scorecardresearch

मनमोहन सिंह क्यों हुए नाकाम?

भारत का चहेता प्रधानमंत्री कैसे हो गया लाचार, असली कहानी उनके करीबी सिपहसालार की जुबानी. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर: द मेकिंग ऐंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह में परत-दर-परत किए हैं कई अंदरुनी खुलासे. पढ़िए पुस्तक के खास अंश भी.

अपडेटेड 21 अप्रैल , 2014
राजधानी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सैटरडे क्लब की थकी-सी एकेडमिक चर्चाओं से लेकर सात रेसकोर्स रोड के व्यस्त माहौल तक 2004 में मनमोहन सिंह का उदय अभूतपूर्व था. भारत में आर्थिक उदारवाद का जनक अब यूपीए सरकार का शिखर पुरुष बन चुका था और उसे युवा उत्तराधिकारी के लिए गद्दी की हिफाजत करनी थी. यह प्रयोग कामयाब होना चाहिए था. सोनिया गांधी पार्टी चला रही थीं और मनमोहन सिंह को सरकार चलानी थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. प्रधानमंत्री कार्यालय में वरिष्ठ अधिकारी एम.के. नारायणन से लेकर जूनियर मंत्री जयराम रमेश और प्रधानमंत्री कार्यालय में उनके सहायक पृथ्वीराज चव्हाण तक सबको लगता था कि उनकी वफादारी सोनिया गांधी के लिए है.

कैबिनेट के वरिष्ठ सदस्य हमेशा उनकी अनदेखी करते थे और कुछ तो उन्हें अपनी विदेश यात्राओं की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझते थे या उन्हें प्रधानमंत्री जी भी नहीं कहते थे. उनकी चुप्पी, विशेषकर साथियों के भ्रष्टाचार पर चुप्पी उन्हें ले डूबी. इतना ही नहीं, जॉर्ज बुश के साथ अपनी मनपसंद परमाणु डील करने का उनका सबसे गौरवशाली पल भी सौदेबाजी के कलंक से अछूता नहीं रहा. उनके 59 वर्षीय मीडिया सलाहकार संजय बारू दो दशक से मनमोहन को जानते थे. 2008 में पद छोडऩे से पहले तक वे सब कुछ करीब से देख रहे थे. बारू पीएमओ के ऐसे कद्दावर सदस्य थे, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने इस दफ्तर का कद घटते देखा. अगर देखा जाए तो जे.एन. दीक्षित की अचानक मृत्यु के बाद शायद बारू प्रधानमंत्री के सबसे करीबी सहायक थे.
 
दस साल तक दुनिया के सबसे बड़े और सबसे जटिल लोकतंत्र की बागडोर संभालने के बाद जब मनमोहन प्रधानमंत्री पद छोडऩे को तैयार हैं, तब आई संजय बारू की पुस्तक द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टरः द मेकिंग ऐंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह  उस कायदे की तरह लगती है, जिसमें बताया गया है कि सत्ता में क्या नहीं करना चाहिए. मीडिया में उभारे जाने की सलाह का सख्ती से विरोध, 2009 में लोकसभा चुनाव लडऩे से इनकार, प्रमुख नियुक्तियां अपने सिर के ऊपर होने देने की छूट देकर सरकार पर नियंत्रण छोडऩा और सरे आम राहुल गांधी के हाथों अपमानित होने के बावजूद पद न छोडऩा.

बारू का कहना है कि मनमोहन जो विरासत छोड़कर जा रहे हैं, असल में वह उनकी नियति नहीं है. बारू ने प्रधानमंत्री की तुलना भीष्म पितामह से की है, जिन्होंने सिंहासन की रक्षा करने की अटूट शपथ ली थी. उनका कहना था कि राजवंश के प्रति बेलौस वफादारी किसी राजतंत्र में भीष्म पितामह का दायित्व रही होगी, लेकिन मनमोहन के लिए यह बहुत खतरनाक भूल साबित हुई. महान उदारवादी से वे महान विनाशक बन गए, जिसने अपनी शाख और सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री कार्यालय की साख डुबो दी.
मनमोहन सिंह के साथ संजय बारू
(मनमोहन सिंह के साथ संजय बारू)
संजय बारू की किताब के अंश:
"प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का नौकरशाह में वजन नहीं था"
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव की ताकत और अहमियत इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी प्रशासनिक सेवा में कैसी साख है और राजनीति में उसका कितना रसूख है. दरअसल प्रधान सचिव वह अफसर है जो प्रधानमंत्री और बाकी मंत्रियों के बीच प्रशासनिक सेतु का काम करता है. और जरूरत पडऩे पर वह बाकी विभागों के सचिवों और पीएम के बीच एक कड़ी बन जाता है. सत्ता की इस संवेदनशील कुर्सी पर बैठने के कारण प्रधान सचिव के पास ज्यादा अधिकार होते हैं और वह नीतियों को प्रभावित कर सकता है. अतीत पर नजर डालें तो ज्यादातर प्रधान सचिव बहुत तेज शख्स रहे हैं जिन्हें अपने हुक्मरान औैर मातहतों, दोनों से पूरा सम्मान मिला.

इंदिरा गांधी के पीएमओ में पी.एन. हकसर, राजीव गांधी के पी.सी. अलेक्जेंडर, पी.वी. नरसिंह राव के ए.एन. वर्मा, देवेगौड़ा के सतीश चंद्रन, गुजराल के एन.एन. वोहरा और वाजपेयी के बृजेश मिश्र. वैसे बीच-बीच में कुछ कम चमकदार अफसर भी इस ओहदे की शोभा बढ़ाते रहे हैं.

मनमोहन सिंह के पीएमओ में एक विशेष सलाहकार का पद भी बनाया गया. इसका मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एम.के. नारायणन को नियुक्त करना था. आंतरिक सुरक्षा उनके जिम्मे कर दी गई. इसमें कोई शक नहीं कि जे.एन. ‘‘मणि’’ दीक्षित इन तीनों (नारायणन, नायर और दीक्षित) में सबसे ज्यादा प्रभावशाली  व्यक्तित्व थे. उनकी हैसियत की वजह से टी.के.ए. नायर कभी वैसे प्रधान सचिव नहीं बन सके, जैसे उनके पहले के लोग थे. वैसे नायर से एकदम पहले बृजेश मिश्र प्रधान सचिव तक ही सीमित नहीं थे. मैंने एक बार मजाक में डॉक्टर सिंह से कहा था कि वाजपेयी के समय प्रधान सचिव ऐसे काम करता था, जैसे वही प्रधानमंत्री हो, जबकि उनके बारे में कहा जाता है कि प्रधानमंत्री सिंह असल में प्रधान सचिव की तरह काम करते थे. यह कथन हर बारीकी पर गौर करने, प्रशासन के हर छोटे काम में दखल देने और अधिकारियों के साथ लंबी थकाऊ बैठकों की अध्यक्षता करने  की डॉक्टर सिंह की आदत के बारे में था. वाजपेयी ऐसा बहुत कम करते थे. डॉक्टर सिंह ने इस बात को अनसुना कर दिया. वे अच्छी तरह जानते थे कि यह व्यंग्य बाण है, जिससे साबित होता है कि राजनैतिक बॉस सोनिया थीं.

