नजारा 2 मई का है. वाराणसी के सूर्या होटल में बीजेपी के वार रूम में अमित शाह देश का नक्शा फैलाए ऐसे मशगूल हैं, मानो कोई जनरल अपनी अगली रणनीति तैयार कर रहा हो. तभी फोन बजता है. उधर, उनके बॉस नरेंद्र मोदी हैं. बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में रैली के बाद 3डी होलोग्राफिक भाषण के लिए गांधीनगर लौट रहे हैं. इस भाषण को खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश के कोई 100 स्थानों पर प्रसारित किया जाना है.
बीजेपी के चुनाव विशेषज्ञों ने पार्टी रणनीतिकारों को आगाह किया है कि बिहार में लालू प्रसाद यादव की जमीन मजबूत हो रही है जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपने-अपने वोट बैंक पर पकड़ बनाने लगी हैं. शाह और मोदी की खांटी गुजराती में छोटी-सी बातचीत का सार यह है कि मोदी 5 मई को राहुल के चुनाव क्षेत्र अमेठी में जाएंगे, ताकि प्रियंका गांधी को मीडिया में मिल रहे प्रचार पर विराम लग सके.
हर तरह की मीडिया के हर मंच पर सक्रिय बीजेपी का प्रचार तंत्र फौरन अमेठी हमले की तैयारी में जुट जाता है. इसी से पता चलता है कि मोदी की मशीनरी किस कदर प्रभावी है. नई दिल्ली में पार्टी के मीडिया सेल को बताया गया कि यह संदेश जारी कर दिया जाए.
पार्टी के दिल्ली मुख्यालय में राष्ट्रीय डिजिटल ऑपरेशन केंद्र को निर्देश दिया गया कि फेसबुक पर मोदी के कार्यक्रम को अपडेट कर दिया जाए और ट्विटर पर संदेश दे दिया जाए. इंडिया 272$ मोबाइल ऐप पर भी अपडेट किया गया और देशभर में 25 लाख सक्रिय वॉलंटियर को निर्देश भेज दिए गए. मिनटों में पूरा तंत्र अमेठी रणनीति से भर उठा, मानो यह मोदी के कार्यक्रमों में हमेशा से तय था.

गुजरात के मुख्यमंत्री गांधीनगर के अपने घर में 5 मई की सुबह 7.30 बजे जब रोज की तरह अपने प्रचार मैनेजरों के साथ बैठक के लिए पहुंचे तब तक अमेठी की विस्तृत जानकारी विमान में रख दी गई थी ताकि वे उड़ान के दौरान उसे पढ़ सकें. इसके पहले दो दिनों में वे उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में आठ रैलियों को संबोधित कर चुके थे. हर जगह की विस्तृत जानकारी के अलावा बाकी सब कुछ मोदी की वाक्पटुता और उनकी लोगों से जुडऩे की क्षमता के सहारे छोड़ दिया जाता है, भले ही लोग किसी इलाके के हों या कोई भाषा बोलते हों.
बाद में वे अमेठी की रैली में राहुल और प्रियंका पर वार शुरू करने के पहले बोले, ‘‘यह मेरी छोटी बहन स्मृति ईरानी है. मैंने इसे अमेठी भेजने के लिए चुना, लेकिन मां-बेटे (सोनिया गांधी और राहुल) के लिए नई समस्या खड़ी करने के लिए नहीं. मैंने इसे अमेठी की समस्या सुलझने के लिए भेजा है. मेरी छोटी बहन अमेठी का उससे ज्यादा ख्याल रखेगी, जितना आपकी अपनी बहन आपका ख्याल रखती है.’’ मोदी ने बताया कि अमेठी देश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार है क्योंकि ‘‘40 साल बेकार गए’’ और ‘‘तीन पीढिय़ां गंवा दी गईं.’’
रैली की सुबह बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने अमेठी की उपेक्षा पर आठ मिनट का वीडियो जारी किया. दोपहर तक ट्विटर पर नमो इन अमेठी की धूम थी और यूट्यूब पर ‘‘डॉक्युमेंटरी’’ दुनियाभर में देखी जा रही थी. आप देश में कहीं भी हों, जो भी राजनीति करते हों और चाहे जिसे वोट करते हों या न करते हों, मोदी का साया 2014 के लोकसभा चुनावों में लंबा दिख रहा है.
उनका अभियान इतना व्यापक है, भाषण में इतनी नाटकीयता है और उनके विकास का संदेश इतना स्पष्ट है कि उन्होंने विविधता भरे संसदीय चुनावों को राष्ट्रपति शैली में बदल डाला है. पिछले नौ महीने में मोदी 3 लाख किमी की यात्रा कर चुके हैं या कहें कि सात बार पृथ्वी का चक्कर लगा चुके हैं. वे 5,187 सभा-समारोहों में शामिल हुए और 25 राज्यों में 477 रैलियों को संबोधित कर चुके हैं. इस दौरान रोज वे महज पांच घंटे की नींद लेते हैं.
अनुमानित 2.3 करोड़ लोगों से इंटरनेट-मोबाइल टेलीफोन से संपर्क किया. यह संख्या ब्राजील की आबादी से अधिक है और दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डे से आने-जाने वालों की कुल सालाना संख्या का तीन गुना है. इन आंकड़ों को देखकर ओबामा का 2012 का राष्ट्रपति चुनाव अभियान भी शरमा जाए, जिससे मोदी मशीन ने जाना कि कैसे हर तरफ छा जाने वाला अभियान चलाया जाता है. मोदी को मानिए या खारिज कीजिए, लेकिन देश के इस सबसे विवादास्पद नेता ने साल भर में ही जैसे अपनी छवि का निर्माण किया, उससे चुनाव लडऩे के तरीके हमेशा के लिए बदल गए.

