पलकों पे नमी, सांस है थमी, ओ मेरे रब्बा, सुकूं है गम कहीं. अंधेरे की आगोश में लेटी है सरजमीं. लौटा दे जरा शहीदे कश्मीर.’’
-शायन नबी, कश्मीरी रैपर
हिंसा और शांति, हड़ताल और कर्फ्यू और किसी खुशनुमा दिन पीस कंसर्ट और उसके समानांतर संगीत में डूबता-उतरता कश्मीर. इस तरह के उथल-पुथल और उतार-चढ़ाव भरे परिवेश में 24 साल के शायन नबी श्रीनगर के अपर टाउन इलाके में स्थित अपने घर में बैठकर संगीत रचते रहते हैं. उनका कहना है कि घर में बंद रहने का एहसास एक तरह से रोज हमें अभिव्यक्ति की अहमियत का सबक देता है. लाइव परफॉर्म करने के मौके बहुत कम हैं उनके पास. इसलिए वे दुनिया भर के कलाकारों के साथ मिल-जुलकर अपना संगीत ऑनलाइन अपलोड करते रहते हैं. उन्होंने ऐसे रैपर्स को अपने रचे 25 से ज्यादा बैकग्राउंड ट्रैक दिए हैं जिन्हें इनकी जरूरत रही है. उनके गीत द ओशन ऑफ टीयर्स (आंसुओं का महासागर), द प्रीचर (उपदेशक) और अभी तक रिलीज न हुए तमाम ट्रैक्स की मूल विषयवस्तु एक ही हैः आजादी.
मुंबई के रैपर 25 साल के अश्विनी मिश्र अकसर नबी की मदद लेते आए हैं. अश्विनी ने कंपनी की अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर पूरा समय संगीत को देने का फैसला किया है. 2004 से ही वे संगीत साधना में लगे हैं. लेकिन उनका खुद का ही मानना है उनके संगीत में ‘‘चेतना 2012 से ही जागी है.’’ फ्री स्टाइल रैपर अश्विनी विमियो और यूट्यूब जैसे माध्यमों का सहारा लेते हैं. जापा यानी जस्टिस ऐंड पीस फॉर ऑल जैसे आयोजनों और क्लबों के लिए उन्होंने रैप किया है. नबी के सुर में सुर मिलाते हुए अश्विनी कहते हैं कि ऑनलाइन मंचों से उन भावनाओं का इजहार करने का मौका मिलता है जिनकी इजाजत मुख्य धारा के मीडिया पर नहीं है या जो उसे पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पाते. नक्सलबाड़ी, प्रे फॉर गाजा (गाजा के लिए दुआ) और द टेल ऑफ अफजल गुरु (अफजल गुरु की दास्तान) जैसे उनके गाने पूरी तरह राजनैतिक तेवर वाले और सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ हैं.

अश्विनी के शब्दों में, ‘‘मैं चुनावी राजनीति और सामाजिक राजनीति को अलग-अलग रखकर देखता हूं. मेरा अपना नियम है कि चुनावी राजनीति से अपने को दूर रखो क्योंकि बड़े मुद्दे आम तौर पर कहीं और ही होते हैं.’’ कुछ गाने खुद अश्विनी ने भी रचे हैं, मसलन राज ठाकरे के नाम चिट्ठीः बंबई में मैं एक बिहारी हूं. अब वे नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर एक गाने पर काम कर रहे हैं.
