सलीम को अब ढंग से याद भी नहीं है कि वे कितने साल पहले अपने गांव कोसी कलां से चलकर दिल्ली आए थे. उन्हें बस इतना ही पता है कि करबला जोरबाग की देखभाल करना उनकी जिंदगी है. यहां लोग कम ही आते हैं, यहां भूले-भटके आने वाले लोग जो थोड़ा-बहुत पैसा दे देते हैं, उसी से इस 62 वर्षीय गरीब मुसलमान का पेट पलता है.
उसे सपने में भी गुमान नहीं है कि दिल्ली के पॉश इलाके में पडऩे वाले जिस करबला का वह खिदमतगार है, उसकी वक्फ जायदाद का बाजार भाव 2,000 करोड़ रु. के करीब है. और उससे यह पूछना तो एकदम ज्यादती होगी कि पिछले दिनों राज्यसभा ने 'वक्फ संशोधन विधेयक 2011’ नाम से एक बिल पास किया है जो देशभर में फैली इसी तरह की लाखों करोड़ रुपए की वक्फ जायदाद से उस जैसे करोड़ों सलीमों की किस्मत बदलने का सपना दिखाता है. देश में वक्फ जायदाद की पड़ताल में इंडिया टुडे को ऐसे पहलू नजर आए, जो इस ख्वाब को स्याह मुस्तकबिल की ओर ले जाते दिखते हैं.

वक्फ की जायदाद या कुबेर का खजाना
वक्फ यानी ऐसी जायदाद जो मुस्लिम समाज के सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए दान में दी गई हो. अगर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को आधार मानें तो देश में 4.9 लाख से अधिक रजिस्टर्ड वक्फ जायदाद हैं. यह जायदाद 6 लाख एकड़ से ज्यादा के क्षेत्रफल में फैली है. रिपोर्ट पेश किए जाने के समय इस जायदाद का बाजार मूल्य कम-से-कम 1.2 लाख करोड़ रु. था. लेकिन राज्यों से मिल रहे वक्फ बोर्डों के आंकड़े और स्वतंत्र आंकड़े मिलाकर देखें तो यह रकम कई लाख करोड़ रु. हो जाती है. यह रकम इतनी है कि अगर देश का हर आदमी गेहूं खरीदने निकले तो सबको एक-एक बोरी गेहूं मिल सकता है. यह रकम मनरेगा योजना के सालाना बजट से चार गुनी है.

अवैध कब्जों से तबाह वक्फ
दिल्ली: पूरी जायदाद अवैध कब्जों से घिरी है. ऊपर, जोरबाग के जिस करबला का जिक्र किया गया है, उसकी 8 एकड़ जमीन पर अवैध कब्जे हैं. इसी तरह महरौली के पॉश इलाके में 500 साल पुरानी गौसिया मस्जिद की दो एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा है. इन दोनों जायदाद की संयुक्त कीमत कोई 3,000 करोड़ रु. है. इन कब्जों को हटाने के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड एफआइआर लिखा चुका है, लेकिन कब्जे नहीं हटे. दिल्ली के हैली रोड पर एक ऐसी ही 500 करोड़ रु. की आधा एकड़ की प्रॉपर्टी दरगाह जलालुद्दीन के पास कब्जा ली गई थी.
जायदाद पर वक्फ बोर्ड को कब्जा तो मिल गया लेकिन मामला वक्फ ट्रिब्यूनल में लंबित है. आइटीओ के पास पंडित पंत अस्पताल के पीछे तकिया काले खां में वक्फ की कई एकड़ पॉश जमीन पर अवैध कॉलोनियां बन गई हैं. दिल्ली वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष चौधरी मतीन अहमद की मानें तो एक साल में बोर्ड ने 1,000 से अधिक बेदखली ऑर्डर जारी किए हैं, लेकिन उन पर कोई अमल नहीं हुआ. मतीन कहते हैं, ''या तो संबंधित नगर निगम आदेश पर कार्रवाई नहीं करते या फिर प्रतिवादी अदालत से स्टे ऑर्डर ले आते हैं.”
उधर, लाल किले के सामने फतेहपुरी मस्जिद में ऐसी दर्जनों दुकानें हैं, जिनका किराया 20 रु. से 200 रु. महीने के बीच अटका हुआ है. मतीन मानते हैं कि बहुत से मामलों में तो वर्षों से किराया मिला ही नहीं है. दिल्ली में वक्फ की प्रॉपर्टी की कीमत 30,000 करोड़ रु. से कम नहीं है, लेकिन जायदाद से वक्फ बोर्ड को महज 2.5 करोड़ रु. सालाना की आय होती है.
उत्तर प्रदेश: यूपी में 1.22 लाख वक्फ जायदाद रजिस्टर्ड हैं.
लेकिन यहां भी वक्फ की जमीन पर लूट का सिलसिला चल रहा है. लखनऊ के बड़े इमामबाड़े के पीछे कभी 20 बीघे का खुला मैदान हुआ करता था. आज यहां 300 से ज्यादा दुकानें और झुग्गी बस्ती बन चुकी है. इमामबाड़े की बगल में वक्फ की जमीन पर दोमंजिला मकान में रहने वाले रामऔतार बताते हैं कि यह मकान 1962 में हरदोई से यहां उनके पिता ने खरीदा था. 60 करोड़ रु. बाजार मूल्य की इस वक्फ संपत्ति पर रामऔतार की तरह सैकड़ों परिवार रहते हैं.

