल आर्मी को हथियार मुहैया करवाए जाएंगे. इस व्यवस्था के अनुसार रूस उपकरण मुहैया कराएगा और भारत उसका खर्च भरेगा.
रूस के साथ विशिष्ट किस्म के रिश्ते का यह बस एक उदाहरण है. ऐसा भरोसा और समझदारी रक्षा, अंतरिक्ष, एटमी और ऊर्जा आदि संवेदनशील क्षेत्रों में भी मौजूद है. फिर भी मोदी के सामने एक चुनौती है-इस अनिवार्य रिश्ते को उन अवसरों के साथ कैसे संतुलित किया जाए जिनका दोहन अमेरिका से किया जाना है. अमेरिका चाहता है कि यूक्रेन में मॉस्को अपनी भूमिका के चलते एक राजनैतिक कीमत अदा करे और जैसे-जैसे व्लादीमिर पुतिन का हठ इस मामले में बढ़ता जा रहा है, सहयोग के लिए अमेरिका भारत पर और ज्यादा निर्भर होता जाएगा. दिल्ली में मौजूद एक मजबूत सरकार अपने लाभ में इस स्थिति को भुना सकती है लेकिन यहीं मोदी की राजनैतिक और कूटनीतिक समझदारी की परीक्षा भी होनी है.

(मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग)
चीन की दीवार
भारत के लिए चीन खतरा भी है और अवसर भी है. मोदी को मिला 280 सीटों का जनादेश उन्हें मौका देता है कि वे सीमा विवाद पर वार्ता को आगे बढ़ाएं. चीन के साथ रिश्तों का मुख्य आधार तो आर्थिक संवाद ही होगा. मोदी ने खुद इस बारे में कहा है लेकिन उन्हें इस द्विपक्षीय रिश्ते पर आंच डालने वाले सुरक्षा मसलों से पहले निपटना होगा. द्विपक्षीय व्यापार चूंकि असमान रूप से चीन के हित में है, लिहाजा भारत को साहसिक और अलोकप्रिय किस्म के कुछ फैसले लेने होंगे ताकि बीजिंग को बुनियादी ढांचा क्षेत्र में दीर्घावधि निवेशों पर वचनबद्ध किया जा सके. एक सरकारी सूत्र बताते हैं, आधुनिक चीन का निर्माण अधिकांश जापान के निवेश से हुआ था. क्या भारत ऐसा रणनीतिक कदम उठा सकता है? भारत के पास जापान समेत और भी विकल्प मौजूद हैं लेकिन चीन का विकल्प उसे सस्ता पड़ेगा. दीर्घावधि निवेशों के चलते द्विपक्षीय रिश्तों में चीन की हिस्सेदारी गुणात्मक रूप से बढ़ जाएगी, विवादित मसलों पर संवाद के लिए दोनों के बीच संभावना बढ़ेगी. पर मोदी के लिए यह मौका जोखिम भरा है.
जापान के साथ तालमेल
अगर कोई अन्य प्रधानमंत्री जापान के अपने दौरे की घोषणा करके आखिरी मौके पर उसे रद्द कर देता और मेजबान देश को सबसे पहले इसकी खबर मीडिया से लगती, तो कूटनीतिक जगत में बवाल मच जाता लेकिन मोदी सस्ते में छूट गए. उनकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी प्रधानमंत्री कार्यालय के इस फैसले से काफी हताश थीं लेकिन जापान के प्रधानमंत्री को खूबसूरत शब्दों में लिखे मोदी के एक पत्र ने इस नुकसान की भरपाई कर डाली.
जाहिर है, मोदी जापान से पर्याप्त परिचित हैं और यही उनके लिए बड़ा अवसर है. वास्तविक परिणामों, व्यापार संधियों और प्रत्याशित कारोबारी माहौल पर केंद्रित मोदी का आर्थिक कूटनीति का एजेंडा टोक्यो में जाकर पहली पनाह पा सकता है. हालांकि चीन और जापान दोनों के साथ आर्थिक राह खोलने के कुछ रणनीतिक नतीजे भी सामने आएंगे. पूर्वी एशिया में गहराते और तीखे होते राजनैतिक विभाजन के मद्देनजर मोदी के सामने कहीं ज्यादा प्रतिकूल वातावरण होगा जिससे निपटने की चुनौती उनके सामने होगी.
तात्कालिक खतरा
इस रणनीतिक समीकरण में हालांकि अनिश्चय का एक ही कारक है रू पाकिस्तान-अफगानिस्तान का केंद्रीय मंच. मोदी के शपथ ग्रहण समारोह से कई दिन पहले हेरात के वाणिज्यिक दूतावास में भारतीय कर्मचारियों को बंधक बनाए जाने की घटना उस खतरे को रेखांकित करती है जो इस इलाके में काम कर रही आतंक की मशीनरी से मोदी के एजेंडे को है. अगर बंधक बनाने की मंशा कामयाब हुई होती तो शपथ ग्रहण की सुर्खियां कुछ और ही होतीं जो राजनैतिक स्थिरता के संदेश को फीका कर देतीं.
बड़ी ताकतों के साथ भारत की कामयाब कूटनीति पाकिस्तान की सरकार से उसे निपटने का हौसला दे सकती है, शांति प्रक्रिया की राह भी खोल सकती है लेकिन इससे प्रतिक्रिया की भी आशंका है. हमने देखा है कि 2005-06 में रिश्तों की बहाली का सिला 26/11 के आतंकी हमलों के रूप में 2008 में मिला था और अफगानिस्तान में तमाम भारतीय परिसंपत्तियों पर भी हमलों की कोशिश हुई थी. कैसे तय हो कि भारत में आतंकी हमले करने वाले उसकी कीमत भी चुकाएं. बड़ी ताकतों के साथ सुरक्षा सहयोग और आंतरिक सुरक्षा में सुधार इस दिशा में शुरुआती कदम हो सकते हैं, लेकिन मोदी जानते हैं कि इस मामले में हम बहुत वक्त गंवा चुके हैं.
संभावनाओं का दोहन
एक ऐसी नीति बनाना और उसे लागू करना जो इन प्रत्येक साझीदारियों का प्रभावी दोहन कर सके, एक तरीके से घरेलू राजनैतिक ताकत को अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक ताकत में तब्दील करने का रोडमैप होगा जो पड़ोस में और दूसरे देशों में भारत को देखे जाने के नजरिए पर असर डालेगा.
ऐसा लगता है कि मोदी पहले ही इस दिशा में सोच रहे हैं. साल बीतने से पहले वे जापान और अमेरिका का दौरा कर चुके होंगे जबकि चीन और रूस के राष्ट्रपति भारत का दौरा करके जा चुके होंगे. वे ब्रिक्स में पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से पहले ही मुलाकात कर चुके हैं.

