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यूपीए यूपी के रहमो-करम पर, कांग्रेस के साथ करुणा नहीं

डीएमके का हटना यूपीए सरकार के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि मुलायम सिंह यादव और मायावती में से किसी ने भी हाथ खींच लिए तो सरकार अल्पमत में होगी.

अपडेटेड 3 अप्रैल , 2013

यह ऐसा बिगड़ैल घोड़ा है जो न सिर्फ अपने सवार को पटक देता है, बल्कि अपनी कब्र खुद खोद लेता है.” गुस्साए डीएमके प्रमुख एम. करुणानिधि ने 19 मार्च को चेन्नै की अन्ना सलाई रोड पर पार्टी मुख्यालय में दर्जनों टेलीविजन कैमरों के सामने अपनी भड़ास कुछ इस तरह निकाली थी. यह वही शानदार दफ्तर था, जहां नौ साल पहले कांग्रेस के साथ गठजोड़ की सौदेबाजी करने के बाद उन्होंने सोनिया गांधी का शानदार स्वागत किया था.

बगल में खड़े उत्तराधिकारी एम.के. स्टालिन की बांछे खिली हुई थीं और डीएमके प्रमुख यूपीए गठबंधन छोडऩे की धमकी दे रहे थे. उनकी मांग थी—केंद्र सरकार 21 मार्च को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में रखे जाने वाले अमेरिका-नीत प्रस्ताव में कुछ शर्तें शामिल कराए, जिसमें श्रीलंका सरकार से कहा गया

है कि बागी एलटीटीई के खिलाफ 2009 के आखिरी दिनों में अपनी सेना द्वारा किए गए युद्ध अपराधों की जांच कराए. इससे पहले समझौता करने आए ए.के. एंटनी, गुलाम नबी आजाद और पी. चिदंबरम उन्हें शांत करने में नाकाम होकर चुपचाप जा चुके थे. डीएमके चाहता था कि भारत एनएचआरसी के प्रस्ताव में नरसंहार शब्द शामिल कराए और श्रीलंकाई सेना की युद्ध ज्यादतियों की समयबद्ध अंतरराष्ट्रीय जांच की भी मांग करे.

करुणानिधि भले ही सधे हुए शब्दों में लिखी गई बातें पढ़ रहे थे पर अपने पूरे रंग में थे. उनके पीछे नारे लगा रहे कार्यकर्ताओं ने सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के खिलाफ  हंगामा मचा रखा था.

तृणमूल कांग्रेस के हटने के ठीक छह महीने के बाद यूपीए-2 से डीएमके की समर्थन वापसी ने कांग्रेस से सरकार के भीतर उसके दो सबसे बड़े सहयोगी छीन लिए हैं. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के 19 और करुणानिधि की डीएमके के 18 सांसद हैं. यूपीए अब पूरी तरह से कांग्रेस की सरकार है.DMK

साथ में नाम के लिए एनसीपी के नौ और राष्ट्रीय लोकदल के पांच सांसद हैं. उसे उत्तर प्रदेश के तुनकमिजाज नेताओं—मुलायम सिंह यादव और मायावती ने ऑक्सीजन दे रखी है. अगर 22 सांसदों वाली समाजवादी पार्टी (सपा) या 21 सांसदों वाली बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) में से किसी ने भी हाथ खींच लिया तो आम चुनाव समय से पहले होकर रहेंगे.

मायावती की बीएसपी ने समर्थन वापसी का कोई संकेत नहीं दिया है, लेकिन डीएमके के हटते ही सपा ने इधर-उधर से धमकियां देनी शुरू कर कर दीं. 20 मार्च को सपा के प्रवक्ता और मुलायम सिंह के चचेरे भाई रामगोपाल यादव ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार यूपीए-2 से कहीं ज्यादा एकजुट थी, उसकी कार्यशैली कहीं ज्यादा बेहतर थी. धर्मनिरपेक्षता की कट्टर समर्थक सपा की तरफ से नाराजगी का यह कड़ा इजहार था.

सपा की नाराजगी का तात्कालिक कारण केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का ताजा बयान था. उन्होंने 18 मार्च को कहा था कि सपा के मुखिया ने 2002 में गुजरात चुनाव लड़कर आतंकवाद का साथ दिया, क्योंकि उन्होंने नरेंद्र मोदी विरोधी वोट बांट दिया थे. 20 मार्च को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी लोकसभा के भीतर हाथ जोड़े मुलायम से बात करते देखी गईं. उसके तुरंत बाद वर्मा ने खेद व्यक्त करने का बयान दिया, लेकिन मुलायम शांत नहीं हुए.

