छब्बीस सितंबर की बात है. पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक एस. नंबीनारायणन को बस इतना पता था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी माता अमृतानंदमयी के 60वें जन्मदिन समारोह में शिरकत करने केरल पहुंच रहे हैं.
लेकिन तिरुअनंतपुरम स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व परियोजना निदेशक को सुबह जब मोदी के सचिव का फोन आया तो उन्हें हैरानी हुई. उनसे पूछा गया कि क्या वे तिरुअनंतपुरम के सरकारी मैस्कॉट होटल में ठहरे बीजेपी के इस नेता से मिल सकते हैं?
दो दशक पुराने इसरो जासूसी कांड के इस मुख्य आरोपी वैज्ञानिक को बाद में निर्दोष पाया गया था. 71 वर्षीय नंबीनारायणन समय पर होटल पहुंच गए, जहां मोदी इंतजार ही कर रहे थे. वे बताते हैं, ''मोदी ने विनम्रता के साथ कहा कि वे काफी दिनों से मुझसे मिलना चाह रहे थे.
उसके बाद उन्होंने मुझसे जासूसी मामले का ब्यौरा लिया और मेरे अनुभव के बारे में पूछा. मैंने उन्हें पूरी बात बताई और इस मामले के सीआइए कनेक्शन के बारे में भी बताया. उन्होंने सीआइए के लिंक के बारे में मुझसे और भी जानकारी ली. हमारी मुलाकात 10 मिनट में खत्म हो गई.” राजनीति से मेरा कोई लेना-देना नहीं. लेकिन मुझे सुकून महसूस हो रहा है कि मोदी जैसे व्यक्ति ने मुझसे मुलाकात की.
मैंने जिन शारीरिक और मानसिक तकलीफों का सामना किया, उसके बारे में उन्होंने पूछा. 19 साल पहले यह मामला सामने आने के बाद से अब तक केरल के मुख्यमंत्री की कुर्सी की शोभा बढ़ा चुके पांच में से किसी भी नेता ने एक बार भी ऐसा नहीं किया था.”
नंबीनारायणन का दावा है कि जासूसी का मामला सीआइए की साजिश है, जिसे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में रोड़ा डालने के लिए रचा गया था, खासकर रूस से मंगाए जाने वाले रॉकेटों के लिए क्रायोजेनिक इंजिन हासिल करने की राह में रुकावट खड़ी करने के लिए.
मोदी-नंबीनारायणन मुलाकात तुरंत सियासी विवादों में आ गई. बीजेपी ने इसरो मामले को हवा देते हुए जांच में शामिल खुफिया ब्यूरो (आइबी) और केरल एसआइटी के सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठा दी. इसमें आर.बी. श्रीकुमार का नाम खास तौर से लिया गया, जो एसआइटी को सहयोग दे रही आइबी की इकाई के उप-निदेशक थे. श्रीकुमार गुजरात काडर के 1971 बैच के आइपीएस अफसर हैं.
2002 में गुजरात दंगों के दौरान वे राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक थे. उन्होंने मोदी को दोषी बताते हुए कोर्ट के अंदर और बाहर उनके खिलाफ जंग छेड़ दी थी. अब गांधीनगर में बस चुके 66 वर्षीय श्रीकुमार ने इंडिया टुडे से कहा कि बीजेपी ने उन्हें निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ मामला उछाला है.
''मैं एसआइटी को सहयोग देने वाली आइबी टीम में दूसरे नंबर पर था. नंबीनारायणन को तकलीफ देना तो दूर, मैंने कभी उनसे पूछताछ भी नहीं की. मुझे मोदी के कहने पर निशाना बनाया जा रहा है.”
श्रीकुमार गुजरात काडर के उन पहले आइपीएस अफसरों में से थे जिन्होंने मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. 2007 में रिटायर होने के बाद उन्होंने मोदी के खिलाफ खुली मुहिम चलाने के लिए तीस्ता सीतलवाड़ के सिटिजंस फार जस्टिस ऐंड पीस जैसे एनजीओ से हाथ मिला लिया. श्रीकुमार ने विभिन्न मामलों में नौ हलफनामे दाखिल कर दावा किया कि तब दंगों के दौरान पुलिस में क्या-कुछ चल रहा था.
वे कहते हैं कि रिटायर होने के बाद वे गांधीनगर में इसलिए रह गए ताकि दंगापीड़ितों को न्याय दिला सकें. वे दावा करते हैं कि यह उनकी और सीतलवाड़ जैसे लोगों की कोशिशों का ही नतीजा है कि दंगे के 116 आरोपियों को उम्र कैद की सजा दिलाई जा सकी. विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस मेडल जीत चुके श्रीकुमार कहते हैं, ''यही वजह है कि बीजेपी और मीडिया में मोदी के समर्थक मुझे निशाना बना रहे हैं.
