लखनऊ में राजाजीपुरम में हुसैन भाई ने लकड़ी के लडख़ड़ाते स्टूल से अपने पैर हटाए और कुर्सी पर आगे झुकते हुए बोले, ''वो तो आपके और मेरे जैसे पढ़े-लिखे लोग ही समझ सकते हैं कि पब्लिक सेक्टर कंपनी होने का मोल क्या है.” साइकिल मरम्मत करने वाली दुकान के भीतर बैठे हुसैन भाई पूरे अधिकार से सहारा के बारे में बात कर रहे हैं, जिसे काटना थोड़ा बदतमीजी लगती है. अपने बाएं हाथ से साइकिल मैकेनिक से लेकर सड़क पार खड़े हेयर ड्रेसर तक इशारा करते हुए उन्होंने बात पूरी की, ''ये भला इसे क्या समझेंगे.” इलाके में लोग इज्जत से उन्हें हुसैन भाई कहते हैं. वे सरकारी मुलाजिम हैं. दिन में कुछ घंटे दफ्तर जाते हैं, अखबार पढ़ते हैं और अंग्रेजी के जुमले उछालते हैं.
लेकिन असल में वे गलत हैं. साइकिल मैकेनिक अवधेश घुटनों तक खाकी निकर पहनते हैं और हेयर कटिंग की दुकान चलाने वाले रामदीन पैंट के ऊपर बनियान पहने हुए हैं. दोनों ने अपना पहला नाम ही बताया और दोनों को इसमें कतई शक नहीं कि सहारा सरकारी कंपनी है और इसी वजह से वे उसमें भरोसे के साथ पैसा लगाते हैं.
बात चाहे कितनी गलत हो, लेकिन लखनऊ के लोग आसानी से इस पर यकीन करते हैं. भरोसा करने वालों के लिए तो सचिन तेंडुलकर और हर भारतीय क्रिकेटर की जर्सी पर सहारा का नाम होना इस बात का पुख्ता सबूत है कि वह सरकार से जुड़ी कंपनी है. इस शहर में हर तरफ सहारा ही सहारा है. सड़क, डिवाइडर या गोल चक्कर हर जगह सहारा के बोर्ड हैं. 1, कपूरथला कॉम्प्लेक्स में उसका कॉर्पोरेट ऑफिस, इस भीड़ भरे इलाके में सिर उठाए खड़ा है. गोमती नगर वह इलाका है जिसे मायावती ने चमका दिया था, लेकिन उनके पार्क और मूर्तियां हल्के ग्रे रंग के सहारा शहर के सामने फीकी पड़ जाती हैं. असल में यह एक किला है, जिसका बाहरी हिस्सा शानदार है, ऊंची दीवारें, वॉच टावर और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था है.
इसमें घुस पाना आसान नहीं है, लेकिन अगर आप घुसने में कामयाब हो जाएं (हम ऐसा कर पाए) तो आपकी आंखों के सामने एकदम नई दुनिया आ जाती है. इस दुनिया में सहाराश्री यानी सुब्रत रॉय सहारा शहंशाह हैं. 300 एकड़ में फैले इस शहर में चौड़ी खाली सड़कें, भव्य मेहराब, पांच हजार सीटों का ऑडिटोरियम, सिनेमाघर, मेडिकल यूनिट, इंडियन ऑयल का फिलिंग स्टेशन और ढाई किमी घेरे में फैली झील है. हरे भरे क्रिकेट ग्राउंड के आसपास छोटी-छोटी कॉटेज और क्लब हाउस है. विशाल मैदान में चार शेरों से खिंचे रथ पर सवार भारत माता की भव्य प्रतिमा है.
भारत माता नमन स्थल के पास ही रॉय के पिता सुधीर चंद्र को समर्पित ज्योति स्थल है. सहारा ग्रुप की वेबसाइट पर सुधीर चंद्र को जाना-माना शुगर टेक्नोलॉजिस्ट और सहारा श्री की माता छवि रॉय को विनम्र गृहिणी बताया गया है. ज्योति स्थल का प्रमुख आकर्षण सुधीर चंद्र की प्रतिमा है. 1 अप्रैल को उनके जन्म दिवस पर ज्योति दिवस मनाया जाता है. पूरे शहर में रवींद्रनाथ ठाकुर, सुभाष चंद्र बोस, अबुल कलाम आजाद और चंद्रशेखर आजाद जैसी नामी हस्तियों की कुछ छोटी प्रतिमाएं हैं. कुछ दूर पर एक बड़ा गुंबद दिखाई देता है, जहां शायद रॉय का निवास है. लेकिन सख्ती से मना कर दिया जाता है कि आप उधर नहीं जा सकते.