तमिलनाडु में बवंडर

तमिलनाडु में लोगों का गुस्सा सबसे ज्यादा उस वीडियो को देखकर भड़का जिसमें एलटीटीई के मारे गए मुखिया वी. प्रभाकरन के छोटे बेटे बालचंद्रन की मरने से पहले और बाद की तस्वीरों को दिखाया गया है. इसे ब्रिटेन के चैनल 4 ने पिछले महीने जारी किया था. 8 मार्च को लोयोला कॉलेज के आठ छात्र चेन्नै में चार दिन के अनशन पर बैठे. यह आग फौरन दूसरे कॉलेजों में भी फैल गई. 15 मार्च को राज्य सरकार ने अगली सूचना तक सभी कॉलेज बंद करने का आदेश दे दिया.

राज्य के लगभग हर राजनैतिक संगठन ने इस मुद्दे को लपक लिया. जयललिता ने करुणानिधि को मात देते हुए 18 मार्च को प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि केंद्र सरकार अमेरिकी प्रस्ताव को ज्यादा कठोर बनाए और भारत अपना प्रस्ताव तैयार करे. पीएमके पार्टी के एस. रामदास ने कह दिया कि अगर डीएमके गंभीर होती तो करुणानिधि शोर मचाने से पहले प्रस्ताव रखने का निर्धारित समय बीतने का इंतजार करने की बजाए केंद्र से एनएचआरसी में प्रस्ताव रखवाते.DMK

डीएमके के कुछ नेता निजी तौर पर मानते हैं कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि यूपीए उनकी दो मुख्य मांगों को मानेगा. इन मांगों की सूचना 17 मार्च को प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को अलग-अलग पत्रों में दी गई थी. सूत्रों का कहना है कि सरकार से बाहर निकलने के करुणानिधि के इस कदम के पीछे 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का भी बड़ा हाथ रहा होगा, जिसमें उनके वफादार ए. राजा और बेटी कनिमोली मुख्य आरोपी हैं.

डीएमके के हटने का एक और कारण यह भी हो सकता है कि 6 जनवरी, 2013 को अगला पार्टी प्रमुख घोषित किए जाने के बाद से स्टालिन ही पार्टी के ज्यादातर फैसले करते हैं. स्टालिन श्रीलंका का मुद्दा सबसे ज्यादा उठाते रहते हैं. वे नवंबर, 2002 में जिनेवा भी गए थे ताकि तमिल ईलम समर्थक संगठन तेसो की ओर से संयुक्ïत राष्ट्र को एक ज्ञापन दे सकें.

डीएमके सूत्रों का कहना है कि शुरू में आनाकानी कर रहे पिता को यूपीए से हटने के लिए स्टालिन ने ही मजबूर किया, लेकिन आखिरी फैसला अब भी करुणानिधि के हाथ में है. यह बात डीएमके के केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे के एक दिन बाद साबित हो गई, जब सीबीआइ की टीम ने स्टालिन के घर पहुंचकर उनके गैराज में खड़ी हमर (गाड़ी) के बारे में पूछताछ शुरू कर दी. इस गाड़ी को स्टालिन के पुत्र उदयनिधि चलाते हैं और संदेह है कि इसे गैर-कानूनी ढंग से विदेश से लाया गया है.

स्टालिन के समर्थक अभी इसे राजनैतिक बदले की कार्रवाई बताने और शोर-शराबा करने की तैयारी में ही थे कि करुणानिधि ने कह दिया कि यह छापा राजनैतिक कार्रवाई है या नहीं, कहना मुश्किल है. सूत्रों का दावा है कि यह इस बात का संकेत हो सकता है कि डीएमके प्रमुख चाहे कितना ही शोर मचा लें, पर शायद कांग्रेस के साथ उन्होंने अपने सारे संपर्क खत्म नहीं किए हैं. हालांकि जिस तरह से प्रधानमंत्री को लेकर वित्त मंत्री तक ने सीबीआई के छापे से खुद को अलग किया और माफी मांगने की मुद्रा अपनाई, वह कमजोर होते केंद्र का संकेत है.

विरोधियों को श्रीलंका का मुद्दा उड़ा ले जाने का मौका देना डीएमके के लिए आत्मघाती होता. जून, 1996 में से लगातार 16 साल केंद्र की सत्ता में भागीदार देश की एकमात्र पार्टी पर यह आरोप लगने लगा था कि उसने श्रीलंकाई तमिलों के लिए कुछ नहीं किया है. मिसाल के तौर पर सन् 2000 में श्रीलंका-एलटीटीई संघर्ष के तीसरे दौर में जब तमिल टाइगर्स ने एलिफेंट पास में हजारों श्रीलंकाई सैनिकों को घेर लिया था, तब विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने श्रीलंका की सेना को समर्थन देने का वादा किया था. गौरतलब है कि तब डीएमके सत्तारूढ़ एनडीए में शामिल था.

यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान संघर्ष के आखिरी चरण में करुणानिधि का इतना दबदबा तो था कि इस खून-खराबे को रुकवा सकें. 2009 में श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे को भुनाने की उनकी कोशिश की भी बहुत आलोचना हुई. चेन्नै के मरीना तट पर करुणानिधि का आमरण अनशन महज छह घंटे हो गया क्योंकि तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के नारायणन ने उन्हें यकीन दिला दिया कि श्रीलंकाई सेना लड़ाई में भारी हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेगी.

