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शिवराज सिंह चौहान बैठे रह गए और व्यापम घोटाला बढ़ता गया

व्यापम घोटाला बढ़ता गया और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बैठे रह गए. इस घोटाले में 500 करोड़ रु. का हो सकता है 1,000 मेडिकल सीटों का सौदा. शिवराज सिंह के पूर्व पीए से लेकर उनकी पत्नी साधना सिंह तक का नाम इस घोटाले में उछल रहा है. ऐसे में क्या शिवराज सिंह चौहान व्यापम घोटाले में धृतराष्ट्र बने रहे? पढ़िए पूरी पड़ताल.

अपडेटेड 17 जुलाई , 2014
सर आर यू इन डी (द) होटल?” 24 मई, 2012 को दोपहर 12.15 बजे व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) घोटाले के फरार आरोपी सुधीर शर्मा के मोबाइल पर 9425185550 नंबर के मोबाइल से एसएमएस आता है. इसके करीब दो घंटे बाद दोपहर 2.43 बजे इसी नंबर से देरी के लिए मनुहार करता हुआ दूसरा एसएमएस बीप हुआ, “सर ओ (ऑन) डी (द) वे, शैल रीच इन 10 मिनट्स. (सर, रास्ते में हूं, 10 मिनट में पहुंच रहा हूं.)” शर्मा के सामने ‘सर-सर’ करने वाले ये साहब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के प्रमुख सचिव और वरिष्ठ आइएएस अधिकारी एस.के. मिश्र हैं. मध्य प्रदेश एसटीएफ के पास मौजूद शर्मा के एसएमएस कॉल डिटेल के इस हिस्से की प्रति इंडिया टुडे के पास है.

मुख्यमंत्री का सबसे विश्वस्त नौकरशाह उस व्यापम घोटाले के आरोपी से हद दर्जे की विनम्रता के साथ बातचीत कर रहा है, जिस घोटाले में अब तक मध्य प्रदेश के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा समेत 450 से ज्यादा गिरफ्तारी हो चुकी हैं; जिस मामले में आरएसएस के दिग्गज नेता सुरेश सोनी और मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों उमा भारती और दिग्विजय सिंह का नाम उछल चुका है; जिस घोटाले में शिवराज का चहेता पूर्व पीए प्रेमचंद्र प्रसाद आरोपी है; जिस मामले में दर्जनों महिलाओं को अपने दुधमुंहे बच्चों के साथ जेल जाना पड़ाः जिस घोटाले में कोई 1,000 मेडिकल छात्रों के एडमिशन रद्द कर दिए गए. पुलिस चार्जशीट के मुताबिक, एक-एक सीट पर लगे पैसे को आधार मानें तो सिर्फ मेडिकल सीटों में 500 करोड़ रु. के लेनदेन का हिसाब बनता है. बड़ी बात यह कि इस घोटाले को लेकर सीएम अपनी पत्नी साधना सिंह की कथित भूमिका को लेकर लगातार सफाई देते फिर रहे हैं, जिसके बारे में अभी कोई भी पुख्ता सबूत सामने नहीं आया है (देखें बातचीत).

एसटीएफ से मिले नए दस्तावेज व्यापम घोटाले को मुख्यमंत्री की दहलीज के और पास ले आते हैं. इससे पहले उनके निजी सचिव रहे प्रेमचंद्र प्रसाद व्यापम घोटाले में आरोपी बनाए जा चुके हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने गलत तरीके से प्री मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) में अपनी बेटी अनीता का दाखिला कराया.

