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सरबजीत सिंह को लेकर बर्बर नापाकिस्तान और बेबस हिंदुस्तान

इटली जैसा छोटा देश अपने हत्यारे नौसैनिकों के लिए भारत से ‘फांसी नहीं’ की गारंटी ले लेता है, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अपने नागरिकों को बचाने का दम नहीं.

अपडेटेड 11 मई , 2013

छब्बीस अप्रैल को लाहौर की कड़ी सुरक्षा वाली कोट लखपत सेंट्रल जेल की कोठरी संख्या 7 में 6 मर्द हत्या के इरादे के साथ घुसे. उनके पास चाबियां थीं और जेल के जंग लगे बरतनों और तेल के पुराने कनस्तरों से बनाए गए ब्लेड थे. उनका काम आसान करने के लिए वहां तीन ईंटें और एक स्टील का पाइप भी था. दस फुट ऊंची चारदीवारी से घिरे और ईंटों के आंगन के बाद बनी 8X8 फुट की कोठरी से हमलावरों ने एक कैदी को बाहर खींचा. तीन मिनट में उनका काम खत्म हो चुका था. लाहौर में घड़ी की सुई शाम के पांच बजा रही थी.

इससे 40 किमी से भी कम दूरी पर स्थित भिखीविंड में उसकी बड़ी बहन, 58 वर्षीया दलबीर कौर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की ओर देख रही थीं, यह सोचते हुए कि ‘‘पाकिस्तान में अब अस्र की नमाज का वक्त हो रहा होगा,’’ सरबजीत थोड़ी ही देर में रात के खाने में पानी जैसी दाल और रोटियां खाएगा. कोट लखपत में अपने भाई को देखने तीन बार जाने की वजह से उन्हें यह पता हो गया था. लेकिन उनके छोटे भाई के लिए एक से ज्यादा मनहूस नियति इंतजार कर रही थी.

करीब 22 साल से मौत की राह पर चल रहे 49 वर्षीय सरबजीत सिंह एक क्षण भी खड़े नहीं रह पाए. उन्हें यह पूर्व आभास हो गया था कि वे लोग उसके साथ क्या करने वाले हैं. अपनी कोठरी की सुरक्षा से बाहर खींचे जाने के कुछ ही मिनटों के भीतर वे जगह-जगह जमे खून के थक्के, टूटे हाथ-पैर और टूटी खोपड़ी के साथ जमीन पर गिरे पड़े थे. हमलावर तब ही ढीले पड़े, जब उन्हें भरोसा हो गया कि उनके शिथिल पड़ चुके शरीर में जान बिलकुल नहीं बची है. सुरक्षा गार्ड जो आसानी से परे हट गए थे, ताकि हत्यारे अपना काम कर लें, चुपचाप वापस लौट आए.

इसके बाद वह कैदी, जिसकी रिहाई और स्वदेश वापसी हाल में भारत-पाकिस्तान के हर द्विपक्षीय मंच पर चर्चा का विषय रही है, लाहौर के जिन्ना अस्पताल के आइसीयू में कोमा की हालत में बिना किसी हरकत के लेटा हुआ था. अस्पताल के एक खाली कमरे में उसके लिए यह विशेष आइसीयू बनाया गया था, लेकिन पाकिस्तान के सर्वश्रेष्ठ सर्जन भी उनकी जान बचाने में नाकामयाब रहे. उनके मायूस परिवार के भारत लौटने के कुछ ही घंटों बाद 2 मई को आधी रात में उन्होंने सरबजीत को ‘मृत’ घोषित कर दिया. सरबजीत की मौत से पूरे भारत में गुस्से की लहर उमड़ पड़ी और और बहुत से लोग सरबजीत को बचाने में नाकाम रहने के लिए केंद्र सरकार के प्रति गुस्से से भर गए.

