नवंबर की सर्द हवा तापमान के गिरते पारे की ओर इशारा कर रही है. लेकिन हरे शॉल में लिपटी 54 वर्षीया राबड़ी देवी कड़कड़ाती ठंड से बेपरवाह दिख रही हैं. पटना में सर्कुलर रोड पर स्थित अपने सरकारी आवास के हरे-भरे विशाल परिसर में सुबह की सैर पूरी करने के बाद बेंत की एक कुर्सी पर बैठी राबड़ी नींबू की चाय की चुस्कियों के साथ राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बैनर के लिए तस्वीरें छांट रही हैं.
सामने मेज पर एक कॉर्डलेस के साथ दो मोबाइल फोन (नोकिया और सैमसंग के बेसिक मॉडल) रखे हैं जिन पर आने वाली कॉल पर वे बातें कर रही हैं.
कुछ ही देर पहले पहुंचे लालू के भरोसेमंद सहयोगी अनवर अहमद अखबार पढ़ रहे हैं और बीच-बीच में उसमें छपी रिपोर्टों में छिपे मायने की भी व्याख्या करते जा रहे हैं, लेकिन अनमनी राबड़ी का ध्यान खबरों की ओर नहीं, बल्कि अपने 'साहब’ पर टिका है जिन्हें देखे दो महीने हो गए हैं.
राबड़ी कहती हैं, ''हां, मुझे अकेलापन लगता है. कौन पत्नी अपने पति के जेल जाने पर खुश रह सकती है? अगर नीतीश कुमार और उनकी टीम को लगता है कि वे पार्टी तोड़ देंगे तो यह उनकी बेवकूफी है. हम पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गए हैं. दरअसल जेडी (यू) ही टूट रही है.”
लालू के जेल में होने के जिक्र पर राबड़ी एक पल के लिए उदास हो जाती हैं और उनकी आंखें नम दिखीं, लेकिन उन्होंने तुरंत खुद को संभाल लिया और चेहरे पर रूखी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ''मुझे तो उनके जेल जाने की आदत-सी हो गई है.”
राबड़ी बताती हैं कि उनके वैवाहिक जीवन की शुरुआत के समय भी उनके पति न्यायिक हिरासत में ही थे. 1959 में जन्मीं राबड़ी की 14 साल की उम्र में लालू यादव से 1973 में शादी हुई थी और तीन साल बाद गौना. लेकिन इसी बीच इमरजेंसी के खिलाफ छात्र आंदोलन के दौरान 1974 से 1977 के दरम्यान लालू कई बार गिरफ्तार हुए और जेल गए.
राबड़ी कहती हैं, ''मैंने अपनी पूरी जिंदगी में यही देखा है. चारा घोटाले के मामलों में साहब को किसी न किसी बहाने जेल में बंद कर दिया जाता था. मुझे अपने छोटे बच्चों की देखभाल करनी थी, जिन्हें यह भी पता नहीं था कि जेल क्या होती है या उनके पिता उनके साथ क्यों नहीं रहते हैं. मुझे सरकार और परिवार दोनों की देखभाल करनी थी.
मैंने अकेले यह सब किया है. मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और वे अपना ख्याल रख सकते हैं. इसके अलावा वे पार्टी के मामलों में भी मेरी मदद करते हैं. अब मैं अपना पूरा ध्यान पार्टी पर लगा सकती हूं और आरजेडी के नेताओं संग उनके राजनैतिक संघर्ष में हाथ बंटा सकती हूं.”

राबड़ी देवी के लफ्जों से बहादुरी झलक रही है. लेकिन लालू के बगैर जीवन इस समय बहुत मुश्किल लग रहा है. समय बदल गया है—जब दिसंबर, 2001 में लालू 35 दिन के लिए जेल गए थे, उसके मुकाबले समय कुछ ज्यादा खराब हो गया है. उस दौरान स्थिति पूरी तरह काबू में थी, राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थीं और बिहार लालू की जागीर.
30 सितंबर को चारा घोटाला मामले में लालू दोषी ठहराए गए. उससे पहले जुलाई, 1997 से दिसंबर, 2001 तक उन्हें छह बार न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका था. उस दौरान राबड़ी देवी ही बिहार की मुख्यमंत्री थीं, लेकिन वे कभी अपने साहब को देखने जेल नहीं गईं. पार्टी के लोगों का कहना है कि वे उन्हें ऐसी हालत में नहीं देख सकतीं.