आज देश में मुख्य धारा के संगीत पर फिल्मी दुनिया के गानों का एकाधिकार जैसा हो गया है. बाकी जो थोड़ी-बहुत जगह बचती है, उसे शास्त्रीय संगीत ने भर दिया है. ऐसे में इस तरह अपने-अपने स्तर पर तैयार किए गए म्युजिक वीडियो बागी तेवर वाले संगीत का नया ठिकाना बन गए हैं. शौकिया हों या कॉमर्शियल, कश्मीर से लेकर केरल तक के युवा संगीतकार अपने गीतों में ऐसे सियासी मुद्दे उठाने से बिलकुल नहीं डर रहे, जो सत्ता प्रतिष्ठानों के कानों को नहीं सुहाते. इस तरह के समूहों का प्रतिनिधित्व स्वांग से बेहतर कौन कर सकता है भला! यह भिन्न-भिन्न रूपों में फिल्म उद्योग से जुड़े कलाकारों, लेखकों, निर्देशकों और अकादमिक लोगों का ग्रुप है.

स्वांग ने दिसंबर, 2012 में दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के बाद ऑनलाइन धूम मचानी शुरू की. उसने मां के नाम बेटी का पत्र रचा मां नी मेरी. तब से लेकर अब तक स्वांग ने 15 से ज्यादा गीत तैयार किए हैं. कुछ बेहद तीखे सियासी तेवर वाले भी हैं, जिनमें से ज्यादातर देशभर में स्कूलों और दूसरी जगहों पर गाए-बजाए जा चुके हैं. करीब 20 सदस्यों की इस टोली के लोग पहली दफा एक फिल्मी पार्टी में 2011 में मिले थे. आपस में बातचीत के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि विद्रोही किस्म के गीत-संगीत में उन सबकी बराबर की दिलचस्पी है.
इस ग्रुप ने हाल ही में अपना दूसरा सोलो गाना रिलीज किया है, जिसका नाम है बेकार कुत्ते. यह असल में, फैज अहमद फैज की कुत्ते नाम की नज्म पर आधारित है. ग्रुप की यह रचना आक्रामक और राजनैतिक नजरिए से भड़काने वाली है. स्वांग के 36 वर्षीय लेखक, गायक और वीडियो निर्देशक रवींद्र रंधावा बताते हैं, ‘‘हमें पाकिस्तान वापस जाओ जैसी धमकियां भी मिली हैं क्योंकि लोगों को इस रचना में छिपे व्यंग्य, टोन और कटाक्ष को सहने की आदत नहीं है. विद्रोही संगीत की जड़ें अभी जमी नहीं हैं. वह अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है.’’

तरु डालमिया उर्फ दिल्ली सल्तनत 32 साल का एक रैपर और रेगे डांस हॉल गायक है जो खुद को स्का वेंगर्स और ज्यादा खांटी वर्ड साउंड पावर जैसे म्यूजिक प्रोजेक्ट्स के जरिए अभिव्यक्त करता है. तरु कहते हैं कि हिंदुस्तान में सियासी संघर्षों में संगीत की भागीदारी का अच्छा-खासा इतिहास रहा है, ‘‘आज यह भले ही ज्यादा दिखाई न देता हो लेकिन भारत में सियासी तेवर वाला संगीत हमेशा से मौजूद रहा है.’’ माओवादी क्रांतिकारी गदर गली-गली घूमकर अपने गीतों से जोश जगाते रहे हैं और विप्लवी धारा से संबंधित रहे हैं. इसी तरह कश्मीर से गायक एक्टिविस्ट एम.सी. काश, पंजाब से बंत सिंह (जिनके साथ तरु ने वर्ड साउंड पावर प्रोजेक्ट पर काम किया) और झारखंड से सांस्कृतिक कार्यकर्ता जीतन मरांडी के नाम लिए जा सकते हैं. जीतन को हत्या के आरोप में 2008 में जेल हुई और 2011 में उन्हें आरोपमुक्त कर दिया गया. शहरी नौजवानों के लिए पुणे का कबीर कला मंच प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत है. इसके कितने ही सदस्यों को 2011 से सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी गीतों के चलते सजा मिली है.