सहारा शहर ही वह जगह है, जहां अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद नेताओं और उद्योगपतियों के काफिले के साथ दोपहर का भोजन करने गए थे. अखबारों में इस खबर पर कोई खास हैरानी नहीं थी, किसी-किसी अखबार ने तो छोटी-सी खबर छापी थी. सोचकर देखिए कि राहुल गांधी, प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही भारती एंटरप्राइज के अध्यक्ष सुनील मित्तल के घर खाना खाने पहुंच जाएं, जिनके पिता कांग्रेस के सदस्य हुआ करते थे. अगर और कुछ भी न हो तो भी भारती के शेयर आसमान छू लेंगे.
लेकिन रॉय की शेयरों के भाव में कोई खास दिलचस्पी नहीं होगी. उन्होंने तो कंपनी के नाम को अपना उपनाम बना लिया है और मैनेजिंग वर्कर तथा चेयरमैन की अनूठी पदवी धारण कर ली है. उनकी दिलचस्पी इस बात में है कि रामदीन और अवधेश जैसे लोग क्या यकीन करते हैं. उसी से उन्हें अविश्वसनीय वित्तीय ताकत मिलती है.
यूनीक साइकिल रिपेयर के मालिक अवधेश ने सहारा की दो योजनाओं में पैसा लगाया है. पहली में वे हर रोज 10-15 रु. और दूसरी में 10 रु. जमा करते हैं. वे कहते हैं, ''हम तो रोज कुआं खोदकर पानी पीते हैं.” वे बगल से गुजराते रिक्शा पर बजते मोहम्मद रफी के गीत को सुनने के लिए पल भर चुप होते हैं और फिर बताते हैं, ''इसलिए मुझे सहारा पसंद है. यह हम पर ज्यादा बोझ् नहीं डालता, बल्कि बचत में हमारी मदद करता है.”
सहारा समूह से उनकी पहली मुलाकात 20 साल पहले हुई जब उन्होंने एक स्कीम में 5 रु. रोज जमा कराने शुरू किए. उसके पूरा होने पर दूसरी ले ली, फिर एक और ले ली. अब वे रोजाना 10 रु. जमा कराते हैं, उनकी जमा रकम की रसीद हर 15 दिन में आ जाती है. दोनों के सिर पर हुसैन भाई का हाथ है, उनका कहना है, ''सहारा में पैसा लगाने में जोखिम कम है. सहारा में मेरा पैसा सुरक्षित है.”
शहर के दूसरे छोर पर, बख्शी का तालाब मुहल्ले में दुकानें बड़ी हैं और मालिक ज्यादा अमीर हैं, पर उन्हें भी सहारा पर उतना ही भरोसा है. दिवाकर प्रकाश सिंह ने बताया कि उन्होंने 1994 में जिस दिन कपड़ों की दुकान खोली, उसी दिन सहारा में खाता भी खोल लिया. तब से एक के बाद एक कई स्कीम में पैसा लगाया, जिस दिन पुरानी स्कीम पूरी हुई, उसी दिन नई में पैसा लगा दिया. अब उनकी दो स्कीम चल रही हैं. वे हर एक में रोजाना 100 रु. जमा करते हैं. उन्होंने बताया, ''ब्याज बहुत नहीं मिलता, लेकिन पैसा थोड़ा-थोड़ा जाता है और एक साथ वापस आता है.”
पाइप विक्रेता संजय लाल मौर्य 15 साल से सहारा के साथ हैं और आजकल रोज 100 रु. जमा कराते हैं. उन्होंने बताया, ''कभी-कभी पैसे जमा कराने का मन नहीं होता, लेकिन जब एजेंट कहता है, भैया दे दो ना, तो मना करना मुश्किल हो जाता है.” एजेंट आम तौर पर कोई रिश्तेदार या दोस्त या पड़ोसी होता है. हुसैन भाई कहते हैं, ''हम अनजान लोगों को पैसा नहीं देते.”