लालू की पिछली जेल यात्रा के एक दशक से भी ज्यादा समय बाद आज राबड़ी देवी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिनमें सबसे बड़ी चुनौती है लालू को जेल होने के बाद बिहार में अपनी मौजूदगी को प्रासंगिक बनाए रखना, क्योंकि पिछले समय के मुकाबले मौजूदा स्थिति यह है कि अदालत में दोषी साबित होने की वजह से लालू 2014 का लोकसभा चुनाव लडऩे की पात्रता खो चुके हैं.
लालू को सजा होने के तुरंत बाद वरिष्ठ जेडी (यू) मंत्री नरेंद्र सिंह ने 'अच्छे आरजेडी नेताओं’ को नीतीश की पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया था, जिसे आरजेडी के हताश नेताओं को तोडऩे की नीतीश की कथित रणनीति के तौर पर देखा गया. राबड़ी कहती हैं, ''मुझे पता है कि यह सब नीतीश कर रहे हैं. वे ही हमारी पार्टी को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं.
विधान परिषद में जब भी वे मेरे सामने आते हैं, मुझसे आंखें नहीं मिला पाते. एक समय था जब वे साहब की बातें सुनने के लिए हमारे घर में देर रात 2 बजे तक बैठे रहते. आज जब लालूजी जेल में हैं तो वे हमें बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं.”
पार्टी को भीतर और बाहर से चुनौती
राबड़ी की चिंता की वजह सिर्फ नीतीश नहीं, उन पर अपनी पार्टी को एकजुट रखने का भी भार है जिसमें तीन लोकसभा सांसद ऐसे हैं जो लालू के उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव के जन्म से पहले से जनप्रतिनिधि बने हुए हैं. यह मुश्किल स्थिति है.
जहां लालू अयोग्य होने की वजह से चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, वहीं संभावना है कि आरजेडी के कई वरिष्ठ नेता 24 वर्षीय तेजस्वी को अपना शीर्ष नेता मानने के लिए तैयार नहीं होंगे. इसी वजह से राबड़ी की राजनैतिक भूमिका और भी महत्वपूर्ण बन गई है.
लालू की जिंदगी में राबड़ी ने कई रोल अदा किए हैं. भारतीय राजनीति में सत्ता की विरासत थमाने का सबसे नाटकीय दृश्य उस दिन देखने को मिला जब नौ बच्चों की मां राबड़ी देवी को 25 जुलाई, 1997 को बिहार का मुख्यमंत्री पद सौंपा गया था.
वे शायद अकेली मुख्यमंत्री हैं जो आंखों में आंसू भरे शपथ समारोह में पहुंचीं. चारा घोटाला मामले में सीबीआइ की ओर से दाखिल चार्जशीट के बाद लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री पद छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा. राजनैतिक हलकों में पूरी तरह अनजान राबड़ी देवी को बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर बिठा दिया गया.
हालांकि, 2000 में आरजेडी ने एक बार फिर विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की, लेकिन लालू प्रसाद ने राबड़ी को ही मुख्यमंत्री के पद पर बरकरार रखा.
30 सितंबर को रांची की सीबीआइ अदालत से सजा पाने के बाद लालू प्रसाद ने एक बार फिर बड़ी सावधानी से अपने पत्ते खेले हैं. अटकलें थीं कि वे राबड़ी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करेंगे, लेकिन लालू ने ऐसे किसी भी कदम को उठाने से परहेज किया और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं की ओर से रखे गए सामूहिक नेतृत्व के विचार का समर्थन किया.
संभव है कि लालू के जेल में बंद होने से आरजेडी सामूहिक नेतृत्व का कोई फॉर्मूला ईजाद करे, लेकिन नतीजे की जिम्मेदारी साफ तौर पर राबड़ी को उठानी होगी. राबड़ी ने अपने पति से भी ज्यादा लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया है.
आज फिर अपने पति के कहने पर जिम्मेदारी उठाने के लिए बढ़ते राबड़ी के कदमों में झिझक या अनिच्छा नहीं दिखती जो 1997 में मुख्यमंत्री बनाए जाने पर झलकी थी.
चल पड़ा राबड़ी-रथ
राबड़ी ने 18 नवंबर से राज्य का दौरा शुरू किया और बिहार के दर्जनों जिलों में आरजेडी की परिवर्तन यात्रा का संचालन किया. राबड़ी की सार्वजनिक सभाओं ने जिस तरह की भीड़ आकर्षित की है वह उनके विरोधियों की नींद उड़ाने के लिए काफी है.
पालीगंज की ओर बढ़ता उनका काफिला जब पटना के मुस्लिमबहुल इलाके फुलवारीशरीफ से गुजरा तो भीड़ ने लालू प्रसाद के पक्ष में नारे लगाते हुए फूल मालाओं से उनका स्वागत किया. साफ है कि लालू को सजा के बाद भी बिहार के मुसलमानों ने उनकी पार्टी नहीं छोड़ी है. यह बात अलग है कि लालू ने पत्नी से कोई प्रेरणा ली है या नहीं, पर संकट की स्थिति में उन्होंने हमेशा राबड़ी का सहारा लिया है और उसके सकारात्मक नतीजों का लाभ भी उठाया है.
