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राहुल गांधी ही पड़ गए कांग्रेस पर भारी

राहुल गांधी ने कांग्रेस को उसके सबसे कम आंकड़े पर पहुंचाया, काडर का मनोबल गिराया और नेताओं को अलग-थलग कर दिया. देश की इस ओल्ड ग्रैंड पार्टी को आज जरूरत है नए विचारों की, एक नए मुहावरे की और एक ऐसे नए चेहरे की जिसके कदम जमीन पर जमे हों. ऐसे में क्या पार्टी राहुल के साथ मिलकर इन मुश्किल हालात से खुद को निकाल पाएगी?

अपडेटेड 2 जून , 2014
बात 19 मई की है. नई दिल्ली में 24 अकबर रोड पर कांग्रेस दफ्तर के बाहर जुलूस पहुंचा, कुछ युवा कांग्रेसी नेता नारे लगा रहे थे, ‘‘राहुल तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं.’’ दफ्तर के भीतर 38 लोगों का झुंड यह सोचने की कोशिश कर रहा था कि आम चुनाव में पार्टी के सबसे खराब प्रदर्शन की वजह आखिर क्या रही, जिसने 16वीं लोकसभा में देश की सबसे पुरानी पार्टी को सिर्फ 44 सीटों पर समेट दिया.

पार्टी नेताओं की सबसे ताकतवर कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे. दफ्तर के बाहर की नौटंकी और भीतर के नाटक में कुछ खास फर्क नहीं था. दोनों का मकसद राहुल को बचाना था.

इस सोचे-समझे नाटक की शुरुआत सोनिया की पद छोडऩे की पेशकश से हुई, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बीच में ही रोक दिया. उन्होंने कहा, ‘‘इस्तीफा देना कोई हल नहीं है. पार्टी को आपकी जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है.’’ इस बीच राहुल अपने सेलफोन को ताकते हुए कागज पर कुछ लिखते जा रहे थे.

वे तीसरे नंबर पर बोले, ‘‘मुझे लगता है कि पार्टी में कोई जवाबदेही नहीं है और शायद मुझसे जो उम्मीद थी, उसे मैं पूरा नहीं कर सका. मैं इस खराब प्रदर्शन के लिए सबसे पहले खुद को ही जिम्मेदार ठहराता हूं.’’ उन्होंने पद छोडऩे का प्रस्ताव रखा. छत्तीसगढ़ में महासमुंद से लोकसभा चुनाव हारकर आए वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजित जोगी ने तुरंत इसे ठुकरा दिया.

उनके बाद अन्य सदस्यों ने भी इसी राह पर चलते हुए इस पर चर्चा करने से भी इनकार कर दिया. दो घंटे की चर्चा का नतीजा यह निकला कि पार्टी के ढांचे में बदलाव की जिम्मेदारी सोनिया को सौंप दी गई. राहुल की असफलता एक बार फिर उन नेताओं के शोर में गुम हो गई, जिन्होंने डूबते परिवार से चिपके रहने का फैसला किया है.

राज्यसभा सांसद वयालार रवि ने कहा, ‘‘सोनिया और राहुल का नेतृत्व रहना चाहिए क्योंकि वे ही इस पार्टी को एकजुट रख सकते हैं.’’ अगर किसी पार्टी को एकजुट रहने के लिए नेता की जरूरत है, तो फिर उसके लिए खोई हुई जमीन वापस पाने की संभावना बहुत कम दिखाई देती है.

कांग्रेस अपने भविष्य के लिए राहुल के भरोसे रहना चाहती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके हाथों में रहने पर पार्टी की कोई प्रासंगिकता रह जाएगी? कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘‘अगर वे आगे नहीं बढ़ सकते, तो कम-से-कम कुछ समय के लिए अलग ही हट जाएं.’’
 
 नाकाम नेता
कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि अब समय आ गया है कि राहुल को हर नाकामी के लिए ईनाम देना बंद किया जाए और पार्टी उनके बिना भी जीने की आदत डाले. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा? और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तो पूछ ही लिया कि और विकल्प क्या हैं?