नायर, प्रधान सचिव के पद के लिए डॉक्टर सिंह की पहली पसंद नहीं थे. वे वोहरा को लेना चाहते थे, जिन्होंने मुझे मेरी नियुक्ति की खबर दी थी. वोहरा न सिर्फ अब पाकिस्तान का हिस्सा बन चुके पश्चिमी पंजाब के हमसफर शरणार्थी थे, बल्कि दोनों ने पंजाब विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी था. वोहरा डॉक्टर सिंह के कुछ साल बाद ऑक्सफॉर्ड भी गए थे. वोहरा ने तो पीएमओ में काम करने के लिए लंदन की अपनी यात्रा भी रद्द कर दी थी. वैसे सोनिया गांधी के दिमाग में एक और रिटायर्ड तमिल आइएएस अधिकारी का नाम था, यह नाम बताने की छूट मुझे नहीं है. उन्होंने राजीव गांधी के साथ काम किया था और उनकी छवि काबिल और ईमानदार अफसर की थी. उन्होंने सिद्धांत रूप में सरकार में फिर शामिल होने का सोनिया का निमंत्रण ठुकरा दिया, क्योंकि उन्होंने अपने पिता से वादा किया था कि रिटायर होने के बाद फिर सरकारी नौकरी नहीं करेगा.

इन दोनों प्रतिष्ठित अधिकारियों का नाम कटने के बाद डॉक्टर सिंह ने नायर का रुख किया. रिटायर होने से पहले नायर गुजराल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के सचिव रह चुके थे और पंजाब के मुख्य सचिव भी रहे थे. नायर के नाम का डॉक्टर सिंह के पारिवारिक मित्र रक्षपाल मल्होत्रा ने जबरदस्त समर्थन किया था. मल्होत्रा चंडीगढ़ में सेंटर फॉर रिसर्च ऑन रूरल ऐंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (सीआरआरआइडी) के अध्यक्ष थे. डॉक्टर सिंह खुद उसके अध्यक्ष रह चुके थे और नायर संचालक मंडल के सदस्य थे. गुजराल के पीएमओ में काम करने को छोड़ दिया जाए तो नायर ने कभी भी गृह, वित्त और रक्षा जैसे ताकतवर मंत्रालय में सचिव का पद नहीं संभाला था और न ही किसी प्रमुख आर्थिक मंत्रालय में रहे थे. वे सिर्फ ग्रामीण विकास और पर्यावरण तथा वन जैसे कम ताकतवर मंत्रालयों में सचिव रहे थे. मतलब नौकरशाही में उनका वजन कम था.

नाटे कद के नायर हमेशा सजे-धजे रहते थे, लेकिन उनका कद बृजेश मिश्र जैसा न था. मिश्र का दबंग व्यक्तित्व अपने आप ध्यान खींच लेता था. नायर किसी भी फाइल पर शायद ही कोई स्पष्ट या दिलेर राय देते थे और हमेशा कृपया चर्चा करें लिखकर दस्तखत कर देते थे. वे संयुक्त सचिवों और उप-सचिवों जैसे कनिष्ठ अधिकारियों को मौखिक निर्देश देना पसंद करते थे. फिर मातहत अफसरों को इन निर्देशों को अपनी सलाह के रूप में फाइल पर लिखना होता था. यह जोखिम से बचने का खांटी नौकरशाही तरीका है, ताकि खुद कभी किसी विवाद या मुसीबत में न फंसें. नायर अहम नीतिगत फैसलों के लिए संयुक्त सचिव पुलक चटर्जी पर बहुत निर्भर रहते थे, जो राजीव और सोनिया गांधी के साथ काम कर चुके थे.

पुलक भी नायर की तरह इस गम से पीड़ित थे कि उनकी अपनी सेवा ने कभी उन्हें प्रतिष्ठा नहीं दिलाई. मौजूदा आइएएस अधिकारी पुलक ने कभी किसी बड़े मंत्रालय में काम नहीं किया. उन पर राजीव गांधी की नजर उत्तर प्रदेश में अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में जिला अधिकारी के रूप में पड़ी और उसके बाद के राजीव के पीएमओ में उपसचिव बनकर आ गए. राजीव की मृत्यु के बाद उन्होंने राजीव गांधी फाउंडेशन में काम करना पसंद किया और कुछ अच्छा सामाजिक विकास का काम किया, लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि उनका नाम पूरी तरह से गांधी परिवार के साथ जुड़ चुका था. सरकार में पुलक की वापसी सोनिया गांधी के निजी स्टाफ में हुई, जब वे लोकसभा में विपक्ष की नेता थीं.

पुलक सोनिया गांधी की सिफारिश पर पीएमओ में शामिल हुए. वे करीब-करीब रोजाना सोनिया से मिलते थे और उन्हें उस दिन के नीतिगत मुद्दों पर जानकारी देते थे. पुलक ही वह शख्स थे जो प्रधानमंत्री कार्यालय से मंजूर होने वाली प्रमुख फाइलों पर सोनिया गांधी से निर्देश लेते थे. असल में तो पुलक ही प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया के बीच नियमित संपर्क की सबसे अहम कड़ी थे. वे सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के लिए भी पीएमओ में मुख्य संपर्क थे.

इस मिली-जुली ताकत के बावजूद मुझे लगता था कि नायर और पुलक की जोड़ी बृजेश मिश्र के सामने नहीं टिकती है. बृजेश मिश्र ने वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यालय को बहुत अच्छी तरह चलाया. मध्य प्रदेश के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री के पुत्र मिश्र ने भले ही राजनय की ट्रेनिंग ली थी, पर राजनीति उनके खून में थी और वे अच्छी तरह जानते थे कि गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री का दबदबा बढ़ाने के लिए कौन-सी चाल चली जाए. मिश्र की एक और सबसे बड़ी खासियत थी. वे जोखिम उठाने से नहीं डरते थे. वहीं नायर और पुलक, दोनों ही अफसरों में इस जरूरी गुण की कमी थी. सियासत और प्रशासन के नाजुक मौकों पर मिश्र डटकर फैसला लेने और प्रधानमंत्री की तरफ से मामले को आगे बढ़ाने को तैयार रहते थे. किसी प्रधानमंत्री के लिए यह सबसे बड़ी सहूलियत होती है. उन्होंने मई 1998 में वाजपेयी के साथ परमाणु परीक्षण करने और भारत को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित करने का फैसला लेकर यह नाम कमाया था. मिश्र की हैसियत ने सरकार के भीतर वाजपेयी का दबदबा बढ़ाया और मजबूत किया. लेकिन यह हैसियत नायर ने कभी हासिल नहीं की.
                                    ***
‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एक तरह से आइबी और रॉ के बॉस बन बैठे’’
प्रधानमंत्री ने खुफिया प्रमुखों से रोजमर्रा की ब्रीफिंग लेने से इनकार किया

मुझे यह साफ एहसास हो गया कि डॉ. सिंह का उनसे (मणि दीक्षित) बेहतर संबंध था, जो नारायणन के साथ कभी नहीं हो पाया था. यह भी लग रहा था कि सोनिया के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए नारायणन को पीएमओ में तीसरी शक्ति के रूप शामिल किया गया था. एमके या माइक, जैसा कि उनके समकालीन उन्हें बुलाते थे, राजीव गांधी और नरसिंह राव दोनों के ही दौर में देश की आंतरिक खुफिया एजेंसी खुफिया ब्यूरो (आइबी) के प्रमुख रहे थे. उन्होंने यह वफादारी 1957 में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद मंत्रिमंडल को बरखास्त करने में भूमिका निभाकर हासिल की थी. राजीव हत्याकांड के दौरान भी वे आइबी के निदेशक थे. नारायणन का पसंदीदा जुमला हुआ करता था, ‘‘मेरे पास आपके नाम की एक फाइल है.’’ वे मंत्रियों, अधिकारियों, पत्रकारों और ऐसे अन्य लोगों से मिलने पर हंसते हुए यह जुमला उछाल देते और सामने वाले के मन में यह घबराहट पैदा कर देते कि क्या पता, वे मजाक न कर रहे हों.