विकास को दी जुबान
मोदी अभियान के कारगर रहने की बड़ी वजह यह है कि वे बड़ी तेजी से विकास और सिर्फ विकास की बातें करने लगे. उन्होंने अपने मुक्त बाजार के अर्थशास्त्र को कांग्रेस के खर्चीले कल्याणकारी कार्यक्रमों के मुकाबले खड़ा किया, जो क्रियान्वयन की गड़बडिय़ों के कारण असर पैदा नहीं कर पाए. मोदी ने चाय बेचने वाले से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक पहुंचने की अपने जीवन की कहानी और गुजरात में विकास के पहिये को घुमाने में कामयाब मुख्यमंत्री के किस्सों के जरिए अपनी छवि एक ऐसे सशक्त नेता की बनाई, जिसकी देश को आकांक्षा है.
शिव नाडर विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स ऐंड क्रिटिकल थ्योरी के निदेशक दीपांकर गुप्ता कहते हैं, ‘‘जब 2009 में आर्थिक मंदी शुरू हुई, मोदी की विकास गाथा की साख बढऩे लगी. पिछले नौ साल से कांग्रेस सांप्रदायिकता बनाम सेकुलरिज्म का राग अलापती रही लेकिन मोदी वहां से आगे निकल गए. मोदी आज जहां हैं, उसके लिए उन्हें राहुल गांधी और मनमोहन सिंह को बदलते हालात के मुताबिक बदलाव न करने के लिए शुक्रिया अदा करना चाहिए.’’
चुनाव अभियान में आरएसएस की सक्रिय भागीदारी और हिंदुत्व की अपनी कट्टर छवि के बावजूद मोदी कट्टर दक्षिणपंथी एजेंडे से दूरी बनाए रखने में कामयाब रहे, जो लालकृष्ण आडवाणी 2004 और 2009 में नहीं कर पाए. अगर उनके संदेश पर यकीन करें तो मोदी अभियान ने भारतीय चुनावी राजनीति को नई परिभाषा दी है. यानी कुछ खास वोट बैंक के हितों का ख्याल रखने के बदले उन्होंने हर किसी की आकांक्षा की पूर्ति का वादा किया. यह राजनीति में नए मोड़ की तरह है.
समाज विश्लेषक और लेखक संतोष देसाई कहते हैं, ‘‘मोदी अभियान हर क्षेत्र और तबके को ध्यान में रखकर तैयार किया गया जबकि परंपरागत अभियान में खास जातियों की अपील का ध्यान रखा जाता था. जाति अब भी महत्वपूर्ण है लेकिन नई समझदारी यह है कि ग्रामीण और शहरी दोनों वर्गों की नजर भविष्य पर है. वे बेहतर जीवन पाने के लिए एक ही तरह से लालायित हैं.’’ सपनों के सौदागर मोदी ने सीधे इस तार को छेड़ा और मध्य वर्ग की चिंताओं और भरोसे को हवा देकर एक नए वोट बैंक का निर्माण कर लिया.
सोनीपत में ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर शिव विश्वनाथन कहते हैं, ‘‘मोदी ने हमें दिखाया कि विकास की अपनी बोली है. जैसे गुजरात मॉडल, बिहार मॉडल, राजस्थान मॉडल वगैरह. और अंत में वे कांग्रेस से ज्यादा प्रभावी लगने लगे. अपने सुनियोजित, विलक्षण अभियान के जरिए वे धर्मनिरपेक्षता ही नहीं, राष्ट्रवाद को भी साधने में कामयाब हो गए.’’

मोदीः कदम दर कदम
करीब साल भर पहले ही मोदी अभियान के चरण तैयार कर लिए गए थे और वे बिना थके-हारे या विचलित हुए इस महाभियान को अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब रहे. पहले चरण में, पिछले साल मार्च से सितंबर तक मोदी देश को और खासकर अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह समझते रहे कि वे बदलाव का वह चेहरा हो सकते हैं, जिसकी देश को शिद्दत से तलाश है.
उनका मिशन अपनी लोकप्रियता को साबित करने के लिए एक वक्त में एक भाषण देने का था. मोदी ने उन आयोजनों का आमंत्रण स्वीकार किया, जो देश के खास वर्गों को आकर्षित करता था-चाहे वह नई दिल्ली में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स का हो या फिक्की महिला संगठन का, या गूगल बिग टेंट हो या फिर 16 मार्च, 2013 को इंडिया टुडे कॉनक्लेव का जिसमें उन्होंने पहली दफा अपने ‘‘गुजरात मॉडल’’ को विस्तार से बताया था.
अभियान की रणनीतिक टोली के एक सदस्य कहते हैं, ‘‘मकसद बीजेपी नेतृत्व पर नीचे से दबाव बनाने का था. मोदी ने इसे अमेरिका में प्राइमरी चुनावों की शैली में अंजाम दिया, जिसमें उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था.’’
दूसरा चरण पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों को समर्पित था. इस दौरान मोदी ने सितंबर से लेकर नवंबर तक 55 रैलियों को संबोधित किया. लिहाजा, बीजेपी को राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सफाए में मदद मिली और छत्तीसगढ़ में पार्टी सत्ता में बनी रही. दिल्ली में भी वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के अचानक उभार ने उसकी चमक छीन ली. केजरीवाल अब वाराणसी में मोदी को चुनौती दे रहे हैं.
तीसरा चरण 9 दिसंबर से 13 मार्च का है जिसमें विभिन्न राज्यों में पार्टी की अंदरूनी समस्याओं को दुरुस्त करने, नई तकनीकी व्यवस्था कायम करने और नए सहयोगियों की तलाश से लेकर दूसरी पार्टी से आए उम्मीदवारों को साधने का काम अंजाम दिया गया. यह सब कुछ मार्च से मई तक के आखिरी चरण को अंजाम देने के मकसद से किया गया, जो सोहो स्क्वायर विज्ञापन एजेंसी के बनाए नारे ‘‘अबकी बार, मोदी सरकार’’ के साथ शुरू हुआ
इस चरण में मोदी ने 196 भारत विजय रैलियों में देश भर के क्षत्रपों पर उनके ही मैदान में उन पर वार करने का अभियान शुरू किया. मसलन, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से लेकर तमिलनाडु में जे. जयललिता और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव से लेकर बिहार में लालू प्रसाद यादव तक.