अमृतसर में बीजेपी के अरुण जेटली को हराकर पार्टी को एक पल की खुशी देने वाले अमरिंदर सिंह का सवाल था, ‘‘श्रीमती गांधी नंबर वन हैं, उनके बाद राहुल हैं, नंबर तीन कौन हो सकता है? मुझे लगता है कि उन्हें वहां रखना कांग्रेस के हित में है.’’

2004 में जब राहुल राजनीति में आए तो उन्हें पार्टी का उत्तराधिकारी माना गया और लोगों में उम्मीद जगी कि वे पार्टी के ढांचे में सुधार कर उसे आधुनिक शक्ल देंगे. लेकिन समय के साथ-साथ उन्होंने खुद को ऐसे सलाहकारों से घेर लिया, जो जमीनी सचाई से कोसों दूर थे. पार्टी के रणनीतिकार मोहन गोपाल, पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और पार्टी महासचिव मधुसूदन मिस्त्री ने राहुल के लिए ऐसा जाल बुन दिया, जिसमें हर काम राहुल की मर्जी से होता था.

राहुल के लिए सब कुछ बदलने का पल 2009 में आया, जब कांग्रेस को दोबारा सत्ता मिली और मनमोहन सिंह ने उनसे मंत्रिमंडल में शामिल होने को कहा. राहुल आगे आ सकते थे और प्रशासनिक अनुभव हासिल कर सकते थे, लेकिन उनकी दिलचस्पी सिर्फ  सत्ता में थी, उसकी जिम्मेदारियों में बिल्कुल नहीं. उस समय उन्होंने पार्टी के लिए काम करने का बहाना बना दिया.

इस बीच, वे विभिन्न मौकों पर बीच-बीच में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे. मई, 2011 में उत्तर प्रदेश के भट्टा-परसौल गांव में उन्होंने किसानों के आंदोलन का समर्थन किया और उसी साल अगस्त में संसद में लोकपाल विधेयक के पक्ष में बोले.

2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने बड़ा जोर लगाया और घूम-घूमकर जोर-शोर से प्रचार किया. लेकिन 403 सदस्यों की विधानसभा में पार्टी की सीटें सिर्फ 6 बढ़ीं और 22 से 28 हो गईं. उन्होंने जिम्मेदारी अपने सिर ली, लेकिन कांग्रेस ने एक नहीं सुनी.

दिसंबर, 2012 में जब 16 दिसंबर के गैंग रेप के बाद सारी दिल्ली सड़क पर थी, तब राहुल भारत से इतने बेखबर थे कि उन्होंने भीड़ से मिलने से मना कर दिया. तभी जोर-शोर से नारा लगा, ‘‘सारे युवा यहां हैं, राहुल गांधी कहां हैं.’’ युवा चेहरे के रूप में उभारी जा रही उनकी छवि को जबरदस्त बट्टा लगा क्योंकि वे सड़कों पर इंसाफ की लड़ाई के दौरान वहां मौजूद नहीं थे.

उसके बावजूद पार्टी नेताओं ने जनवरी, 2013 में उन्हें कांग्रेस का उपाध्यक्ष बना दिया. राहुल ने खूब धूम-धड़ाके के साथ नई भूमिका स्वीकार की और कांग्रेसजनों को लगा कि अब सब कुछ बदल जाएगा. 2014 के आम चुनाव में सिर्फ 15 महीने बचे थे और उनकी भूमिका पार्टी कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने और उन्हें जंग के लिए तैयार करने की थी, लेकिन उन्होंने प्रयोगों का ऐसा दौर शुरू किया, जिनका आने वाले चुनावों से कोई लेना-देना ही नहीं था.

उन्होंने प्रदेश कांग्रेस इकाइयों के साथ कई दौर की बैठकों को अंजाम दिया और अपनी मर्जी से संगठन के ढांचे में फेरबदल कर डाला. उनका उपाध्यक्ष पद एक पायलट प्रोजेक्ट बन गया, जो कभी यूथ कांग्रेस में, कभी मीडिया में और कभी सोशल मीडिया समितियों में दखल देने लगा.

इस पूरी प्रक्रिया में पार्टी के बदलते ढांचे में वरिष्ठ नेताओं की कोई जगह ही नहीं रह गई और ऑक्सफोर्ड में पढ़े-लिखे नफीस डाटा एनालिस्ट्स की उनकी टीम पूरी तरह से हावी हो गई. दक्षिण मुंबई से हारे कांग्रेस के पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा का कहना था, ‘‘आंकड़ों और विश्लेषण में माहिर लोगों को रखना अच्छी बात है, लेकिन उन्हें रणनीतिक फैसले लेने की इजाजत नहीं होनी चाहिए.’’