तरु कहते हैं, ‘‘हमारे जैसे अंग्रेजी पृष्ठभूमि वाले मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए बदलाव यह है कि सियासी तेवर वाला जो संगीत एक समय में किसी मूवमेंट में शामिल रहे और उससे प्रभावित लोगों के लिए होता था, उसी अभिव्यक्ति को आज पहले से कहीं बड़ा श्रोता वर्ग मिल गया है. आप जितने ज्यादा लोकप्रिय होते हैं उतनी ही ज्यादा छूट हासिल कर पाते हैं.’’

कोझिकोड के रैपर ग्रुप मैपिला लहाला को अब किसी तरह के उत्पीडऩ से डर नहीं लगता. बाजार में बम लगाने के आरोप में फंसाए गए एक मुसलमान लड़के के बारे में मलयालम में स्ट्रीट एकेडमिक्स नाम के एक स्थानीय ग्रुप के साथ मिलकर नेटिव बप्पा नाम से एक तीखा व्यंग्य रचा था, जो जनवरी, 2013 में सब जगह छा गया. 20 सदस्यों के इस ग्रुप में हिंदू, ईसाई और मुसलमान सब हैं, फिर भी मुसलमान लड़कों को एक घिसी-पिटी भूमिका में बांधने की कोशिश के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए इसके गीत की जबर्दस्त आलोचना हुई. यह ग्रुप अब उतने ही तीखे तेवर वाले दूसरे गीत पर काम कर रहा है, जो मलयालम कवि के. सच्चिदानंदन की ठोस कार्रवाई की अपील से भरी कविता कोजीपंखू पर आधारित है. बैंड के निर्देशक और प्रवक्ता मोहसिन परारी का कहना है कि आज के विचारधारा शून्य युग में विचारधारा ही सब कुछ है, ‘‘हम समानता और जनहितकारी आंदोलनों के समर्थक हैं. हम चाहते हैं कि किसी के साथ तो खड़ा हुआ जाए.’’
उधर मणिपुर की राजधानी इंफाल में इंफाल टॉकीज बैंड के अगुवा 27 साल के अखू चिंगांगबम अपने नए एल्बम के लिए एक गीत की रचना और रिकॉर्डिंग में लगे हैं. उसका शीर्षक देखिए जराः इंडिया, आइ सी डर्ट इन योर हैंड्स (ओ हिंदुस्तान, दिखती है मुझे तुम्हारे हाथों में गंदगी). नवंबर में रिलीज होने वाले उनके इस नए एल्बम का नाम है ह्वेन द होम इज बर्निंग (जल रहा हो जब आशियां). इंफाल टॉकीज का पहला एल्बम टिडिम रोड 2009 में रिलीज हुआ था, जो पूरी तरह मणिपुरी में था. अब इस साल शुरू हुए इंफाल म्युजिक प्रोजेक्ट में नगा, बांग्ला और अंग्रेजी के गीत भी शामिल हैं. चिंगांगबम स्थानीय मुद्दों को अपने गीतों में उठाते हैं.
मसलन सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) और इस अधिनियम को खत्म किए जाने की मांग के लिए नवंबर, 2000 से अनशन कर रही इरोम शर्मिला उनके गीतों का अहम मजमून है. उनका कहना है, ‘‘मैं सरकारी और गैर-सरकारी दोनों पक्षों को दोषी मानता हूं. विद्रोही गतिविधियां इसलिए पनपती हैं क्योंकि लोगों को आजादी से जीने की छूट नहीं है. हमें इतनी आजादी नहीं है कि हम जान सकें कि हमें क्या चाहिए और हमारे लिए क्या अच्छा है.’’ उनकी शिकायत है कि शहरी भारतीय संगीत पर पश्चिमी गीतों, बोलों और सरोकारों की नकल करने वाले युवाओं ने कब्जा कर लिया है. उनका एक दिलचस्प सवाल है, ‘‘अगर किसी नौजवान को माइक्रोफोन पकडऩे की आजादी हो तो अपने घर के पीछे सुलगती आग की बजाए वह होटल कैलिफोर्निया जैसा गीत भला क्यों गाएगा?’’