इस अभियान के दौरान मोदी ने अपने भाषणों में लोगों की दिली भावनाओं को छूने की कला विकसित की. वे उन्हें उनके इलाके के गौरव की याद दिलाने से शुरू करते और फिर स्थानीय समस्याओं पर आ जाते और उसकी तुलना गुजरात के लोगों की स्थितियों से करते. इसके बाद मोदी 60 साल के कांग्रेस राज की नाकामियों का जिक्र करके विरोधियों पर हमला करते, चुटकी लेते और मौका मिलने पर सुनहरे भविष्य का वादा करते.
स्थानीय भावनाओं को छूने के लिए उन्होंने बिहार के हाजीपुर के केला किसानों, कोलकाता में बांग्लादेशी घुसपैठियों और भुवनेश्वर में बेहिसाब आर्थिक पिछड़ेपन का मुद्दा उठाया. झारखंड में उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि कैसे झुमरी तलैया कभी आकाशवाणी में गानों की सिफारिश करने के लिए मशहूर था. मणिपुर के इंफाल में उन्होंने कहा कि नगालैंड में आर्थिक नाकाबंदी हो तो जिरीबम हाइवे को दुरुस्त करने से कैसे राज्य की तकलीफें कम हो सकती हैं.
मोदी विकास, आर्थिक प्रगति और ‘‘गुजरात मॉडल’’ की बात करके जैसे लोगों की भावनाओं को छूते हैं, उससे स्वाभाविक रूप से एक फिजा तैयार हो जाती है. कभी ब्रांड मोदी विभाजन और बहुसंख्यकवाद के लिए जाना जाता था लेकिन अब उसका अर्थ सुशासन से लिया जाने लगा है. मोदी के भाषणों में स्थानीय मंदिरों और देवताओं के जिक्र या धीरे से पृष्ठभूमि की याद दिलाकर छेड़ा जाने वाला हिंदुत्व राग कभी मुख्य पटकथा का हिस्सा नहीं बन पाता. लोगों में वे कैसा आवेग पैदा कर रहे हैं इसका एक उदाहरण यह है कि 24 अप्रैल को वाराणसी में उनके रोड शो के दौरान रेल पुल से गुजर रही ट्रेनों के यात्री बार-बार चेन खींचकर गाड़ी रोक ले रहे थे.

टेक्नोलॉजी पर सवार
गांधीनगर में मोदी की सुबह-सुबह की बैठकों में एक प्रमुख मुद्दा यह तय करने का होता है कि राहुल गांधी और मोदी के दूसरे राजनैतिक विरोधियों के भाषण कैसे सुने जाएंगे और उनमें उठे मुख्य मुद्दे मोदी तक कैसे पहुंचाए जाएं, जो दिन भर एक से दूसरी जगह हेलिकॉप्टर में उड़ते रहते हैं. मोदी के साथ सफर करते निजी सहायक ओम प्रकाश चंदेल विरोधी नेताओं के मुख्य कथन जमा कर लेते हैं और मोदी को सौंप देते हैं, ताकि अगले भाषण में वे जवाब दे सकें.
प्रचार की एक और बड़ी विशेषता यह है कि समय का पूरा ध्यान रखा जाता है, क्योंकि जरा सी भी देरी होने पर दिन के अन्य कार्यक्रम गड़बड़ा जाएंगे. मोदी के स्टाफ की सटीक योजना और संसाधनों की लगातार निगरानी के बल पर ही मोदी हर रात घर लौट आते हैं और अगले दिन के लिए ताजा दम रहते हैं.
बैंकर रह चुके अखिल हांडा आजकल मोदी समर्थित एनजीओ सिटिजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी के साथ) के लिए काम करते हैं. उनका कहना था, ‘‘मोदी जी की कम से कम 20 फीसदी जनसभाएं सटीक कार्यक्रम की देन हैं, जिससे वे ज्यादा रैलियों में भाषण दे पाते हैं.’’
मोदी का प्रचार उन नई-नई तकनीक विधियों पर टिका है, जिन्हें उनकी टीम ने संपर्क का दायरा फैलाने के लिए अपनाया है. चुनाव प्रचार में इंटरनेट और मोबाइल फोन की ताकत को फौरन पहचान कर मोदी ने शुरू में ही अपने चारों तरफ तकनीक को समझ्ने वाले समर्थक जुटा लिए, जिनका काम सूचना के प्रसार की समग्र व्यवस्था करना था. उन्हें सबसे पहला काम यह सौंपा गया कि 15 सितंबर को रेवाड़ी में हुई महारैली मोबाइल फोन पर दिख जाए.
रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों के सामने उनके संबोधन का लाइव प्रसारण देखने के लिए उपभोक्ता डायल कर सकते थे. पिछले नौ महीने में इस सेवा का दायरा बहुत फैल गया है. लोग अब मोदी के पहले से रिकॉर्ड किए गए क्लिप सुन सकते हैं, जिनमें वे महंगाई, विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर बोल रहे हैं. प्रचार से जुड़े एक अंदरूनी व्यक्ति ने बताया कि सिर्फ अप्रैल में ही 4501-4501 डायल करके 30 लाख से अधिक लोगों ने मोदी के भाषण सुने.