उत्तर प्रदेश में कुशीनगर से हारे कांग्रेस के पूर्व मंत्री आर.पी.एन. सिंह का कहना था, ‘‘कोई राजनैतिक दल एनजीओ नहीं हो सकता. बेहतरीन कॉलेजों से डिग्रीधारी लोगों का होना ठीक है, अगर वे जमीन से जुड़े नहीं हैं, तो वे फैसले लेने वाले नहीं हो सकते, हमें उनसे छुटकारा पाना ही होगा.’’

राहुल के सलाहकारों ने उन्हें एक ऐसा योद्धा राजकुमार बना दिया, जो अन्याय से लडऩे की कसम खा चुका था और बाकी पार्टी से अलग था. राहुल ने उनकी सलाह मानकर सितंबर, 2013 में अपनी ही सरकार की उस समय भद पीट डाली, जब अदालत से दोषी सांसदों को संरक्षण देने वाले अध्यादेश को मंत्रिमंडल से मंजूरी के बावजूद बकवास बताया.

नए भारत के लिए राहुल की धुंधली कल्पना ने मामला और उलझा दिया. जैसा उन्होंने अप्रैल, 2013 में सीआइआइ में अपने भाषण में कहा कि भारत मधुमक्खी का छत्ता या हाथी है? पिछले अक्तूबर में दिल्ली में विज्ञान भवन में राहुल ने कहा कि उनके हिसाब से दलितों के उत्थान का अंदाजा लगाने के लिए क्या बृहस्पति के पलायन वेग को समझना जरूरी है? जैसा कि अगस्त, 2013 में इलाहाबाद में राहुल ने इशारा किया था कि गरीबी बोझ्, खतरा या सिर्फ ‘‘मानसिक अवस्था’’ है?

राहुल ने अपने भाषणों में बार-बार जो अजीबोगरीब बातें कहीं, उसका दोष उनके वैचारिक सलाहकारों के सिर मढ़ा गया. 12 मई को चुनाव का अंतिम चरण पूरा होने से ठीक पहले 10, जनपथ पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में पी. चिदंबरम और कपिल सिब्बल ने मीडिया में पार्टी की खराब छवि के लिए अजय माकन के नेतृत्व में मीडिया विभाग को जिम्मेदार ठहराया.

अगले दिन पार्टी प्रवक्ता संदीप दीक्षित ने सोनिया से माकन की लिखित शिकायत की थी कि पार्टी की ओर से मीडिया को जानकारी देने के लिए उन्हें शायद ही कभी बुलाया गया.

पार्टी नेताओं में टीम राहुल के प्रति व्यापक आक्रोश है, जो नीतिगत उपायों से लेकर प्रचार की योजना और टिकट वितरण तक हर काम खुद कर रही थी. कमलनाथ, जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह जैसे परिवार के वफादारों को भी नई टीम ने घास नहीं डाली. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जगदंबिका पाल जैसे कुछ लोगों ने निराश होकर बीजेपी का दामन थाम लिया.

अब बीजेपी के सांसद जगदंबिका पाल ने मार्च में फैजाबाद में कहा था, ‘‘कांग्रेस राहुल गांधी और उनकी टीम के लिए ट्रेनिंग ग्राउंड बन गई है. देश इस बात का इंतजार नहीं कर सकता कि कोई अपनी ट्रेनिंग पूरी करेगा और फिर नेतृत्व संभालेगा.’’

मोदी से मुकाबला
राहुल के सामने बीजेपी का एक ऐसा नेता खड़ा था, जिसने कभी जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराया. नरेंद्र मोदी की तुलना में राहुल नौसिखिए थे, जिनके पास न काम का कोई अनुभव था और न भविष्य के लिए कोई गुंजाइश. मोदी वृद्धि और आकांक्षाओं को पूरा करने का साफ संदेश दे रहे थे और राहुल मुफ्त कल्याण योजनाओं और भूख मुक्त भारत की बात कर रहे थे.

