ऐसे विपरीत माहौल में भी अगर रचनात्मक सोच पनप रही है तो कारोबारी दिग्गजों के विश्व मंच दावोस में भारतीय अंदाज में बात करने वालों का उभरना उसकी एक बेहतरीन मिसाल है. कॉरपोरेट भारत में साम्राज्य खड़े करने वालों में से सबसे महत्वाकांक्षी हस्तियां अब ग्लोबलाइज हुई दुनिया का सबसे अच्छा उपयोग करते हुए भारत की सीमाओं से परे दौलत कमाने में जुटी हैं.
सत्ता एक निरंतर जारी रहने वाला संघर्ष है. मुल्कों की अपनी कहानी में यह इतिहास की धाराओं से टकराने का संघर्ष है. और जीत तो अंतत: नेतृत्व की सहज बुद्धि की ही होती है. व्यक्तियों की कहानी की बात करें तो भी ऐसा नहीं है कि ऊंचे तबके में, जिसे दूसरे शब्दों में सत्ता प्रतिष्ठान कहा जाता है, उसकी सदस्यता की अवधि अपने आप बढ़ती रहती हो. वक्त की सबसे कठिन चुनौतियों में वही खरे उतरते हैं जिनके पास रचनात्मक सोच और जोखिम उठाने का जज्बा है.
समाज के सबसे ऊपरी तबके में गिने चुने यही वे दबदबे वाले लोग हैं जो अपने पेशे की हदों से भी बाहर निकलकर एक बड़े मंच पर ताकत की पटकथा लिखते हैं. वे सबसे अलग होते हैं और उनका प्रदर्शन पैसे और दिमाग, विचारों और दृष्टिकोण से संचालित होता है. उनके प्रभाव क्षेत्र का दायरा बोर्ड रूम से न्यूज रूम, सिनेमाघर से टेलीविजन की स्क्रीन तक, वकील के चैंबर से लेखक की स्टडी तक फैला होता है लेकिन ऊंचे-नीचे धरातल वाली दुनिया में उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है.
इंडिया टुडे की ऊंचे और असरदार लोगों की सूची के ग्यारहवें संस्करण में उनकी जय-पराजय की झलक मिलती है और पहले की तरह अब भी इसमें बाजार के शहंशाहों का बोलबाला है. ‘‘भारत उदय’’ की कहानी को आज भले ही आर्थिक ग्राफ और आंकड़ों का सहारा न हो और उसकी जगह ‘‘भारत ठहराव’’ ने ले ली हो, फिर भी भारत का कारपोरेट जगत प्रेरणादायी किस्से सुना रहा है. हालांकि आज देश में ऐसी सरकार नहीं है जो विकास के लिए आदर्श माहौल दे रही हो बल्कि ऐसी सरकार है जिसके पास कोई दूरगामी आर्थिक सोच नहीं है. इसलिए भारत के उद्यमी वर्ग की सफलता व्यक्तिगत साहस और अभिनव सोच की देन है और वह भी ऐसे मुल्क में जो लोकतंत्र की सबसे बुरी आदतों यानी एक से अधिक सत्ता केंद्रों और नौकरशाही के मकडज़ाल से त्रस्त है. ऐसे विपरीत माहौल में भी अगर रचनात्मक सोच पनप रही है तो कारोबारी दिग्गजों के विश्व मंच दावोस में भारतीय अंदाज में बात करने वालों का उभरना उसकी एक बेहतरीन मिसाल है.