असल में नारायणन ने खुद ही ऐसी अफवाहों को तूल दी थी कि वे हर किसी की ताक-झांक करने की फिराक में रहते हैं. मुझे यह बताकर वे काफी खुश लग रहे थे कि वे सभी प्रभावशाली संपादकों के क्रेडिट कार्ड से खर्च पर नजर रखते हैं. प्रधानमंत्री के विमान में लंबी यात्राओं के दौरान वे हमें ऐसी कहानियां सुनाया करते कि कैसे कई प्रधानमंत्रियों ने अपने साथियों पर नजर रखने के लिए उन्हें बुलाया था.

अगर वे कहानियां सही थीं तो डॉ. सिंह अपवाद हैं. उन्होंने न सिर्फ अपने साथियों की जासूसी के लालच पर काबू पाया, बल्कि खुफिया प्रमुखों से रोजाना ब्रीफिंग लेने से इनकार करके ऐसी खबरें हासिल करने के मौके से हाथ धो लिया. वे ऐसा करने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं. इसके बदले आइबी और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुखों को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) से मिलने को कहा गया. मुझे नहीं लगता कि खुफिया एजेंसियों के प्रमुख प्रधानमंत्री के बदले किसी दूसरे से सारी खबरें सही-सही बताते होंगे और वे प्रधानमंत्री से ही सीधे रोज की ब्रीफिंग पर जोर देते रहे. कभी-कभी प्रधानमंत्री इस तरह की ब्रीफिंग लेते थे, लेकिन असल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ही उनके बॉस बन गए थे.

दीक्षित की जगह जब नारायणन एनएसए बनाए गए तो उन्होंने इस अधिकार का हद दर्जे तक इस्तेमाल किया. यह दौर बिना विवाद के नहीं रहा. रॉ के अधिकारियों ने उन पर आइबी को ज्यादा तवज्जो देने का आरोप लगाया. समूची व्यवस्था पर उनकी पुख्ता पकड़ की एक वजह उनकी पेशेवर काबिलियत थी तो दूसरी वजह अफसरी न झाडऩे के कारण मातहतों से मिलने वाला सम्मान था. उनका मकसद होता था कि काम पूरा होना चाहिए, इसके लिए भले ही उन्हें काफी छोटे अफसरों से सीधे ही बात क्यों न करनी पड़े. वे दोस्तों से बातचीत करते हुए मुझे ‘‘ईडी’’ पुकारते थे यानी जो नाम एफबीआइ के ताकतवर बॉस जे. एडगर हूवर के लिए लिया जाता रहा है, जिनसे अमेरिका के राष्ट्रपति भी घबराया करते थे. डॉ. सिंह भी नारायणन की प्रतिष्ठा से सतर्क रहते थे और रहना भी चाहिए. कभी-कभी जब वे अपना कोई संवेदनशील काम मुझे सौंपते तो साफ इशारा करते कि इसके बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए.
                                       ***
‘‘नैतिकता के मामले में खुद पर सख्त लेकिन दूसरों पर लुंजपुंज रवैया’’
मनमोहन अपने साथियों के भ्रष्टाचार पर आंख मूंदे रहे

मुझे लगता है कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के बारे में मनमोहन सिंह ने ताजिंदगी एक ही रवैया अपनाया. यही कि वे खुद तो शुचिता के ऊंचे मानदंड अपनाए रहेंगे लेकिन उसे दूसरों पर नहीं थोपेंगे. दूसरे शब्दों में वे खुद तो कतई भ्रष्ट नहीं हैं और यह भी ध्यान रखते हैं कि उनका कोई करीबी परिजन भी कभी कुछ गलत न करे, लेकिन वे अपने साथियों और मातहतों की गड़बडिय़ों के लिए खुद को जवाबदेह नहीं मानते. इस मामले में वे खुद को कुछ कमतर मानते थे क्योंकि उन लोगों को मंत्री पद पर नियुक्त करने वाले राजनैतिक अधिकारी वे नहीं थे. इसका व्यावहारिक मतलब यह था कि वे अपने मंत्रियों की करतूतों पर आंख मूंदे रहते थे. उन्हें कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व से उम्मीद थी कि वह उनकी सरकार के दागियों पर कार्रवाई करेगा. इसी तरह वे सहयोगी दलों से चाहते थे कि वे अपने दागियों से निबटें. वे जो भी कर रहे हैं, उसके बारे में उनका अंतरमन हमेशा सजग था और वे चाहते थे कि दूसरे भी अपने विवेक का इस्तेमाल करें.

जब डीएमके के मंत्री ए. राजा के रूप में उनका एक साथी पकड़ा गया, तो उन्होंने कानून को अपना काम करने दिया. राजा गिरफ्तार हुए, 15 महीने तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में न्यायिक हिरासत में रहे और अब 2जी घोटाले में मुकदमा झेल रहे हैं. डॉ. सिंह का रवैया अपने लिए कड़ी नैतिकता का पालन लेकिन दूसरों के मामले में लचीला बने रहना है. नैतिकता के इसी दोहरे मानदंड के कारण यूपीए-1 में लोगों की राय उनके बारे में इतनी खिलाफ नहीं हुई थी क्योंकि मामले तब खुले नहीं थे. उनके पहले कार्यकाल में मीडिया का फोकस उनकी नीतिगत पहल पर था.

लेकिन यूपीए-2 में जब घोटाले खुलने लगे तो उनकी सार्वजनिक छवि को भारी झटका लगा, जिससे उबर पाने में वे नाकाम रहे क्योंकि ऐसी कोई नीतिगत पहल बची नहीं थी जिससे स्थिति पलट जाती. दूसरे शब्दों में, ऐसी कोई सकारात्मक पहल लोगों को प्रभावित नहीं कर पाई ताकि गड़बडिय़ों का नकारात्मक असर मिटाया जा सके.
                                     ***
सोनिया गांधी
‘‘मैं नहीं चाहता कि आप मेरी छवि चमकाएं’’
प्रधानमंत्री ने नरेगा और यूपीए की दूसरी बार जीत का श्रेय राहुल को लेने दिया जब मनरेगा जैसी योजना राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और ग्रामीण विकास मंत्रालय से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) तक पहुंची तो डॉ. सिंह ने जोश-खरोश से इसका स्वागत किया क्योंकि वे महाराष्ट्र में इस तरह के प्रयासों से परिचित थे. 1980 के दशक में योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में डॉ. सिंह ने इस योजना का अध्ययन किया था और वे इससे काफी प्रभावित थे. इसलिए वे इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने के पक्ष में थे और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी ऐक्ट (मनरेगा) कमोबेश एमईजीएस (महाराष्ट्र रोजगार गारंटी योजना) का ही रूप थी.