चिंगांगबम का संगीत उत्सवों और ऑनलाइन साधनों के जरिए छोटे से इंडी संगीत सर्किट तक पहुंचता है लेकिन रचनात्मक अभिव्यक्ति के मंच कहीं और उभर रहे हैं. मुंबई में कल्चर शॉक करीब तीन साल से बंगलुरू, हैदराबाद, चेन्नै और कोच्चि के क्लबों में बिग माइक नाइट्स आयोजित कर रहा है. 33 वर्षीय सुदीप नायर, 28 वर्षीय राजेश मरार नायर और 33 वर्षीय प्रमोद सिप्पी की त्रिमूर्ति के समूह ने 28 वर्षीय विराज मांजरेकर जैसे कलाकारों को तराशा है. विराज कैसे में सहूं जैसे गीतों में गुवाहाटी, दिल्ली और मुंबई में यौन हिंसा के दौर में इंसानों की व्यथा और भारत-पाकिस्तान संबंधों के गीत गाते हैं.
बाईस वर्षीय एम.सी. काश जैसे प्रेरक रैप आर्टिस्ट नई विद्रोही संस्कृति के स्वरों के प्रतिनिधि हैं. इनके गीतों में ऐसी कथाएं सुनाई जाती हैं, जिन्हें मुख्य धारा का संगीत कभी नहीं सुनाएगा. कश्मीर के काश सियासी हिपहॉप सिंगर हैं. वे 2007 में अपने सोलो गीत आइ प्रोटेस्ट से चर्चा में आए थे.
‘‘...अब मैं जो भी गीत रचूंगा सोचूंगा, गुनूंगा
कोई बकवास नहीं होगी, कोई न कोई संदेश होगा
जैसे हार कभी न मानी और सच के लिए आज भी दें कुर्बानी
क्योंकि बुराई के संग गलबहियां जो डालीं, तो गिरना निश्चित है मानी
-मुझे गिरना कभी नहीं’, एमसी काश
-शायन नबी, कश्मीरी रैपर
हिंसा और शांति, हड़ताल और कर्फ्यू और किसी खुशनुमा दिन पीस कंसर्ट और उसके समानांतर संगीत में डूबता-उतरता कश्मीर. इस तरह के उथल-पुथल और उतार-चढ़ाव भरे परिवेश में 24 साल के शायन नबी श्रीनगर के अपर टाउन इलाके में स्थित अपने घर में बैठकर संगीत रचते रहते हैं. उनका कहना है कि घर में बंद रहने का एहसास एक तरह से रोज हमें अभिव्यक्ति की अहमियत का सबक देता है. लाइव परफॉर्म करने के मौके बहुत कम हैं उनके पास. इसलिए वे दुनिया भर के कलाकारों के साथ मिल-जुलकर अपना संगीत ऑनलाइन अपलोड करते रहते हैं. उन्होंने ऐसे रैपर्स को अपने रचे 25 से ज्यादा बैकग्राउंड ट्रैक दिए हैं जिन्हें इनकी जरूरत रही है. उनके गीत द ओशन ऑफ टीयर्स (आंसुओं का महासागर), द प्रीचर (उपदेशक) और अभी तक रिलीज न हुए तमाम ट्रैक्स की मूल विषयवस्तु एक ही हैः आजादी.
