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अरविंद केजरीवाल के उजली कमीजवाद की हकीकत

अरविंद आरक्षण विरोधी संगठन—यूथ फॉर इक्वालिटी के मंच पर सक्रिय रहे हैं. क्या आरक्षण का प्रावधान उनके लोकपाल बिल में होगा? सामाजिक न्याय के बिना क्या स्वस्थ राजनीति होगी? सामाजिक न्याय के प्रति अभी तक उनमें कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखी है. ये क्यों नहीं उद्योग जगत, मीडिया और एनजीओ के भ्रष्टाचार पर कुछ कहते हैं?

अरविंद केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल
अपडेटेड 2 जनवरी , 2014
अरविंद केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा (आइआरएस) के 1992 बैच के हैं और इस्तीफा 2006 में दिया. इतने दिन सेवा में रहते हुए विभागीय कार्यों में वे कोई कीर्तिमान नहीं स्थापित कर सके. मेरे संज्ञान में इन्होंने एक भी बड़ी टैक्स-चोरी का मामला नहीं पकड़ा. आंदोलन के दौरान प्रचार किया कि वे इनकम टैक्स कमिश्नर रहते तो करोड़ों-अरबों रुपए कमा जाते.

आइआरएस एसोसिएशन ने इस पर आपत्ति जताई कि क्या आयकर विभाग में सभी अधिकारी भ्रष्ट हैं और यह भी कहा कि अरविंद कमिश्नर के पद तक कभी नहीं पहुंचे थे. क्या अरविंद यह कहना चाहते हैं कि इनकी पत्नी ने आइआरएस के पद पर रहते हुए करोड़ों-अरबों रुपए कमाए हैं?

मैं जब गाजियाबाद में उसी पद पर लगभग पांच साल तक रहा, विभाग मेरे नाम से जाना जाता था और व्यापारी मुझे गब्बर सिंह कहते थे. क्या व्यवहार में अरविंद जो दिख रहे हैं, वह हो पाएंगे?

आयकर विभाग में चपरासी का इस्तेमाल न करना, मेज को स्वयं साफ करना आदि कृत्य से सादगी तो स्थापित की लेकिन इससे टैक्स की वसूली का क्या संबंध? रामलीला मैदान में शपथ लें या राजभवन में, जनता के वादे से इसका क्या संबंध है?

सरकारी बंगले में रहें या न रहें, सुरक्षा न लें आदि का संबंध सरकार चलाने से क्या है? अपने बच्चों की कसम खाई थी कि न कांग्रेस से समर्थन लेंगे और न बीजेपी से, उसका क्या हुआ? सरकार बनाएं या न बनाएं, उस पर राय-शुमारी कराकर उन्होंने जनतंत्र का अपमान ही किया है.

जब कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए सहयोग दिया तो इन्हें सीधा अपने वादों को पूरा करने के लिए सरकार बनाकर काम करना शुरू कर देना चाहिए था. जनता से जो वादे किए हैं—जैसे 700 लीटर प्रतिदिन पानी, बिजली का बिल आधा करना, सफाई के काम में ठेकेदारी प्रथा की समाप्ति.

उन्हें नियमित करना, अनियमित कॉलोनियों को नियमित करना, सरकारी स्कूलों का स्तर बढ़ाकर पब्लिक स्कूल के समान करना, जनलोकपाल बनाना, मोहल्ला समिति का गठन, 500 सरकारी स्कूलों की स्थापना, 0 प्रतिशत ब्याज दर पर दलित उद्यमियों को ऋण देना आदि पर फौरन कार्य शुरू कर देना चाहिए था.

आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से इस मुकाम पर पहुंची है, लेकिन क्या यह संभव होगा? जब रामलीला मैदान में अनशन किया तो अनुसूचित जाति/जनजाति परिसंघ की ओर से एक रैली समानांतर की गई और इनसे सवाल किया गया था कि क्यों नहीं अपने बिल में उद्योग जगत, मीडिया एवं एनजीओ के भ्रष्टाचार को शामिल किया?

लोकपाल में आरक्षण देने की भी बात नहीं थी तो हमने बहुजन लोकपाल बिल पेश करके दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों का आरक्षण सुनिश्चित कराया. जिस तरह से मीडिया, एनजीओ और उद्योग जगत का समर्थन इनको है, अगर इसका आधा भी मुझे मिले तो शायद इनसे ज्यादा समाज को प्रभावित किया जा सकता है.

अब भी मेरे संगठन के बराबर के कार्यकर्ता इनके पास नहीं होंगे लेकिन मीडिया जिस तरह से 24 घंटे इनको दिखा और लिख रहा है, लोगों की सोच इनकी बंधुआ बन गई है, यह भी एक तरह का फासीवाद है. क्या अधिकारियों एवं नेताओं के भ्रष्टाचार की निंदा करने से देश सुधर जाएगा? ये क्यों नहीं उद्योग जगत, मीडिया और एनजीओ के भ्रष्टाचार पर कुछ कहते?

जब तक सामाजिक न्याय की बात न की जाए, क्या यह स्वस्थ राजनीति होगी? सामाजिक न्याय के बारे में अभी तक अरविंद की कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखी है. 18 सूत्रीय मांग पर जो पत्र इन्होंने सोनिया गांधी को लिखा है, उसमें आरक्षण नहीं है और इसी से इनकी मानसिकता का पता लगता है. अरविंद आरक्षण विरोधी संगठन—यूथ फॉर इक्वालिटी के मंच पर सक्रिय रहे हैं.

देखना है कि क्या उनके जन-लोकपाल बिल में उद्योग जगत के भ्रष्टाचार को शामिल करेंगे? क्या आरक्षण का प्रावधान उसमें होगा? जो दिख रहा है, वैसा है नहीं क्योंकि आम आदमी पार्टी ने भी जातीय समीकरण के आधार पर टिकट दिया है—जैसे, आंबेडकर नगर, त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी और मंगोलपुरी से बाल्मीकि प्रत्याशी उतारे जहां पर इस जाति की संख्या ज्यादा है.

आम आदमी पार्टी की कुछ उपलब्धि जरूर है और वह है इनकी सादगी और कुछ शुरुआती ईमानदारी. हालांकि अरविंद की शुरुआत फोर्ड फाउंडेशन के अनुदान से हुई है. विदेशी दानकर्ता कुछ न कुछ मकसद तो जरूर रखते हैं. पारंपरिक पार्टियों के नेताओं के अहंकार, भ्रष्टाचार और महंगाई से लोग परेशान हैं और यह भी एक कारण था कि वे इनकी ओर मुखातिब हुए.

2011 में  अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से अचानक एक माहौल बन गया. बीजेपी, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, रामदेव, आर्ट ऑफ लिविंग सहित तमाम संगठनों का समर्थन रातोंरात मिला. हजारों एनजीओ, कार्यकर्ता समर्थन देने आ पहुंचे. अरविंद और उनके साथी इरादतन सक्रिय रहे कि आगे चलकर इस सबका लाभ उठाना है और अंत में हुआ भी यही.

सरकार बनाने के लिए जो अनावश्यक प्रोपगैंडा अरविंद कर रहे हैं, उससे लगता है कि काम में उनका यकीन कम है और बात करने में ज्यादा. वैसे अरविंद जैसा दावा कर रहे है, वैसी सरकार चला जाएं तो इससे अच्छी बात देश के लिए क्या होगी?

(लेखक इंडियन रेवेन्यू सर्विस में अरविंद केजरीवाल के सीनियर रहे. अब एससी-एसटी कर्मचारियों के राष्ट्रीय परिसंघ के चेयरमैन हैं)
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