असल में बहुत सारे एजेंट तो अपने ही परिवार और दूसरे रिश्तेदारों से शुरुआत करते हैं. वे कमीशन पर काम करते हैं. इसलिए रोजाना छोटी-छोटी रकम के लिए छोटे दुकानदारों के पास जाने में हिचकते नहीं. जबकि बैंक अपने कर्मचारियों के भरोसे चलते हैं, जिनके पास इतना पसीना बहाने के लिए न तो वक्त है और न कोई इनाम मिलता है. वैसे भी, सहारा के बहुत से खाता धारकों के बैंक खाते नहीं हैं.
अगर राजाजीपुरम के कर्मियों की बात करें तो संदीप नाम का एजेंट (इसने भी कोई उपनाम नहीं बताया) अकसर अपनी साइकिल की मरम्मत या टायर में हवा भरवाने अवधेश की दुकान पर आता है. उसके बालों में मेहंदी का भूरा रंग साफ दिखाई देता है. संदीप उनका दोस्त भी है और उस कंपनी का एजेंट भी है, जिस पर वे बचत के लिए भरोसा करते हैं. अवधेश ने बताया, ''मैं सहारा में पैसा इसलिए भी जमा कराता रहता हूं कि संदीप के साथ रिश्ता खराब नहीं करना चाहता.” यही रिश्ता सहारा के प्रति उनके नजरिए की चमक और बढ़ा देते हैं, यानी यह वह ग्रुप है जिसने उनके दोस्तों को नौकरी दी है.
मैनेजिंग वर्कर इस बात से परिचित हैं. अपनी वेबसाइट पर उन्होंने ङ्क्षजदगी में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि दर्ज की है, ''मुझे बहुत गर्व है कि मैं दुनिया के सबसे बड़े परिवार का संरक्षक हूं.” सहारा ग्रुप में यह सहारा परिवार कहलाता है, इसके सदस्यों की संख्या आज 10 लाख को पार कर चुकी है, जबकि 1978 में रॉय ने 2,000 रु. की पूंजी, एक मेज, दो कुर्सी, लैम्ब्रेटा स्कूटर, एक मुंशी और एक चपरासी से शुरुआत की थी. ऐसी मामूली शुरुआत करने वाले लोग बहुत होंगे, लेकिन उनमें से कोई भी रॉय के अनूठे जीवन दर्शन की बराबरी नहीं कर सकता.
वेबसाइट पर सुधीर चंद्रा को यह श्रेय दिया गया है कि उन्होंने अपने बेटे को इंसानों की इज्जत करना सिखाया. किस्सा कुछ यूं है कि एक बार पिता ने देख लिया कि बेटा सुब्रत अपनी कमीज सही ढंग से प्रेस न करने के लिए धोबी को फटकार रहा था. फिर क्या था, पिता ने झाड़ लगाई, ''वह तुम से बड़ा नहीं है? तुम उसकी कमीज प्रेस कर सकते हो? उसे यह काम तुम से बेहतर आता है.” पिता से मिली सीख का सार कुछ इस तरह बताया गया है, ''जो मिले उससे सदा संतुष्ट रहो, पर देते समय हमेशा असंतुष्ट रहो.” इसीलिए रॉय अपनी कंपनी के दर्शन को ''कलेक्टिव मटीरियलिज्म” कहते हैं और पूरे ग्रुप की नजर में यही दर्शन सामूहिक हिस्सेदारी और देखभाल के लिए सामूहिक विकास की वकालत करता है.
सहारा ग्रुप के कर्मचारियों और एजेंटों ने कभी कोई यूनियन नहीं बनाई. यह कभी खुद को डिविडेंड नहीं देता. मुनाफे का 40 प्रतिशत कर्मचारियों के कल्याण पर खर्च होता है. उन्हें कर्तव्ययोगी कहा जाता है. बाकी 35 प्रतिशत कंपनी के स्वामित्व वाले फंड्स में जाता है और शेष समाज सेवा के लिए है. यही इसकी अनूठी पहचान है.