मुंबई के रैपर 25 साल के अश्विनी मिश्र अकसर नबी की मदद लेते आए हैं. अश्विनी ने कंपनी की अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर पूरा समय संगीत को देने का फैसला किया है. 2004 से ही वे संगीत साधना में लगे हैं. लेकिन उनका खुद का ही मानना है उनके संगीत में ‘‘चेतना 2012 से ही जागी है.’’ फ्री स्टाइल रैपर अश्विनी विमियो और यूट्यूब जैसे माध्यमों का सहारा लेते हैं. जापा यानी जस्टिस ऐंड पीस फॉर ऑल जैसे आयोजनों और क्लबों के लिए उन्होंने रैप किया है. नबी के सुर में सुर मिलाते हुए अश्विनी कहते हैं कि ऑनलाइन मंचों से उन भावनाओं का इजहार करने का मौका मिलता है जिनकी इजाजत मुख्य धारा के मीडिया पर नहीं है या जो उसे पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पाते. नक्सलबाड़ी, प्रे फॉर गाजा (गाजा के लिए दुआ) और द टेल ऑफ अफजल गुरु (अफजल गुरु की दास्तान) जैसे उनके गाने पूरी तरह राजनैतिक तेवर वाले और सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ हैं.

अश्विनी के शब्दों में, ‘‘मैं चुनावी राजनीति और सामाजिक राजनीति को अलग-अलग रखकर देखता हूं. मेरा अपना नियम है कि चुनावी राजनीति से अपने को दूर रखो क्योंकि बड़े मुद्दे आम तौर पर कहीं और ही होते हैं.’’ कुछ गाने खुद अश्विनी ने भी रचे हैं, मसलन राज ठाकरे के नाम चिट्ठीः बंबई में मैं एक बिहारी हूं. अब वे नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर एक गाने पर काम कर रहे हैं.
आज देश में मुख्य धारा के संगीत पर फिल्मी दुनिया के गानों का एकाधिकार जैसा हो गया है. बाकी जो थोड़ी-बहुत जगह बचती है, उसे शास्त्रीय संगीत ने भर दिया है. ऐसे में इस तरह अपने-अपने स्तर पर तैयार किए गए म्युजिक वीडियो बागी तेवर वाले संगीत का नया ठिकाना बन गए हैं. शौकिया हों या कॉमर्शियल, कश्मीर से लेकर केरल तक के युवा संगीतकार अपने गीतों में ऐसे सियासी मुद्दे उठाने से बिलकुल नहीं डर रहे, जो सत्ता प्रतिष्ठानों के कानों को नहीं सुहाते. इस तरह के समूहों का प्रतिनिधित्व स्वांग से बेहतर कौन कर सकता है भला! यह भिन्न-भिन्न रूपों में फिल्म उद्योग से जुड़े कलाकारों, लेखकों, निर्देशकों और अकादमिक लोगों का ग्रुप है.

स्वांग ने दिसंबर, 2012 में दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के बाद ऑनलाइन धूम मचानी शुरू की. उसने मां के नाम बेटी का पत्र रचा मां नी मेरी. तब से लेकर अब तक स्वांग ने 15 से ज्यादा गीत तैयार किए हैं. कुछ बेहद तीखे सियासी तेवर वाले भी हैं, जिनमें से ज्यादातर देशभर में स्कूलों और दूसरी जगहों पर गाए-बजाए जा चुके हैं. करीब 20 सदस्यों की इस टोली के लोग पहली दफा एक फिल्मी पार्टी में 2011 में मिले थे. आपस में बातचीत के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि विद्रोही किस्म के गीत-संगीत में उन सबकी बराबर की दिलचस्पी है.
इस ग्रुप ने हाल ही में अपना दूसरा सोलो गाना रिलीज किया है, जिसका नाम है बेकार कुत्ते. यह असल में, फैज अहमद फैज की कुत्ते नाम की नज्म पर आधारित है. ग्रुप की यह रचना आक्रामक और राजनैतिक नजरिए से भड़काने वाली है. स्वांग के 36 वर्षीय लेखक, गायक और वीडियो निर्देशक रवींद्र रंधावा बताते हैं, ‘‘हमें पाकिस्तान वापस जाओ जैसी धमकियां भी मिली हैं क्योंकि लोगों को इस रचना में छिपे व्यंग्य, टोन और कटाक्ष को सहने की आदत नहीं है. विद्रोही संगीत की जड़ें अभी जमी नहीं हैं. वह अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है.’’