आरजेडी हमेशा से लालू प्रसाद की पार्टी रही है, लेकिन चारा घोटाला मामले में जुलाई, 1997 में लालू के जेल जाने के समय से कमान राबड़ी ने थाम ली और अपनी पार्टी और सरकार को अपने दो भाइयों, साधु यादव और सुभाष सहित कई अन्य महत्वाकांक्षी नेताओं से सुरक्षित और पहुंच से परे रखा. आज जब लालू दोषी साबित होने की वजह से लोकसभा सांसद के रूप में अयोग्य घोषित हो चुके हैं, एक बार फिर राबड़ी उनकी ओर से पार्टी की देखरेख कर रही हैं.
2010 के विधानसभा चुनाव में हारने के बाद राबड़ी एक तरह से रिटायर हो गई थीं, लेकिन लालू ने मई, 2012 को उन्हें विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामांकित कर राजनीति की मुख्यधारा में वापस खींच लिया. आरजेडी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो यह सोची-समझी रणनीति थी जो चारा घोटाला मामले को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई थी.

सहानुभूति की लहर जगाना कोई आसान काम नहीं. एक सीनियर आरजेडी नेता का कहना है, ''जब तक हमारे समर्थकों की चिंता लालू से जुड़ी है, तब तक आरजेडी को इससे फायदा होगा. लेकिन अगर हमारे समर्थक लालू के लिए दुखी होने लगें तो यह स्थिति हमारे खिलाफ जा सकती है, क्योंकि तब वे हमारे सबसे बड़े चुनावी दुश्मन नीतीश कुमार को सजा देने के लिए नरेंद्र मोदी की बीजेपी के साथ हाथ मिला सकते हैं.
झारखंड हाइकोर्ट से लालू की जमानत याचिका खारिज होने के बाद हमारे समर्थकों में पनप रही हताशा चिंता का विषय है. ऐसे में राबड़ी के संचालन में हो रही परिवर्तन यात्रा हमारे समर्थकों का ध्यान केंद्रित रखने में अहम भूमिका निभा रही है.”
राबड़ी ने लालू की गैर-मौजूदगी में राजनैतिक परिपक्वता दिखाई है. जैसे ही नरेंद्र मोदी ने आरजेडी के मुस्लिम-यादव वोट बैंक को लुभाने की कोशिश की, राबड़ी ने तुरंत मोर्चा खोल दिया. 27 अक्तूबर को मोदी ने पटना की अपनी हुंकार रैली में महाभारत से जुड़े वाकये का हवाला देते हुए यादवों को अपने पाले में करने की कोशिश की थी.
जो बिहार में लालू के सबसे अधिक प्रतिबद्ध वोट बैंक के रूप में पहचाने जाते हैं. उन्हें कृष्ण के वंशज कहते हुए नरेंद्र मोदी ने उनका ध्यान रखने का वादा किया और कहा कि वे उस द्वारिका से आए हैं जिसे कृष्ण ने मथुरा के बाद अपनी कर्मभूमि बनाई थी.
अगले दिन राबड़ी लगभग 100 बुर्काधारी महिलाओं और यादव नेताओं के साथ दिखीं. वहां फोटोग्राफरों के लिए प्रवेश खुला था और राबड़ी मुस्लिम महिलाओं के साथ हंस-हंसकर बातें कर रही थीं.
लालू की गैरहाजिरी में आरजेडी के परंपरागत यादव और मुस्लिम वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की मोदी की साफ कोशिशों से आशंकित राबड़ी ने नाप-तौल कर गुजरात के मुख्यमंत्री पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि गुजरात में हुए दंगों और उसके बाद तो मोदी को यादवों और मुसलमानों का ध्यान नहीं आया.
मुस्लिम-यादव के सामाजिक समीकरण की वजह से ही लालू ने 15 साल तक राज्य में शासन किया. ये दोनों समूह राज्य की कुल आबादी का 30 फीसदी हैं.
बीजेपी की यादवों पर नजर
नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार पूरी शिद्दत से कोशिश कर रहे हैं कि लोकसभा चुनावों से पहले आरजेडी के इस परंपरागत वोट बैंक को अपने पाले में ले आया जाए. नरेंद्र मोदी का ध्यान जहां यादव वोट बैंक पर है, वहीं नीतीश राबड़ी के पाले से मुसलमानों को खींच लेना चाहते हैं.