अमृतसर के पास स्थित उनके गांव भिखीविंड में रात भर चला मोमबत्ती जुलूस लोगों के भारी विरोध प्रदर्शन में बदल गया जिसमें लोगों ने पाकिस्तानी झंडे जलाए. दिल्ली में गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद दलबीर कौर ने कहा, ‘मेरे भाई को पाकिस्तानियों ने प्रताड़ित किया और मार डाला क्योंकि वह भारतीय था.’

पाकिस्तान के अपने समकक्षों के साथ काफी नरमी दिखाए जाने के आरोपों का सामना कर रहे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने यह स्वीकार किया कि सरबजीत की मौत ‘अवाम से अवाम के बीच रिश्तों के लिए एक भारी मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक झटका है.’ रिश्तों पर अगले दिनों में बर्फ जमने के लक्षण साफ तौर पर देखे गए जब संसद में अभूतपूर्व तरीके से पाकिस्तान विरोधी नारे लगे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सीधे पाकिस्तान पर यह आरोप लगाने को बाध्य होना पड़ा कि उसने भारत के अनुरोध को अनसुना कर दिया.

पाकिस्तान में सरबजीत के जिंदा रहने और जेल में बंद रहने के दौरान पिछले पूरे 22 साल में आत्मसंतुष्टि और निष्क्रियता दिखाने की आरोपी केंद्र सरकार और पंजाब की शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी सरकार उनकी मौत के बाद मौके का फायदा उठाने के लिए जाग गई हैं.  इधर एनडीए के कार्यकारी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर इस घटना के लिए केंद्र की नीति को जिम्मेदार ठहराया.

पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सरबजीत की बेटियों स्वप्नदीप और पूनम को नौकरी देने का वादा किया, साथ ही दोनों को एक करोड़ रु. का मुआवजा देने की भी घोषणा की. राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर सरबजीत को ‘‘राष्ट्रीय शहीद’’ घोषित करने और भिखीविंड में 3 मई को एक ‘‘आम आदमी’’ के राजकीय अंतिम संस्कार में 21 तोपों की अभूतपूर्व तरीके से सलामी देने की मांग की गई. इसमें पीछे न रहते हुए केंद्र सरकार ने भी उनके परिवार को 25 लाख रु. देने की घोषणा की और एयर इंडिया से अनुरोध किया कि लाहौर से सरबजीत के शव को लाने के लिए वह अपने जेट विमान की सेवा दे.

पंजाब के सुदूर इलाके में स्थित धूल भरे कस्बे  भिखीविंड में राजनीतिक हस्तियों का जमावड़ा शुरू हो गया और अचानक वीवीआइपी ट्रैफिक की बढ़ोतरी से निबटने के लिए रातोरात तीन अस्थायी हेलिपैड बनाए गए. अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए राहुल गांधी भी पहुंचे और अपने छोटे भाई को चिता पर जलते देख बिलखती हुई दलबीर कौर से मिलने के लिए वहां रुके रहे.

जेल के अधिकारियों का कहना था कि सरबजीत पर यह निंदनीय हमला उसके प्रति ‘अत्यंत घृणा की भावना’ का नतीजा था क्योंकि वह कथित रूप से अगस्त 1990 में फैसलाबाद (लायलपुर) और लाहौर में हुए दो बम विस्फोटों का मास्टरमाइंड था, जिनमें 10 लोग मारे गए थे. यह हमला पाकिस्तान के पुराने जमाने वाली जेल व्यवस्था की भयावह कहानी को बयान करता है. 60 वर्षीय विनोद साहनी इसे ‘‘जिंदा लोगों का कब्रिस्तान’’ बताते हैं. इस पूर्व सैनिक ने जासूसी के आरोप में सियालकोट, मुलतान, साहीवाल और कोट लखपत में 11 साल (1977-1988) गुजारे हैं. वे अब जम्मू में करीब 60 पूर्व जासूसों के संगठन पूर्व गुप्तचर संघ के प्रमुख हैं.