तरु डालमिया उर्फ दिल्ली सल्तनत 32 साल का एक रैपर और रेगे डांस हॉल गायक है जो खुद को स्का वेंगर्स और ज्यादा खांटी वर्ड साउंड पावर जैसे म्यूजिक प्रोजेक्ट्स के जरिए अभिव्यक्त करता है. तरु कहते हैं कि हिंदुस्तान में सियासी संघर्षों में संगीत की भागीदारी का अच्छा-खासा इतिहास रहा है, ‘‘आज यह भले ही ज्यादा दिखाई न देता हो लेकिन भारत में सियासी तेवर वाला संगीत हमेशा से मौजूद रहा है.’’ माओवादी क्रांतिकारी गदर गली-गली घूमकर अपने गीतों से जोश जगाते रहे हैं और विप्लवी धारा से संबंधित रहे हैं. इसी तरह कश्मीर से गायक एक्टिविस्ट एम.सी. काश, पंजाब से बंत सिंह (जिनके साथ तरु ने वर्ड साउंड पावर प्रोजेक्ट पर काम किया) और झारखंड से सांस्कृतिक कार्यकर्ता जीतन मरांडी के नाम लिए जा सकते हैं. जीतन को हत्या के आरोप में 2008 में जेल हुई और 2011 में उन्हें आरोपमुक्त कर दिया गया. शहरी नौजवानों के लिए पुणे का कबीर कला मंच प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत है. इसके कितने ही सदस्यों को 2011 से सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी गीतों के चलते सजा मिली है.
तरु कहते हैं, ‘‘हमारे जैसे अंग्रेजी पृष्ठभूमि वाले मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए बदलाव यह है कि सियासी तेवर वाला जो संगीत एक समय में किसी मूवमेंट में शामिल रहे और उससे प्रभावित लोगों के लिए होता था, उसी अभिव्यक्ति को आज पहले से कहीं बड़ा श्रोता वर्ग मिल गया है. आप जितने ज्यादा लोकप्रिय होते हैं उतनी ही ज्यादा छूट हासिल कर पाते हैं.’’

कोझिकोड के रैपर ग्रुप मैपिला लहाला को अब किसी तरह के उत्पीडऩ से डर नहीं लगता. बाजार में बम लगाने के आरोप में फंसाए गए एक मुसलमान लड़के के बारे में मलयालम में स्ट्रीट एकेडमिक्स नाम के एक स्थानीय ग्रुप के साथ मिलकर नेटिव बप्पा नाम से एक तीखा व्यंग्य रचा था, जो जनवरी, 2013 में सब जगह छा गया. 20 सदस्यों के इस ग्रुप में हिंदू, ईसाई और मुसलमान सब हैं, फिर भी मुसलमान लड़कों को एक घिसी-पिटी भूमिका में बांधने की कोशिश के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए इसके गीत की जबर्दस्त आलोचना हुई. यह ग्रुप अब उतने ही तीखे तेवर वाले दूसरे गीत पर काम कर रहा है, जो मलयालम कवि के. सच्चिदानंदन की ठोस कार्रवाई की अपील से भरी कविता कोजीपंखू पर आधारित है. बैंड के निर्देशक और प्रवक्ता मोहसिन परारी का कहना है कि आज के विचारधारा शून्य युग में विचारधारा ही सब कुछ है, ‘‘हम समानता और जनहितकारी आंदोलनों के समर्थक हैं. हम चाहते हैं कि किसी के साथ तो खड़ा हुआ जाए.’’