उत्तर प्रदेश में शिव नाडर यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं, ‘‘कांग्रेस स्वाभाविक की निरंतरता की प्रतीक थी और मोदी आशा के प्रतीक थे.’’ दलित विचारक चंद्रभान प्रसाद के अनुसार, ‘‘राहुल आज के भारत को 1970 के दशक का भारत मानते हैं, जब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था. वे समाज में हो रहे बदलाव को नहीं पहचानते. उन्होंने मोदी की तुलना में कमजोर सामाजिक मानक तय किए. मोदी सबके लिए सम्मानजनक जीवन की बात कर रहे थे.’’

64 वर्षीय मोदी की युवाओं में लोकप्रियता 44 वर्षीय राहुल से कहीं ज्यादा थी. कांग्रेस के नेता भी प्रचारक के रूप में मोदी की कामयाबी के कायल हैं. आर.पी.एन. सिंह ने कहा, ‘‘3डी से इंटरनेट और एलईडी स्क्रींस तक मोदी ने लोगों से सीधे संवाद करने के लिए टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल किया.’’ कई और नेता हैरान हैं कि अगर उन्होंने भी मोदी की तरह जोश के साथ प्रचार किया होता और नए-नए संदेश दिए होते, तो क्या होता.
 
इतिहास गवाह है कि कांग्रेस जब भी कमजोर हुई है, कई नेता उसे छोड़ गए हैं. 1988 में, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राजीव गांधी की कैबिनेट में मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पार्टी छोड़कर जनता दल बनाया और कांग्रेस से लड़े. 1989 के चुनाव के बाद वे प्रधानमंत्री बन गए. 1991 और 1996 के बीच जब पी.वी. नरसिंह राव केंद्र में कांग्रेस की सरकार चला रहे थे, तब अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, माधवराव सिंधिया, चिदंबरम और ममता बनर्जी जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़कर अपने-अपने दल बना लिए.

1998 में सोनिया के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद इनमें से अधिकतर वापस आ गए. 1999 में सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे पर शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर ने बगावत कर दी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) बना ली. बाद में यह मुद्दा गौण हो गया और एनसीपी कांग्रेस की सहयोगी बन गई.

आज के नेताओं की जड़ें इतनी मजबूत नहीं हैं कि पार्टी छोड़कर अलग पार्टी बना लें. लेकिन उन्हें हालात सुधरते नहीं दिखाई दिए, तो उनमें से कुछ कहीं और भविष्य तलाशने पर मजबूर हो सकते हैं. उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि गांधी परिवार के चुंबक में वोट खींचने की ताकत खत्म हो गई है, जो पहले पार्टी के काम आती थी.
 कांग्रेस की हार
पार्टी इकाइयों में फूट
भारतीय राजनीति में कोई भी दल तभी उभरता है, जब राज्यों में ताकतवर होता है. लेकिन पूरे देश में कांग्रेस की प्रदेश इकाइयां एकदम छिन्न-भिन्न हो गई हैं, इसकी बड़ी वजह यह है कि दिल्ली में बैठे हाइकमान ने राज्य के नेताओं को एकदम बौना बना दिया है.

19 मई को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में आर.के. धवन ने कई कांग्रेसी नेताओं की इस मुहिम का खुलेआम विरोध किया कि राज्यों में नेताओं को ताकत और ज्यादा स्वायत्तता दी जाए. तब साफ जाहिर था कि सोनिया धवन से सहमत थीं और यथा स्थिति कायम रखने की बात कही गई.

इस अक्तूबर में कांग्रेस को हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव लडऩा है और दोनों में से कहीं भी वापस सत्ता में आने की गुंजाइश न के बराबर है. हरियाणा में नेताओं के तीन गुट हैं, जो हमेशा एक-दूसरे को पटखनी देने में लगे रहते हैं. दिसंबर, 2013 में चार राज्य विधानसभा चुनावों में हार के बाद राहुल ने नया नेतृत्व विकसित करने के नाम पर अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया.