वैसे एस.के. मिश्र और सुधीर शर्मा के करीबी रिश्तों को इस नजर से भी देखा जा सकता है कि मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव बनने से पहले मिश्र खनन विभाग के प्रमुख सचिव थे, जबकि सुधीर शर्मा बीजेपी शासन में शिशु मंदिर के शिक्षक से बढ़कर खनन माफियाओं में शुमार होने लगा था.
शिवराज सिंह और उनकी पत्नी साधना
शिवराज बैठे रहे, घोटाला बढ़ता गया
लेकिन कुछ दिन पहले तक अपनी जगुआर से भोपाल की सड़कों पर धूल उड़ाने वाले स्थूलकाय शर्मा हैं कहां? लेकिन वही क्या, व्यापम घोटाले के कई आरोपी गायब हैं. थोड़ा पीछे जाएं तो पता चलता है कि इस मामले में पहली आधिकारिक शिकायत जुलाई 2009 में इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के सीनियर रेजिडेंट डॉ. आनंद राय ने की. इसके बाद जुलाई 2011 में विधायक राधेलाल बघेल ने विधानसभा में सवाल उठाया कि 2008, 2009, 2010 और 2011 में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में धांधली में क्या कार्रवाई हुई? तब चौहान ने सदन को पहली बार बताया, “जानकारी एकत्रित की जा रही है.” वहीं नवंबर 2011 में विधायक पारस सकलेचा के सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री 2009 की पीएमटी में हुई धांधली के बारे में बोले, “भविष्य में इस तरह के फर्जी प्रवेश को रोकने के लिए व्यावसायिक परीक्षा मंडल द्वारा वर्ष 2011 से परीक्षार्थियों का बायोमीट्रक थंब इंप्रेशन कराया जाता है.” यहीं मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता सत्यदेव कटारे आरोप लगाते हैं, “असल में मुख्यमंत्री कर कुछ भी नहीं रहे थे.

घोटालेबाजों को पता था कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा. इसीलिए घोटाला कैंसर की तरह अपना दायरा बढ़ाता रहा.” व्यापम के दस्तावेज इसकी तस्दीक करते हैं (देखें चार्ट). आगे चलकर पीएमटी-2011 में ही 98 मेडिकल छात्रों के एडमिशन फर्जीवाड़े के कारण रद्द करने पड़े. घोटालेबाजों ने सीएम को मुंह चिढ़ाया और 2012 में 286 और 2013 में 439 फर्जी मेडिकल दाखिले हुए.

घोटालेबाज किस कदर बेधड़क होकर अपना काम कर रहे थे, इसकी बानगी इंदौर पुलिस की चार्जशीट में मिलती है, “आरोपी सुधीर राय ने दिनांक 1 अगस्त, 2013 को अपने मेमोरेंडम में बताया कि मैंने अपनी मेल आइडी से जो 14 लड़कों की लिस्ट संतोष गुप्ता को व्यापम से सेट कराकर नकल कराकर पास कराने हेतु भेजी थी एवं 75 लाख रु. नकद दिए थे एवं इन्हीं पीएमटी के पैसों से मैंने कैप्टीवा कार खरीदी.” पुलिस की चार्जशीट में मामूली माली हालत वाले लोगों के बीच करोड़ों रु. के लेनदेन की बातें ऐसे हो रही हैं, जैसे कोई आलू-प्याज खरीद रहा हो.

इन हालात पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव चुटकी लेते हैं, “यानी पूरा व्यापम बिक गया और मुख्यमंत्री के कान पर जूं तक नहीं रेंगी.” यही नहीं, इसी दौरान घोटालेबाजों ने एडमिशन के साथ ही सरकारी नौकरियों के दायरे में भी इत्मीनान से कदम रख दिया. इसके दायरे में व्यापम से होने वाली कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी और माप-तौल इंस्पेक्टर की नियुक्तियां, पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा 2012, दारोगा के लिए पुलिस भर्ती परीक्षा 2012, संविदा शाला शिक्षक ग्रेड दो और ग्रेड तीन की नियुक्तियां भी आ गईं. इन पदों पर 200 से ज्यादा नियुक्तियां रद्द की जा चुकी हैं (देखें चार्ट).