मनरेगा पर एक ओर पीएमओ और वित्त मंत्रालय, दूसरी ओर एनएसी में तथाकथित मतभेद मुख्यतः प्रोग्राम के वित्तीय पहलुओं पर थे कि राजकोष पर इससे कितना अतिरिक्त भार पड़ेगा. यह राष्ट्रीय आय का 1 से 3 फीसदी तक हो सकता था. न तो डॉ. सिंह, न पी. चिदंबरम खुली वित्तीय व्यवस्था चाहते थे, क्योंकि प्रोग्राम का खर्च इस पर निर्भर होता कि कितने लोग इससे लाभान्वित होते हैं. यानी मनरेगा के तहत रोजगार पाने वाले को कितने दिन और एक निश्चित मजदूरी पर रोजगार मिलेगा. दूसरे शब्दों में सरकार साल के शुरू में यह तय नहीं कर सकती थी कि योजना का लाभ उठाने को कितने लोग आगे आएंगे.

कभी फिजिक्स के प्रोफेसर रह चुके और जमीन से जुड़े नेता ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह का डॉ. सिंह बहुत आदर करते थे और स्नेह भी रखते थे. डॉ. प्रसाद ने वित्तीय सीमाओं और लोक लुभावन नीति के बीच की दूरी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

मनरेगा का पूरा श्रेय गांधी परिवार को देने का कांग्रेस पार्टी का उन्माद इस हद तक पहुंच गया था कि खुद गांधी परिवार को भी शायद झिझक होने लगी. जब मैंने इसे सुधारने की कोशिश की तो मैं एक मुसीबत में फंस गया. 26 सितंबर, 2007 को कांग्रेस महासचिव नियुक्त किए जाने के थोड़े दिन बाद ही राहुल गांधी एक प्रतिनिधिमंडल के साथ डॉ. सिंह को उनके जन्मदिन पर बधाई देने पहुंचे. नाश्ता करने के बाद प्रतिनिधिमंडल नीतियों और मुद्दों पर विचार करने बैठ गया. मीटिंग के अंत में सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने मीटिंग के बारे में एक टिप्पणी लिखकर इसे प्रेस में जारी करने को कहा.

इसमें दावा किया गया था कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से नरेगा (महात्मा गांधी का नाम जोड़े जाने से पहले यह इसी नाम से जानी जाती थी) का दायरा देश के 500 ग्रामीण जिलों तक बढ़ाने का अनुरोध किया. तब यह देश के 200 बेहद पिछड़े जिलों में ही लागू की जाती थी. मैंने पटेल से कहा कि पीएमओ में प्रधानमंत्री से मिलने आने वाले नेताओं की ओर से प्रेस स्टेटमेंट जारी करने का नियम नहीं है. मैंने यह भी कहा कि मैं खुद एक स्टेटमेंट तैयार करूंगा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी सचिवों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री को शुभकामनाएं देने आया. जहां तक स्टेटमेंट के राजनैतिक अंश का सवाल है तो मैंने सुझाव दिया कि बेहतर हो, ऐसा बयान पार्टी कार्यालय से जारी किया जाए.

उस शाम बाद में इंडियन एक्सप्रेस के एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे फोन कर यह जानने की कोशिश की कि क्या डॉ. सिंह ने राहुल का यह सुझाव मान लिया है कि नरेगा का दायरा पूरे देश में फैला दिया जाएगा. मैंने उन्हें याद दिलाया कि प्रधानमंत्री अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इसकी प्रतिबद्धता दिखा चुके हैं और यह भी कि पीएमओ इस मामले में ग्रामीण विकास मंत्रालय और वित्त मंत्रालय से बात कर रहा है.

उसी शाम टीवी चौनलों ने बड़े जोश के साथ कांग्रेस पार्टी के बयान को पेश किया कि राहुल ने प्रधानमंत्री से नरेगा को पूरे देश में ले जाने का अनुरोध किया है. अगली सुबह समाचार पत्रों मंा भी यह खबर छपी दिखाई दी. सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर में अतिरिक्त मैटर जोड़ा, ‘‘सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी के पार्टी पद पर आने से पहले ही यह मामला पीएमओ के ध्यान में था. प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव वित्त मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय और योजना आयोग से दो हफ्ते पहले इस पर विचार कर चुके हैं.’’

जोश में मैंने एक पत्रकार को, जो प्रोग्राम के राष्ट्रीय स्वरूप के बारे में जानना चाहते थे, एक एसएमएस भेजा कि यह घोषणा प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर उनकी ओर से देश को एक तोहफा है. आखिरकार यदि सोनिया या राहुल देश के प्रधानमंत्री होते तो पार्टी की ऐसी ही रणनीति होती और नेता के जन्मदिन पर ऐसी घोषणा होती.

बाद में मुझे पता चला कि वह एसएमएस घूमता-घूमता पार्टी नेतृत्व तक पहुंच गया. एक वरिष्ठ नेता ने एक संपादक से कहा, ‘‘यह बारू क्या सोचता है? उसके ख्याल से डॉक्टर साहेब हमें चुनाव जितवा सकते हैं? हम राहुलजी की छवि निखारना चाहते हैं, और इस तरह के एसएमएस मददगार नहीं हो सकते.’’

जब मैंने यह सुना तो समझ गया कि मैं गले तक मुसीबत में धंस गया हूं. जैसी कि उम्मीद थी, प्रधानमंत्री ने लताडऩे के लिए मुझे बुलाया. जब मैं उनके कमरे के उपकक्ष में पहुंचा तो नायर, नारायणन और पुलक वहां से निकलते दिखे. तीनों ने मुझसे नजरें चुराने की कोशिश की. तब मुझे एहसास हो गया कि मामला गंभीर बन गया है. वहां देखा तो डॉ. सिंह बांह मोड़े बैठे थे, चेहरे पर गुस्सा साफ महसूस किया जा सकता था.
                                         ***
राहुल गांधी

‘‘आपने कुछ पत्रकारों को इस आशय का एसएमएस भेजा कि नरेगा का विस्तार मेरे जन्मदिन का तोहफा है?’’
‘‘हां, मैंने किया, लेकिन मजाक में...’’ प्रधानमंत्री चुप्पी साधे हुए थे, मैंने चुप्पी तोड़ी, ‘‘पार्टी इस फैसले का सारा श्रेय राहुल को देना चाहती है, लेकिन आप और रघुवंश प्रसाद को भी उतना ही श्रेय है.’’

‘‘मुझे किसी चीज का श्रेय नहीं चाहिए.’’ प्रधानमंत्री अब भी गुस्से से लाल थे.