लोकसभा के नतीजों में राज्य में पार्टी का वोट बैंक पूरी तरह खत्म हो गया. 2009 के चुनाव के मुकाबले वोट में हिस्सेदारी 42 से 20 प्रतिशत घटकर 22 फीसदी रह गई और सीटों की संख्या 9 के मुकाबले 1 पर सिमट गई. तंवर खुद सिरसा सीट पर 1,00,000 से ज्यादा वोट से हारे. रोहतक से सांसद दीपेंद्र सिंह “हुड्डा को पूरा यकीन है, ‘‘विधानसभा चुनाव में गणित कुछ अलग होगा. लोकसभा चुनाव सिर्फ मोदी के नाम पर लड़ा गया.’’ उनके पिता भूपिंदर सिंह हुड्डा राज्य के मुख्यमंत्री हैं.

महाराष्ट्र में वोट हिस्सेदारी में इतनी भारी गिरावट तो नहीं हुई (19.6 से घटकर 18.1 फीसदी), लेकिन पार्टी ने 10 सीटें गवां दीं और सिर्फ 2 सीटें मिलीं. नवंबर, 2010 में आदर्श हाउसिंग घोटाले में मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम आने पर हाइकमान ने पृथ्वीराज चव्हाण को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा. पृथ्वीराज का राज्य में कोई जनाधार नहीं है और उनके नेतृत्व में वापसी की कोई संभावना नजर भी नहीं आती है.

अशोक चव्हाण नांदेड़ से लोकसभा चुनाव जीत गए हैं, लेकिन घोटाले में सीबीआइ जांच को देखते हुए उन्हें कोई बड़ी भूमिका मिलने की उम्मीद बहुत कम ही नजर आती है.

असम में कांग्रेस की सीटें 2009 में 7 से तीन रह गई हैं और वोट में हिस्सेदारी में 5 फीसदी की कमी आई है. कर्नाटक जैसे राज्य में पिछले साल ही सरकार बनाने के बावजूद पार्टी की सीटें नहीं बढ़ सकीं. हालांकि उसकी वोट हिस्सेदारी 3 फीसदी बढ़ी है (2009 में 37 से बढ़कर 40 फीसदी).

कांग्रेस को 28 में से 9 सीटें मिलीं, जो 2009 से सिर्फ तीन ज्यादा हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में पार्टी 25 साल से सत्ता से बाहर है और हालात बदलने के कोई आसार नजर नहीं आते. लोकसभा में इन चार राज्यों की 201 सीटें हैं, जिसमें से पार्टी को इस बार सिर्फ 6 सीटें मिली हैं.

गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कुल मिलाकर कांग्रेस ने तीन सीटें जीती हैं-गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया, छिंदवाड़ा से कमलनाथ और छत्तीसगढ़ के पूर्व विधायक ताम्रध्वज साहू. लेकिन सबसे करारा झटका आंध्र प्रदेश में लगा, जहां 2009 में पार्टी को 33 सांसद मिले थे. वाइ.एस. जगनमोहन रेड्डी की टूट-फूट और तेलंगाना के गठन के उलटे असर ने कांग्रेस की वोट हिस्सेदारी 27 फीसदी कम कर दी और 31 सीटें हाथ से निकल गईं. पार्टी का पूरा सफाया.

सिमटती अपील
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपना अस्तित्व बचाने की है. राहुल ने बार-बार पारंपरिक वोटरों तक पहुंचने की कोशिश की है, लेकिन पार्टी का जनाधार तेजी से सिकुड़ रहा है. राहुल ने कुलियों, मछुआरों, अल्पसंख्यकों, महिला स्वसहायता समूहों, रेहड़ी-पटरीवालों और समाज के अन्य बहुत-से समूहों के साथ कई टाउन हॉल बैठकें की हैं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

चंद्रभान प्रसाद का कहना है, ‘‘अगर गरीब से गरीब आदमी को भी आप गरीब कहेंगे, तो उसे अपमान महसूस होगा. राहुल ने यह भूल की है. उनके इरादे भले ही नेक हों, लेकिन शब्द सही नहीं थे. समाज के निचले तबके ने अपना गुस्सा जाहिर किया है.’’ कम आय वाले वर्गों में कांग्रेस की वोट हिस्सेदारी 2009 में 43 फीसदी थी, लेकिन 2014 में सिर्फ 19 फीसदी रह गई.