यही हाल वक्फ करबला अब्बास बाग का है. यहां की 25 बीघा में से 10 बीघा जमीन भू-माफिया प्लॉटिंग करके बेच चुके हैं. आजादी के समय लखनऊ में जहां 46 शिया कब्रिस्तान थे, वहीं अब 15 ही बचे हैं. लखनऊ में वक्फ संपत्ति को बचाने के लिए गठित संस्था हुसैनी टाइगर्स के अध्यक्ष शमील शम्सी कहते हैं, ''वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करने का जिम्मा संभालने वाले मुतवल्लियों ने ही भ्रष्टाचार किया है.” अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास 50,000 करोड़ रु. की जायदाद है और इसमें से 40 फीसदी से ज्यादा अवैध कब्जों से घिरी है.
बिहार: यहां सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास 2,426 औैर शिया वक्फ बोर्ड के पास 228 वक्फ संपतियां रजिस्टर्ड हैं. शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहसिन अली मासूमी मानते हैं कि बोर्ड की 40 फीसदी संपत्ति पर अवैध कब्जा है, तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष इरशादुल्लाह का बेबस बयान है कि उनके बोर्ड की 20 फीसदी जमीन पर अवैध कब्जे हैं. इरशाद मानते हैं, ''राज्य में बोर्ड के पास 10,000 करोड़ रु. की जायदाद है, लेकिन सालाना आमदनी 23-24 लाख रु. है.”

उन्हें उम्मीद है कि नए कानून से अतिक्रमण हटाने में मदद मिलेगी. अगर इस अतिक्रमण का जमीनी जायजा लेना हो तो पटना के फ्रेजर रोड का मुल्तान पैलेस इसका आदर्श उदाहरण है. इस पर जिस कदर अतिक्रमण हो रहा है, उससे इसके वजूद को ही खतरा पैदा हो गया है. पटना में डाक बंगला चौराहा, एसपी वर्मा रोड, फ्रेजर रोड, पटना सिटी, अशोक राजपथ और मौर्यालोक जैसे इलाकों में वक्फ की करोड़ों रु. की जायदाद विवादों में फंसी है.
मध्य प्रदेश: यहां वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड संपत्तियों की संख्या 15,000 से अधिक है. सरकार ने आखिरी बार 1990 में इनका मूल्य कोई 52,000 करोड़ रु. आंका था. इस संपत्ति से बोर्ड की सालाना आय महज 3 करोड़ रु. है. पिछले महीने मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष पद से मुक्त हुए गुफरान ए आजम का वर्तमान कीमत के बारे में कहना है, ''ताजा मूल्यांकन के अभाव में वर्तमान कीमत बताना तो कठिन है, लेकिन यह किसी भी सूरत में एक लाख करोड़ रु. से कम तो नहीं ही होगी.” भारत के हृदय प्रदेश में वक्फ संपत्तियों पर सरकारी और गैर सरकारी दोनों तरह के कब्जे हैं.
सरकारी कब्जों का यह हाल है कि एशिया की सबसे बड़ी ताजुल मस्जिद और अपनी खूबसूरती की मिसाल मोती मस्जिद वक्फ की जगह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं. आजम को भी समझ नहीं आता कि मस्जिदें सरकारी संपत्ति कैसे हो सकती हैं. निजी कब्जों के मामले में भी मध्य प्रदेश पीछे नहीं है.