कॉरपोरेट भारत में साम्राज्य खड़े करने वालों में से सबसे महत्वाकांक्षी हस्तियां अब ग्लोबलाइज हुई दुनिया का सबसे अच्छा उपयोग करते हुए भारत की सीमाओं से परे दौलत कमाने में जुटी हैं. इसके बावजूद ऊंचे और असरदार लोगों की सूची में शामिल उद्योग के हर प्रतिनिधि को दिलेर या सम्मानित नहीं कहा जा सकता. इनमें से ज्यादातर का नैतिकता से बहुत वास्ता नहीं और कुछ को तो सिस्टम का लाभ मिला है. भ्रष्टाचार की सीढिय़ों को तेजी से फलांगते भारत में कड़क टाइ-सूट वाली ऐसी हस्तियों की कमी नहीं है जो बोर्ड रूम और कोर्ट रूम दोनों की जरूरतों को बड़े सहज ढंग से पूरा करने में सक्षम हैं. सत्ता या शक्ति के साथ हमेशा नैतिकता और मर्यादाओं का संबंध हो यह कतई जरूरी नहीं.
कारोबार जगत के ठीक नीचे मीडिया के बादशाह हैं और उनकी कहानी भी एकदम भारतीय है, वह भी उस दुनिया में जहां न्यूज यानी समाचार सबसे ज्यादा बिकाऊ वस्तु नहीं है. हो सकता है कि उनमें रचनात्मकता का गुबार बाजार की संभावनाओं की बराबरी का न हो क्योंकि अधिकतर भारतीय अपने समाचार और मनोरंजन के कार्यक्रम अपने टैबलेट या मोबाइल फोन पर नहीं पढ़ते-देखते. वे पश्चिम की टचस्क्रीन पीढ़ी की बराबरी करने जा रहे हैं फिर भी उन्होंने हकीकत का साथ नहीं छोड़ा है. पुराना मीडिया बाजार ही भारत के मीडिया के बादशाहों की बैलेंसशीट को सहारा देता है. फिर भी वे बाजार की नैतिकता को तिलांजलि देने में उस्ताद साबित हो रहे हैं और साथ-साथ मुनाफा भी कमा रहे हैं.
सत्ता के पिरामिड का तीसरा पायदान सांस्कृतिक सामंतवाद का ज्यादा आदी है. इसमें फिल्मी सितारे और शो बिजनेस के सितारे आते हैं. हिंदी सिनेमा आज सिर्फ नाच गाने का मेला नहीं रहा है. लीक को तोडऩे वाले नए खिलाडिय़ों और उनके संरक्षकों ने दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग को ज्यादा समावेशी और दिलेर बना दिया है. ऊंचे और असरदार लोगों की सूची में वे आज के लोकप्रिय फिल्मी ब्रांड्स के साथ पूरा सामंजस्य रखते हुए मौजूद हैं.
सबसे बड़ा शो तो खुद भारतीय लोकतंत्र है, हालांकि उससे होने वाला मनोरंजन देश की सेहत के लिए ज्यादा से ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है. राजनीतिक सत्ता के मंसूबों और गलत इरादों का विरोध ही लोकतंत्र को प्राणवायु दे रहा है. असंतोष के ये स्वर कभी चौराहों पर या टेलीविजन के प्राइम टाइम पर सुनाई और दिखाई देते है अथवा अखबारों के संपादकीय पन्नों से ललकारते प्रतीत होते हैं. विरोधी स्वरों की यह शक्ति आज इस सूची में कहीं ज्यादा मुखर है.
सत्ता की धुरी भी जगह बदल चुकी है. शासक, सेनापति और कारोबारी का जो त्रिकोण कल तक पारंपरिक सत्ता प्रतिष्ठान को परिभाषित करता था, अब वह खुले समाजों और वैश्वीकरण की आंधी में कहीं गुम होता जा रहा है. इंडिया टुडे की ऊंचे और असरदार लोगों की 2013 की सूची में उन लोगों ने भी जगह बना ली है, जो लोकतंत्र की एक सबसे धधकती भट्टी में तपकर कुंदन हो गए हैं. उन्होंने बदलते वक्त के साथ कदम ताल करने के लिए खुद को बदला है. दुनिया में हमेशा सबसे आगे रहने के उनके इस संघर्ष ने ही आगामी पन्नों पर सत्ता की 50 छटाओं में इक्कीसवीं सदी के भारत की कथा का रूप लिया है.