एक अन्य मामले में आर.के.राघवन के नेतृत्व वाली एसआइटी ने मोदी को क्लीन चिट दी थी और मैंने उसे चुनौती देते हुए साक्ष्य पेश किए थे. अहमदाबाद की विशेष अदालत इस मामले पर 13 दिसंबर को फैसला सुनाने वाली है. मेरे हलफनामों में कोई झूठ और तथ्यहीन बात होती तो मोदी सरकार ने अब तक इसे मेरे खिलाफ हथियार बना दिया होता.”
मोदी ने केरल में अप्रैल महीने में ऑपरेशन लोटस शुरू किया. एक के बाद एक शुरू किए गए तमाम सियासी अभियानों की श्रृंखला में इसरो मामला एक ताजा कड़ी है. केरल में सत्तारूढ़ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और विपक्षी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ने मोदी से दूरी बना रखी है. उन्हें डर है कि कहीं राज्य में 45 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला अल्पसंख्यक समुदाय (ईसाई और मुस्लिम) नाराज न हो जाए.
अब तक किसी भी चुनाव में भाजपा 10 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल नहीं कर पाई जबकि संघ की शाखाओं की संख्या के मामले में केरल देश में अव्वल है. यहां 4,310 शाखाएं हैं, जो गुजरात से चार गुना हैं. हालात का अंदाजा इसी से लगाइए कि मोदी अपने ऐलान में इस दफा राज्य की 20 लोकसभा सीटों में से दो पर बीजेपी के जीतने का दम भर पाए हैं.
हाल ही में केरल की दो सबसे लोकप्रिय आध्यात्मिक संस्थाओं के कार्यक्रम में मोदी मुख्य अतिथि रहे. पहला मौका उन्हें शिवगिरि मठ की ओर से अप्रैल में मिला. इसका आयोजन एक शक्तिशाली आध्यात्मिक संस्था एसएनडीपी ने किया था. यह राजनैतिक तौर पर अत्यधिक अहम ओबीसी समुदाय इझवा की संस्था है.
इसके बाद उन्हें अमृतानंदमयी के बहुप्रचारित जन्मदिन समारोह के उद्घाटन का मौका मिला. यूं तो अमृतानंदमयी भी अराया नाम की पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखती हैं, लेकिन इनकी लोकप्रियता जात-पात से ऊपर है. इसके अलावा संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय बैठक भी कोच्चि में हुई. इन सबसे यह साफ है कि मोदी के लिए सियासी तौर पर इस राज्य का क्या महत्व है.
लेकिन तिरुअनंतपुरम स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व परियोजना निदेशक को सुबह जब मोदी के सचिव का फोन आया तो उन्हें हैरानी हुई. उनसे पूछा गया कि क्या वे तिरुअनंतपुरम के सरकारी मैस्कॉट होटल में ठहरे बीजेपी के इस नेता से मिल सकते हैं?
दो दशक पुराने इसरो जासूसी कांड के इस मुख्य आरोपी वैज्ञानिक को बाद में निर्दोष पाया गया था. 71 वर्षीय नंबीनारायणन समय पर होटल पहुंच गए, जहां मोदी इंतजार ही कर रहे थे. वे बताते हैं, ''मोदी ने विनम्रता के साथ कहा कि वे काफी दिनों से मुझसे मिलना चाह रहे थे.उसके बाद उन्होंने मुझसे जासूसी मामले का ब्यौरा लिया और मेरे अनुभव के बारे में पूछा. मैंने उन्हें पूरी बात बताई और इस मामले के सीआइए कनेक्शन के बारे में भी बताया. उन्होंने सीआइए के लिंक के बारे में मुझसे और भी जानकारी ली. हमारी मुलाकात 10 मिनट में खत्म हो गई.” राजनीति से मेरा कोई लेना-देना नहीं. लेकिन मुझे सुकून महसूस हो रहा है कि मोदी जैसे व्यक्ति ने मुझसे मुलाकात की.
मैंने जिन शारीरिक और मानसिक तकलीफों का सामना किया, उसके बारे में उन्होंने पूछा. 19 साल पहले यह मामला सामने आने के बाद से अब तक केरल के मुख्यमंत्री की कुर्सी की शोभा बढ़ा चुके पांच में से किसी भी नेता ने एक बार भी ऐसा नहीं किया था.”
नंबीनारायणन का दावा है कि जासूसी का मामला सीआइए की साजिश है, जिसे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में रोड़ा डालने के लिए रचा गया था, खासकर रूस से मंगाए जाने वाले रॉकेटों के लिए क्रायोजेनिक इंजिन हासिल करने की राह में रुकावट खड़ी करने के लिए.