लेकिन इधर कुछ दिनों से यह संतुलन थोड़ा गड़बड़ाया लगता है और रॉय का ''सब ठीक-ठाक है” का परदा झीना होता जा रहा है. जब दिन अच्छे थे, तो सहारा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता था. 1990 के दशक के आखिरी दिनों में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के घोटालों में घिरने (यह वही दौर था जब सी.आर. भंसाली के नाम से मशîर सीआरबी स्कैम में आम लोगों के 1200 करोड़ रु. डूब गए) के बावजूद सहारा ने दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की की. जून, 2011 में ग्रुप की बुनियाद समझे जाने वाले सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन ने अखबारों में एक विज्ञापन दिया कि उसके पास कुल जमा का मूल्य 73,000 करोड़ रु. है. इस विज्ञापन ने तहलका मचा दिया. इसके तुरंत बाद रॉय ने इंडिया टुडे से कहा, ''सहारा परिवार भीतर से बहुत मजबूत है और अपने रास्ते में आने वाले तमाम कांटों को पार कर जाएगा.”
लेकिन कांटों की चुभन बढ़ती गई. 73,000 करोड़ रु. की घोषणा ऐसे समय आई, जब भारतीय रिजर्व बैंक और प्रतिभूति तथा विनिमय बोर्ड (सेबी) के साथ टकराव चल रहा था. दोनों नियामक सहारा कंपनियों द्वारा डिपोजिट जमा करने पर अंकुश लगाना चाह रहे थे. रिजर्व बैंक ने विज्ञापन भी छपवा दिए थे कि वह सहारा कंपनियों में जमा होने वाली रकम के भुगतान की गारंटी नहीं देगा. सेबी ने भी यही रुख अपनाया. सुप्रीम कोर्ट ने सेबी के रुख का समर्थन किया और सहारा से कहा कि उसकी दो कंपनियों ने लाखों छोटे निवेशकों से ओएफसीडी (वैकल्पिक पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर्स) के जरिए करीब 24,000 करोड़ रु. की जो रकम जमा की है उसे लौटा दिया जाए. ऐसा लगा कि यह जंग लंबी चलेगी और वर्षों तक अदालत में मामला लटका रहेगा, लेकिन सेबी ने 13 फरवरी को एक और वार किया और उन दोनों कंपनियों तथा रॉय सहित कंपनी के प्रमुख अधिकारियों की संपत्तियां तथा बैंक खाते फ्रीज कर दिए, जिन्होंने ओएफसीडी जारी किए थे.
पिछले साल अगस्त में सोसाइटी पत्रिका में एक इंटरव्यू में रॉय ने अपनी बात कहने के लिए तुलना के बड़े पुराने हथियार का सहारा लिया और तुलना भी बांग्लादेश से की, ''हम उनके एक वरिष्ठ मंत्री के घर लंच करने गए थे, मंत्री जी ने इतनी ज्यादा दिलचस्पी ली कि अपने लोगों से कहा कि फलां-फलां नदी से ताजी मछली लाकर मुझे खिलाएं... लोगों को वहां जाकर सीखना चाहिए कि मंत्री और अफसर बिना कोई अहं दिखाए कैसे बर्ताव करते हैं.
अगर आप उनके देश का भला करने गए हैं तो वे आपसे प्यार करते हैं, आपकी इज्जत करते हैं और आपका स्वागत करते हैं और आपको बहुत अच्छा महसूस होता है. मैं अपने देश से प्यार करता हूं, फिर भी सख्ती से कहना चाहता हूं कि दिल्ली में बैठे लोगों को जाकर सीखना चाहिए कि वहां के लोग कैसा बर्ताव करते हैं. उन्हें सीखना चाहिए कि देश के विकास के लिए सही लोगों का स्वागत कैसे किया जाता है. वे दूसरों को सता कर खुद मजा नहीं लेते.”
वे ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स कैमरन से भी इसी तरह प्रभावित हैं, ''जब मैं ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मिलने गया तो मेरी कार थोड़ी देर के लिए गेट के बाहर रोक दी गई. जब मैं भीतर पहुंचा तो कोई सुरक्षा जांच नहीं हुई. प्रधानमंत्री ने आते ही सबसे पहले माफी मांगी और जोर से बोले रॉय साहब, माफी चाहता हूं कि आपको गेट पर रुकना पड़ा. क्षमा कीजिए, मैं ऐक्शन लूंगा. यह बात सही नहीं है. फिर उन्होंने मेरे तमाम आने वाले प्रोजेक्टस के बारे में पूछा. उन्हें सब कुछ मालूम था, मैं चार दिन पहले ही लंदन पहुंचा था, पर उन्हें सब मालूम था. मैं उनकी प्रशंसा करता हूं. वे बहुत गजब के प्रधानमंत्री हैं.”