उधर मणिपुर की राजधानी इंफाल में इंफाल टॉकीज बैंड के अगुवा 27 साल के अखू चिंगांगबम अपने नए एल्बम के लिए एक गीत की रचना और रिकॉर्डिंग में लगे हैं. उसका शीर्षक देखिए जराः इंडिया, आइ सी डर्ट इन योर हैंड्स (ओ हिंदुस्तान, दिखती है मुझे तुम्हारे हाथों में गंदगी). नवंबर में रिलीज होने वाले उनके इस नए एल्बम का नाम है ह्वेन द होम इज बर्निंग (जल रहा हो जब आशियां). इंफाल टॉकीज का पहला एल्बम टिडिम रोड 2009 में रिलीज हुआ था, जो पूरी तरह मणिपुरी में था. अब इस साल शुरू हुए इंफाल म्युजिक प्रोजेक्ट में नगा, बांग्ला और अंग्रेजी के गीत भी शामिल हैं. चिंगांगबम स्थानीय मुद्दों को अपने गीतों में उठाते हैं.
मसलन सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) और इस अधिनियम को खत्म किए जाने की मांग के लिए नवंबर, 2000 से अनशन कर रही इरोम शर्मिला उनके गीतों का अहम मजमून है. उनका कहना है, ‘‘मैं सरकारी और गैर-सरकारी दोनों पक्षों को दोषी मानता हूं. विद्रोही गतिविधियां इसलिए पनपती हैं क्योंकि लोगों को आजादी से जीने की छूट नहीं है. हमें इतनी आजादी नहीं है कि हम जान सकें कि हमें क्या चाहिए और हमारे लिए क्या अच्छा है.’’ उनकी शिकायत है कि शहरी भारतीय संगीत पर पश्चिमी गीतों, बोलों और सरोकारों की नकल करने वाले युवाओं ने कब्जा कर लिया है. उनका एक दिलचस्प सवाल है, ‘‘अगर किसी नौजवान को माइक्रोफोन पकडऩे की आजादी हो तो अपने घर के पीछे सुलगती आग की बजाए वह होटल कैलिफोर्निया जैसा गीत भला क्यों गाएगा?’’

चिंगांगबम का संगीत उत्सवों और ऑनलाइन साधनों के जरिए छोटे से इंडी संगीत सर्किट तक पहुंचता है लेकिन रचनात्मक अभिव्यक्ति के मंच कहीं और उभर रहे हैं. मुंबई में कल्चर शॉक करीब तीन साल से बंगलुरू, हैदराबाद, चेन्नै और कोच्चि के क्लबों में बिग माइक नाइट्स आयोजित कर रहा है. 33 वर्षीय सुदीप नायर, 28 वर्षीय राजेश मरार नायर और 33 वर्षीय प्रमोद सिप्पी की त्रिमूर्ति के समूह ने 28 वर्षीय विराज मांजरेकर जैसे कलाकारों को तराशा है. विराज कैसे में सहूं जैसे गीतों में गुवाहाटी, दिल्ली और मुंबई में यौन हिंसा के दौर में इंसानों की व्यथा और भारत-पाकिस्तान संबंधों के गीत गाते हैं.
बाईस वर्षीय एम.सी. काश जैसे प्रेरक रैप आर्टिस्ट नई विद्रोही संस्कृति के स्वरों के प्रतिनिधि हैं. इनके गीतों में ऐसी कथाएं सुनाई जाती हैं, जिन्हें मुख्य धारा का संगीत कभी नहीं सुनाएगा. कश्मीर के काश सियासी हिपहॉप सिंगर हैं. वे 2007 में अपने सोलो गीत आइ प्रोटेस्ट से चर्चा में आए थे.
‘‘...अब मैं जो भी गीत रचूंगा सोचूंगा, गुनूंगा
कोई बकवास नहीं होगी, कोई न कोई संदेश होगा
जैसे हार कभी न मानी और सच के लिए आज भी दें कुर्बानी
क्योंकि बुराई के संग गलबहियां जो डालीं, तो गिरना निश्चित है मानी
-मुझे गिरना कभी नहीं’, एमसी काश