‘‘सर, मेरा काम है आपकी अच्छी छवि पेश करना और आप जिस राजनैतिक श्रेय के हकदार हैं, उसे आपके लिए सुरक्षित रखना मेरी जिम्मेदारी है. पार्टी को सोनिया और राहुल के लिए यह करने दीजिए, आपके लिए मुझे यह करना होगा.’’
                                     ***
‘‘नहीं,’’ प्रधानमंत्री फिर बोले, ‘‘मैं नहीं चाहता कि आप मेरी कोई छवि बनाएं.’’
सीएनएन-आइबीएन रिपोर्टर ने पृथ्वी (पृथ्वी राज चव्हाण जो अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं) से पूछा, ‘‘तो इस जीत का सेहरा किस के सिर है? सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह?’’ पृथ्वी को डॉ. सिंह ने पीएमओ में अपना राज्य मंत्री चुना था और खास उपलब्धि न होने के बावजूद वे पूरे पांच साल वहां रहे. उन्होंने हवा के रुख को देखते हुए जवाब दिया, ‘‘दोनों को.’’ और जोड़ दिया, ‘‘यह जीत राहुल गांधी और उनके काम को है. उनके काम ने जीतने में मदद की.’’

और उनका बयान सरकारी मंत्र बन गया. हर पार्टी वफादार का दावा था कि 2009 की चुनावी जीत का श्रेय राहुल गांधी को है. जीत के जश्न के उन पलों में उस शख्स को किसी ने श्रेय नहीं दिया जिसने यह संभव कर दिखाया था.

मैं सोच रहा था कि यदि कांग्रेस हार जाती तो हार का ठीकरा निश्चित रूप से प्रधानमंत्री के सिर फोड़ा जाता. कहा जाता कि परमाणु करार के प्रति प्रेम की वजह से पार्टी से वामपंथियों और मुसलमानों का समर्थन जाता रहा. उनकी ‘‘नव-उदार’’ नीतियों की वजह से गरीब तबके के छिटक जाने का दोष मढ़ा जाता. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से दोस्ती के उनके प्रयासों को हिंदू वोट खिसक जाने की वजह माना जाता. यानी हार के लिए प्रधानमंत्री को दोषी ठहराने की हजार वजह तलाश ली जातीं.
 
चुनाव के बाद डॉ. सिंह ने ज्यादा मुखर रुख अपनाने की कोशिश की कि कौन उनके मंत्रिमंडल में शामिल होगा और कौन नहीं. उन्होंने डीएमके के विवादित छवि के राजा और टीआर बालू को मंत्रिमंडल में लेने में हिचक दिखाई. मैं दूर खड़ा देख रहा था कि डॉ. सिंह दबाव के आगे नहीं झुकेंगे. वे बालू को दूर रखने में कामयाब रहे लेकिन अपनी पार्टी के दबाव के चलते राजा को लेना पड़ा. यह इसी संदेश की पुष्टि थी कि जीत उनकी नहीं बल्कि प्रथम परिवार की थी.
                                        ***
‘‘वे मीडिया और जनता में सोनिया गांधी से अधिक लोकप्रिय नहीं होना चाहते थे.’’
प्रधानमंत्री की लो प्रोफाइल यानी प्रचार से दूर रहने की आदत को यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में तो सराहना की दृष्टि से देखा गया लेकिन यूपीए- 2 यानी दूसरे कार्यकाल में इसकी आलोचना की गई.
यहां यह कहना भी जरूरी है कि यूपीए -1 में डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया के साथ संबंध मधुर रहे. उनकी समस्या यह थी कि वे मीडिया और जनता में सोनिया गांधी से अधिक  लोकप्रिय नहीं बनना चाहते थे. जब भी किसी टीवी चैनल या समाचार पत्रिका की ओर से करवाए गए जनमत संग्रह में दिखाया जाता कि उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है, लेकिन सोनिया गांधी से नीचे है तो वे राहत की सांस लेते और चौकन्नी मुस्कान से कहते, ‘‘शुक्र है.’’ यही उनकी ब्रांड बिल्डिंग और लोकप्रियता हासिल करने की सीमा थी.
डॉ. सिंह की ‘‘चुप्पी’’ और खुद को ताकतवर नेता के रूप में पेश न करने के इरादे को यूपीए-2 में आलोचना की दृष्टि से देखा गया.
                                      ***
‘‘अपनी बैठकों के बारे में प्रधानमंत्री को जानकारी देना ‘‘भूल जाते’’ थे प्रणब मुखर्जी’’
मनमोहन का अपने कैबिनेट सहयोगियों पर नियंत्रण नहीं है.
अब देश के राष्ट्रपति बन चुके प्रणब मुखर्जी अपना समर्थन या मतभेद व्यक्त करने में इतने पारदर्शी कभी नहीं रहे. वाशिंगटन डीसी से एक महत्वपूर्ण मीटिंग से लौटने के बाद प्रणब ने तीन दिन तक प्रधानमंत्री से दौरे के बारे में बात करने की जरूरत नहीं समझी. वे सोनिया गांधी से मिलने गए लेकिन डॉ. मनमोहन से मिलने का समय नहीं मांगा. तीसरे दिन मैंने डॉ. सिंह से पूछा कि राष्ट्रपति (जॉर्ज डब्ल्यू. बुश) और कोंडालिजा राइस से प्रणब की मुलाकात का क्या नतीजा रहा? तो उनका सपाट जवाब था, ‘‘मुझे नहीं पता.’’

मैं स्तब्ध रह गया. ऐसा कैसे हो सकता है कि विदेश मंत्री ने विदेश से लौटने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री को उसका ब्यौरा न दिया हो. मैंने उन्हें सुझाव दिया कि उन्हें विदेश मंत्री को बुलाना चाहिए और ब्यौरे की मांग करनी चाहिए. मुझे नहीं पता कि प्रणब को बुलाया गया या वे वहां खुद ही गए लेकिन अगले दिन उन्होंने प्रधानमंत्री से मुलाकात की. इसी तरह प्रणब वामपंथी दलों के साथ मुलाकातों-बैठकों का ब्यौरा प्रधानमंत्री को देना भी ‘‘भूल’’ जाते थे.

प्रणब मुखर्जी और ए.के. एंटनी यूपीए के पहले कार्यकाल में एक के बाद एक रक्षा मंत्री रहे हैं. दोनों सियाचिन पर समझौते के पक्ष में नहीं थे, हालांकि शांति फॉर्मूले को सोनिया गांधी का समर्थन प्राप्त था. सशस्त्र सैन्य बल दुविधा में थे, सियाचिन में काम कर चुके रिटायर्ड जनरल उस दुर्गम क्षेत्र में सैनिकों के कष्टों को दूर करने के लिए समझौते के पक्ष में थे लेकिन सेवारत अधिकारी पाकिस्तान पर किसी तरह का भरोसा नहीं करना चाहते थे. एंटनी थोड़े रुढ़िवादी नेताथे, वे किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते थे. वे ऐसे आइएएस अधिकारियों की सलाह पर जरूरत से ज्यादा आश्रित थे जो रणनीतिक और प्रतिरक्षा अनुभव में एकदम कोरे थे. रक्षा मंत्रालय में उनके कामकाज की कड़ी आलोचना की गई.
 