इतनी भारी गिरावट की वजह से वर्तमान और भावी सहयोगी कांग्रेस के साथ लंबे समय तक अपने संबंध के बारे में सोचने पर मजबूर हो गए हैं. 14 मार्च को पुणे में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बंद कमरे में हुई बैठक में राहुल ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि वे अधिक से अधिक सीटें लाने की कोशिश करें, ताकि एनसीपी के साथ गठजोड़ की जरूरत कम हो जाए.

उनकी खूब आलोचना हुई और एनसीपी नेता शरद पवार ने 20 अप्रैल को मुंबई में चुनाव रैली के दौरान उनके साथ मंच पर आने से इनकार कर दिया.

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के एक दिन बाद 17 मई को बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की नेता मायावती ने अपनी पार्टी के खराब प्रदर्शन का ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़ा. उनका कहना था कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए को समर्थन देना आत्मघाती साबित हुआ और पार्टी ने उसकी कीमत चुकाई. गौरतलब है कि पूरे भारत में 4.2 फीसदी वोट हिस्सेदारी के बावजूद बीएसपी को एक भी सीट नहीं मिली.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस के साथ अपनी पार्टी के गठजोड़ का मुद्दा उठाया है. एक टेलीविजन इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस में कई नेता यह गठबंधन खत्म करना चाहते हैं, फिलहाल मैं नहीं कह सकता कि इसका भविष्य क्या होगा.’’

कांग्रेस के कुछ नेता लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) नेता रामविलास पासवान के एनडीए में जाने के लिए भी राहुल को जिम्मेदार मानते हैं. पासवान गठजोड़ के बारे में बात करने के लिए जनवरी में दो बार सोनिया और राहुल दोनों से मिले थे. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, ‘‘आखिरी क्षण तक राहुल तय नहीं कर पाए कि लालू यादव और रामविलास या नीतीश कुमार में से किसके साथ गठजोड़ किया जाए.’’  

भविष्य का रास्ता
कांग्रेस के कई छोटे-बड़े नेता पार्टी का ढांचा बदलने की मांग कर रहे हैं. राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है, ‘‘बेकार लोगों को तुरंत बाहर किया जाए. जमीनी समर्थन और जनता से जुड़े लोगों को ऊपर लाना ही होगा.’’ लेकिन वे इस सवाल पर चुप हैं कि पार्टी राहुल का क्या करेगी, जो ऐसे नेता नहीं बन पाए, जिसकी भारत को उनसे अपेक्षा थी और कांग्रेस को आवश्यकता थी.

इससे यह सवाल भी उठता है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव से पहले परिवार के सामने यह बात क्यों नहीं रखी और रखी थी, तो क्या उनकी सलाह को नजरअंदाज किया गया?

जब सब नाकाम हो जाते हैं, तो आम तौर पर गांधी परिवार ही पार्टी को संकट से उबारता है. पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह के अनुसार, ‘‘कांग्रेस को नेहरू-गांधी परिवार ने ही पाला- पोसा है. हर बार विभाजन के बाद पार्टी फिर एकजुट हुई है और एकमात्र उदार, लोकतांत्रिक, वाम रुझान वाली पार्टी के रूप में उभरी है, जो भारत की सोच का प्रतिनिधित्व करती है. हमारी हार इसलिए हुई, क्योंकि सरकार शासन चलाने का कौशल भूल गई.’’

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी की इतिहासकार मृदुला मुखर्जी का तर्क है कि पार्टी को वापस लोकतंत्र के रास्ते पर जाना होगा, जो 1970 के दशक तक पार्टी का मूल आधार था. उन्होंने बताया कि तब ग्राम स्तर से अध्यक्ष तक नियमित चुनाव हुआ करते थे और पार्टी के भीतर एक अलग सरकार भी हुआ करती थी.

देश की ग्रैंड ओल्ड पार्टी को आज जरूरत है, नए विचारों की, एक नए मुहावरे की और एक ऐसे नए चेहरे की जिसके कदम जमीन पर जमे हों. सड़कों पर नारेबाजी और बंद कमरों में चापलूसी उसे इससे आगे नहीं ले जा सकती. कांग्रेस को अपने आप को नए सिरे से खोजना होगा. नई राहों को तलाशना होगा. सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी यह कर पाने में समर्थ हैं?
(-साथ में आशीष मिश्र,  असित जॉली और एम.जी. राधाकृष्णन)
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