प्रचार का अगला तोहफा जनवरी में आया. यह तोहफा था, एंड्रॉयड उपकरणों के लिए इंडिया 272 प्लस मोबाइल ऐप और मोदी 4 पीएम दान अभियान. कार्यकर्ताओं ने पैसे जुटाने और मोदी के प्रचार के लिए खोमचे लगा लिए. आइटी सेल में लोगों का कहना है कि इस तरह अब तक 5 करोड़ रु. से ज्यादा जमा हो चुके हैं. प्रचार की लागत करीब 150 करोड़ रु. है, लेकिन इसमें टेलीविजन, रेडियो, पत्र-पत्रिकाएं शामिल नहीं हैं.
9 फरवरी को मोदी के फेसबुक पेज को पसंद करने वालों की संख्या एक करोड़ तक पहुंचने के एक सप्ताह बाद एक विशेष नमो नंबर जारी किया गया. इस नंबर 78200-78200 को भेजे गए एसएमएस, मिस्ड कॉल और व्हाट्सऐप संदेश ने उपभोक्ता को संभावित स्वयंसेवक के रूप में बीजेपी के डाटाबेस में शामिल कर दिया. प्रचार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि उन्हें रोजाना औसतन एक लाख मिस्ड कॉल मिलती हैं और इस सेवा के जरिए अब 13 करोड़ लोगों से संवाद हो चुका है, जो प्रचार के कुल दायरे के आधे से अधिक है.
आइटी सेल के मुखिया अरविंद गुप्ता का कहना था, ‘‘हर कोई सिर्फ इंटरनेट की बात करता है, लेकिन असल में मोदी के प्रचार में सारा खेल मोबाइल फोन ने बदला है. इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार भारत में 20.5 करोड़ वेब यूजर हैं. भारत में मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या 2013 के अंत तक 91.59 करोड़ थी.’’
20 फरवरी को शुरू की गई एक नई पहल की ब्रांडिंग से पता चला कि मोदी का प्रचार किस तरह अकसर विपरीत परिस्थिति को अवसर में बदल देता है. 17 जनवरी को नई दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के दौरान मणि शंकर अय्यर ने कहा था कि मोदी भारत के प्रधानमंत्री तो कभी नहीं बन सकते, लेकिन सम्मेलन स्थल पर उन्हें चाय की दुकान लगाने के लिए जगह दी जा सकती है. मौका देखकर बीजेपी ने चाय की दुकानों पर नुक्कड़ सभाएं करने का फैसला किया और उन्हें ‘‘चाय पर चर्चा’’ का नाम दे दिया.
मार्च से अप्रैल तक जीपीएस लगे डिजिटल रथों का एक बेड़ा पूरे उत्तर प्रदेश और बिहार में गांव की चौपालों पर पहुंचा और 55 इंच के एलईडी पर्दों पर मोदी के भाषणों के अंश दिखाए.
आखिरी और शायद सबसे असरदार हथियार थ्री-डी रैलियों का आयोजन था, जो 10 अप्रैल से शुरू हुआ था. 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में थ्री-डी होलोग्राम के साथ मोदी के प्रयोग ने उन्हें 53 स्थानों पर एक साथ भाषण देने के कारनामे के लिए गिनेस वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह दिला दी. इन घटनाओं पर नाटकीय प्रतिक्रियाएं हुईं.
18 अप्रैल को अमृतसर में एक रैली में बीजेपी के कुछ समर्थकों ने मोदी के करीब जाने का फैसला किया, जब वे चुपचाप मंच की तरफ बढऩे लगे, तो सुरक्षाकर्मी हैरान होने की बजाए मुस्कराने लगे. समर्थक पहचान नहीं पाए कि उनके सामने मोदी नहीं बल्कि मोदी की होलोग्राफिक तस्वीर थी.

खड़े-खड़े सोचना
प्रचार की व्यापकता की एक और मिसाल यह है कि मोदी ने जैसे ही सुना कि बिहार पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, तो 2 मई के बाद से वे 3 दिन में एक बार की बजाए हर शाम थ्री-डी तस्वीर के रूप में उभरने लगे. मोदी ने अपने हाइटेक थ्री-डी स्टूडियो से कहा, ‘‘यह बड़े दुख की बात है कि एक तरफ भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र संपन्न हैं, तो दूसरी तरफ पूर्वी हिस्से में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर और ओडिसा पिछड़े हुए हैं.’’
थ्री-डी स्टूडियो सीएजी के हाथ में है, जिसे प्रमुख प्रचार प्रबंधक प्रशांत किशोर चलाते हैं. सीएजी के करीब एक हजार स्वयंसेवकों में से अनेक आइआइटी और आइआइएम से आए हैं. किशोर का कहना था, ‘‘हाइटेक प्रचार ने मोदी की लहर को कई मील बढ़ा दिया है.’’ वर्चुअल मोदी अब तक 1.4 करोड़ लोगों को संबोधित कर चुके हैं. यह दुनिया के इतिहास का अब तक का जबरदस्त अभियान है. खासकर उस देश में जो दुनिया में अपनी पारंपरिक छवि तोड़कर तेजी से उभरते देश की छवि गढऩे में लगा हुआ है.
मोदी इस प्रचार के साथ खुद की और देश की नई छवि गढ़ रहे हैं. हर बार उन्होंने मंदिरों, समुदायों या आस्थाओं की बजाए बदलाव लाने का संकल्प जाहिर किया है. इन सभाओं में उठने वाले मुद्दे उनके श्रोताओं के अनुसार चुने जाते हैं, पर संदेश एक ही है.
अब मोदी अपने क्रांतिकारी प्रचार के अंत में गंगा के तट पर खड़े हैं, लेकिन कई प्रश्न अनुत्तरित हैं. क्या वे भारत को भरोसा दिला पाए हैं कि वे विकास के हिमायती हैं, हिंदुत्व के नहीं? क्या उनका गुजरात मॉडल इतना लुभावना है कि गहराई में जमे बैठे जातीय समीकरणों पर हावी हो जाएगा? क्या वे वास्तव में अपने वादे पूरे कर सकेंगे? 3 लाख किमी से भी लंबा फासला तय करके मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए धरती से चांद तक की दूरी नाप ली है. प्रचार कोई छोटा कदम नहीं था, पर क्या अब वे लंबी छलांग लगा पाएंगे?