एक बात यह भी कि डॉ. सिंह को रक्षा सेवाओं के गिरते स्तर से संतोष करना पड़ा. जिस तरह जनरल जे.जे. सिंह सियाचिन मुद्दे से निबटे, वह गिरावट का पहला स्पष्ट लक्षण था. बंद कमरे में बैठकों में जनरल कहते कि पाकिस्तान के साथ समझौता किया जा सकता है लेकिन सार्वजनिक रूप में इस मामले में एंटनी को समर्थन देते, खासकर जब एंटनी प्रधानमंत्री का समर्थन नहीं कर रहे होते.
                                        ***
बुश के साथ मनमोहन सिंह

‘‘यह पार्टी पर निर्भर करता है कि मैं चुनाव लड़ूं या नहीं’’
लोकसभा चुनाव न लडऩे से प्रधानमंत्री राजनैतिक सत्ता से वंचित रह जाते.

मैंने डॉ. सिंह को सुझाव दिया कि चुनाव की घोषणा हो गई है, उन्हें लोकसभा चुनाव लडऩा चाहिए. यदि पार्टी बहुमत हासिल करती है तो वे फिर प्रधानमंत्री बन सकते हैं. इस बार उन्हें लोकसभा में होना चाहिए. यदि पार्टी नहीं जीतती तो भी उन्हें यह संतुष्टि तो होगी कि उन्होंने अपने राजनैतिक करियर का अंत जन प्रतिनिधि सदन यानी लोकसभा चुनाव जीतकर किया. 1999 में दक्षिणी दिल्ली से चुनाव हारने के बाद यह विषय मनमोहन सिंह के लिए थोड़ा संवेदनशील बन गया था. उनके परिवार और दोस्तों का मानना था कि हार की वजह कुछ कांग्रेसियों का भितरघात था.

मैं पहले से भी अधिक आश्वस्त हो गया कि लोकसभा चुनाव न लडऩा प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी राजनैतिक गलती थी. दूसरे कार्यकाल में सरकार के मुखिया के रूप में जो अधिकार और वैधता उन्हें मिलती, उससे वे राज्यसभा का सदस्य होने की वजह से वंचित हो गए, जनाधार उनके पास नहीं था. वे सोनिया से कह सकते थे कि वे दूसरी बार राज्यसभा के सदस्य बनने की बजाए प्रधानमंत्री पद से रिटायर होना चाहेंगे, यदि सोनिया उन्हें सुरक्षित लोकसभा सीट नहीं देतीं तो वे स्वास्थ्य के आधार पर रिटायरमेंट ले सकते थे.

यूपीए-2 की शुरुआत एक महाभारत जैसे प्रकरण से हुई. अपनी प्रतिभा और रणनीतिक योग्यता के बावजूद भीष्म पितामह को महाभारत के दोनों पक्षों कौरव और पांडवों से आदर प्राप्त था लेकिन जब द्रौपदी ने उनसे पूछा कि चीरहरण के दौरान उसकी रक्षा के लिए क्यों नहीं आए तो भीष्म ने धर्म के कुछ सिद्धांतों का सहारा लिया. यूपीए-2 में डॉ. सिंह पर भी मीडिया इसी तरह कटाक्ष और व्यंग्य करता रहा. और मुझे संदेह होता रहा कि क्या डॉ. सिंह भी भीष्म की तरह थे?
ग्रीक कथाओं और शेक्सपियर के नाटकों की तरह भारतीय पौराणिक कथाओं में भी ऐसा नायक नहीं है, जो दागदार न हो. नश्वर मानव की तो छोड़िए, भगवान भी अवगुणों से मुक्त नहीं हैं. भगवान राम का सीता को त्यागना ऐसा प्रश्न है जो कभी खत्म नहीं हुआ.

तो ऐसे कई प्रश्न हैं जो डॉ. सिंह को भी सताते रहेंगे. सबसे बड़ा यह कि जब उन्हें यह एहसास हो गया था कि अपनी सरकार पर उनका नियंत्रण नहीं रहा तो उन्होंने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? कांग्रेस के प्रति निष्ठा या सोनिया से किए वादे से ऊपर उठने की उनकी नाकामी भी तो काम नहीं आई. न ही उसे पुरस्कृत किया गया. सिवाए इसके वे पद पर तो बने रहे, भले ही सत्ता हाथ में न रही हो. राहुल के उत्तराधिकार के लिए मार्ग प्रशस्त करते रहना, पार्टी पर एक ही परिवार का नियंत्रण बने रहने में सहयोग देना तो और भी गलत था. ऐसी गलती भीष्म ने भी की थी. उन्हें कौरवों के उत्तराधिकार का विरोध करना चाहिए था. सबसे बढ़कर वंशवाद के उत्तराधिकार के प्रति वफादारी राजशाही मानसिकता है, लोकतांत्रिक नहीं. डॉ. सिंह ने यही समझने में भारी भूल की.
                                        ***
इन नेताओं के साथ मनमोहन सिंह के संबंध कैसे रहे, किताब में क्या कहते हैं बारू:

अमर सिंहअमर सिंह
तमाम गहमागहमी के बाद 21 जून को शनिवार का दिन काफी शांत था. मैं अपने घर पर लंच करके आराम कर रहा था कि तभी मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह के एक दोस्त लाइन पर थे. उन्होंने कहा, ‘‘मि. बारू, आपके लिए एक संदेश है. मेरे मित्र अमर सिंह कोलोराडो में अस्पताल में हैं. वे चाहते हैं कि आप प्रधानमंत्री को बता दें कि अमेरिका के डॉक्टर बहुत अच्छे हैं और उनका पूरा ख्याल रख रहे हैं. वे वहां बहुत खुश हैं और कहते हैं कि अमेरिकी लोग बहुत गर्मजोशी भरे और दोस्ताना लोग हैं. हमें उनके साथ अच्छा रिश्ता रखना चाहिए.’’ उसी दिन दोपहर बाद मैं डॉ. सिंह से मिला और उन्हें उस संदेश के बारे में बताया, जो अमर सिंह की ओर से एक स्पष्ट राजनैतिक संदेश था. उन्होंने इस संदेश के जरिए परमाणु करार पर समाजवादी पार्टी के समर्थन का इशारा किया था...कई महीने बाद अमर सिंह ने परमाणु सौदे का श्रेय लेने की कोशिश की. उन्होंने पूछा, ‘‘तो आप परमाणु करार के लिए किसे श्रेय देंगे.’’ मैं कोई जवाब दे पाता उससे पहले ही उन्होंने खुद ही जवाब दे दिया, ‘‘आप कहेंगे जॉर्ज बुश और मनमोहन सिंह. मैं आपको बताता हूं, यह काम जॉर्ज बुश और अमर सिंह ने किया.’’
राहुल गांधी
सन् 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के संचालन पर सरकार की सार्वजनिक किरकिरी के साथ ही टेलीकॉम का मुद्दा भी उठा. खेलों पर विवाद तो होना ही था. एक बार डॉ. सिंह ने इसके संचालन का जिम्मा संभालने के लिए राहुल गांधी को राजी करने की कोशिश की और उन्होंने सलाह दी कि जिस तरह उनके पिता राजीव गांधी ने 1982 के एशियाई खेलों का कार्यभार संभालकर प्रशासनिक अनुभव के साथ नाम भी कमाया था, उसी तरह वे भी इस मौके का फायदा उठा सकते हैं. लेकिन राहुल ने कोई रुचि नहीं दिखाई.