ये सब तो वे आंकड़े हैं जो कुबूल किए जा चुके हैं. लेकिन घोटाले ने अपने पैर समूह तीन और समूह चार की भर्ती करने वाले व्यापम से आगे बढ़ाकर आला अफसरों की भर्ती करने वाले मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) तक बढ़ा दिए. फर्जी भर्तियों की जांच तो अभी शुरुआती चरण में है, आगे चलकर बड़े पैमाने फर्जी भर्तियां सामने आने का अंदेशा है. इस मामले में मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता के.के. मिश्र ने तो सीधे मुख्यमंत्री की भतीजी को ही गलत तरीके से डिप्टी कलेक्टर बनाने के आरोप जड़ दिए और मुख्यमंत्री ने मिश्र के ऊपर मानहानि का मुकदमा डालकर अपनी इज्जत बनाने की कोशिश की है.
भोपाल एसटीएफ कार्यालय में पेश होते व्यापम के आरोपी छात्र
(भोपाल एसटीएफ कार्यालय में पेश होते व्यापम के आरोपी छात्र)
कैसे हुई थी शुरुआत
मुख्यमंत्री के लिए मामला भले ही प्रतिष्ठा का हो लेकिन जिन अभिभावकों के बच्चे मेहनत करने के बावजूद पीएमटी में सलेक्ट नहीं हो पा रहे थे, उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था. ऐसे ही अभिभावकों में भोपाल के आनंद प्रकाश और नागदा के अभय चोपड़ा शामिल थे. इसके अलावा डॉ. आनंद राय ने भी जुलाई, 2009 में पहली बार पीएमटी का पर्चा लीक होने की शिकायत पुलिस में की थी. बाद में डॉ. जगदीश सागर को 14 जुलाई, 2013 में मुंबई से गिरफ्तार किया गया. डॉ. राय पूरा किस्सा बयान करते हैं, “उस समय मैं अपने काम में व्यस्त था और डॉक्टरों की एसोसिएशन के सिलसिले में मेरी मुलाकात डॉ. सागर और डॉ. दीपक यादव (अन्य फरार आरोपी) से होती थी. मुझे इन लोगों की हरकतों से शक हुआ कि ये मेडिकल परीक्षा में कुछ गड़बड़ कर रहे हैं.” मामले का खुलासा करने के बाद से पुलिस सुरक्षा में रह रहे इस डॉक्टर को अच्छी तरह याद है, जब एक बार चुपके से उन्होंने डॉ. सागर का सूटकेस खोला था, जिसका अनलॉक कोड 786 हुआ करता था. उस सूटकेस से उन्हें पता चला कि किस तरह फर्जी फोटो लगाकर प्रवेश पत्र बनाए जा रहे हैं और यह कोई बड़ा रैकेट है. इसी तरह उन्हें डॉ. यादव के बारे में भी पता चला था.

भोपाल निवासी वकील आनंद प्रकाश की बेटी जब लगातार दो बार एक-एक नंबर से पीएमटी में सलेक्ट नहीं हो पाई तो उन्होंने भी मामले को सूंघना शुरू किया. अपनी मेहनत से जुटाए दस्तावेजों को लेकर उन्होंने 2013 में जबलपुर हाइकोर्ट की ग्वालियर पीठ में याचिका डाली. उधर,  बेटी का दाखिला न होने से परेशान अभय चोपड़ा ने सीधे जबलपुर अदालत में याचिका डाली. इस तरह की 54 याचिकाएं जब जबलपुर हाइकोर्ट के पास पहुंच गईं तो हाइकोर्ट ने इन सबको एक मामला बनाया और उसकी जांच स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) को सौंपी गई. एसटीएफ ने जब जांच शुरू की तो घोटाले की पर्तें प्याज के छिलके की तरह उतरने लगीं. नेता, अफसर, स्वयंसेवक और सैकड़ों छात्र इसकी जद में आते चले गए.

कैसे होता था घोटाला
मेडिकल घोटाले के संबध में व्यापम के 24 अप्रैल, 2014 को 272 मेडिकल छात्रों का नामांकन रद्द करने संबंधी आदेश में घोटाले की कारिस्तानी का तफसील से जिक्र है. इस आदेश में बताया गया है कि घोटाले के मुख्य आरोपियों—व्यापम के तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक डॉ. पंकज त्रिवेदी, तत्कालीन कंप्यूटर शाखा प्रभारी नितिन मोहिंद्रा, तत्कालीन सिस्टम एनालिस्ट अजय कुमार सेन और तत्कालीन प्रोग्रामर सी.के. मिश्र की चौकड़ी ने व्यापम के भीतर घोटाले को अंजाम दिया. इनके ऊपर लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे मंत्रियों का हाथ था. लक्ष्मीकांत शर्मा पर किसका हाथ था, यह भी धीरे-धीरे सामने आ जाएगा.