साहनी उन भयावह अनुभवों को याद करते हैं जिसमें जीना ही काफी तकलीफदेह था, थर्ड डिग्री की प्रताडऩा, दिमाग को हिला देने वाली नशीली दवाओं के सेवन के लिए मजबूर किए जाने के बाद हथकड़ी के साथ अनिश्चितकाल तक अंधेरी कोठरी में बंद कर देना, भोजन बंद कर देना और जानलेवा बीमारी होने के बाद भी दवा देने से इनकार करना, आम बात हैं. उनका कहना है कि  कुछ बेहद सौभाग्यशाली लोग ही यातना के इतने साल गुजारने के बाद बचे रह पाते हैं.

उन्होंने बताया कि साहीवाल की सेंट्रल जेल में 1971 के बाद फिर से शिकंजे का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया. शिकंजा ब्रिटिश राज के पुराने जमाने के दौरान प्रताडऩा के लिए इस्तेमाल होने वाला एक भयानक उपकरण है. इसमें कैदियों को इस मशीन पर निर्वस्त्र लिटाया जाता है जो स्टील के एक बड़े ड्रम से बनी होती है, इसकी पूरी बाहरी सतह पर नुकीले कील लगे होते हैं. उन्हें तब तक लिटाया जाता है, जब तक कि उनके शरीर का पिछला हिस्सा पूरी तरह क्षत-विक्षत न हो जाए.

ब्रिटेन की वकील जसबीर उप्पल वर्ष 2007 में सरबजीत की दुर्दशा की कहानी जानने के बाद नागरिक आजादी की सक्रिय आंदोलनकारी बन चुकी हैं. उप्पल ने कहा कि पाकिस्तान की जेलों में ऐसे बहुत से भारतीय सड़ रहे हैं जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर में नहीं आए हैं. इनमें से बहुत से लोग 1971 युद्ध के युद्धबंदी हैं और वह इसके बाद से लगातार यातना सह रहे हैं. ये लोग पाकिस्तान की कैद में जीवन बिताने को मजबूर हैं और उन्हें भारत की तरफ से अपना हाल पूछने का कोई संकेत नहीं मिल रहा.

नवंबर, 2012 में उप्पल ने पाकिस्तान की अदालतों, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त (ओएचसीएचआर) के जेनेवा ऑफिस, ह्यूमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल और सलमान खुर्शीद को राम दास और मंगल सिंह के बारे में एक याचिका दी.  इन दोनों भारतीय जासूसों को दिसंबर 1971 में जेल में डाला गया और वे अब भी कोट लखपत जेल में बंद हैं.

हाल में ही गत 7 मार्च को उन्होंने ब्रिटिश सांसदों की एक संयुक्त समिति को दिए ज्ञापन में ऐसे दर्जनों कैदियों का विवरण दिया जिनके बारे में बाहरी दुनिया को कोई जानकारी नहीं है. इनमें पंजाब का 15 साल का एक गायब बच्चा भी शामिल है जिसे आठ साल बाद पाकिस्तान की एक जेल में पाया गया था. ऐसा माना जाता है कि मसीराह द्वीप विदेश स्थित ऐसा कैदी शिविर है, जहां पाकिस्तान ने 1970 के दशक के मध्य में बहुत से युद्ध बंदियों को भेजा था. इनमें से किसी का भी नाम विदेश मंत्रालय की 1971 में गायब हो गए 54 भारतीय सैनिकों की सूची मे शामिल नहीं है.

उप्पल का कहना है कि वे यह जानकर दंग रह गईं कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था किस तरह दुर्दशा झेल रहे अपने नागरिकों को ही पहचानने से इनकार कर देती है. पाकिस्तान का भारतीय कैदियों के साथ 1970 के दशक की शुरुआत में चालू हुआ बर्बर व्यवहार आज भी जारी है, जिसका सहारा उसने 1971 के युद्ध में अपमानजनक हार का बदला लेने के लिए लिया है. जेलों में भारतीय कैदियों को खाने के नाम पर अब भी नाश्ते में गुड़ का एक टुकड़ा और अधपका छोला दिया जाता है और बाकी पूरा दिन उन्हें घुन भरे 233 ग्राम आटे से बनी चार चपातियों और पानी जैसी दो कटोरी दाल के सहारे गुजारना पड़ता है.