जार्ज डब्लूय बुश
उनकी राजनैतिक छवि जो भी रही हो, लेकिन निजी तौर पर वे काफी दोस्ताना स्वभाव वाले व्यक्ति थे. शर्मीले और कम बातचीत करने वाले डॉ. सिंह उन लोगों के साथ काफी सहज महसूस करते थे, जो मिलनसार होते थे. उन्हें बुश बहुत अच्छे लगे. सितंबर 2004 में जब न्यूयॉर्क में दोनों की मुलाकात हुई तो बुश ने उनका काफी सम्मान किया और उन्हें ‘‘सर’’ कहकर संबोधित करते रहे, जो किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए आश्चर्यजनक बात थी. मार्च 2006 में जब वे फिर दिल्ली में मिले तो दोनों अच्छे दोस्त बन चुके थे. मीडिया की तरफ बढ़ते हुए जब दोनों आ रहे थे तो बुश का हाथ डॉ. सिंह के कंधे पर था. हालांकि उनका यह अंदाज कुछ भारतीय राजनयिकों और पत्रकारों को पसंद नहीं आया था. लेकिन मेरी राय में जॉर्ज बुश प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सहज और स्वाभाविक अंदाज में अपना श्दोस्त्य मान रहे थे.

 परवेज मुशर्रफ
दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में क्रिकेट मैच देखने के बाद डॉ. सिंह और मुशर्रफ औपचारिक बातचीत के लिए हैदराबाद हाउस गए. मुशर्रफ काफी अच्छे मूड में थे क्योंकि पाकिस्तानी टीम ने अच्छी शुरुआत की थी. मुशर्रफ के स्टाफ के लोगों ने उन्हें बता दिया था कि पाकिस्तान मैच जीतने वाला है (जैसा कि अंत में हुआ भी). उन्होंने यह कहते हुए बातचीत शुरू की, ‘‘डॉ. साहब, अगर आप और मैं फैसला करें तो लंच के पहले हम अपने सभी विवादों को हल कर सकते हैं और फिर से मैच देखने जा सकते हैं.’’
डॉ. सिंह ने कहा, ‘‘जनरल साहब, आप तो एक सिपाही हैं और मुझसे उम्र में काफी छोटे हैं. लेकिन आप मेरी उम्र का ख्याल करें. मैं केवल एक-एक कदम रखकर चहलकदमी कर सकता हूं.’’ एक बुजुर्ग अर्थशास्त्री और एक 61 वर्षीय जनरल ने चहलकदमी करते हुए बात की. अगले दो साल में दोनों ने डॉ. सिंह की एक मशहूर अवधारणा पर कश्मीर मसले के हल के लिए रूपरेखा बनाई कि ‘‘सरहदें बदली नहीं जा सकती हैं, लेकिन उन्हें निरर्थक जरूर बनाया जा सकता है.’’

 एम. करुणानिधि

मनमोहन सिंह ने ही जनवरी 2004 में डीएमके को यूपीए में शामिल करने के लिए एम. करुणानिधि को राजी किया था और वे उन्हें अत्यधिक आदर देते थे. प्रधानमंत्री होते हुए भी डॉ. सिंह अपने कमरे के दरवाजे की बजाए 7 रेसकोर्स के पोर्टिको में जाकर करुणानिधि का स्वागत करते थे, जबकि ज्यादातर आगंतुकों का स्वागत कमरे के द्वार पर ही करने का रिवाज था. करुणानिधि जब भी कोई संदेश देने के लिए किसी संदेशवाहक को भेजते थे तो डॉ. सिंह सारा काम छोड़कर उस व्यक्ति से मिलते थे. इससे डीएमके को लगता था कि डॉ. सिंह के साथ उनका विशेष तालमेल था. आखिरकार सोनिया के साथ डीएमके की दोस्ती अपेक्षाकृत नई थी. 1996 में सोनिया ने एआइएडीएमके की जगह डीएमके के साथ गठबंधन करने के पी.वी. नरसिंह राव के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, क्योंकि डीएमके को राजीव गांधी की हत्या करने वाले एलटीटीई का समर्थक माना जाता था.
सोनिया गांधी
दोनों नेताओं के परिवारों के बीच सामाजिक संबंध लगभग नहीं के बराबर था. डॉ. सिंह की बेटियां या सोनिया के बच्चे कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की सामाजिक पार्टियों में शायद ही कभी साथ देखे जाते थे. कभी-कभी सोनिया पारिवारिक मुद्दों पर बात करने के लिए डॉ. सिंह से मिलती थीं. आखिर, सोनिया को व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं पर सलाह देने के लिए परिवार में कोई बड़ा था भी तो नहीं. मुझे याद है कि एक बार सोनिया राहुल की व्यक्तिगत समस्याओं पर बात करने के लिए डॉ. सिंह से मिलने आई थीं. उस बातचीत के बाद डॉ. सिंह ने राहुल को लंच पर आमंत्रित किया था और फिर दोनों ने कुछ वक्त एक साथ गुजारा.
‘‘उन्होंने मुझे निराश किया’’
सोनिया गांधी और डॉ. सिंह, दोनों ने ही 12 अक्तूबर, 2007 को हिंदुस्तान टाइम्स समिट में भाषण दिया था. अपने भाषण में सोनिया ने कहा कि परमाणु सौदे से ज्यादा सरकार का अस्तित्व जरूरी था और कांग्रेस हालांकि वाम मोर्चे को मनाने की कोशिश करती रहेगी लेकिन वह इस मुद्दे पर इतना जोर नहीं देगी कि वाम मोर्चे से उसका रिश्ता टूट जाए.
अखबार की संपादकीय निदेशक ने डॉ. सिंह से पूछा, ‘‘आपने एक अखबार में ऐसा बयान दिया, जो आपके चरित्र से मेल नहीं खाता था और जिसके कारण काफी विवाद खड़ा हो गया. क्या आपका मानना है कि आप अपनी हद से कुछ आगे गए थे?’’
डॉ. सिंह ने अपने स्वभाव के विपरीत पूरी दृढ़ता से जवाब दिया, ‘‘मैं नहीं मानता कि मैं अपनी हद से आगे बढ़ गया था. मैं चार वामपंथी पार्टियों के सार्वजनिक बयान का जवाब दे रहा था. मुझे अपने दायित्वों का पूरा एहसास है और यह भी पता है कि मुझे क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं बोलना चाहिए.’’
वे बहुत निराश होकर घर लौटे. जब मैं उनसे जाने की अनुमति लेने लगा तो उन्होंने पूछा, ‘‘ऐसे कौन समझदार लोग हैं, जिनसे मैं सलाह ले सकता हूं.’’ मैंने कहा कि मैं सिर्फ दो जानकार लोगों को जानता हूं. एक थे मेरे पिता, जो उस दिन दिल्ली में थे और दूसरे मेरे गुरु के. सुब्रह्मण्यम. वे उन दोनों लोगों से जब अलग-अलग मिले तो कहा कि ‘‘उन्होंने (सोनिया ने) मुझे निराश किया.’’ उनकी आवाज में गुस्से से ज्यादा दर्द था.