नई जोड़-तोड़

तमिलनाडु में कांग्रेस ने 1967 में आखिरी बार शासन किया था. ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस ने एलटीटीई पर श्रीलंकाई सेना के आखिरी वार को रोकने के लिए कुछ नहीं किया और इसकी छाप इसके बाद हुए चुनावों में साफ  दिखाई दी. बीजेपी पर अब भी अल्पसंख्यक विरोधी का ठप्पा लगा हुआ है. करीब 20 प्रतिशत तमिल मतदाता अल्पसंख्यक समुदायों के हैं. डीएमडीके के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, ''जब भी किसी क्षेत्रीय दल ने बीजेपी से गठजोड़ किया है तो उसके सिर्फ  दो प्रतिशत वोट उसे मिले हैं, लेकिन उसने अपने चार प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट गंवाएं भी हैं.”

सूत्रों का कहना है कि अभिनेता-नेता और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता विजयकांत की डीएमडीके पार्टी डीएमके की तरफ बढ़ रही है. उनका आरोप है, ''संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने श्रीलंका के विरुद्ध प्रस्ताव को भारत के दबाव में कमजोर किया है.” विजयकांत कांग्रेस से सीधे गठजोड़ करने में आशंकित हैं, लेकिन भीतर के लोगों की मानें तो वे डीएमके-नीत ऐसे किसी मोर्चे के विरुद्ध नहीं हैं, जिसमें कांग्रेस की हैसियत छोटी हो.

जब तक डीएमके और कांग्रेस के बीच समझौते की गुंजाइश नहीं होती, तब तक तमिलनाडु में एक संभावना यह है कि दोनों द्रविड़ दल बीजेपी को अकेला छोड़ दें और कांग्रेस को सिर्फ पीएमके का संग मिले. डीएमके की कोशिश डीएमडीके, वाम दलों और वीसीके से नाता जोडऩे की हो सकती है, जबकि एआइडीएमके श्रीलंका समर्थक तमिल गुटों और एमडीएम के जैसे छोटे दलों को साध सकती है, लेकिन अगर डीएमके ने यूपीए छोड़ो अभियान में पलटी खा ली और डीएमडीके, कांग्रेस तथा वीसीके के साथ अपना गठजोड़ जारी रखा तो वाम दल, एमडीएमके और श्रीलंका समर्थक तमिल गुट एआइडीएमके की तरफ झुक सकते हैं.

इधर यूपीए, तमिलनाडु में व्यस्त है तो उधर दूसरे दल अगले चुनाव में अपनी हैसियत मजबूत करने में जुटे हैं. 17 मार्च को दिल्ली में अपनी अधिकार रैली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी गैर-कांग्रेसी, गैर-बीजेपी विकल्प टटोलने के लिए तैयार है (इसी अंक में देखें: नीतीश का दिल्ली प्लान). साथ ही उन्होंने बीजेपी के साथ गठजोड़ जारी रखने या कांग्रेस से हाथ मिलाने का विकल्प भी खुला रखा. नीतीश के जनता दल यूनाइटेड के 20 सांसद यूपीए-2 के बहुत काम आ सकते हैं.

गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दावा कर रहे हैं कि यूपीए-2 को कोई खतरा नहीं है. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने विश्वास व्यक्त किया है कि सरकार बची रहेगी, लेकिन उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को अचानक चुनाव के लिए तैयार रहने की हिदायत भी दे डाली है.

सच तो यह है कि यूपीए को अब अपनी सरकार बचाने की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. अब किसी आर्थिक सुधार कानून को पारित कराना यूपीए सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा. पिछले साल लोकसभा में खुदरा कारोबार में एफडीआइ का प्रस्ताव पारित कराने में डीएमके की भूमिका निर्णायक थी. सपा और बीएसपी सुधार के मुद्दों पर लोक-लुभावन रुख अपनाने के लिए मशहूर हैं. उन्हें बीमा और पेंशन में एफडीआइ या विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे विधेयकों को समर्थन देने के लिए राजी करना आसान नहीं होगा.

तीसरे कार्यकाल की दावेदार सरकार के लिए अर्थव्यवस्था में ठहराव और महंगाई मददगार साबित नहीं हो सकते. डीएमके की निकासी से सरकार के विधायी एजेंडा को करारा झटका लगा है. इससे यह धारणा प्रबल होगी कि यूपीए अपाहिज है और अगले आम चुनाव तक दिन काट रही है. अगर राजनैतिक प्रतिष्ठान से उठ रही आवाज कोई संकेत दे रही है तो अगला चुनाव 2013 में हो सकते हैं.

—साथ में ए. सदासिवम, एस. सेंथिल कुमार और आर. नरसिम्हन

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