दिसंबर, 2012 में इंडिया टुडे समूह के आजतक चैनल ने नई दिल्ली में 'एजेंडा आजतक’ सम्मेलन आयोजित किया. रॉय ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में बहुत कम जाते हैं, लेकिन वहां गए और साफ-साफ कह दिया, ''अगर भारत में इतनी मुश्किलें नहीं होतीं, बिना कसूर इतना सताया न जाता तो मैं (कारोबार करने) सीमा पार कभी नहीं जाता.’’ सहारा ने लंदन और न्यूयॉर्क में बड़े नामी होटल खरीदे.
रॉय के अनुसार नियामकों को अपनी जिम्मेदारियों से ज्यादा अधिकारों की समझ है, ''नियमकों को नियमन करना सिखाया जाना चाहिए, प्रतिबंध एजेंसी बनना नहीं. अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसे बंद कर दो, लेकिन सही चुनाव करो. सब कुछ बंद मत करो. अगर रिजर्व बैंक मेरे सामने बैठे तो मैं समझ सकता हूं कि अब बिना कोई हुनर वाला नौजवान भी तरक्की कैसे कर सकता है.”
उन्होंने बताया कि उद्यमी के रूप में इतने लंबे सफर में कैसी-कैसी रुकावटें आईं और वे कैसे उन्हें छकाकर आगे बढ़े. उन्होंने 1978 में लोगों से पैसा जमा करने की एक स्कीम से शुरुआत की, जिस पर 1979/80 में पाबंदी लग गई और तुरंत पैसा वापस करना पड़ा. फिर उन्होंने एक पार्टनरशिप कंपनी खोल ली, लेकिन बैंकिंग संशोधन अधिनियम 1982 के तहत उसे जनता से पैसा उगाहने से रोक दिया गया. फिर उन्होंने हाउसिंग फाइनेंस कंपनी शुरू की, जिसके लिए बाजार से पैसा उगाहने की कोई सीमा नहीं थी. ''हम उसमें कूद पड़े, लेकिन दो साल भी नहीं बीते थे कि सीमा लगा दी गई. फिर हमने परस्पर लाभ वाली एक कंपनी खोली, अगले डेढ़-दो साल में उस पर भी पाबंदी लग गई.” फिर उनके करियर में मुसीबतों से मुक्त सबसे लंबा दौर आया, जब उन्होंने एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी चलाई. वह दो दशक तक आराम से काम करती रही. फिर उस पर भी पाबंदी लग गई. ''अब यह मत पूछिए कि नियामकों ने इस पर पाबंदी क्यों लगाई.”
अब सहारा की दो कंपनियों ने वह ओएफसीडी जारी किए जो आजकल सेबी के निशाने पर हैं, जिन्हें बंद करने और पैसा चुकाने का आदेश दिया गया है. ''अब तो कोऑपरेटिव का रास्ता बचा है लेकिन कोई नौजवान या नया उद्यमी उसके बारे में सोच भी नहीं सकता. अगर मुझे आज शुरुआत करनी पड़े तो मैं 5-10 करोड़ से आगे नहीं जा सकता. विकास के मामले में हमने समाजवाद का रास्ता छोड़ दिया है. दौलतमंद परिवारों के लोग ही आगे बढ़ सकते हैं, इसलिए समाजवाद की बात न करें. पूंजीवाद की बात करें.”
निराश रॉय को विदेशी चीजें इस्तेमाल करना कभी पसंद नहीं था, लेकिन अब वे विदेशी परफ्यूम लगाने लगे हैं, ''मेरी पत्नी विदेशी परफ्यूम लगाती थीं, पर जब मुझ पर से करतीं तो मैं दूर हट जाता था. लेकिन आज मैं उसे लगाता हूं.” उनके इस गुस्से की गंध अभी राजाजीपुरम नहीं पहुंची है. वहां किसी को चिंता नहीं है. मालूम भी नहीं है कि नियामकों के साथ सहारा का क्या झंगड़ा है. बस एक शिकायत है कि सहारा ग्रुप कभी-कभी उनका पैसा लौटाने में देर कर देता है. हुसैन भाई के शब्दों में, ''कभी-कभी लोगों को जरूरी काम होता है, जैसे गैस का कनेक्शन लेना हो, ऐसी हालत में पैसा मिलने में देरी से मुश्किल होती है.”