बीजेपी के चुनाव विशेषज्ञों ने पार्टी रणनीतिकारों को आगाह किया है कि बिहार में लालू प्रसाद यादव की जमीन मजबूत हो रही है जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपने-अपने वोट बैंक पर पकड़ बनाने लगी हैं. शाह और मोदी की खांटी गुजराती में छोटी-सी बातचीत का सार यह है कि मोदी 5 मई को राहुल के चुनाव क्षेत्र अमेठी में जाएंगे, ताकि प्रियंका गांधी को मीडिया में मिल रहे प्रचार पर विराम लग सके.
हर तरह की मीडिया के हर मंच पर सक्रिय बीजेपी का प्रचार तंत्र फौरन अमेठी हमले की तैयारी में जुट जाता है. इसी से पता चलता है कि मोदी की मशीनरी किस कदर प्रभावी है. नई दिल्ली में पार्टी के मीडिया सेल को बताया गया कि यह संदेश जारी कर दिया जाए.
पार्टी के दिल्ली मुख्यालय में राष्ट्रीय डिजिटल ऑपरेशन केंद्र को निर्देश दिया गया कि फेसबुक पर मोदी के कार्यक्रम को अपडेट कर दिया जाए और ट्विटर पर संदेश दे दिया जाए. इंडिया 272$ मोबाइल ऐप पर भी अपडेट किया गया और देशभर में 25 लाख सक्रिय वॉलंटियर को निर्देश भेज दिए गए. मिनटों में पूरा तंत्र अमेठी रणनीति से भर उठा, मानो यह मोदी के कार्यक्रमों में हमेशा से तय था.

गुजरात के मुख्यमंत्री गांधीनगर के अपने घर में 5 मई की सुबह 7.30 बजे जब रोज की तरह अपने प्रचार मैनेजरों के साथ बैठक के लिए पहुंचे तब तक अमेठी की विस्तृत जानकारी विमान में रख दी गई थी ताकि वे उड़ान के दौरान उसे पढ़ सकें. इसके पहले दो दिनों में वे उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में आठ रैलियों को संबोधित कर चुके थे. हर जगह की विस्तृत जानकारी के अलावा बाकी सब कुछ मोदी की वाक्पटुता और उनकी लोगों से जुडऩे की क्षमता के सहारे छोड़ दिया जाता है, भले ही लोग किसी इलाके के हों या कोई भाषा बोलते हों.
बाद में वे अमेठी की रैली में राहुल और प्रियंका पर वार शुरू करने के पहले बोले, ‘‘यह मेरी छोटी बहन स्मृति ईरानी है. मैंने इसे अमेठी भेजने के लिए चुना, लेकिन मां-बेटे (सोनिया गांधी और राहुल) के लिए नई समस्या खड़ी करने के लिए नहीं. मैंने इसे अमेठी की समस्या सुलझने के लिए भेजा है. मेरी छोटी बहन अमेठी का उससे ज्यादा ख्याल रखेगी, जितना आपकी अपनी बहन आपका ख्याल रखती है.’’ मोदी ने बताया कि अमेठी देश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार है क्योंकि ‘‘40 साल बेकार गए’’ और ‘‘तीन पीढिय़ां गंवा दी गईं.’’
रैली की सुबह बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने अमेठी की उपेक्षा पर आठ मिनट का वीडियो जारी किया. दोपहर तक ट्विटर पर नमो इन अमेठी की धूम थी और यूट्यूब पर ‘‘डॉक्युमेंटरी’’ दुनियाभर में देखी जा रही थी. आप देश में कहीं भी हों, जो भी राजनीति करते हों और चाहे जिसे वोट करते हों या न करते हों, मोदी का साया 2014 के लोकसभा चुनावों में लंबा दिख रहा है.
उनका अभियान इतना व्यापक है, भाषण में इतनी नाटकीयता है और उनके विकास का संदेश इतना स्पष्ट है कि उन्होंने विविधता भरे संसदीय चुनावों को राष्ट्रपति शैली में बदल डाला है. पिछले नौ महीने में मोदी 3 लाख किमी की यात्रा कर चुके हैं या कहें कि सात बार पृथ्वी का चक्कर लगा चुके हैं. वे 5,187 सभा-समारोहों में शामिल हुए और 25 राज्यों में 477 रैलियों को संबोधित कर चुके हैं. इस दौरान रोज वे महज पांच घंटे की नींद लेते हैं.
अनुमानित 2.3 करोड़ लोगों से इंटरनेट-मोबाइल टेलीफोन से संपर्क किया. यह संख्या ब्राजील की आबादी से अधिक है और दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डे से आने-जाने वालों की कुल सालाना संख्या का तीन गुना है. इन आंकड़ों को देखकर ओबामा का 2012 का राष्ट्रपति चुनाव अभियान भी शरमा जाए, जिससे मोदी मशीन ने जाना कि कैसे हर तरफ छा जाने वाला अभियान चलाया जाता है. मोदी को मानिए या खारिज कीजिए, लेकिन देश के इस सबसे विवादास्पद नेता ने साल भर में ही जैसे अपनी छवि का निर्माण किया, उससे चुनाव लडऩे के तरीके हमेशा के लिए बदल गए.