गत 15 जनवरी को 40 वर्षीय चमेल सिंह की  कोट लखपत जेल में ही मौत भी दफन हो जाती, अगर पाकिस्तान के एक स्वयंसेवी आंदोलनकारी तहसीम खान ने आवाज बुलंद नहीं की होती. इस मामले के खुल जाने के बाद भी पाकिस्तानी प्रशासन ने चमेल सिंह के शव की जांच करने के लिए राजी होने में दो महीने लगा दिए, सिर्फ  अपने इस दावे पर कायम रहने के लिए कि उसकी मौत ‘हार्ट अटैक’ से हुई है. चमेल के शव को गत 15 मार्च को भारत को सौंप दिया गया, लेकिन जम्मू-कश्मीर में रहने वाले उनके परिवार को अब भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट की एक कॉपी का इंतजार है.

सरबजीत पर 26 अप्रैल को हुए हमले में भी कोट लखपत जेल के कर्मचारियों की संलिप्तता के संकेत मिले हैं. डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (जेल) मलिक मुबाशिर द्वारा जांच में यह दावा किया गया है कि सरबजीत की सुरक्षा के लिए तैनात दो वार्डन एहसानुल हक और मुहम्मद सफदर को भी उसे बचाने की कोशिश में दो हमलावर कैदियों अमर अफताब और मुदस्सर द्वारा पिटाई से मामूली चोटें आई हैं. लेकिन इसके पहले कुछ जेल कर्मचारियों ने जो बयान दिए थे, उनमें हमलावरों की संख्या ‘छह’ बताई गई थी, जिनमें वे दो वार्डन भी शामिल थे जिन्हें निलंबित कर दिया गया है.

सरबजीत का शोकाकुल परिवार यह मानता है कि यह हमला किसी बड़ी साजिश का नतीजा है जिसमें जेल के शीर्ष अधिकारी भी शामिल रहे हैं. दलबीर कौर ने बताया, ‘‘उनके पास चाकू और रॉड थे. मुझे लगता है कि वार्डन ने खुद ही हमलावरों को मेरे भाई की कोठरी की चाबी दे दी थी.’’ कोट लखपत जेल में सजा काट चुके कई पूर्व कैदियों का भी यह कहना है कि किसी मौत की सजा पाए कैदी तक जेल कर्मचारियों के अलावा और किसी का पहुंच पाना असंभव है.

सरबजीत के परिवार का आरोप है कि भारत सरकार ने कुछ खास नहीं किया. लाहौर से 1 मई को वाघा सीमा पर लौटने के बाद परेशान और दुखी दलबीर कौर ने पत्रकारों से कहा था, ‘प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस्तीफा दे देना चाहिए.’ साहनी ने कहा कि भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान ने पाकिस्तान में उसके अस्तित्व को नजरअंदाज करने के लिए हर संभव प्रयास किया है.

उन्होंने कहा, ‘क्या आप विश्वास करेंगे कि मेरे 11 साल तक जेल में रहने के दौरान दूतावास से एक भी व्यक्ति मिलने नहीं आया था. भारतीय कैदियों के साथ पाकिस्तान जानवरों की तरह व्यवहार करता है क्योंकि हमारे अपने लोग हमें जानवरों की तरह ही समझते हैं.’’

सरबजीत पर बर्बर हमले के दो दिन बाद 28 अप्रैल को सलमान खुर्शीद ने उनकी मदद करने का वादा किया था. उन्होंने मास्को में टीवी पत्रकारों से कहा था, ‘हम जो कुछ भी अच्छे से अच्छा कर सकते हैं, करेंगे.’ लेकिन साथ में उन्होंने यह भी कहा कि इस मसले पर सरकार के लिए ‘‘एक बिंदु से आगे जाना वास्तव में कठिन है.’

दलबीर कौर ने कहा, ‘ये मिट्टी के खिलौने हैं, ये कुछ नहीं कर सकते.’ वह इससे ज्यादा सटीक बात और क्या कह सकती थीं.

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