 जयराम रमेश
सन् 2005 में जब उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मेरी राय में जयराम रमेश को सरकार में शामिल किया जाना चाहिए तो मेरा जवाब था कि अगर वे सरकार में मंत्री पद चाहते हैं तो उन्हें प्रधानमंत्री के प्रति अपनी वफादारी प्रदर्शित करनी चाहिए. कुछ दिन बाद पत्रकार टी.एन. नैनन के घर पर क्रिसमस की पार्टी में जब मोंटेक सिंह आहलूवालिया मुझे एक किनारे ले गए और पूछा कि मैं जयराम रमेश को मंत्री बनाए जाने के खिलाफ क्यों हूं तो मैं चकित रह गया. मुझे नहीं पता कि उसके बाद क्या हुआ, लेकिन अगले महीने जनवरी, 2006 में जयराम को वाणिज्य मंत्रालय में राज्यमंत्री बना दिया गया. मुझे यह जानकर हैरानी नहीं हुई कि जयराम बाद में सोनिया के मित्र सुमन दुबे से मिले और उन्हें इस काम के लिए धन्यवाद दिया.
राजनीति सत्ता और संरक्षण बनकर रह गई है और मंत्री पद पाने का आधार सिर्फ योग्यता नहीं, बल्कि नेता का रसूख और पार्टी के नेता के प्रति वफादारी भी जरूरी है. कांग्रेस के सांसदों के लिए वह नेता हमेशा सोनिया ही थीं, जिन्हें खुश करना जरूरी था. मंत्री बनने के कुछ ही हफ्तों बाद यह बात उस वक्त स्पष्ट हो गई कि जयराम की वफादारी केवल सोनिया के प्रति थी, जब उन्होंने सोनिया के एक पत्र को लीक करके डॉ. सिंह को शर्मिंदा कर दिया. सोनिया ने उस पत्र में डॉ. सिंह को आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता न करने की हिदायत दी थी, जबकि वे इसे काफी प्राथमिकता देना चाहते थे.

प्रकाश करातपद छोडऩे को तैयार
मैं 3 रेसकोर्स रोड पर डॉ. सिंह से मिला. वे श्रीमती कौर के साथ बैठक कक्ष में बैठे हुए थे और दोनों के हाथ में कोई किताब थी. वे अकसर इसी तरह दिखाई देते थे. मैं उन्हें इस तरह एक साथ चुपचाप बैठकर पूरी लगन के साथ कोई किताब पढ़ते हुए अनगिनत बार देख चुका था. मैंने जब मोंटेक सिंह के माध्यम से भेजे गए सोनिया के संदेश के बारे में पूछा तो डॉ. सिंह ने इस बात की पुष्टि की कि सोनिया उन्हें इंतजार करने और जल्दबाजी न करने के लिए कह रही थीं. मैंने उन्हें चेताया कि अगर उन्होंने अभी कदम नहीं उठाया तो उनका बाकी का कार्यकाल बेकार चला जाएगा. वामपंथी दलों को इसमें अपनी जीत नजर आएगी और वे फिर प्रधानमंत्री बदलने के लिए भी दबाव डाल सकते हैं. मैंने उन्हें याद दिलाया कि वामपंथी दलों का यह पुराना इतिहास रहा है. उन्होंने 1978 में ‘‘कारोबारियों के समर्थक’’ मोरारजी देसाई को हटाकर ‘‘किसान समर्थक’’ चरण सिंह को लाने का श्रेय लेने का दावा किया था...मैंने उन्हें सावधान किया कि अब वे फिर नव उदारवादी मनमोहन सिंह की जगह धर्मनिरपेक्ष अर्जुन सिंह, बंगाली प्रणब (सीपीएम मुख्य रूप से बंगाल की पार्टी रह गई थी) या ‘‘वामपंथी’’ एंटनी को लाने का श्रेय लेंगे, जो केरल में कॉमरेडों के पुराने सहयोगी रह चुके थे. डॉ. सिंह हंसने लगे. उन्होंने कहा, ‘‘मैं तो जाने के लिए तैयार हूं. उनमें से किसी को भी प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है. क्यों नहीं.’’
                                            ***
मनमोहन सिंह
वे अपने चेहरे से इतने नजर नहीं आते
1 उनका मूलमंत्र जब मनमोहन सिंह ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में आने के लिए यूएनसीटीएडी की नौकरी छोड़ी तो इसके प्रमुख रॉल प्रेबिश ने उनसे कहा कि वे बेवकूफी कर रहे हैं, लेकिन ‘‘कई बार बेवकूफ बनना समझदारी होती है.’’ परमाणु करार पर उन्होंने कहा था, ‘‘अब बेवकूफ बनने का समय आ गया है.’’

2 हिंदी नहीं, सिर्फ उर्दू वे उर्दू पढ़ सकते हैं, उनके भाषण उर्दू में होते हैं, अपने पहले टीवी भाषण के लिए उन्हें तीन दिन अभ्यास करना पड़ा

3 शर्मीला स्वभाव उनका संकोची स्वभाव दरअसल एक सुरक्षा कवच है जो कठिनाइयों भरे बचपन की देन है. मां के निधन के बाद उन्हें गाह (अब पाकिस्तान में) में एक रिश्तेदार के यहां रहना पड़ा था.

4 सलाहकार महत्वपूर्ण फैसले लेते समय वे विशेषज्ञों की राय लेते हैं. चीन के बारे में सब कुछ जानने के लिए उन्होंने सिंगापुर के नेता ली कुआन येव के साथ दो बार लंबी बातचीत की.

5 कम खाना पत्नी गुरशरण कौर ने पीएमओ के मेन्यू से समोसे कचौरी की जगह ढोकले को शामिल किया. चाय और मारी बिस्किट मनमोहन को ऊर्जा देते हैं.

6 खबरों का स्रोत वे हर सुबह बीबीसी सुनते हैं. इससे उन्होंने 2004 की सूनामी के बारे में सबसे पहले प्रतिक्रिया की, आपदा प्रबंधन अधिकारियों की ओर से पीएमओ को चेताए जाने से भी पहले.

7 गांठ बांध लेते हैं प्रधानमंत्री के रूप में पहले दिन संसद में आए तो एनडीए नेताओं ने उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया. बाद में जब एनडीए का प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने उनके दफ्तर आया तो उन्हें बैठने के लिए भी नहीं कहा. यहां तक कि उनका ज्ञापन भी मेज पर फेंक दिया.

8 संकट के साथी दिवंगत के. सुब्रह्मण्यम, जो कि रणनीतिकार और विश्लेषक थे, उनके अलावा वीपीआर विठ्ठल जो सिविल सर्विस में थे और बारू के पिता.

9 राजनैतिक मित्र मंडली अपनी पार्टी से बाहर उनके ज्यादा दोस्त रहे हैं- शरद पवार और दिवंगत सीपीएम नेता हरकिशन सिंह सुरजीत, एम. करुणानिधि, लालू यादव और रघुवंश प्रसाद सिंह.

10 ऑफ द रिकॉर्ड स्कूल में दाखिले के समय उनके दादा ने वही जन्मतिथि लिखवा दी जो उनके दिमाग में आई- 26 सितंबर, 1932. बाद में यही उनकी वैध जन्मतिथि बन गई.

Advertisement
Advertisement