राबड़ी अपने अंदाज में दोनों पर निशाना साधती हैं, ''लालकृष्ण आडवाणी ने जब बिहार में अपने सांप्रदायिक एजेंडे को मजबूत करने की कोशिश की तो लालूजी ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के लिए सिर्फ जुबान चलाने वाले नीतीश ने उस नरेंद्र मोदी को दो बार राज्य के मेहमान के तौर पर बुलाया जिस पर अल्पसंख्यक कभी भरोसा नहीं कर सकते.”
आरजेडी के नेता मानते हैं कि मोदी के मुद्दे पर बीजेपी से नाता तोड़कर नीतीश ने मुसलमानों के एक वर्ग का समर्थन तो पा ही लिया है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि इसके बाद भी अल्पसंख्यक लालू के उम्मीदवार को ही वोट करेंगे क्योंकि बीजेपी को हराने की कुव्वत आरजेडी में कहीं ज्यादा है.
आरजेडी के एक शीर्ष नेता के मुताबिक, ''मुसलमान हमेशा उसी प्रत्याशी को वोट देते हैं जिसमें बीजेपी को हराने की कुव्वत हो. 2009 के लोकसभा और 2010 के राज्य विधानसभा चुनावों में जरूर अलग रुख देखने को मिला जब नीतीश की वजह से कुछ मुसलमानों ने एनडीए के पक्ष में वोट डाले.
अब नरेंद्र मोदी बीजेपी के सबसे बड़े नेता बन चुके हैं तो मुसलमान अपनी बुनियादी रणनीति पर वापस आएंगे और आरजेडी के लिए वोट करेंगे क्योंकि बिहार का अकेला सबसे बड़ा जातीय समुदाय 'यादव’ लालू को दोषी ठहराए जाने के बाद और भी मजबूती से उनके साथ खड़ा हो गया है.”
क्या चलेगी सहानुभूति लहर?
राबड़ी की रैलियों में सजे बैनरों में अनिवार्य तौर पर राबड़ी को छठ पूजा करते और लालू को सलाखों के पीछे दिखाया जा रहा है. जाहिर है, इसका उद्देश्य सहानुभूति की लहर पैदा करना है. साथ ही जिस अंदाज में राबड़ी जनसमुदाय की आंखों में आंखें डालकर उन्हें संबोधित करती हैं, उसका सीधा संकेत यह है कि पार्टी हर मुसीबत से लडऩे के लिए तैयार है.
रैलियों में राबड़ी अक्सर पूछती हैं, ''क्या आपको लगता है कि पिछड़े, अत्यंत पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए लड़ाई लडऩे वाली आवाज को दबाकर जेल में बंद कर देना चाहिए? भीड़ जवाब देती है, ''कभी नहीं...कभी नहीं.” राबड़ी लोगों से कहती हैं, ''लालूजी निर्दोष हैं. वे हमारे प्रतिद्वंद्वियों की राजनैतिक साजिश का शिकार हो गए हैं.
समय आ गया है कि आप एकजुट रहें और सांप्रदायिक ताकतों का सामना करें. जेडी (यू) और बीजेपी में अंदर ही अंदर दोस्ती है. अगर राज्य में गरीबों का शासन वापस लाना चाहते हैं तो आपको इन दोनों के खिलाफ लडऩा होगा.”
क्या करेगी कांग्रेस
पटना के अखबार जब नीतीश-सुशील मोदी के झगड़ों की खबरों से पटे पड़े हैं, तब राबड़ी चुपचाप समर्थकों से संपर्क साधने में जुटी हैं. कभी-कभी वे मन की बातें भी खोलती हैं: ''बीजेपी रावण है, तो जेडी (यू) कंस. दोनों ने मिलकर लोगों को मूर्ख बनाया और सात साल से ज्यादा समय से बिहार को लूट रहे हैं.” आरजेडी को उम्मीद है कि कांग्रेस अंतत: उसके साथ ही गठबंधन बनाएगी.
राबड़ी कहती हैं, ''वे जरूर देख रहे होंगे कि लालूजी के साथ जो बर्ताव किया जा रहा है उससे लोगों में कितना गुस्सा है.” राबड़ी अपने गांव सलारकलां के प्राथमिक स्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाई थीं. उनकी शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी. वहां से 1997 में पैदा हुई राजनैतिक उथल-पुथल के बीच बिहार की महिला मुख्यमंत्री (अब तक राज्य की अकेली मुख्यमंत्री) के रूप में पदभार संभालने तक की यात्रा उनके लिए वास्तव में काफी मुश्किल भरी रही होगी.