मध्य प्रदेश में वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जे का सबसे बड़ा मामला भोपाल का आरिफ नगर है. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के करीबी और उत्तर भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ अकील के नाम पर 58 एकड़ में यह उपनगर बसा है. यहां सिर्फ जमीन की कीमत 120 करोड़ रु. है. लेकिन इस कब्जे को हटाने के बारे में कांग्रेस या बीजेपी सरकार ने कभी सोचा तक नहीं. आजम की मानें तो प्रदेश में वक्फ के रूप में एक लाख एकड़ कृषि भूमि भी उपलब्ध थी, लेकिन इसकी आय शून्य है.
रखवाले ही लूट रहे वक्फ की जायदाद
वक्फ बोर्डों के गले तक भ्रष्टाचार में धंसे होने की बानगी देखनी हो तो उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड (यूपीएससीडब्ल्यूबी) के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अकमल हुसैन की जांच रिपोर्ट का एक अंश देखिए, ''स्थानीय लोगों, अतिक्रमण करने वालों और किराएदारों से बातचीत के बाद समझ में आया कि इसमें हमारे कर्मचारियों (इंस्पेक्टर और स्थानीय ऑडिटर्स) और संबंधित मुतवल्ली या कमेटी के एग्जीक्यूटिव की मिलीभगत है.
बोर्ड के कुछ कर्मचारियों का आर्थिक-सामाजिक स्तर कुछ ज्यादा ही ऊंचा है और उनके पास शानदार घर, जमीन, गाडिय़ां और बेनामी संपत्ति है. हद तो यह है कि कई मामलों में बोर्ड के कर्मचारी खुद ही वक्फ की एग्जीक्यूटिव कमेटी को सीधे नियंत्रित कर रहे हैं और साथ ही अपने भाई-भतीजों को कमेटी में रखकर उन्हें भी फायदा पहुंचा रहे हैं. ये लोग वक्फ की जायदाद को सस्ते में किराए पर दे रहे हैं या बेच रहे हैं.
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे भ्रष्ट बोर्ड अधिकारियों की संपत्ति की जांच सीबीआइ, इकोनॉमिक ऑफेंस विंग या डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस जैसी जांच एजेंसी से कराने की जरूरत है.” हुसैन की ऐसी बहुत-सी जांच रिपोर्ट वक्फ बोर्ड में धूल खा रही हैं, जिनमें वक्फ जायदाद में बड़े घोटालों का खुलासा किया गया. इन रिपोर्ट में बिजनौर वक्फ नंबर 309, फर्रुखाबाद वक्फ नंबर 247, फर्रुखाबाद वक्फ नंबर 177, सहारनुपर वक्फ नंबर 374/2ए, बदायूं वक्फ नंबर 223 और 224 और बहराइच वक्फ नंबर 19 के मामले प्रमुख हैं.
इनमें से ज्यादातर वक्फ में या तो ऑडिट नहीं हो रहा है या फिर इसके नाम पर खानापूर्ति हो रही है. ऐसे बहुत से मामले हैं जहां फर्जी कर्मचारियों को पेमेंट दिखाकर पैसा मुतवल्ली या कमेटी एग्जीक्यूटिव की जेब में जा रहा है. ये रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि कैसे वक्फ की जमीन को कुछ लोग निजी मिल्कियत के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.

दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद को लेकर भी ऐसे ही आरोप हैं. जामा मस्जिद से कितनी आमदनी होती है या वित्तीय लेखा-जोखा किसके पास है, यह किसी को नहीं पता. जब इस बारे में मतीन अहमद से पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''हम जामा मस्जिद को हाथ नहीं लगाते.” हां, उन्होंने यह जरूर बताया कि प्रति मौलवी 10,000 रु. महीने के हिसाब से मस्जिद में काम करने वाले मौलवियों के वेतन के रूप में 25 लाख रु. महीना दिया जाता है.
लेकिन बोर्ड ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि जामा मस्जिद में चलने वाली पार्किंग का पैसा कौन ले रहा है और इसके आस-पास की दुकानों का किराया कहां जा रहा है. जाहिर है, ये सारे सवाल अंत में जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी की ड्योढ़ी से जाकर टकराते हैं. इसी चुनौती को आगे बढ़ाते हुए जेडीयू सांसद अली अनवर ने कहा, ''वक्फ बोर्ड सिर्फ जामा मस्जिद का वित्तीय प्रबंधन सार्वजनिक कर दे और वहां के प्रबंधन में पारदर्शिता ला दे, दिल्ली के बाकी वक्फ से कब्जे खुद-ब-खुद हट जाएंगे.”

क्या कर पाएगा नया कानून
नए कानून के सबसे बड़े पैराकारों में शामिल जम्मू कश्मीर से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैफुद्दीन सोज को भरोसा है कि वक्फ डेवलपमेंट बोर्ड की जो व्यवस्था की गई है, उससे जायदाद के विकास में फायदा मिलेगा. इसके अलावा बोर्ड को दिए गए बेदखली के अधिकार भी कानून को प्रभावी बनाएंगे. लेकिन उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के सांसद चौधरी मुनव्वर सलीम का सवाल है कि क्या यह कानून वक्फ की जमीन से सरकारी कब्जे हटा पाएगा? उन्हें नहीं लगता कि वक्फ की जमीन पर काबिज रईसों, नेताओं या माफिया को बेदखल करने में यह कानून कामयाब होगा.
उधर, मतीन अहमद कहते हैं कि प्रॉपर्टी के व्यावसायिक इस्तेमाल में सबसे बड़ी बाधा लैंड यूज चेंज कराने की आएगी. यह कानून अच्छी पहल से ज्यादा कुछ नहीं है और जिस तरह से वक्फ बोर्डों के अध्यक्ष अवैध कब्जों की फेहरिस्त गिनाकर खामोश हो जाते हैं, उससे लगता नहीं कि करबला जोरबाग के रखवाले बुजुर्ग सलीम की किस्मत बदल पाएगी.
—साथ में आशीष मिश्र, शुरैह नियाजी और अशोक कुमार प्रियदर्शी
उसे सपने में भी गुमान नहीं है कि दिल्ली के पॉश इलाके में पडऩे वाले जिस करबला का वह खिदमतगार है, उसकी वक्फ जायदाद का बाजार भाव 2,000 करोड़ रु. के करीब है. और उससे यह पूछना तो एकदम ज्यादती होगी कि पिछले दिनों राज्यसभा ने 'वक्फ संशोधन विधेयक 2011’ नाम से एक बिल पास किया है जो देशभर में फैली इसी तरह की लाखों करोड़ रुपए की वक्फ जायदाद से उस जैसे करोड़ों सलीमों की किस्मत बदलने का सपना दिखाता है. देश में वक्फ जायदाद की पड़ताल में इंडिया टुडे को ऐसे पहलू नजर आए, जो इस ख्वाब को स्याह मुस्तकबिल की ओर ले जाते दिखते हैं.

वक्फ की जायदाद या कुबेर का खजाना
वक्फ यानी ऐसी जायदाद जो मुस्लिम समाज के सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए दान में दी गई हो. अगर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को आधार मानें तो देश में 4.9 लाख से अधिक रजिस्टर्ड वक्फ जायदाद हैं. यह जायदाद 6 लाख एकड़ से ज्यादा के क्षेत्रफल में फैली है. रिपोर्ट पेश किए जाने के समय इस जायदाद का बाजार मूल्य कम-से-कम 1.2 लाख करोड़ रु. था. लेकिन राज्यों से मिल रहे वक्फ बोर्डों के आंकड़े और स्वतंत्र आंकड़े मिलाकर देखें तो यह रकम कई लाख करोड़ रु. हो जाती है. यह रकम इतनी है कि अगर देश का हर आदमी गेहूं खरीदने निकले तो सबको एक-एक बोरी गेहूं मिल सकता है. यह रकम मनरेगा योजना के सालाना बजट से चार गुनी है.