मोदी-नंबीनारायणन मुलाकात तुरंत सियासी विवादों में आ गई. बीजेपी ने इसरो मामले को हवा देते हुए जांच में शामिल खुफिया ब्यूरो (आइबी) और केरल एसआइटी के सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठा दी. इसमें आर.बी. श्रीकुमार का नाम खास तौर से लिया गया, जो एसआइटी को सहयोग दे रही आइबी की इकाई के उप-निदेशक थे. श्रीकुमार गुजरात काडर के 1971 बैच के आइपीएस अफसर हैं.
2002 में गुजरात दंगों के दौरान वे राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक थे. उन्होंने मोदी को दोषी बताते हुए कोर्ट के अंदर और बाहर उनके खिलाफ जंग छेड़ दी थी. अब गांधीनगर में बस चुके 66 वर्षीय श्रीकुमार ने इंडिया टुडे से कहा कि बीजेपी ने उन्हें निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ मामला उछाला है.
''मैं एसआइटी को सहयोग देने वाली आइबी टीम में दूसरे नंबर पर था. नंबीनारायणन को तकलीफ देना तो दूर, मैंने कभी उनसे पूछताछ भी नहीं की. मुझे मोदी के कहने पर निशाना बनाया जा रहा है.”
श्रीकुमार गुजरात काडर के उन पहले आइपीएस अफसरों में से थे जिन्होंने मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. 2007 में रिटायर होने के बाद उन्होंने मोदी के खिलाफ खुली मुहिम चलाने के लिए तीस्ता सीतलवाड़ के सिटिजंस फार जस्टिस ऐंड पीस जैसे एनजीओ से हाथ मिला लिया. श्रीकुमार ने विभिन्न मामलों में नौ हलफनामे दाखिल कर दावा किया कि तब दंगों के दौरान पुलिस में क्या-कुछ चल रहा था.
वे कहते हैं कि रिटायर होने के बाद वे गांधीनगर में इसलिए रह गए ताकि दंगापीड़ितों को न्याय दिला सकें. वे दावा करते हैं कि यह उनकी और सीतलवाड़ जैसे लोगों की कोशिशों का ही नतीजा है कि दंगे के 116 आरोपियों को उम्र कैद की सजा दिलाई जा सकी. विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस मेडल जीत चुके श्रीकुमार कहते हैं, ''यही वजह है कि बीजेपी और मीडिया में मोदी के समर्थक मुझे निशाना बना रहे हैं.
एक अन्य मामले में आर.के.राघवन के नेतृत्व वाली एसआइटी ने मोदी को क्लीन चिट दी थी और मैंने उसे चुनौती देते हुए साक्ष्य पेश किए थे. अहमदाबाद की विशेष अदालत इस मामले पर 13 दिसंबर को फैसला सुनाने वाली है. मेरे हलफनामों में कोई झूठ और तथ्यहीन बात होती तो मोदी सरकार ने अब तक इसे मेरे खिलाफ हथियार बना दिया होता.”
मोदी ने केरल में अप्रैल महीने में ऑपरेशन लोटस शुरू किया. एक के बाद एक शुरू किए गए तमाम सियासी अभियानों की श्रृंखला में इसरो मामला एक ताजा कड़ी है. केरल में सत्तारूढ़ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और विपक्षी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ने मोदी से दूरी बना रखी है. उन्हें डर है कि कहीं राज्य में 45 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला अल्पसंख्यक समुदाय (ईसाई और मुस्लिम) नाराज न हो जाए.अब तक किसी भी चुनाव में भाजपा 10 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल नहीं कर पाई जबकि संघ की शाखाओं की संख्या के मामले में केरल देश में अव्वल है. यहां 4,310 शाखाएं हैं, जो गुजरात से चार गुना हैं. हालात का अंदाजा इसी से लगाइए कि मोदी अपने ऐलान में इस दफा राज्य की 20 लोकसभा सीटों में से दो पर बीजेपी के जीतने का दम भर पाए हैं.
हाल ही में केरल की दो सबसे लोकप्रिय आध्यात्मिक संस्थाओं के कार्यक्रम में मोदी मुख्य अतिथि रहे. पहला मौका उन्हें शिवगिरि मठ की ओर से अप्रैल में मिला. इसका आयोजन एक शक्तिशाली आध्यात्मिक संस्था एसएनडीपी ने किया था. यह राजनैतिक तौर पर अत्यधिक अहम ओबीसी समुदाय इझवा की संस्था है.
इसके बाद उन्हें अमृतानंदमयी के बहुप्रचारित जन्मदिन समारोह के उद्घाटन का मौका मिला. यूं तो अमृतानंदमयी भी अराया नाम की पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखती हैं, लेकिन इनकी लोकप्रियता जात-पात से ऊपर है. इसके अलावा संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय बैठक भी कोच्चि में हुई. इन सबसे यह साफ है कि मोदी के लिए सियासी तौर पर इस राज्य का क्या महत्व है.