मोबाइल फोन एक बार फिर से बजता है. यह किसी जानने वाले का फोन है और उनके चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती है. राबड़ी कॉल लेती हैं. फोन करने वाले को होल्ड पर रख अपने बेटे तेज प्रताप को लैपटॉप के साथ बुलाने के लिए अनवर को कहती हैं जिससे तस्वीरों को चुनने में वे उनकी मदद कर सकें.
सामने मेज पर एक कॉर्डलेस के साथ दो मोबाइल फोन (नोकिया और सैमसंग के बेसिक मॉडल) रखे हैं जिन पर आने वाली कॉल पर वे बातें कर रही हैं.
कुछ ही देर पहले पहुंचे लालू के भरोसेमंद सहयोगी अनवर अहमद अखबार पढ़ रहे हैं और बीच-बीच में उसमें छपी रिपोर्टों में छिपे मायने की भी व्याख्या करते जा रहे हैं, लेकिन अनमनी राबड़ी का ध्यान खबरों की ओर नहीं, बल्कि अपने 'साहब’ पर टिका है जिन्हें देखे दो महीने हो गए हैं.
राबड़ी कहती हैं, ''हां, मुझे अकेलापन लगता है. कौन पत्नी अपने पति के जेल जाने पर खुश रह सकती है? अगर नीतीश कुमार और उनकी टीम को लगता है कि वे पार्टी तोड़ देंगे तो यह उनकी बेवकूफी है. हम पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गए हैं. दरअसल जेडी (यू) ही टूट रही है.”
लालू के जेल में होने के जिक्र पर राबड़ी एक पल के लिए उदास हो जाती हैं और उनकी आंखें नम दिखीं, लेकिन उन्होंने तुरंत खुद को संभाल लिया और चेहरे पर रूखी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ''मुझे तो उनके जेल जाने की आदत-सी हो गई है.”
राबड़ी बताती हैं कि उनके वैवाहिक जीवन की शुरुआत के समय भी उनके पति न्यायिक हिरासत में ही थे. 1959 में जन्मीं राबड़ी की 14 साल की उम्र में लालू यादव से 1973 में शादी हुई थी और तीन साल बाद गौना. लेकिन इसी बीच इमरजेंसी के खिलाफ छात्र आंदोलन के दौरान 1974 से 1977 के दरम्यान लालू कई बार गिरफ्तार हुए और जेल गए.
राबड़ी कहती हैं, ''मैंने अपनी पूरी जिंदगी में यही देखा है. चारा घोटाले के मामलों में साहब को किसी न किसी बहाने जेल में बंद कर दिया जाता था. मुझे अपने छोटे बच्चों की देखभाल करनी थी, जिन्हें यह भी पता नहीं था कि जेल क्या होती है या उनके पिता उनके साथ क्यों नहीं रहते हैं. मुझे सरकार और परिवार दोनों की देखभाल करनी थी.
मैंने अकेले यह सब किया है. मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और वे अपना ख्याल रख सकते हैं. इसके अलावा वे पार्टी के मामलों में भी मेरी मदद करते हैं. अब मैं अपना पूरा ध्यान पार्टी पर लगा सकती हूं और आरजेडी के नेताओं संग उनके राजनैतिक संघर्ष में हाथ बंटा सकती हूं.”

राबड़ी देवी के लफ्जों से बहादुरी झलक रही है. लेकिन लालू के बगैर जीवन इस समय बहुत मुश्किल लग रहा है. समय बदल गया है—जब दिसंबर, 2001 में लालू 35 दिन के लिए जेल गए थे, उसके मुकाबले समय कुछ ज्यादा खराब हो गया है. उस दौरान स्थिति पूरी तरह काबू में थी, राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थीं और बिहार लालू की जागीर.
30 सितंबर को चारा घोटाला मामले में लालू दोषी ठहराए गए. उससे पहले जुलाई, 1997 से दिसंबर, 2001 तक उन्हें छह बार न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका था. उस दौरान राबड़ी देवी ही बिहार की मुख्यमंत्री थीं, लेकिन वे कभी अपने साहब को देखने जेल नहीं गईं. पार्टी के लोगों का कहना है कि वे उन्हें ऐसी हालत में नहीं देख सकतीं.
लालू की पिछली जेल यात्रा के एक दशक से भी ज्यादा समय बाद आज राबड़ी देवी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिनमें सबसे बड़ी चुनौती है लालू को जेल होने के बाद बिहार में अपनी मौजूदगी को प्रासंगिक बनाए रखना, क्योंकि पिछले समय के मुकाबले मौजूदा स्थिति यह है कि अदालत में दोषी साबित होने की वजह से लालू 2014 का लोकसभा चुनाव लडऩे की पात्रता खो चुके हैं.