इन लोगों ने एसटीएफ को जो बताया, उसका सार कुछ इस तरह है. सबसे पहले आरोपियों ने राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों से स्कोरर छात्रों का इंतजाम किया. स्कोरर ऐसे लोगों को कहते हैं जो पढऩे में होशियार होते हैं और इस तरह की परीक्षा को पहले भी पास कर चुके होते हैं. ये लोग पैसा लेकर किसी परीक्षा में बैठते हैं और पीछे बैठे छात्र को नकल कराते हैं. स्कोरर मिल जाने के बाद व्यापम की यह चौकड़ी रोल नंबरों में बदलाव कर स्कोरर और अपने क्लाइंट को बगल में बैठाने का पुख्ता इंतजाम कर देती थी. क्लाइंट छात्र को नकल कराई के एवज में 15 से 20 लाख रु. तक खर्च करने पड़ते थे. सिर्फ पीएमटी-2012 में ही इस तरह के 701 लड़के पकड़े गए.

इसके बाद स्कोरर लड़के खुद भी प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सरकारी कोटे की सीटों पर दाखिला ले लेते थे. बाद में ये स्कोरर सीट छोड़ देते थे और कॉलेजों का मैनेजमेंट इन खाली सीटों को 20 से 25 लाख रु. या इससे कहीं ज्यादा रकम लेकर अपात्र छात्रों को अपने यहां दाखिला दे देता था. यह एक मोटा धंधा बन गया था. यानी व्यापम के दलाल एक स्कोरर के जरिए 50 लाख रु. से ऊपर की कमाई कर रहे थे. राय ने इस तरह के मामले में इंडेक्स मेडिकल कॉलेज इंदौर, एसएआइएमएस इंदौर, चिरायु मेडिकल कॉलेज, भोपाल, एलएन मेडिकल कॉलेज, भोपाल, आरडी गार्र्दी मेडिकल कॉलेज, उज्जैन और पीपल्स मेडिकल कॉलेज की शिकायत मध्य प्रदेश लोकायुक्त से की है.
व्यापम घोटाला

कुर्सी तक पहुंचने लगी आंच
शिकायतों का इतना बड़ा पुलिंदा और बेहद करीबियों पर लग रहे आरोपों ने चौहान की मुसीबत बढ़ा दी है. कटारे सवाल करते हैं, “आखिर ये कैसी पुलिस भर्ती परीक्षा है जिसमें अभ्यर्थी को फिजिकल परीक्षा से पूरी तरह छूट दे दी गई और सारी परीक्षाएं एक दौड़ में सिमट गईं. यह तो घोटाले को न्योता देना है.”

शिवराज के राज में सेंटर फॉर रिसर्च ऐंड इंडस्ट्रियल स्टाफ परफॉर्मेंस (क्रिस्प) का चेयरमैन रह चुके और प्रभात झा के प्रदेश अध्यक्ष कार्यकाल में बीजेपी शिक्षा प्रकोष्ठ का अध्यक्ष रह चुके सुधीर शर्मा का अब तक गिरफ्तार न होना भी बीजेपी की किरकिरी करा रहा है. पिछले साल आयकर विभाग ने जब भोपाल की एक ट्रैवल एजेंसी पर छापा मारा था तो यह बात सामने आई थी कि शर्मा ने संघ नेता सुरेश सोनी और बीजेपी नेता प्रभात झा की हवाई यात्राओं और अन्य यात्राओं का मोटा खर्च उठाया है. और 24 मई को जिस दिन दोपहर में उसे मिश्र का एसएमएस आया था उसके पास उसी शाम 5.59 बजे 9425144588 नंबर से एसएमएस आया- भाईसाहब नमस्कार, नोटिफिकेशन ऑफ आइपीएस सीट इज़ इश्यूड नाव टीआरएफ (ट्रांसफर) ऑफ वार्ड ऑफ कटारिया. एसटीएफ ने इस नंबर के धारक का नाम लिखा हैः आइजी होशंगाबाद विजय कटारिया जी.

छोटों की गिरफ्तारी और बड़ों की जमानत शिवराज को विवाद में ला रही है. सिर्फ गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ही उनका पक्ष लिया है. सरपरस्त लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज खामोश हैं. संघ प्रमुख मोहन भागवत ‘कानून अपना काम करेगा’ का जुमला उछाल चुके हैं. और प्रधानमंत्री कार्यालय में दिन पर दिन व्यापम घोटाले का अपडेट दर्ज होता जा रहा है. कहीं दिग्विजय सिंह का वह बयान सही तो नहीं होने वाला, “मोदी के अच्छे दिन आ गए और शिवराज के बुरे दिन.”
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