विकास को दी जुबान
मोदी अभियान के कारगर रहने की बड़ी वजह यह है कि वे बड़ी तेजी से विकास और सिर्फ विकास की बातें करने लगे. उन्होंने अपने मुक्त बाजार के अर्थशास्त्र को कांग्रेस के खर्चीले कल्याणकारी कार्यक्रमों के मुकाबले खड़ा किया, जो क्रियान्वयन की गड़बडिय़ों के कारण असर पैदा नहीं कर पाए. मोदी ने चाय बेचने वाले से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक पहुंचने की अपने जीवन की कहानी और गुजरात में विकास के पहिये को घुमाने में कामयाब मुख्यमंत्री के किस्सों के जरिए अपनी छवि एक ऐसे सशक्त नेता की बनाई, जिसकी देश को आकांक्षा है.
शिव नाडर विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स ऐंड क्रिटिकल थ्योरी के निदेशक दीपांकर गुप्ता कहते हैं, ‘‘जब 2009 में आर्थिक मंदी शुरू हुई, मोदी की विकास गाथा की साख बढऩे लगी. पिछले नौ साल से कांग्रेस सांप्रदायिकता बनाम सेकुलरिज्म का राग अलापती रही लेकिन मोदी वहां से आगे निकल गए. मोदी आज जहां हैं, उसके लिए उन्हें राहुल गांधी और मनमोहन सिंह को बदलते हालात के मुताबिक बदलाव न करने के लिए शुक्रिया अदा करना चाहिए.’’
चुनाव अभियान में आरएसएस की सक्रिय भागीदारी और हिंदुत्व की अपनी कट्टर छवि के बावजूद मोदी कट्टर दक्षिणपंथी एजेंडे से दूरी बनाए रखने में कामयाब रहे, जो लालकृष्ण आडवाणी 2004 और 2009 में नहीं कर पाए. अगर उनके संदेश पर यकीन करें तो मोदी अभियान ने भारतीय चुनावी राजनीति को नई परिभाषा दी है. यानी कुछ खास वोट बैंक के हितों का ख्याल रखने के बदले उन्होंने हर किसी की आकांक्षा की पूर्ति का वादा किया. यह राजनीति में नए मोड़ की तरह है.
समाज विश्लेषक और लेखक संतोष देसाई कहते हैं, ‘‘मोदी अभियान हर क्षेत्र और तबके को ध्यान में रखकर तैयार किया गया जबकि परंपरागत अभियान में खास जातियों की अपील का ध्यान रखा जाता था. जाति अब भी महत्वपूर्ण है लेकिन नई समझदारी यह है कि ग्रामीण और शहरी दोनों वर्गों की नजर भविष्य पर है. वे बेहतर जीवन पाने के लिए एक ही तरह से लालायित हैं.’’ सपनों के सौदागर मोदी ने सीधे इस तार को छेड़ा और मध्य वर्ग की चिंताओं और भरोसे को हवा देकर एक नए वोट बैंक का निर्माण कर लिया.
सोनीपत में ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर शिव विश्वनाथन कहते हैं, ‘‘मोदी ने हमें दिखाया कि विकास की अपनी बोली है. जैसे गुजरात मॉडल, बिहार मॉडल, राजस्थान मॉडल वगैरह. और अंत में वे कांग्रेस से ज्यादा प्रभावी लगने लगे. अपने सुनियोजित, विलक्षण अभियान के जरिए वे धर्मनिरपेक्षता ही नहीं, राष्ट्रवाद को भी साधने में कामयाब हो गए.’’

मोदीः कदम दर कदम
करीब साल भर पहले ही मोदी अभियान के चरण तैयार कर लिए गए थे और वे बिना थके-हारे या विचलित हुए इस महाभियान को अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब रहे. पहले चरण में, पिछले साल मार्च से सितंबर तक मोदी देश को और खासकर अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह समझते रहे कि वे बदलाव का वह चेहरा हो सकते हैं, जिसकी देश को शिद्दत से तलाश है.
उनका मिशन अपनी लोकप्रियता को साबित करने के लिए एक वक्त में एक भाषण देने का था. मोदी ने उन आयोजनों का आमंत्रण स्वीकार किया, जो देश के खास वर्गों को आकर्षित करता था-चाहे वह नई दिल्ली में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स का हो या फिक्की महिला संगठन का, या गूगल बिग टेंट हो या फिर 16 मार्च, 2013 को इंडिया टुडे कॉनक्लेव का जिसमें उन्होंने पहली दफा अपने ‘‘गुजरात मॉडल’’ को विस्तार से बताया था.
अभियान की रणनीतिक टोली के एक सदस्य कहते हैं, ‘‘मकसद बीजेपी नेतृत्व पर नीचे से दबाव बनाने का था. मोदी ने इसे अमेरिका में प्राइमरी चुनावों की शैली में अंजाम दिया, जिसमें उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था.’’
दूसरा चरण पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों को समर्पित था. इस दौरान मोदी ने सितंबर से लेकर नवंबर तक 55 रैलियों को संबोधित किया. लिहाजा, बीजेपी को राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सफाए में मदद मिली और छत्तीसगढ़ में पार्टी सत्ता में बनी रही. दिल्ली में भी वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के अचानक उभार ने उसकी चमक छीन ली. केजरीवाल अब वाराणसी में मोदी को चुनौती दे रहे हैं.
तीसरा चरण 9 दिसंबर से 13 मार्च का है जिसमें विभिन्न राज्यों में पार्टी की अंदरूनी समस्याओं को दुरुस्त करने, नई तकनीकी व्यवस्था कायम करने और नए सहयोगियों की तलाश से लेकर दूसरी पार्टी से आए उम्मीदवारों को साधने का काम अंजाम दिया गया. यह सब कुछ मार्च से मई तक के आखिरी चरण को अंजाम देने के मकसद से किया गया, जो सोहो स्क्वायर विज्ञापन एजेंसी के बनाए नारे ‘‘अबकी बार, मोदी सरकार’’ के साथ शुरू हुआ
इस चरण में मोदी ने 196 भारत विजय रैलियों में देश भर के क्षत्रपों पर उनके ही मैदान में उन पर वार करने का अभियान शुरू किया. मसलन, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से लेकर तमिलनाडु में जे. जयललिता और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव से लेकर बिहार में लालू प्रसाद यादव तक.