अवैध कब्जों से तबाह वक्फ
दिल्ली: पूरी जायदाद अवैध कब्जों से घिरी है. ऊपर, जोरबाग के जिस करबला का जिक्र किया गया है, उसकी 8 एकड़ जमीन पर अवैध कब्जे हैं. इसी तरह महरौली के पॉश इलाके में 500 साल पुरानी गौसिया मस्जिद की दो एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा है. इन दोनों जायदाद की संयुक्त कीमत कोई 3,000 करोड़ रु. है. इन कब्जों को हटाने के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड एफआइआर लिखा चुका है, लेकिन कब्जे नहीं हटे. दिल्ली के हैली रोड पर एक ऐसी ही 500 करोड़ रु. की आधा एकड़ की प्रॉपर्टी दरगाह जलालुद्दीन के पास कब्जा ली गई थी.
जायदाद पर वक्फ बोर्ड को कब्जा तो मिल गया लेकिन मामला वक्फ ट्रिब्यूनल में लंबित है. आइटीओ के पास पंडित पंत अस्पताल के पीछे तकिया काले खां में वक्फ की कई एकड़ पॉश जमीन पर अवैध कॉलोनियां बन गई हैं. दिल्ली वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष चौधरी मतीन अहमद की मानें तो एक साल में बोर्ड ने 1,000 से अधिक बेदखली ऑर्डर जारी किए हैं, लेकिन उन पर कोई अमल नहीं हुआ. मतीन कहते हैं, ''या तो संबंधित नगर निगम आदेश पर कार्रवाई नहीं करते या फिर प्रतिवादी अदालत से स्टे ऑर्डर ले आते हैं.”
उधर, लाल किले के सामने फतेहपुरी मस्जिद में ऐसी दर्जनों दुकानें हैं, जिनका किराया 20 रु. से 200 रु. महीने के बीच अटका हुआ है. मतीन मानते हैं कि बहुत से मामलों में तो वर्षों से किराया मिला ही नहीं है. दिल्ली में वक्फ की प्रॉपर्टी की कीमत 30,000 करोड़ रु. से कम नहीं है, लेकिन जायदाद से वक्फ बोर्ड को महज 2.5 करोड़ रु. सालाना की आय होती है.
उत्तर प्रदेश: यूपी में 1.22 लाख वक्फ जायदाद रजिस्टर्ड हैं.
लेकिन यहां भी वक्फ की जमीन पर लूट का सिलसिला चल रहा है. लखनऊ के बड़े इमामबाड़े के पीछे कभी 20 बीघे का खुला मैदान हुआ करता था. आज यहां 300 से ज्यादा दुकानें और झुग्गी बस्ती बन चुकी है. इमामबाड़े की बगल में वक्फ की जमीन पर दोमंजिला मकान में रहने वाले रामऔतार बताते हैं कि यह मकान 1962 में हरदोई से यहां उनके पिता ने खरीदा था. 60 करोड़ रु. बाजार मूल्य की इस वक्फ संपत्ति पर रामऔतार की तरह सैकड़ों परिवार रहते हैं.

यही हाल वक्फ करबला अब्बास बाग का है. यहां की 25 बीघा में से 10 बीघा जमीन भू-माफिया प्लॉटिंग करके बेच चुके हैं. आजादी के समय लखनऊ में जहां 46 शिया कब्रिस्तान थे, वहीं अब 15 ही बचे हैं. लखनऊ में वक्फ संपत्ति को बचाने के लिए गठित संस्था हुसैनी टाइगर्स के अध्यक्ष शमील शम्सी कहते हैं, ''वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करने का जिम्मा संभालने वाले मुतवल्लियों ने ही भ्रष्टाचार किया है.” अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास 50,000 करोड़ रु. की जायदाद है और इसमें से 40 फीसदी से ज्यादा अवैध कब्जों से घिरी है.
बिहार: यहां सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास 2,426 औैर शिया वक्फ बोर्ड के पास 228 वक्फ संपतियां रजिस्टर्ड हैं. शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहसिन अली मासूमी मानते हैं कि बोर्ड की 40 फीसदी संपत्ति पर अवैध कब्जा है, तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष इरशादुल्लाह का बेबस बयान है कि उनके बोर्ड की 20 फीसदी जमीन पर अवैध कब्जे हैं. इरशाद मानते हैं, ''राज्य में बोर्ड के पास 10,000 करोड़ रु. की जायदाद है, लेकिन सालाना आमदनी 23-24 लाख रु. है.”