लालू को सजा होने के तुरंत बाद वरिष्ठ जेडी (यू) मंत्री नरेंद्र सिंह ने 'अच्छे आरजेडी नेताओं’ को नीतीश की पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया था, जिसे आरजेडी के हताश नेताओं को तोडऩे की नीतीश की कथित रणनीति के तौर पर देखा गया. राबड़ी कहती हैं, ''मुझे पता है कि यह सब नीतीश कर रहे हैं. वे ही हमारी पार्टी को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं.
विधान परिषद में जब भी वे मेरे सामने आते हैं, मुझसे आंखें नहीं मिला पाते. एक समय था जब वे साहब की बातें सुनने के लिए हमारे घर में देर रात 2 बजे तक बैठे रहते. आज जब लालूजी जेल में हैं तो वे हमें बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं.”
पार्टी को भीतर और बाहर से चुनौती
राबड़ी की चिंता की वजह सिर्फ नीतीश नहीं, उन पर अपनी पार्टी को एकजुट रखने का भी भार है जिसमें तीन लोकसभा सांसद ऐसे हैं जो लालू के उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव के जन्म से पहले से जनप्रतिनिधि बने हुए हैं. यह मुश्किल स्थिति है.
जहां लालू अयोग्य होने की वजह से चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, वहीं संभावना है कि आरजेडी के कई वरिष्ठ नेता 24 वर्षीय तेजस्वी को अपना शीर्ष नेता मानने के लिए तैयार नहीं होंगे. इसी वजह से राबड़ी की राजनैतिक भूमिका और भी महत्वपूर्ण बन गई है.
लालू की जिंदगी में राबड़ी ने कई रोल अदा किए हैं. भारतीय राजनीति में सत्ता की विरासत थमाने का सबसे नाटकीय दृश्य उस दिन देखने को मिला जब नौ बच्चों की मां राबड़ी देवी को 25 जुलाई, 1997 को बिहार का मुख्यमंत्री पद सौंपा गया था.
वे शायद अकेली मुख्यमंत्री हैं जो आंखों में आंसू भरे शपथ समारोह में पहुंचीं. चारा घोटाला मामले में सीबीआइ की ओर से दाखिल चार्जशीट के बाद लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री पद छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा. राजनैतिक हलकों में पूरी तरह अनजान राबड़ी देवी को बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर बिठा दिया गया.
हालांकि, 2000 में आरजेडी ने एक बार फिर विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की, लेकिन लालू प्रसाद ने राबड़ी को ही मुख्यमंत्री के पद पर बरकरार रखा.
30 सितंबर को रांची की सीबीआइ अदालत से सजा पाने के बाद लालू प्रसाद ने एक बार फिर बड़ी सावधानी से अपने पत्ते खेले हैं. अटकलें थीं कि वे राबड़ी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करेंगे, लेकिन लालू ने ऐसे किसी भी कदम को उठाने से परहेज किया और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं की ओर से रखे गए सामूहिक नेतृत्व के विचार का समर्थन किया.
संभव है कि लालू के जेल में बंद होने से आरजेडी सामूहिक नेतृत्व का कोई फॉर्मूला ईजाद करे, लेकिन नतीजे की जिम्मेदारी साफ तौर पर राबड़ी को उठानी होगी. राबड़ी ने अपने पति से भी ज्यादा लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया है.
आज फिर अपने पति के कहने पर जिम्मेदारी उठाने के लिए बढ़ते राबड़ी के कदमों में झिझक या अनिच्छा नहीं दिखती जो 1997 में मुख्यमंत्री बनाए जाने पर झलकी थी.
चल पड़ा राबड़ी-रथ
राबड़ी ने 18 नवंबर से राज्य का दौरा शुरू किया और बिहार के दर्जनों जिलों में आरजेडी की परिवर्तन यात्रा का संचालन किया. राबड़ी की सार्वजनिक सभाओं ने जिस तरह की भीड़ आकर्षित की है वह उनके विरोधियों की नींद उड़ाने के लिए काफी है.
पालीगंज की ओर बढ़ता उनका काफिला जब पटना के मुस्लिमबहुल इलाके फुलवारीशरीफ से गुजरा तो भीड़ ने लालू प्रसाद के पक्ष में नारे लगाते हुए फूल मालाओं से उनका स्वागत किया. साफ है कि लालू को सजा के बाद भी बिहार के मुसलमानों ने उनकी पार्टी नहीं छोड़ी है. यह बात अलग है कि लालू ने पत्नी से कोई प्रेरणा ली है या नहीं, पर संकट की स्थिति में उन्होंने हमेशा राबड़ी का सहारा लिया है और उसके सकारात्मक नतीजों का लाभ भी उठाया है.