इस अभियान के दौरान मोदी ने अपने भाषणों में लोगों की दिली भावनाओं को छूने की कला विकसित की. वे उन्हें उनके इलाके के गौरव की याद दिलाने से शुरू करते और फिर स्थानीय समस्याओं पर आ जाते और उसकी तुलना गुजरात के लोगों की स्थितियों से करते. इसके बाद मोदी 60 साल के कांग्रेस राज की नाकामियों का जिक्र करके विरोधियों पर हमला करते, चुटकी लेते और मौका मिलने पर सुनहरे भविष्य का वादा करते.
स्थानीय भावनाओं को छूने के लिए उन्होंने बिहार के हाजीपुर के केला किसानों, कोलकाता में बांग्लादेशी घुसपैठियों और भुवनेश्वर में बेहिसाब आर्थिक पिछड़ेपन का मुद्दा उठाया. झारखंड में उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि कैसे झुमरी तलैया कभी आकाशवाणी में गानों की सिफारिश करने के लिए मशहूर था. मणिपुर के इंफाल में उन्होंने कहा कि नगालैंड में आर्थिक नाकाबंदी हो तो जिरीबम हाइवे को दुरुस्त करने से कैसे राज्य की तकलीफें कम हो सकती हैं.
मोदी विकास, आर्थिक प्रगति और ‘‘गुजरात मॉडल’’ की बात करके जैसे लोगों की भावनाओं को छूते हैं, उससे स्वाभाविक रूप से एक फिजा तैयार हो जाती है. कभी ब्रांड मोदी विभाजन और बहुसंख्यकवाद के लिए जाना जाता था लेकिन अब उसका अर्थ सुशासन से लिया जाने लगा है. मोदी के भाषणों में स्थानीय मंदिरों और देवताओं के जिक्र या धीरे से पृष्ठभूमि की याद दिलाकर छेड़ा जाने वाला हिंदुत्व राग कभी मुख्य पटकथा का हिस्सा नहीं बन पाता. लोगों में वे कैसा आवेग पैदा कर रहे हैं इसका एक उदाहरण यह है कि 24 अप्रैल को वाराणसी में उनके रोड शो के दौरान रेल पुल से गुजर रही ट्रेनों के यात्री बार-बार चेन खींचकर गाड़ी रोक ले रहे थे.

टेक्नोलॉजी पर सवार
गांधीनगर में मोदी की सुबह-सुबह की बैठकों में एक प्रमुख मुद्दा यह तय करने का होता है कि राहुल गांधी और मोदी के दूसरे राजनैतिक विरोधियों के भाषण कैसे सुने जाएंगे और उनमें उठे मुख्य मुद्दे मोदी तक कैसे पहुंचाए जाएं, जो दिन भर एक से दूसरी जगह हेलिकॉप्टर में उड़ते रहते हैं. मोदी के साथ सफर करते निजी सहायक ओम प्रकाश चंदेल विरोधी नेताओं के मुख्य कथन जमा कर लेते हैं और मोदी को सौंप देते हैं, ताकि अगले भाषण में वे जवाब दे सकें.
प्रचार की एक और बड़ी विशेषता यह है कि समय का पूरा ध्यान रखा जाता है, क्योंकि जरा सी भी देरी होने पर दिन के अन्य कार्यक्रम गड़बड़ा जाएंगे. मोदी के स्टाफ की सटीक योजना और संसाधनों की लगातार निगरानी के बल पर ही मोदी हर रात घर लौट आते हैं और अगले दिन के लिए ताजा दम रहते हैं.
बैंकर रह चुके अखिल हांडा आजकल मोदी समर्थित एनजीओ सिटिजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी के साथ) के लिए काम करते हैं. उनका कहना था, ‘‘मोदी जी की कम से कम 20 फीसदी जनसभाएं सटीक कार्यक्रम की देन हैं, जिससे वे ज्यादा रैलियों में भाषण दे पाते हैं.’’
मोदी का प्रचार उन नई-नई तकनीक विधियों पर टिका है, जिन्हें उनकी टीम ने संपर्क का दायरा फैलाने के लिए अपनाया है. चुनाव प्रचार में इंटरनेट और मोबाइल फोन की ताकत को फौरन पहचान कर मोदी ने शुरू में ही अपने चारों तरफ तकनीक को समझ्ने वाले समर्थक जुटा लिए, जिनका काम सूचना के प्रसार की समग्र व्यवस्था करना था. उन्हें सबसे पहला काम यह सौंपा गया कि 15 सितंबर को रेवाड़ी में हुई महारैली मोबाइल फोन पर दिख जाए.
रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों के सामने उनके संबोधन का लाइव प्रसारण देखने के लिए उपभोक्ता डायल कर सकते थे. पिछले नौ महीने में इस सेवा का दायरा बहुत फैल गया है. लोग अब मोदी के पहले से रिकॉर्ड किए गए क्लिप सुन सकते हैं, जिनमें वे महंगाई, विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर बोल रहे हैं. प्रचार से जुड़े एक अंदरूनी व्यक्ति ने बताया कि सिर्फ अप्रैल में ही 4501-4501 डायल करके 30 लाख से अधिक लोगों ने मोदी के भाषण सुने.
प्रचार का अगला तोहफा जनवरी में आया. यह तोहफा था, एंड्रॉयड उपकरणों के लिए इंडिया 272 प्लस मोबाइल ऐप और मोदी 4 पीएम दान अभियान. कार्यकर्ताओं ने पैसे जुटाने और मोदी के प्रचार के लिए खोमचे लगा लिए. आइटी सेल में लोगों का कहना है कि इस तरह अब तक 5 करोड़ रु. से ज्यादा जमा हो चुके हैं. प्रचार की लागत करीब 150 करोड़ रु. है, लेकिन इसमें टेलीविजन, रेडियो, पत्र-पत्रिकाएं शामिल नहीं हैं.