उन्हें उम्मीद है कि नए कानून से अतिक्रमण हटाने में मदद मिलेगी. अगर इस अतिक्रमण का जमीनी जायजा लेना हो तो पटना के फ्रेजर रोड का मुल्तान पैलेस इसका आदर्श उदाहरण है. इस पर जिस कदर अतिक्रमण हो रहा है, उससे इसके वजूद को ही खतरा पैदा हो गया है. पटना में डाक बंगला चौराहा, एसपी वर्मा रोड, फ्रेजर रोड, पटना सिटी, अशोक राजपथ और मौर्यालोक जैसे इलाकों में वक्फ की करोड़ों रु. की जायदाद विवादों में फंसी है.
मध्य प्रदेश: यहां वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड संपत्तियों की संख्या 15,000 से अधिक है. सरकार ने आखिरी बार 1990 में इनका मूल्य कोई 52,000 करोड़ रु. आंका था. इस संपत्ति से बोर्ड की सालाना आय महज 3 करोड़ रु. है. पिछले महीने मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष पद से मुक्त हुए गुफरान ए आजम का वर्तमान कीमत के बारे में कहना है, ''ताजा मूल्यांकन के अभाव में वर्तमान कीमत बताना तो कठिन है, लेकिन यह किसी भी सूरत में एक लाख करोड़ रु. से कम तो नहीं ही होगी.” भारत के हृदय प्रदेश में वक्फ संपत्तियों पर सरकारी और गैर सरकारी दोनों तरह के कब्जे हैं.
सरकारी कब्जों का यह हाल है कि एशिया की सबसे बड़ी ताजुल मस्जिद और अपनी खूबसूरती की मिसाल मोती मस्जिद वक्फ की जगह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं. आजम को भी समझ नहीं आता कि मस्जिदें सरकारी संपत्ति कैसे हो सकती हैं. निजी कब्जों के मामले में भी मध्य प्रदेश पीछे नहीं है.

मध्य प्रदेश में वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जे का सबसे बड़ा मामला भोपाल का आरिफ नगर है. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के करीबी और उत्तर भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ अकील के नाम पर 58 एकड़ में यह उपनगर बसा है. यहां सिर्फ जमीन की कीमत 120 करोड़ रु. है. लेकिन इस कब्जे को हटाने के बारे में कांग्रेस या बीजेपी सरकार ने कभी सोचा तक नहीं. आजम की मानें तो प्रदेश में वक्फ के रूप में एक लाख एकड़ कृषि भूमि भी उपलब्ध थी, लेकिन इसकी आय शून्य है.
रखवाले ही लूट रहे वक्फ की जायदाद
वक्फ बोर्डों के गले तक भ्रष्टाचार में धंसे होने की बानगी देखनी हो तो उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड (यूपीएससीडब्ल्यूबी) के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अकमल हुसैन की जांच रिपोर्ट का एक अंश देखिए, ''स्थानीय लोगों, अतिक्रमण करने वालों और किराएदारों से बातचीत के बाद समझ में आया कि इसमें हमारे कर्मचारियों (इंस्पेक्टर और स्थानीय ऑडिटर्स) और संबंधित मुतवल्ली या कमेटी के एग्जीक्यूटिव की मिलीभगत है.
बोर्ड के कुछ कर्मचारियों का आर्थिक-सामाजिक स्तर कुछ ज्यादा ही ऊंचा है और उनके पास शानदार घर, जमीन, गाडिय़ां और बेनामी संपत्ति है. हद तो यह है कि कई मामलों में बोर्ड के कर्मचारी खुद ही वक्फ की एग्जीक्यूटिव कमेटी को सीधे नियंत्रित कर रहे हैं और साथ ही अपने भाई-भतीजों को कमेटी में रखकर उन्हें भी फायदा पहुंचा रहे हैं. ये लोग वक्फ की जायदाद को सस्ते में किराए पर दे रहे हैं या बेच रहे हैं.
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे भ्रष्ट बोर्ड अधिकारियों की संपत्ति की जांच सीबीआइ, इकोनॉमिक ऑफेंस विंग या डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस जैसी जांच एजेंसी से कराने की जरूरत है.” हुसैन की ऐसी बहुत-सी जांच रिपोर्ट वक्फ बोर्ड में धूल खा रही हैं, जिनमें वक्फ जायदाद में बड़े घोटालों का खुलासा किया गया. इन रिपोर्ट में बिजनौर वक्फ नंबर 309, फर्रुखाबाद वक्फ नंबर 247, फर्रुखाबाद वक्फ नंबर 177, सहारनुपर वक्फ नंबर 374/2ए, बदायूं वक्फ नंबर 223 और 224 और बहराइच वक्फ नंबर 19 के मामले प्रमुख हैं.
इनमें से ज्यादातर वक्फ में या तो ऑडिट नहीं हो रहा है या फिर इसके नाम पर खानापूर्ति हो रही है. ऐसे बहुत से मामले हैं जहां फर्जी कर्मचारियों को पेमेंट दिखाकर पैसा मुतवल्ली या कमेटी एग्जीक्यूटिव की जेब में जा रहा है. ये रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि कैसे वक्फ की जमीन को कुछ लोग निजी मिल्कियत के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.

दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद को लेकर भी ऐसे ही आरोप हैं. जामा मस्जिद से कितनी आमदनी होती है या वित्तीय लेखा-जोखा किसके पास है, यह किसी को नहीं पता. जब इस बारे में मतीन अहमद से पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''हम जामा मस्जिद को हाथ नहीं लगाते.” हां, उन्होंने यह जरूर बताया कि प्रति मौलवी 10,000 रु. महीने के हिसाब से मस्जिद में काम करने वाले मौलवियों के वेतन के रूप में 25 लाख रु. महीना दिया जाता है.
लेकिन बोर्ड ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि जामा मस्जिद में चलने वाली पार्किंग का पैसा कौन ले रहा है और इसके आस-पास की दुकानों का किराया कहां जा रहा है. जाहिर है, ये सारे सवाल अंत में जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी की ड्योढ़ी से जाकर टकराते हैं. इसी चुनौती को आगे बढ़ाते हुए जेडीयू सांसद अली अनवर ने कहा, ''वक्फ बोर्ड सिर्फ जामा मस्जिद का वित्तीय प्रबंधन सार्वजनिक कर दे और वहां के प्रबंधन में पारदर्शिता ला दे, दिल्ली के बाकी वक्फ से कब्जे खुद-ब-खुद हट जाएंगे.”

क्या कर पाएगा नया कानून
नए कानून के सबसे बड़े पैराकारों में शामिल जम्मू कश्मीर से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैफुद्दीन सोज को भरोसा है कि वक्फ डेवलपमेंट बोर्ड की जो व्यवस्था की गई है, उससे जायदाद के विकास में फायदा मिलेगा. इसके अलावा बोर्ड को दिए गए बेदखली के अधिकार भी कानून को प्रभावी बनाएंगे. लेकिन उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के सांसद चौधरी मुनव्वर सलीम का सवाल है कि क्या यह कानून वक्फ की जमीन से सरकारी कब्जे हटा पाएगा? उन्हें नहीं लगता कि वक्फ की जमीन पर काबिज रईसों, नेताओं या माफिया को बेदखल करने में यह कानून कामयाब होगा.
उधर, मतीन अहमद कहते हैं कि प्रॉपर्टी के व्यावसायिक इस्तेमाल में सबसे बड़ी बाधा लैंड यूज चेंज कराने की आएगी. यह कानून अच्छी पहल से ज्यादा कुछ नहीं है और जिस तरह से वक्फ बोर्डों के अध्यक्ष अवैध कब्जों की फेहरिस्त गिनाकर खामोश हो जाते हैं, उससे लगता नहीं कि करबला जोरबाग के रखवाले बुजुर्ग सलीम की किस्मत बदल पाएगी.
—साथ में आशीष मिश्र, शुरैह नियाजी और अशोक कुमार प्रियदर्शी