आरजेडी हमेशा से लालू प्रसाद की पार्टी रही है, लेकिन चारा घोटाला मामले में जुलाई, 1997 में लालू के जेल जाने के समय से कमान राबड़ी ने थाम ली और अपनी पार्टी और सरकार को अपने दो भाइयों, साधु यादव और सुभाष सहित कई अन्य महत्वाकांक्षी नेताओं से सुरक्षित और पहुंच से परे रखा. आज जब लालू दोषी साबित होने की वजह से लोकसभा सांसद के रूप में अयोग्य घोषित हो चुके हैं, एक बार फिर राबड़ी उनकी ओर से पार्टी की देखरेख कर रही हैं.
2010 के विधानसभा चुनाव में हारने के बाद राबड़ी एक तरह से रिटायर हो गई थीं, लेकिन लालू ने मई, 2012 को उन्हें विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामांकित कर राजनीति की मुख्यधारा में वापस खींच लिया. आरजेडी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो यह सोची-समझी रणनीति थी जो चारा घोटाला मामले को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई थी.

सहानुभूति की लहर जगाना कोई आसान काम नहीं. एक सीनियर आरजेडी नेता का कहना है, ''जब तक हमारे समर्थकों की चिंता लालू से जुड़ी है, तब तक आरजेडी को इससे फायदा होगा. लेकिन अगर हमारे समर्थक लालू के लिए दुखी होने लगें तो यह स्थिति हमारे खिलाफ जा सकती है, क्योंकि तब वे हमारे सबसे बड़े चुनावी दुश्मन नीतीश कुमार को सजा देने के लिए नरेंद्र मोदी की बीजेपी के साथ हाथ मिला सकते हैं.
झारखंड हाइकोर्ट से लालू की जमानत याचिका खारिज होने के बाद हमारे समर्थकों में पनप रही हताशा चिंता का विषय है. ऐसे में राबड़ी के संचालन में हो रही परिवर्तन यात्रा हमारे समर्थकों का ध्यान केंद्रित रखने में अहम भूमिका निभा रही है.”
राबड़ी ने लालू की गैर-मौजूदगी में राजनैतिक परिपक्वता दिखाई है. जैसे ही नरेंद्र मोदी ने आरजेडी के मुस्लिम-यादव वोट बैंक को लुभाने की कोशिश की, राबड़ी ने तुरंत मोर्चा खोल दिया. 27 अक्तूबर को मोदी ने पटना की अपनी हुंकार रैली में महाभारत से जुड़े वाकये का हवाला देते हुए यादवों को अपने पाले में करने की कोशिश की थी.
जो बिहार में लालू के सबसे अधिक प्रतिबद्ध वोट बैंक के रूप में पहचाने जाते हैं. उन्हें कृष्ण के वंशज कहते हुए नरेंद्र मोदी ने उनका ध्यान रखने का वादा किया और कहा कि वे उस द्वारिका से आए हैं जिसे कृष्ण ने मथुरा के बाद अपनी कर्मभूमि बनाई थी.
अगले दिन राबड़ी लगभग 100 बुर्काधारी महिलाओं और यादव नेताओं के साथ दिखीं. वहां फोटोग्राफरों के लिए प्रवेश खुला था और राबड़ी मुस्लिम महिलाओं के साथ हंस-हंसकर बातें कर रही थीं.
लालू की गैरहाजिरी में आरजेडी के परंपरागत यादव और मुस्लिम वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की मोदी की साफ कोशिशों से आशंकित राबड़ी ने नाप-तौल कर गुजरात के मुख्यमंत्री पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि गुजरात में हुए दंगों और उसके बाद तो मोदी को यादवों और मुसलमानों का ध्यान नहीं आया.
मुस्लिम-यादव के सामाजिक समीकरण की वजह से ही लालू ने 15 साल तक राज्य में शासन किया. ये दोनों समूह राज्य की कुल आबादी का 30 फीसदी हैं.
बीजेपी की यादवों पर नजर
नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार पूरी शिद्दत से कोशिश कर रहे हैं कि लोकसभा चुनावों से पहले आरजेडी के इस परंपरागत वोट बैंक को अपने पाले में ले आया जाए. नरेंद्र मोदी का ध्यान जहां यादव वोट बैंक पर है, वहीं नीतीश राबड़ी के पाले से मुसलमानों को खींच लेना चाहते हैं.
राबड़ी अपने अंदाज में दोनों पर निशाना साधती हैं, ''लालकृष्ण आडवाणी ने जब बिहार में अपने सांप्रदायिक एजेंडे को मजबूत करने की कोशिश की तो लालूजी ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के लिए सिर्फ जुबान चलाने वाले नीतीश ने उस नरेंद्र मोदी को दो बार राज्य के मेहमान के तौर पर बुलाया जिस पर अल्पसंख्यक कभी भरोसा नहीं कर सकते.”