9 फरवरी को मोदी के फेसबुक पेज को पसंद करने वालों की संख्या एक करोड़ तक पहुंचने के एक सप्ताह बाद एक विशेष नमो नंबर जारी किया गया. इस नंबर 78200-78200 को भेजे गए एसएमएस, मिस्ड कॉल और व्हाट्सऐप संदेश ने उपभोक्ता को संभावित स्वयंसेवक के रूप में बीजेपी के डाटाबेस में शामिल कर दिया. प्रचार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि उन्हें रोजाना औसतन एक लाख मिस्ड कॉल मिलती हैं और इस सेवा के जरिए अब 13 करोड़ लोगों से संवाद हो चुका है, जो प्रचार के कुल दायरे के आधे से अधिक है.
आइटी सेल के मुखिया अरविंद गुप्ता का कहना था, ‘‘हर कोई सिर्फ इंटरनेट की बात करता है, लेकिन असल में मोदी के प्रचार में सारा खेल मोबाइल फोन ने बदला है. इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार भारत में 20.5 करोड़ वेब यूजर हैं. भारत में मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या 2013 के अंत तक 91.59 करोड़ थी.’’
20 फरवरी को शुरू की गई एक नई पहल की ब्रांडिंग से पता चला कि मोदी का प्रचार किस तरह अकसर विपरीत परिस्थिति को अवसर में बदल देता है. 17 जनवरी को नई दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के दौरान मणि शंकर अय्यर ने कहा था कि मोदी भारत के प्रधानमंत्री तो कभी नहीं बन सकते, लेकिन सम्मेलन स्थल पर उन्हें चाय की दुकान लगाने के लिए जगह दी जा सकती है. मौका देखकर बीजेपी ने चाय की दुकानों पर नुक्कड़ सभाएं करने का फैसला किया और उन्हें ‘‘चाय पर चर्चा’’ का नाम दे दिया.
मार्च से अप्रैल तक जीपीएस लगे डिजिटल रथों का एक बेड़ा पूरे उत्तर प्रदेश और बिहार में गांव की चौपालों पर पहुंचा और 55 इंच के एलईडी पर्दों पर मोदी के भाषणों के अंश दिखाए.
आखिरी और शायद सबसे असरदार हथियार थ्री-डी रैलियों का आयोजन था, जो 10 अप्रैल से शुरू हुआ था. 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में थ्री-डी होलोग्राम के साथ मोदी के प्रयोग ने उन्हें 53 स्थानों पर एक साथ भाषण देने के कारनामे के लिए गिनेस वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह दिला दी. इन घटनाओं पर नाटकीय प्रतिक्रियाएं हुईं.
18 अप्रैल को अमृतसर में एक रैली में बीजेपी के कुछ समर्थकों ने मोदी के करीब जाने का फैसला किया, जब वे चुपचाप मंच की तरफ बढऩे लगे, तो सुरक्षाकर्मी हैरान होने की बजाए मुस्कराने लगे. समर्थक पहचान नहीं पाए कि उनके सामने मोदी नहीं बल्कि मोदी की होलोग्राफिक तस्वीर थी.

खड़े-खड़े सोचना
प्रचार की व्यापकता की एक और मिसाल यह है कि मोदी ने जैसे ही सुना कि बिहार पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, तो 2 मई के बाद से वे 3 दिन में एक बार की बजाए हर शाम थ्री-डी तस्वीर के रूप में उभरने लगे. मोदी ने अपने हाइटेक थ्री-डी स्टूडियो से कहा, ‘‘यह बड़े दुख की बात है कि एक तरफ भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र संपन्न हैं, तो दूसरी तरफ पूर्वी हिस्से में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर और ओडिसा पिछड़े हुए हैं.’’
थ्री-डी स्टूडियो सीएजी के हाथ में है, जिसे प्रमुख प्रचार प्रबंधक प्रशांत किशोर चलाते हैं. सीएजी के करीब एक हजार स्वयंसेवकों में से अनेक आइआइटी और आइआइएम से आए हैं. किशोर का कहना था, ‘‘हाइटेक प्रचार ने मोदी की लहर को कई मील बढ़ा दिया है.’’ वर्चुअल मोदी अब तक 1.4 करोड़ लोगों को संबोधित कर चुके हैं. यह दुनिया के इतिहास का अब तक का जबरदस्त अभियान है. खासकर उस देश में जो दुनिया में अपनी पारंपरिक छवि तोड़कर तेजी से उभरते देश की छवि गढऩे में लगा हुआ है.
मोदी इस प्रचार के साथ खुद की और देश की नई छवि गढ़ रहे हैं. हर बार उन्होंने मंदिरों, समुदायों या आस्थाओं की बजाए बदलाव लाने का संकल्प जाहिर किया है. इन सभाओं में उठने वाले मुद्दे उनके श्रोताओं के अनुसार चुने जाते हैं, पर संदेश एक ही है.
अब मोदी अपने क्रांतिकारी प्रचार के अंत में गंगा के तट पर खड़े हैं, लेकिन कई प्रश्न अनुत्तरित हैं. क्या वे भारत को भरोसा दिला पाए हैं कि वे विकास के हिमायती हैं, हिंदुत्व के नहीं? क्या उनका गुजरात मॉडल इतना लुभावना है कि गहराई में जमे बैठे जातीय समीकरणों पर हावी हो जाएगा? क्या वे वास्तव में अपने वादे पूरे कर सकेंगे? 3 लाख किमी से भी लंबा फासला तय करके मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए धरती से चांद तक की दूरी नाप ली है. प्रचार कोई छोटा कदम नहीं था, पर क्या अब वे लंबी छलांग लगा पाएंगे?