आरजेडी के नेता मानते हैं कि मोदी के मुद्दे पर बीजेपी से नाता तोड़कर नीतीश ने मुसलमानों के एक वर्ग का समर्थन तो पा ही लिया है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि इसके बाद भी अल्पसंख्यक लालू के उम्मीदवार को ही वोट करेंगे क्योंकि बीजेपी को हराने की कुव्वत आरजेडी में कहीं ज्यादा है.
आरजेडी के एक शीर्ष नेता के मुताबिक, ''मुसलमान हमेशा उसी प्रत्याशी को वोट देते हैं जिसमें बीजेपी को हराने की कुव्वत हो. 2009 के लोकसभा और 2010 के राज्य विधानसभा चुनावों में जरूर अलग रुख देखने को मिला जब नीतीश की वजह से कुछ मुसलमानों ने एनडीए के पक्ष में वोट डाले.
अब नरेंद्र मोदी बीजेपी के सबसे बड़े नेता बन चुके हैं तो मुसलमान अपनी बुनियादी रणनीति पर वापस आएंगे और आरजेडी के लिए वोट करेंगे क्योंकि बिहार का अकेला सबसे बड़ा जातीय समुदाय 'यादव’ लालू को दोषी ठहराए जाने के बाद और भी मजबूती से उनके साथ खड़ा हो गया है.”
क्या चलेगी सहानुभूति लहर?
राबड़ी की रैलियों में सजे बैनरों में अनिवार्य तौर पर राबड़ी को छठ पूजा करते और लालू को सलाखों के पीछे दिखाया जा रहा है. जाहिर है, इसका उद्देश्य सहानुभूति की लहर पैदा करना है. साथ ही जिस अंदाज में राबड़ी जनसमुदाय की आंखों में आंखें डालकर उन्हें संबोधित करती हैं, उसका सीधा संकेत यह है कि पार्टी हर मुसीबत से लडऩे के लिए तैयार है.
रैलियों में राबड़ी अक्सर पूछती हैं, ''क्या आपको लगता है कि पिछड़े, अत्यंत पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए लड़ाई लडऩे वाली आवाज को दबाकर जेल में बंद कर देना चाहिए? भीड़ जवाब देती है, ''कभी नहीं...कभी नहीं.” राबड़ी लोगों से कहती हैं, ''लालूजी निर्दोष हैं. वे हमारे प्रतिद्वंद्वियों की राजनैतिक साजिश का शिकार हो गए हैं.
समय आ गया है कि आप एकजुट रहें और सांप्रदायिक ताकतों का सामना करें. जेडी (यू) और बीजेपी में अंदर ही अंदर दोस्ती है. अगर राज्य में गरीबों का शासन वापस लाना चाहते हैं तो आपको इन दोनों के खिलाफ लडऩा होगा.”
क्या करेगी कांग्रेस
पटना के अखबार जब नीतीश-सुशील मोदी के झगड़ों की खबरों से पटे पड़े हैं, तब राबड़ी चुपचाप समर्थकों से संपर्क साधने में जुटी हैं. कभी-कभी वे मन की बातें भी खोलती हैं: ''बीजेपी रावण है, तो जेडी (यू) कंस. दोनों ने मिलकर लोगों को मूर्ख बनाया और सात साल से ज्यादा समय से बिहार को लूट रहे हैं.” आरजेडी को उम्मीद है कि कांग्रेस अंतत: उसके साथ ही गठबंधन बनाएगी.
राबड़ी कहती हैं, ''वे जरूर देख रहे होंगे कि लालूजी के साथ जो बर्ताव किया जा रहा है उससे लोगों में कितना गुस्सा है.” राबड़ी अपने गांव सलारकलां के प्राथमिक स्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाई थीं. उनकी शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी. वहां से 1997 में पैदा हुई राजनैतिक उथल-पुथल के बीच बिहार की महिला मुख्यमंत्री (अब तक राज्य की अकेली मुख्यमंत्री) के रूप में पदभार संभालने तक की यात्रा उनके लिए वास्तव में काफी मुश्किल भरी रही होगी.
मोबाइल फोन एक बार फिर से बजता है. यह किसी जानने वाले का फोन है और उनके चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती है. राबड़ी कॉल लेती हैं. फोन करने वाले को होल्ड पर रख अपने बेटे तेज प्रताप को लैपटॉप के साथ बुलाने के लिए अनवर को कहती हैं जिससे तस्वीरों को चुनने में वे उनकी मदद कर सकें.

